दैविक निर्देश
भगवान
श्री सत्य साई बाबा
पर
वार्तायें तथा साक्षात्कार
अनिल कुमार कामराजू
प्रोफेसर बाटनी :-
श्री सत्य साई उच्च
शिक्षण संस्थान
प्रशान्ति निलयम
पूर्व प्राचार्य :-
श्री सत्य साई उच्च
शिक्षण संस्थान
वृन्दावन परिसर, बैंगलोर
सम्पादित द्वारा :-
श्री टी. आर. दत्ता
से.नि. प्रोफेसर इंगलिश
:-
आन्ध्रा विश्वविद्यालय,
विशाखापटनम
अनुवादक :-
मदन मोहन राय
सम्पादक :-
श्री सत्य साई समाचार
विषय
प्रवेष
भूमिका
5
सम्पादकीय
7
प्रस्तावना
10
भाग -
1 वार्तायें
1. सफलता का
रहस्य 11
2. पंच
कोष
34
3. शरीर सम्बन्धी
समझदारी 39
4. समझदारी - मन
की 44
5.
बुद्धि
52
6.
आत्मा-स्रोत्र
59
7. ज्ञातम,
दृष्टम्,
प्रतिष्टम् 66
8. पूजा : विधि,
प्रक्रिया
73
9. तब और
अब
79
10. उद्देश्यसहित
जीना 88
11. तीन से मुक्त
हो
94
12. ईश्वर के साथ
रहना, ईश्वर के लिये रहना, ईश्वर में रहना 101
13. धर्म और
आध्यात्मिकता 112
14. सनातन
धर्म
120
15. मननम -
पुनरावर्तन
129
16. प्रसन्नता की
कुंजी 136
17. बालक -
बाबा
144
18. साई अवतार की
घोषणा
147
19. अवतार साई
बाबा 156
20. साईं रूपान्तरण
166
21. दुर्गा - शक्ति
की देवी
173
22. देवी लक्ष्मी की
विशेषतायें (महत्व) 178
23. जीवन एक
चुनौती 187
भाग -
2
24. बाबा के प्रश्न
अनिल कुमार से
187
25. बाबा से
साक्षात्कार
196
26. श्री अनिल कुमार
से प्रश्न
अ)
विश्वास व अन्य विषय 209
ब)
संवाद
228
स)
नवरात्रि. का त्योहार
238
27. सत्य
उपनिषद
246
28. रामला केन्द्र पर
साक्षात्कार 259
भूमिका
भगवान बाबा के श्रीचरणों में शत्-शत् प्रणाम !
प्रस्तुत
पुस्तक "दैविक निर्देश" (Divine Directions) भगवान श्री सत्य साई बाबा के निकटतम
भक्त, दैविक प्रवचनों हेतु स्वयं उनके द्वारा चुने दुभाषिये तथा श्री सत्य साई मिशन
के राजदूत श्री अनिल कुमार जी के सम्भाषणों, विभिन्न समूहों में चर्चाओं तथा भगवान
बाबा से प्रत्यक्ष वार्ताओं एवं समाधानों का एक संकलित रूप है। ऐसा कौन है जो श्री
अनिल कुमार जी से परिचित नहीं। वे अत्यन्त मृदुभाषी, सरल तथा सादगी भरे स्नेहिल
व्यक्तित्व के धनी हैं। आप उन्हें सदैव मृदुमुस्कान के साथ देख सकते हैं। यही
व्यक्तित्व उनके सम्भाषणों एवं चर्चाओं में उभरकर आया है। श्री अनिल कुमार जी श्री
सत्य साई उच्च शिक्षा संस्थान में प्रवक्ता के पद पर सेवारत हैं। वह बाबा के मिशन
के प्रवक्ता भी हैं तथा देश-विदेश में भगवान के सन्देशों का प्रसार करने में व्यस्त
हैं।
इस पुस्तक में
हमारे व्यवहारिक जीवन तथा संसारी जीवन की समस्याओं से लेकर आध्यात्मिकता की ऊंचाई
तक पहुंचने की समस्याओं का निराकरण अति रोचक एवं प्रमाणित ढ़ंग से किया गया है।
उन्होंने भगवान बाबा के उपदेशों, शिक्षाओं तथा प्रत्यक्ष व्यवहारों द्वारा जो भी और
जितना भी हृदयंगम किया, वह सब, हम सब में वितरित कर देने की उनकी अदम्य इच्छा का
दर्शन होता है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद लगता है कि हम बहुत कुछ जानने के बाद भी
कुछ नहीं जानते हैं। इसमें अनेक धार्मिक एवं आध्यात्मिक शंकाओं को निर्मूल किया गया
है। क्या धर्म है और क्या अध्यात्म, स्पष्ट रेखा खीची गई है। ईश्वर के अनेक रूपों,
कथानकों एवं क्रियाओं की व्याख्या की गई है। पुस्तक में भगवान बाबा के महानतम
चमत्कारों का विषद वर्णन मिलता है। श्री सत्य साई बाबा भगवान हैं, इसे यथार्थ की
कसौटी पर कस कर स्थापित किया गया है। इसके विभिन्न अध्यायों को बार-बार पढ़ा जा सकता
है और हर बार आपको इसमें कुछ नवीनता मिल जाएगी।
यह पुस्तक
प्रत्येक व्यक्ति, भले ही वह आर्त हो या अर्थाथी, जिज्ञासु हो या ज्ञानी, सभी का
मार्ग दर्शन करती है। वस्तुत: साई साहित्य में यह अनूठी कृति है। इस पुस्तक का
हिन्दी में अनुवाद भगवान बाबा की कृपा, उनकी प्रेरणा तथा इच्छा ही रही है, अन्यथा
मुझ जैसे मन्दमति को यह सौभाग्य कहां मिलता? गुड़गांव निवासी श्री आर.के.सूद को मिली
प्रेरणा, को शब्द दिया श्री वी.के. सिंह ने जो प्रशान्ति निवासी हैं और मुझे कार्य
रूप में हस्तगत हुई। मैं इनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूं।
मैं श्री अनिल
कुमार जी का अनुग्रहीत हूं जिन्होंने मुझे इस अमूल्य कृति का अनुवाद करने हेतु
स्वीकृति प्रदान की। मैं श्री वी.के. सिंह जी का ऋणी हूं जो सदैव मेरे कल्याण हेतु
सदकार्यों की ओर प्रेरित करते रहे हैं। मैं श्री आर.के. सूद जी का बहुत-बहुत
अनुग्रहीत हूं कि उन्होंने मेरे घर राजाजीपुरम् आकर 15.3.06 को होली के दिन यह
पुस्तक अनुवाद करने हेतु स्वीकृति सहित प्रदान की।
मैं इस कृति
को इस रूप में प्रस्तुत करने में श्री शरद तिवारी तथा श्रीमती शुभ्रा कुमार के
प्रति आभार व्यक्त करता हूं जिन्होंने प्रूफ पढ़ने तथा कम्प्यूटर पर तैयार करने में
महान सहयोग दिया।
अन्त में मैं
कहना चाहूंगा कि वे जो चलना सीखना चाहते हैं अर्थात अपने जीवन के लक्ष्य को पहचान
कर उसे सार्थकता प्रदान करने हेतु प्रयास करना चाहते हैं, वे भगवान बाबा से इस
प्रार्थना के साथ "मैं आप का बच्चा हूं, कृपया अंगुली पकड़ लें, मैं चलना चाहता
हूं" इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें और बार-बार पढ़ें।
9.8.2007
अनुवादक
ई-5/106, राजाजीपुरम्,
मदन मोहन राय
लखनऊ-226017
सम्पादकीय
अपने परम प्रिय
भगवान श्री सत्य साई बाबा के चरण कमलों में, मैं अपना प्रणाम अर्पित करता हूं।
प्रो0
अनिल कुमार की वार्तायें तथा साक्षात्कार, मेरी दृष्टि में, एक आध्यात्मिक आत्मकथा
या एक मिशन, जो आगे बढ़ रहा है, के सार को प्रस्तुत करते हैं। भगवान श्री सत्य साई
बाबा ने जिन्हें स्वयं अपने दिव्य प्रवचनों हेतु दुभाषिया चुना है तथा जो भगवान
बाबा के निर्देशानुसार यहां एवं विदेशों में श्री सत्य साई सेवा संगठन के कार्यों
को करते हुए वृन्दावन और प्रशान्ति निलयम के श्री सत्य साई उच्च शिक्षण संस्थानों
के विभागीय सदस्य के रूप में सेवारत हैं। किसी समय वृन्दावन परिसर के प्राचार्य
रहे, श्री अनिल कुमार, बाबा के सर्वाधिक भक्तों के बीच एक परिचित चेहरा है। एक
पश्चिमी पाठक को, इस अध्यात्मिक आत्मकथा में सेन्ट आगस्टीन के "कनफेशन्स" का
दृढ़तापूर्वक किया गया आत्म-निरीक्षण, कोलेरिज की "टेबल टाक" का आध्यात्मिक
गाम्भीर्य और चार्ल्स लैम्ब के लेखों में हास्य मिश्रित उत्साह का सुन्दर सम्मिलन
मिलेगा। भारतीय पाठकों को ज्ञान, अपने जीवन में सरलता से व्यवहार पुरातन ज्ञान
स्थानीय भाषा में मिल जायेगा। पाठकों के लिए इन वार्ताओं तथा साक्षात्कारों में
भगवान के स्वर में वही चुटकुले और उदाहरण, विचार और सन्दर्भ सर्वत्र मिलेगा। अनिल
कुमार जी का प्रत्येक वक्तव्य वास्तविक रूप से श्री सत्य साई वचनामृत का एक प्रकार
का भावानुवाद तथा पुनर्कथन है। हमारे समस्याग्रस्त युग में प्रत्येक घंटे और
प्रत्येक मिनट बहुत बड़ी संख्या में लोग सहायता हेतु एक अज्ञात ईश्वर को, नाम सहित
ईश्वर तथा ऐसे ईश्वर को यदि है, की पुकार लगाते हैं। जिज्ञासु, अर्थाथी, दु:खी,
ज्ञान के खोजी और सांसारिक सुखों के पीछे दौड़ते लोगों से आती पुकारों का स्वामी
द्वारा प्रति उत्तर देने के अनगिनत उदाहरण हैं। वे सर्वत्र दु:खीजनों को सान्त्वना
तथा सलाह देते हैं। भगवान के शब्द जिस प्रकार अनिल कुमार के माध्यम से उनकी कृपा
द्वारा व्यक्त होते हैं, उनकी प्रमाणिकता एक आध्यात्मिक आकांक्षी के लिए बहुमूल्य
साधन है।
अधिकतर
वार्तायें वृन्दावन के अध्ययन मण्डलों में दी गई हैं और कुछ चुने हुए श्रोतागणों के
बीच, जिन्हें मूल पाठ में पहचाना जा सकता है। विषयों की विस्तृत श्रेणी श्री अनिल
कुमार की आध्यात्मिक भूख का द्योतक है। समस्यायें, जिनका विश्लेषण किया गया है, वे
हैं जिनका सामना व्यक्ति तथा संसार करता है, वे ईश्वर और भक्ति के हमारे विचारों
तथा दिव्यता, देवताओं, अवतारों और धार्मिक ग्रन्थों के सम्बन्ध में हमारी बदलती
धारणाओं से सम्बन्धित हैं। कुछ न पूछे प्रश्न तथा अबोले विचार भक्तों को भटका देते
हैं। यद्यपि भगवान बाबा की सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमानता और सर्वदृष्टा को मानते
हुए, भक्तगण बाबा द्वारा दिखाई पड़ने वाले पक्षपात, उनका दुभाषिये का उपयोग, सेवा
वर्ग के कार्यकर्ताओं से असन्तुष्टि और शिरडी साई के देह त्याग तथा सत्य साईं के
अवतरण के बीच समय के सम्बन्ध में अटकलबाजियां तथा सीता, कृष्ण आदि के सम्बन्ध में
शंकाओं से दु:खी हो जाते हैं।
साक्षात्कार
में प्रश्न और अनुपूरक प्रश्नों के प्रारूप में वजन तथा शक्ति कम ही दिखाई देती है।
स्वामी अक्सर अनिल कुमार द्वारा शब्दों के चयन या बल देने में सुधार करते हैं तथा
समुचित शब्दों को बताते भी हैं, यह सिद्ध करता है कि वे कितनी सूक्ष्मता से ध्यान
देते हैं। अनिल कुमार को तेलगू कहावतों एवं मुहावरों का शाब्दिक और भावात्मक अर्थ
प्रेषित कर पाने का वरदान है। उनका अंग्रेजी अनुवाद मूल पाठ के निकटतम होता है।
उनकी वार्तायें, जीवन्त तथा प्रेरणाप्रद होती हैं। वास्तव में यह ध्यान देने योग्य
है कि एक साक्षात्कार के समय, कदाचित नाटकीय प्रभाव उत्पन्न करने के लिए
साक्षात्कारकर्ता को छोड़कर स्वामी अनिल कुमार से प्रश्न पूछने लगते हैं। ऐसा उनका
सौभाग्य है उन पर कृपा, सदा प्रसन्न रहने वाले अनिल कुमार की मुस्कान, उनके सम्भाषण
में नृत्य करती है, भगवान द्वारा स्वीकृत दिव्य वरदान है। मैं भगवान से प्रार्थना
करता हूं कि वे इस संग्रह के पाठकों को उनके दिव्य प्रवचन सुनने के आनन्द की
अनुभूति पाने का आशीर्वाद दें।
प्रोफेसर अनिल
कुमार की वार्ताओं और साक्षात्कारों को प्रकाशित करने का कार्य, हमारी आध्यात्मिक
यात्रा में एक मील का पत्थर है। हमारी भक्ति का यह विनम्र प्रतीक, भगवान बाबा के
75वें जन्म दिन के शुभ अवसर पर हमारी प्रेमपूर्ण भेंट है। सम्पूर्ण संसार के भक्तों
की सेवा, कर पाने हेतु, मैं प्रो0 अनिल कुमार का कृतज्ञ हूं कि उन्होंने हमें भगवान
के अनेक विषयों पर भगवान के दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व
के भक्तों की सेवा करने का अवसर प्रदान किया। दो अप्रकाशित वार्तायें "सफलता की
कुंजी" और "सुखों की कुंजी" सर्वप्रथम यहां प्रस्तुत है। अनिल कुमार का डेविड जीवान
द्वारा साक्षात्कार, "रामला केन्द्र न्यूजलेटर ग्लास्टनबरी, यू.के.", और सत्या
उपनिषद, "सत्य साईं दि अवतार ऑफ लव" श्री प्रशान्ति सोसायटी, हैदराबाद द्वारा
प्रकाशित हो चुके हैं। इस पुस्तक के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे
सभी, जो प्रकाशन के विभिन्न स्तरों से जुड़े हैं, सम्पादक, मुद्रक और प्रकाशक,
पवित्रता ग्राफिक्स लि. (चेन्नई) के श्री वी0 कोटेश्वर राव और ऑडियो टेप की अनुकृति
करने वाले श्री बी0 फणिशंकर, श्री डी0एच0आर0के0 सन्यासी सेट्टी और श्री बी0
ब्रह्मानन्द राव (विशाखापट्टनम) सभी साईं अनुयायी हैं। स्वामी के चरण कमलों में
समर्पित होने हेतु शक्ति प्राप्त करने तथा उनकी सेवा में योग्य यन्त्र बनने के लिए
हम सदा भगवान बाबा के दैविक निर्देशों का पालन करते रहें, यही प्रार्थना है।
साईं राम
नवम्बर, 1,
2000
टी. आर. दत्त
श्री साईं सदन
39.8.1 मुरलीनगर,
विशाखापत्तनम्, 530 007
यूनीकोड फोन्ट
रूपान्तरणकर्ता :-
सुरेश चन्द्र अग्रवाल,
109, दरभंगा कालोनी,
इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)
मोः 9936834821
ऊँ
श्री भगवान श्री सत्य साई बाबाय नम:
प्रेम
ईश्वर है।
जहां
प्रेम है,
वहां
निश्चित रूप से ईश्वर है।
अधिक
से अधिक लोगों को प्रेम करो।
उन्हें
और अधिक तथा तीव्रता से प्रेम करो।
प्रेम
को सेवा में परिवर्तित करो।
सेवा
को पूजा में परिवर्तित करो।
यही
अध्यात्मवाद में सर्वोच्च
अनुशासन है।
-बाबा
भगवान श्री सत्य साई बाबा के दिव्य चरण कमलों में
समर्पित
अध्याय -1
सफलता का रहस्य
प्रिय बन्धुओं एवं बहनों
!
साई
राम !
कदाचित बैंक
के लोगों ने यहाँ क्रम से मेरी वार्तायें कराने का निर्णय कर लिया है। मुझे पिछले
दिन केनारा बैंक के लोगों से वार्ता करने का अवसर मिला था और अब आज वैश्या बैंक के
लोगों के साथ होने से मैं प्रसन्न हूं। भगवान बाबा के सन्देशों में, मानव जीवन के
समस्त क्षेत्रों, हमारे पेशों और प्रयासों हेतु विविध पहलू, विविध आयाम मिलते हैं।
इसलिए हम में से प्रत्येक के लिए यह जानना नितान्त महत्वपूर्ण है कि स्वामी को,
हममें से प्रत्येक व्यक्ति, पेशेवरों, व्यवसायियों, शिक्षकों, बैंक कर्मियों
आदि-आदि से क्या कहना है। इस बैंक के समान जो राष्ट्रीय स्तर का है, में पेशेवर के
रूप में कार्य करते हुए तथा दूसरे जो डाक्टरों या प्रवक्ताओं या व्यवसायी के रूप
में कार्य कर रहे हैं, उनके लिए, जीवन में किस प्रकार सफल होना है, जानना अति
महत्वपूर्ण है। हम में से बहुत लोग सोचते हैं कि आध्यात्मिकता एक ऐसा विषय है जो
अवकाश प्राप्त करने के उपरान्त विचार करने के लिए है, कि आध्यात्मिकता वह विषय है
जो मृत्यु के उपरान्त जीवन के सम्बन्ध में बतलाता है, एक वादा और एक आशा, लेकिन ऐसा
नहीं है। आध्यात्मिकता जमीन पर सफलता की चर्चा करती है, आध्यात्मिकता हमारे जीवन को
क्षमतावान बनाने की बात करती है। आध्यात्मिकता हमारे जीवन के चुने हुए पथ हेतु
दक्षता की मांग करती है। हमें समर्थ बनना है। हमें निपुणता प्राप्त करनी है। हमें
सफल होना ही है, यह है आध्यात्मिकता । आध्यात्मिकता आंखें बन्द कर सीधे बैठने जैसा
कुछ नहीं है, वह जो प्रात:काल के प्रारंभिक घंटों या देर रात में, और कुछ विचित्र
शारीरिक व्यायाम तक सीमित है। ये सब व्यर्थ हैं। हमें प्रोफेसर के समान आधुनिकतम
होना है। हमें अपने कर्मक्षेत्र में प्रतियोगी होना है। हमें जीवन के चुने हुए
मार्ग में विशेषज्ञ होना है। इस सन्दर्भ में, मैं अब से शेष समय में, भगवान बाबा
द्वारा अपने प्रवचनों में दिये निर्देशों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा।
इन विचारों में से कुछ को आपके सामने रखना पसन्द करूंगा।
जीवन में किस
प्रकार सफल हों, इस शाम आपके लिए मेरी वार्ता का विषय है। मैं
व्यक्तिगत जीवात्मा
और ब्रह्मांडीय
परमात्मा के सम्बन्ध में बोलने नहीं जा रहा हूं। इसके लिए यह समय नहीं है। मैं
जानता हूं कि आप प्रात:काल से इस समय तक निरन्तर काम करते रहे हैं। बैंक में काम
करना कोई छोटी बात नहीं है। आपका काम तथ्यों, अंकों तथा सांख्यिकी से होता है। कुछ
भी गलती हो सकती है मुझे उनके परिणामों का वर्णन नहीं करना है। आप जिस प्रकार से
पूरे दिन, प्रत्येक क्षण एक उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य के बोझ तले दबे रहे हैं, मैं
दूसरे संसार के सम्बन्ध में आपसे चर्चा नहीं करना चाहता। स्वामी ऐहिक संसारी पक्षों
पर बोलते हैं। भगवान विश्वास करते हैं कि संसार तथा अध्यात्मिकता एक समान है। वे
अलग नहीं हैं। चूंकि हम ही उसे अलग करते हैं और इस प्रकार हम अपने को भ्रमित करते
हैं तथा दूसरों को भी सफलतापूर्वक भ्रम में डालते हैं। मुझसे ऐसा करने की आशा नहीं
की जानी है। वास्तव में दोनों एक सिक्के के दो फलक हैं। जीवन में किस प्रकार सफल
होना है? जीवन में सफल होने के लिए पहला बिन्दु है कि हमें भारी सामान साथ में
नहीं रखना चाहिए।
भारी सामान,
इससे मेरा क्या तात्पर्य है? सांसारिक अर्थों में यदि हम भारी सामान के साथ यात्रा
करते हैं, और जब हम एक हवाई अड्डे से दूसरे पर जाते हैं, हम अपना कुछ सामान भूल
सकते हैं। विशेषकर पश्चिम में जब हम एक स्थान से दूसरे स्थान में परिवर्तन करते हैं
और लम्बी दूरी तय करते हैं, हम पूर्णतया अपना सामान खो सकते हैं। वे जो मात्र एक
बैग लिए हुए हैं आसानी से टहलते हुए वायुयान में प्रवेश कर सकते हैं तथा आगे की सीट
पा सकते हैं जबकि दूसरे लोगों को जिन्हें सामान लेना है, लम्बी दूरी चलना पड़ेगा, इस
बीच उनकी हवाई यात्रा छूट सकती हैं। इसलिए सांसारिक अर्थों में "कम सामान अधिक
आराम है।" हां कम सामान के साथ हम एक प्लेटफार्म से दूसरे, एक हवाई पट्टी से
दूसरी, एक बस स्टेशन से दूसरे पर आसानी से जा सकते हैं। यही वह है जो भगवान कहते
हैं, यह रेलवे का एक नारा है। प्रत्येक सवारी डिब्बे में तुम्हें कम सामान अधिक
आराम" लिखा मिलेगा और भगवान अक्सर इसे अपने प्रवचनों में सन्दर्भित करते हैं, लेकिन
मेरा तात्पर्य भिन्न है। हमारे पास भौतिक सामानों से इतना भारी सामान है और वह हम
अपने सिरों पर ढो रहे हैं। वह भारी सामान क्या है? हमें अपना सामान कम करना है।
पहला सामान जो हम ढो रहे हैं, वह है मन-मुटाव, झगड़े, कलह, गलतफहमी, अपने साथियों के
साथ मतभिन्नता, अपने मित्रों से, अपने सम्बन्धियों से, अपने अधिकारी से तथा उनके
साथ जो हमारे साथ काम करते हैं। हम सदा ही किसी के विरुद्ध इस प्रकार का मनमुटाव या
किसी के साथ मतभिन्नता रखते हैं। यह वह भारी सामान है जो हम अपने साथ लेकर चल रहे
हैं। हमें इसे उतार फेंकना है। हम और अधिक इसे लेकर नहीं चल सकते। दूसरों के साथ यह
मनमुटाव का सामान, यह मत भिन्नता का सामान बढ़ जाता है जब दूसरे व्यक्तियों के
विरुद्ध वैमनस्य, घृणा आदि हमारे में होती है। यह व्यक्तियों के विरुद्ध घृणा,
बैर-भाव भी बढ़ायेगा। इसलिए पहला सामान, पहला बण्डल जिसे आसानी से छोड़ा जा सकता है
वह है दूसरों के विरुद्ध मनमुटाव रखना। जीवन में सफल होने के लिए यह पहली
वस्तु है जिसे व्यक्ति को छोड़ना है।
दूसरा सामान
जो हम अपने साथ ढोते हैं वह है अपराध बोध। मैंने कुछ गलत कर दिया है। मैं
पूर्व में बुरा था। मैंने अपराध किया है। मैंने अपराध से भी कुछ बुरा किया है।
मैंने एक पाप किया है। मैंने एक भारी भूल, गलती की है। मैं इसी प्रकार का अपराध बोध
ढोता हूं। यह मेरे सामान को बढ़ा देता है। वास्तव में अपराधबोध अत्यन्त घातक है।
किये गये एक अपराध से अपराधबोध की भावना महान अपराध है। अपराधबोध से, किये गये
अपराध का विस्तार कम होता है। इसलिए मेरे मित्रों, अपराधबोध हमारे भारी बोझ को
बढ़ाता है और भारी करता है। हमें उसे नीचे उतारना है। हमें पूर्व में किये गये किसी
अपराध के अपराधबोध को छोड़ना है, यही वह है जो भगवान अक्सर कहते हैं। "आज से, कम
से कम एक बुरी आदत जो तुम्हारे पास है, छोड़ दो। गुजर गया सो गुजर गया। कम से कम आज
से अच्छा बनने का प्रयास करो।" इसका केवल यही अर्थ है कि भगवान नहीं चाहते कि
हम किसी प्रकार के अपराधबोध की भावना रखें जिसे किसी ने कुछ समय पूर्व किसी प्रकार
के अपराध से प्राप्त किया है और जो कार्यालय में हमारे कार्य को प्रभावित कर रहा
है। यदि हम भूतकाल पर ही सोचते रहते हैं, यदि हम पिछले वर्ष की गई गलतियों के
सम्बन्ध में चिन्तित बने रहते हैं, इस वर्ष का कार्य काफी कुछ नष्ट हो जायेगा।
इसलिए अपराधबोध का भारी बोझ सर से उतारना ही है। यह दूसरा अतिरिक्त वजन है जो हम ढो
रहे हैं।
तीसरा
अतिरिक्त बोझ जो हम ढो रहे हैं वह है, कभी किसी समय मैंने तुम्हारे साथ कुछ बुरा कर
दिया है, मैंने तुम्हारी भावनाओं को चोट पहुंचाया है। मैंने तुम्हारे मनोविचारों को
तोड़ा है, मैं तुम्हारे साथ इतना शिष्ट नहीं रहा हूं। कदाचित जब मेरे अधिकारी ने
मुझे बुलाया मैने उन्हें तुरन्त प्रत्युत्तर नहीं दिया, जब कोई ग्राहक बैंक आया,
मैं संवेदनशील या ग्रहणशील नहीं था। अग्रहणशीलता या असंवेदनशीलता या अभिरुचि की कमी
के कारण प्रत्युत्तर न दे पाना, यही वह है जो एक परिवार में घटित होता रहता है।
कभी-कभी पति अति दु:ख व्यक्त करता है, क्योंकि पत्नी दृढ़ थी। पति बहुत बुरा महसूस
करता है क्योंकि पत्नी ने जैसा पति चाहता था वैसा सुस्वादु भोजन नहीं बनाया। इसलिए
कभी-कभी हम बहुत बुरा महसूस करते हैं। उस समय तुम्हें कुछ बुरा कह देने के लिए,
तुम्हारी भावनाओं को चोट पहुंचाने के लिए, तुम्हारे मनोविचारों को तोड़ने के लिए,
अपने अधिकारी से अशिष्ट होने के लिए, क्षमतावान न होने के लिए, कार्यालय समय में उस
स्थान पर उपस्थित नहीं रह सका जहां मुझसे आशा की जाती है। हम "मुझे खेद है",
न कह पाने का यह अतिरिक्त बोझ ढोते हैं। मात्र तीन शब्द "मुझे खेद है" अगर हम यह कह
दें, हां, तो सीने पर रखा बोझ तुरन्त हलका हो जायेगा। मुझे खेद है। मैं अपनी पत्नी
से कह सकता हूं, "मुझे खेद है।" वह भी कह सकती है, "मुझे खेद है"। मैं अपने अधिकारी
से कह सकता हूं "मुझे खेद है" "महोदय मुझे खेद है।" बस सब कुछ साफ हो जाता है। मेरे
मित्रों! ये हमारे सामान के तीन अतिरिक्त बैग हैं जो हमारे सर पर बोझ बढ़ाते हैं। यह
तनाव जो बन जाता है, हमारा रक्त चाप बढ़ा होता है और शरीर को अस्त व्यस्त कर देता
है, हमारे शारीरिक स्वास्थ्य को नष्ट करता है। यह पहली बात है जिस ओर मैं आपका
ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।
दूसरा
अतिरिक्त सामान, जीवन में सफलता का दूसरा बिन्दु अपने सामान में से ये 3 बैग या
पैकेट जो भी आप उन्हें कह सकें, निकाल दें। कम कर दें। जीवन में सफलता के लिए दूसरा
बिन्दु है "अधिकार का प्रश्न।" तुम्हें प्रोन्नति मिल गई। मुझे प्रोन्नति
नहीं मिली। क्यों, तुम्हें वह मिलना चाहिए? मुझे क्यों नहीं? मुझे वह क्यों नहीं
मिला? तुम्हें वह क्यों मिलना चाहिए? क्यों? मैं ही पीड़ित हूं। इस संसार में मैं ही
अकेला क्यों? जब सम्पूर्ण संसार आनन्द और प्रसन्नता से नाच रहा है, कूद रहा है, यह
कैसे हुआ कि मैं अकेला इस संसार में पीड़ा भोग रहा हूं, क्यों मैं ही? तुम प्रसन्न
हो। तुम्हें क्यों प्रसन्न होना चाहिए? हर बार तुम्हें ही प्रोन्नति क्यों मिलनी
चाहिए? हर बार मैं ही असफल क्यों रहता हूं? यह क्यों का प्रश्न है जिसका विश्लेषण
जीवन में सफलता हेतु होना है।
क्यों प्रश्न
के दो पक्ष हैं। सकारात्मक और नकारात्मक। सकारात्मक क्यों और नकारात्क क्यों।
नकारात्मक क्यों, क्या है? तुम्हें क्यों प्रोन्नति मिलनी चाहिए? मुझे क्यों नहीं
मिली? तुम्हें क्यों प्रसन्न होना चाहिए, मैं अप्रसन्न क्यों हूं? तुम्हें क्यों
लोकप्रिय होना चाहिए, मैं क्यों नहीं समान रूप से लोकप्रिय हो सकता हूं? तुम्हारे
पास बैंक में जमा धन इतना क्यों होना चाहिए, मेरे पास क्यों नहीं? ये नकारात्मक
क्यों हैं। क्यों "मैं" अकेला ही जीवन में पीड़ित हूं? मेरे जीवन में अनेकों
समस्यायें हैं। मेरे ही क्यों? ये सभी नकारात्मक क्यों हैं? लेकिन सकारात्मक भी
क्यों हैं? सकारात्मक क्यों क्या हैं? मैं अपने जीवन में इन घटनाओं के सम्बन्ध में
इतना बुरा क्यों महसूस करता हूं। मैं जीवन में इन बातों से परेशान क्यों हो जाता
हूं? मेरे जीवन की समस्याओं के कारण मेरी कार्य क्षमता कार्यालय या बैंक में क्यों
प्रभावित होनी चाहिए। समस्यायें मुझे क्यों परेशान करनी चाहिए, क्यों नहीं मैं जीवन
की चुनौती का सामना कर सकता? मैं जीवन में क्यों नहीं सफल हो सकता? क्या मुझे इन
बातों से परेशान हो जाना चाहिए? इसके कारण क्या मुझे प्रत्येक की मनोदशा नष्ट करनी
चाहिए? क्या मुझे सहन करना चाहिए अथवा मुझे अपनी समस्याओं के कारण गम्भीर लम्बा
चेहरा लेकर रहना चाहिए? क्या मुझे जीवन में इन घटनाओं या दुर्घटनाओं के कारण दु:खी
हो जाना चाहिए? मुझे क्यों प्रभावित होना चाहिए? क्या मैं इसे सहजता से नहीं ले
सकता? क्या मैं जीवन के उस ताने-बाने को नहीं समझ सकता कि कुछ भी स्थायी नहीं है,
कि सब कुछ गुजरते बादलों के समान है कि एक भी बादल स्थायी नहीं है?
बादल आते हैं
और चले जाते हैं, एक भी स्थायी नहीं है। मैं जीवन की आधारभूत बातों को क्यों नहीं
समझ सकता? मुझे क्यों परेशान हो जाना चाहिए? मत भिन्नता के कारण मुझे क्यों उदास हो
जाना चाहिए? पदावनति के कारण, प्रोन्नति न होने के कारण या अप्रत्याशित स्थानान्तरण
के कारण मुझे क्यों परेशान होना चाहिए तथा अस्पताल में भर्ती हो जाना चाहिए? मुझे
इन बातों का शिकार क्यों होना चाहिए? मैं जीवन में चुनौतियों का सामना क्यों नहीं
कर सकता? अत: ये हैं सकारात्मक क्यों? अत:, मेरे मित्रों! जीवन में सफलता के लिए
क्यों का प्रश्न सकारात्मक होना चाहिए, नकारात्मक नहीं। यह दूसरा बिन्दु है जिसकी
ओर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।
तीसरा पक्ष
है। वह क्या है जो जीवन सफल बनाने में एक बाधा के रूप में आता है? कोई एक व्यक्ति
सफल क्यों नहीं होता जबकि दूसरे सफल हैं? जीवन में सफल होने का उपाय क्या है?
महानतम बाधा क्या है? वह एक मात्र अहं है जो मुझे सफल होने से रोकता है। अहं
के कारण आजादी के साथ दूसरों से सम्पर्क करने में सक्षम नहीं हो पाता हूं। मैं
सोचता हूं कि मैं तुमसे अधिक सौभाग्यशाली हूं। इसलिए, मैं तुमसे बात नहीं करता। मैं
सोचता हूं कि मुझे तुमसे अधिक भगवान का आशीर्वाद मिला है। इसलिए तुम्हारे साथ
सम्पर्क करने में सक्षम नहीं हूं। इस प्रकार स्वयं चुना हुआ अलगाव इस प्रकार के
एकाकीपन की दशा स्वयं से चाहना, इस प्रकार का अकेलापन या अलगाव स्वयं द्वारा आरोपित
है। इस सबका कारण अहं है। अनेक लोग आजादी से मुस्कुरा तक नहीं सकते। बहुत से लोग
आजादी से दूसरे के साथ सम्पर्क नहीं कर पाते। क्यों? अहं! अहं, यही वह समस्या है।
एक सफल व्यक्ति अहंकार विहीन होता है। कुछ दिन पीछे बिल क्लिन्टन इस देश के
आधिकारिक भ्रमण पर थे। जब राष्ट्रपति क्लिन्टन हमारी संसद में थे, मैंने टी0वी0 पर
उनके व्यवहार को देखा। उन्होंने प्रदेश की राजधानी हैदराबाद का भ्रमण प्रात: 10 बजे
से सायं 4 बजे तक किया। हमने बिल क्लिन्टन के भ्रमण का जीवान्त प्रसारण देखा। मैं
आपसे बताता हूं कि किस प्रकार वह व्यक्ति चारों ओर घूम-घूम कर किस जोश के साथ
प्रत्येक व्यक्ति से हाथ मिला रहा था। पांच सौ संसद सदस्य, प्रत्येक व्यक्ति से हाथ
मिलाना और यहां हैदराबाद में वह प्रत्येक व्यक्ति से बातें कर रहा था। टिप्पणीकार
स्वयं अपने को यह कहने से रोक नहीं सके कि हमारे प्रशासक रूखे होते हैं, जबकि
अमेरिका के राष्ट्रपति सबके साथ अत्यधिक खुले हुए हैं। सबके साथ खुले रहने के लिए
आपको अहंकार विहीन होना है। अहंकारी व्यक्ति किसी से भी खुल नहीं पाता। इसलिए मेरे
मित्रों, एक सफल व्यक्ति अहंकारी नहीं हो सकता। यह वह बिन्दु है जिस पर मैं आपका
ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। अब इस अहं के दो पक्ष हैं। इस अहं से कैसे मुक्त
होना है? इस अहं को कैसे छोड़ना है? वह हमारे साथ स्वाभाविक रूप से रहता है। जब दस
लोग कहते हैं कि आप महान व्यक्ति हैं, अहं का बदसूरत फन अपना सर उठा लेता है। हां,
यह स्वाभाविक रूप से होता है। यदि दस लोग कहते हैं कि तुम साधारणतया अनोखे व्यक्ति
हो, अहं बढ़ता है। लेकिन वह इस प्रकार का है नहीं। अहं से कैसे मुक्त हो? यहां दो
बिन्दु हैं। एक बिन्दु है चिन्तन। क्या चिन्तन? कुछ देर मौन धारण करो। प्रतिदिन कम
से कम आधे घंटे का मौन धारण करो। सभी महान लोगों ने इसकी सिफारिश की है। परमहंस
योगानन्द, हमारे द्वारा मौन धारण चाहते हैं। स्वामी
शिवानन्द, उन्होंने
मौनता पर बल दिया। भगवान श्री सत्य साईं बाबा हमसे हिमालय के समान मौन धारणा चाहते
हैं, जिसे पालन करने से तोड़ने में हम अधिक सम्मानित महसूस करते हैं।
वे हमसे
कठोरतापूर्वक मौन धारणा चाहते हैं। क्यों? भगवान ने कहा कि यह मात्र निस्तब्धता
है जिसमें ईश्वर की आवाज सुनी जाती है। ईश्वर की आवाज मात्र निस्तब्धता की गहराई
में सुनाई पड़ती है। क्यों? यदि तुम बातें करते रहते हो, यदि तुम अपने को व्यस्त
और शोर में रखते हो, तो तुम अपने पीछे चलते ईश्वर के पद चापों पर ध्यान नहीं दे
सकोगे। ईश्वर तुम्हारी ओर चल कर आ रहे हैं और तुम उनके चरण चापों को सुन सकने में
अक्षम होगे यदि तुम अत्यधिक ध्वनि उत्पन्न कर रहे हो तथा व्यस्त हो। इसलिए आधे घंटे
मौन रहने का काल अनिवार्य है। वास्तव में प्रसिद्ध दार्शनिक जे.के. जिद्दू
कृष्णामूर्ति ने कहा कि जो आधे घण्टे का समय तुम मौन धारण करने में व्यतीत करते हो,
वह तुम अपने लिए करते हो, शेष सारा समय तुम अपने परिवार के लिए, अपने व्यवसाय, अपने
वेतन, अपनी जीवन वृत्ति में प्रोन्नति के लिए व्यतीत करते हो, लेकिन वह क्या है जो
तुम वास्तव में स्वयं अपने लिए, अपनी वास्तविक आत्मा के लिए व्यतीत करते हो। यही है
वह जिसे वे चिन्तन कहते हैं। चिन्तन प्रतिदिन मौनता का काल है। इस मौनता के काल की
अवधि में तुम अन्तर्मुखी होते हो तथा अपनी सहायता करते हो और यह मौनता का काल बाद
में निरहंकारी होने में तुम्हारी सहायता करता है, और इसका दूसरा पक्ष है करुणा।
करुणा अहंकार की विरोधी है। अहंकारी व्यक्ति कभी दयालु नहीं होता। एक दयालु व्यक्ति
निरहंकारी होता है। अहं से मुक्त होने के लिए दया का भाव जैसा कि भगवान कहते हैं,
एक प्रकार का फैशन नहीं होना चाहिए। जैसा कि हम आज देखते हैं कि दयालुता विज्ञापनों
तथा विस्तृत प्रचार साधनों के द्वारा फैशन के स्तर तक आ गई है। मैं वास्तव में आपको
यह बताते हुए रोमांचित हो जाता हूं। मैं चकित हो जाता हूं कि कुछ लोगों ने अपना नाम
छत के पंखें के तीनों परों पर लिखवा दिया है। दानदाताओं के नाम। मैं सोचता हूं कि
जब पंखा पूरी गति से घूम रहा होता है, वे कैसे अपने नामों को पढ़ पाते होंगे। कदाचित
वे सारे समय बिजली का न होना चाहते हैं ताकि वे नाम पढ़ सकें। हम यह विश्वास नहीं कर
पायेंगे। दयालुता - क्या है दयालुता? वह जो प्रचार से मुक्त है, वह जो विज्ञापन से
रहित है, जो गुप्त रूप से किया गया है, वह जो बगैर किसी की जानकारी में किया जाता
है। दयालुता निरहंकारी होने का एक सहज उपाय है। अत: एक सफल व्यक्ति किसी भी समय
अहंकार पोषित करने की आशा नहीं कर सकता और अन्य बातें भी कुछ हैं। अहंकार से मुक्त
कैसे हों, पर कुछ सरल बिन्दुओं का सुझाव आता है। पहला बिन्दु, जिसका सुझाव आया था।
मित्रों की मण्डली में, सम्बन्धियों के बीच अपना दिखावा मत करो। मैं वह हूं और यह
हूं, क्योंकि जिस क्षण तुम वहां से चले जाओगे, वे तुम्हारी हंसी उड़ायेंगे।
अपरिचितों तथा सम्बन्धियों के बीच अपने बारे में दिखावा मत करो, यदि आप अहं से
मुक्त होना चाहते हैं। दूसरा बिन्दु है यदि आप अहं नष्ट करना चाहते हैं, आवश्यकता
से अधिक बातें मत करें, क्योंकि जब हम आवश्यकता से अधिक बातें करने लगते हैं तब
कभी-कभी वह परिस्थिति आ जाती है जब हम आत्म प्रशंसा करने लगते हैं। आप जानते हैं कि
मैंने क्या किया, आप जानते हैं कि मैं क्या था, आप जानते हैं मैं क्या हूं, क्या
कभी आपने मेरी उपलब्धि और प्राप्तियों को जानने का प्रयास किया? पूरा संसार मुझे
जानता है, तुम मुझे नहीं जानते? इस प्रकार आवश्यकता से अधिक वार्ता करते हुए कदाचित
अनजाने में, बिना किसी मकसद या प्रसंगवश हम आत्म प्रसंशा में संलिप्त हो जाते हैं।
हमारे शास्त्रों के अनुसार आत्म स्तुति और परनिंदा गम्भीरतम अपराध है।
इस प्रकार से
अत्यधिक बातें करने से हम ये दो अपराध कर सकते हैं। अत: कठोरतापूर्वक सीमित बात
करना आवश्यक है, जैसा कि भगवान कहते हैं। मधुर सम्बन्ध बनाये रखने के लिए,
व्यक्तिगत बातें वार्तालाप के बीच बिल्कुल नहीं आना चाहिए। इसलिए मेरे मित्रों,
एक सफल व्यक्ति को सीमित वार्ता का पालन करना चाहिए ताकि व्यक्तियों के व्यक्तिगत
सन्दर्भों की चर्चा न हो। एक दूसरा बिन्दु है कि एक सफल व्यक्ति परिवर्तन में
विश्वास करता है जो तरंगों के माध्यम से आता है, शब्दों से नहीं। एक सफल व्यक्ति
अपना सन्देश शब्दों के स्थान पर तरंगों से प्रेषित करने में सफल होता है। एक सफल
व्यक्ति जानता है कि उसकी प्रार्थना से शान्ति मिलती है, साधारणतया उसके भाषणों से
नहीं, भाषणों से अधिक प्रार्थना आश्चर्यजनक रूप से कार्य करती है, शब्दों से तरंगें
अधिक प्रभावशाली हैं। एक सफल व्यक्ति को इसका आवश्यक रूप से पालन करना चाहिए।
अहंकार छोड़ने का दूसरा बिन्दु यह भी है कि अपनी उपलब्धियों तथा प्राप्तियों के
सम्बन्ध में दूसरों से न कहें। किसी भी दशा में, नहीं। कुछ लोग आकर कह सकते है,
"महोदय, आप यह हैं और वह हैं।" "क्या तुम यह नहीं जानते?" कहने से "यह सब ठीक है"
कहना बेहतर है। इस प्रकार एक सफल व्यक्ति को स्वयं अपने सम्बन्ध में, अपनी
उपलब्धियों या प्राप्तियों के सम्बन्ध में कभी भी बढ़-चढ़कर बातें नहीं करनी चाहिए।
क्यों? क्योंकि हम जानते हैं कि हम कितने छोटे हैं, हम अपने सम्बन्ध में डींग कभी
नहीं मार सकते।
भगवान एक
सुन्दर सा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। मैं सदा भगवान को उद्धृत करने का लोभ संवरण
नहीं कर पाता क्योंकि किसी समकालीन दार्शनिक ने मानव जीवन के विभिन्न पक्षों को
इतना स्पर्श नहीं किया है जितना स्वयं बाबा ने। उन्होंने एक उदाहरण दिया। इस आकाश
गंगा में, सौर्य परिवार में तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विस्तृत अनेकों ग्रहों तथा
पिण्डों की अनन्त संख्या के बीच तुम अपने पर क्योंकर गर्व कर सकते हो? वह क्या है
जो सबसे छोटा है? वह पृथ्वी है, जो सबसे छोटी है और इस पृथ्वी पर सबसे छोटा क्या
है? इसका एक तिहाई पानी निकल गया, शेष भूमि है। आखिर इस पृथ्वी ग्रह पर, अन्य
ग्रहो, तारों, चाँद, सूर्य आदि से तुलना करने पर भूमि का आकार क्या है? पृथ्वी एक
चींटी के आकार की आती है और भारत एक चींटी की आंख के आकार का होता है। आंध्र प्रदेश
राज्य चींटी की एक आंख में एक बिन्दु के आकार का आता है। अनन्तपुर जिला, पुट्टपर्ती
एक चींटी के शरीर में आंख के एक बिन्दु में एक बिन्दु के बराबर है और अब आपका घर,
तथा घर में आपकी स्थिति क्या रह जाती है? बेहतर है ऐसा कुछ न बोलें। बेहतर है हम घर
में पत्नी से सलाह करें, ताकि वह भी वैसी ही हो। गर्व करने के लिए क्या है? मैं कुछ
नहीं हूं और यदि इस पर भी मैं घमण्ड महसूस करता हूं, तो इस संसार में मैं निश्चित
रूप से अपनी मूर्खता पर घमण्ड कर सकता हूं। नहीं, मुझसे बड़ा मूर्ख इस संसार में
नहीं है। मेरे अतिरिक्त दूसरा कोई इसं संसार में नहीं है। हां, हां, कोई अपनी
बुद्धिहीनता, अपनी अज्ञानता, स्वयं अपनी मूर्खता पर गर्व कर सकता है। इस संसार में
कुछ भी गर्व करने के लिए नहीं है। इसलिए कोई भी सफल व्यक्ति अपने सम्बन्ध में कभी
डींग नहीं मारेगा, कभी कोई प्रचार नहीं करेगा, वह अपनी उपलब्धियों के
सम्बन्ध में नहीं बोलेगा, जब तक किसी अन्य ने पूर्व में उसके सम्बन्ध में चर्चा न
की हो।
एक अन्य
बिन्दु : एक सफल व्यक्ति सदा अपने अन्तस या वास्तविक आत्मा के प्रति चैतन्य रहता
है। वास्तविक आत्मा क्या है? मैं इस परिस्थिति को दार्शनिकता में नहीं परिवर्तित
करना चाहता। परिस्थिति का अध्यात्मीकरण करने का यह समय नहीं है। आत्मा क्या है?
क्या है आत्म विश्वास? जब मैं अपनी कक्षा में जाता हूं या जब आप बैंक में अपने
स्थान पर बैठते हो, हां अपने स्थान पर वहां आपको पूर्ण विश्वास होता है कि आप सफल
होगे। आत्म विश्वास अपने पर विश्वास है। पद में विश्वास नहीं, न ही संगठन में
विश्वास। तुम्हें सर्वप्रथम अपने पर विश्वास होना चाहिए। संगठन महान हो सकता है।
यदि मुझे अपने पर विश्वास नहीं है, तब, मैं अपने को परेशानी में डाल लेता हूं तथा
अपने संगठन को भी। मेरे पास अति श्रेष्ठ कार है। कार नवीनतम है तथा बहुत अच्छी है।
लेकिन उसे चलाते समय मुझमें यदि आत्मविश्वास नहीं है तो मैं अपने को अस्पताल पहुंचा
दूंगा। क्यों? मुझमें आत्म विश्वास जो नहीं है। इस प्रकार अपनी आत्मा पर विश्वास वह
है जो एक सफल व्यक्ति के पास होता है और एक सफल व्यक्ति जो भी कार्य हाथ में लेता
है, प्रसन्न रहता है। वह अति महत्वाकांक्षी नहीं होता। उसमें अतिरिक्त आकांक्षायें
नहीं होंगी। वह कभी किसी व्यक्ति को पीछे कर आगे बढ़ने का प्रयास नहीं करेगा।
एक सफल
व्यक्ति अपनी उपलिब्घयों का समय-समय पर आकलन करता है। वह क्या है जो मैंने किया है?
वह क्या है जो मैं प्राप्त कर सकता था? हां, वह सदा सन्तुष्ट रहता है। एक सफल
व्यक्ति सदा सन्तुष्ट रहता है क्योंकि सन्तुष्टि एक सफल व्यक्ति का प्रमाण चिन्ह
है। जिसके पास सन्तुष्टि नहीं है, वह अत्यन्त असफल व्यक्ति है। यही वह कारण है कि
हम धनाढ्य लोगों से मिलते हैं। हमारा मिलना ऐसे लोगों से भी होता है, जो उच्च
उपलिब्घयों के साथ उच्च पदों पर हैं, लेकिन फिर भी सन्तुष्टि न होने से उनका जीवन
दु:खी व दयनीय है। सन्तुष्टि क्यों नहीं है? क्योंकि प्रारम्भ करने के लिए विश्वास
नहीं है। इस प्रकार आत्मविश्वास, आत्म सन्तुष्टि प्रदान करेगा जो और कुछ नहीं बल्कि
सन्तोष है। मुझे ज्ञात है कि मैंने क्या किया है और मैं अपने परिणामों से प्रसन्न
हूं। यह आत्म विश्वास है और एक सफल व्यक्ति किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार
होगा। वह एक इंच भी नहीं हिलेगा और न अपने सिद्धान्तों का त्याग करेगा। उसके कुछ
सिद्धान्त होते हैं। उसके कुछ निश्चित जीवन मूल्य होते हैं। जीवन में किसी भी वस्तु
से अधिक वह उन मूल्यों को सर्वाधिक प्रिय मानता है। इस प्रकार का मूल्य संविर्धत
जीवन ही वह है जिसे हम आत्म त्याग कहते हैं। वह जीवन मूल्यों को बनाये रखने के लिए
अपना बलिदान करने के लिए तैयार रहता है, जिन पर वह विश्वास करता है और अन्त में वह
अपनी वास्तविक प्रकृति को समझ जाता है। उसे उसकी वास्तविक पहचान मिल जाती है, जिसे
आप आत्म साक्षात्कार कहते हैं।
ये सन्देश
भगवान के प्रवचनों से हैं। एक सफल व्यक्ति को निश्चित रूप से इन गुणों को रखना
चाहिए। वह दूसरा पक्ष क्या है जिसकी एक सफल व्यक्ति से आशा की जाती है। हां वह क्या
है? एक सफल व्यक्ति जीवन में चुनौतियों का अपने सम्पूर्ण साहस से सामना करता है, वह
कभी भागेगा नहीं। मान लीजिए कोई मुझसे कहता है "महोदय, क्या आप एम.एस.सी. अन्तिम
वर्ष की कक्षा ले लेंगे? मैंने भले ही पिछले 38 वर्ष की नौकरी में वह विषय कभी नहीं
पढ़ाया है। लेकिन लोग मुझसे यह कहने की आशा कभी नहीं करते।" "महोदय, मैं वह नहीं
जानता"। लोग मुझसे "किसी दूसरे को दे दो" कहने की आशा नहीं करते हैं। दूसरी ओर लोग
मुझसे "क्यों नहीं" मैं निश्चित रूप से पढ़ाऊंगा" कहने की आशा करते हैं। लेकिन,
कदाचित इसके लिए मुझे कुछ अतिरिक्त तैयारी करनी पड़ेगी, बस। मात्र इसलिए कि एक मेज
से दूसरी और एक काउन्टर से दूसरे पर जाने से बचने के लिए मैं नहीं कह सकता -
"महोदय, मैं लेखा विभाग नहीं चाहता, मैं कैश विभाग नहीं चाहता, मैं रिकरिंग डिपाजिट
विभाग नहीं चाहता, मैं सुरक्षित जमा विभाग चाहता हूं, मैं अभय या अक्षय चाहता हूं।
मैं एक पद या एक प्रकार के कार्य तक सीमित नहीं रहना चाहता, नहीं, मुझसे, प्रत्येक
क्षेत्र में प्रवीण होने की आशा की जाती है। हां, मैं लाचारी का सहारा नहीं ले
सकता। मुझे एक ठिठोली याद आ गई जिसे भगवान ने कहा था - "एक व्यक्ति दांत की समस्या
से पीड़ित था, - हां, बाईं ओर के नीचे वाले जबड़े में भयंकर दर्द था। वह एक दन्त
चिकित्सक के पास गया और कहा "डॉक्टर साहब! मुझे तीव्र दर्द है" डॉक्टर कहता है -
"मैं देखता हूं। कौन सा जबड़ा, वह ऊपर वाला या नीचे वाला?" "वह नीचे वाला है" डॉक्टर
उसे बताता है "मैं ऊपर वाले जबड़े का विशेषज्ञ हूं, किसी दूसरे दन्त चिकित्सक के पास
जाओ" तब वह दूसरे दन्त चिकित्सक के पास जाता है और कहता है कि "डॉक्टर! मैं, इस
समस्या से पीड़ित हूं।" ओह, मैं देखता हूं, नीचे में कहां - ठीक कहां?" "इस कोने
में, महोदय" मैं सामने के दांतों का विशेषज्ञ हूं, पीछे जाओ, किसी दूसरे दरवाजे की
ओर" अत्यधिक विशेषज्ञता कभी-कभी हमारे जीवन को दयनीय बना देती है। विशेषज्ञता की
अधिकता, नियमित प्रकार के कार्यों से, जिन्हें नियमित दैनिक व्यवहार से किया जाता
है, हमारे सम्बन्ध तोड़ देती है। जो कुछ भी हमारे सामने आये, करने की आशा की जाती
है। एक सफल व्यक्ति चुनौतियों से नहीं भागेगा। हां मैं करने को तैयार हूं। इसी कारण
भगवान कहते हैं "जीवन चुनौती है, उसका सामना करो" आप इस चुनौती का सामना
कैसे कर सकते हैं? वह किस प्रकार सम्भव है? मान लीजिए आप मुझे उस पर बोलने के लिए
कहते हैं जिसे मैं नहीं जानता। हां, मैं उसे एक चुनौती के रूप में लेता हूं। मैं
क्या कर सकता हूं? क्या किया जाना है? इसलिए, मैं कल के लिए आकिस्मक अवकाश यह कहकर
लेता हूं कि मुझे बुखार हो गया है या पेचिश जो प्रमाणित करने का विषय नहीं है। अब
क्या किया जाना है? वह व्यक्ति जो जीवन में सफल होने के लिए चुनौतियों का सामना
करता है, उसे एक रहस्य सदा याद रखना चाहिए कि वह अकेला नहीं है। आप कभी अकेले
नहीं हैं। ईश्वर आपके साथ है। ईश्वर आपके साथ यह देखने के लिए है कि आप सफल होने जा
रहे हैं।
ऐसा क्यों
सोचते हैं कि आप चुनौतियों से डरते हैं? क्यों सोचते हैं कि आप असफल हो जायेंगे?
निश्चित रूप से नहीं। मैं जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए अपने को तैयार
करता हूं। कैसे? ईश्वर मेरे साथ है। मैं अकेला नहीं हूं। वह देखना चाहता है कि मैं
विजयी हूं, कि मैं सफल होऊंगा, कि विजय प्राप्त करूंगा। यह एक सफल व्यक्ति की
मनोवृत्ति होती है। एक सफल व्यक्ति अपनी जीवन पद्धति के सम्बन्ध में एकदम स्पष्ट
होता है। वह अपने सभी लक्ष्यों को स्पष्ट देखता है। वह क्या प्राप्त करना चाहता है,
तथा उसके लिए क्या करना है। कार्य प्रणालियों के सम्बन्ध में वह पूरा जानकार होता
है। वह पूर्ण व्यवहारिक होता है। हां, मैं, इस सम्बन्ध में तथा इसी प्रकार की कुछ
अन्य बातों के सम्बन्ध में बता सकता हूं। मान लीजिए आप मुझसे गणना करने के लिए कहते
हैं, मैं जानता हूं कि बचपन से मैं गणित में अत्यधिक कमजोर रहा हूं। घरेलू खर्चों
तक में मैं पूर्ण रूप से असफल रहा हूं। हां, मैं गणितीय गणना, साधारण जोड़ने-घटाने
आदि में भी कभी एक सफल व्यक्ति नहीं था। ये संख्यायें ही मुझे डराने के लिए काफी
हैं। इसलिए यदि मैं कहता हूं कि "ठीक है, मैं उसे करूंगा। इसका एकमात्र अर्थ है कि
आपको अपनी क्षमता का अनुमान नहीं है। मान लीजिए एक विद्यार्थी आता है और कहता है कि
"मैं भगवान के समक्ष नृत्य करना चाहता हूं, क्या आप मुझे प्रशिक्षण देंगे?" "हां
मैं तुम्हें प्रशिक्षण दूंगा" "मैं नृत्य का ककहरा भी नहीं जानता।" यह कहना कि मैं
तुम्हें नृत्य करना सिखाऊंगा, निरी मूर्खता है। एक सफल व्यक्ति अपनी योग्यताओं और
अयोग्यताओं, अपनी क्षमताओं और अक्षमताओं को भली भांति जानता है। मैं अपने लड़कों को
नृत्य कला में मार्गदर्शन नहीं कर सकता। एक सफल व्यक्ति जानता है कि वह कहां
शक्तिशाली है तथा कहां वह कमजोर है। मैं अपने लड़कों को शास्त्रीय संगीत में
मार्गदर्शन नहीं कर सकता। मैं उसे नहीं जानता। मैं, कैसे सुना व आनन्द लिया जा सकता
है, जानता हूं। लेकिन मैं किसी को शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित नहीं कर सकता
हूं। इस प्रकार, एक सफल व्यक्ति को अपनी क्षमताओं को जानना चाहिए, उसके पास जो
सामग्री है, वे सभी घटक जो उसमें तथा उसके आसपास उपलब्ध हैं, की पूर्ण जानकारी होनी
चाहिए तथा पद्धति बिल्कुल स्पष्ट हो। उसके काम करने के तरीके एकदम स्पष्ट होते हैं।
लेकिन एक सफल व्यक्ति की पद्धति उसके नि:स्वार्थ होने में निहित है, वह लक्ष्य जो
स्वार्थ रहित है, वह लक्ष्य जो नि:स्वार्थी है।
यदि मुझे एक
सफल व्यक्ति के वास्तविक लक्ष्य के बारे में बोलना है, तो वे लोग जो अपने जीवन के
लक्ष्य के रूप में अपना स्वार्थ रखते हैं, निन्दनीय हैं। उदाहरण के लिए मैं एक सफल
व्यक्ति हूं क्योंकि सांसारिक दृष्टिकोण से, मेरे पास मेरे खाते में कुछ लाख रुपए
हैं या मैं एक अत्यन्त उच्च पद पर आसीन हूं, लेकिन कोई मेरे बारे में अच्छा नहीं
कहता। "वह ऐसा व्यक्ति है जिसने खूब पैसा बनाया है, वह है क्या?" क्या तुम सोचते हो
मैं एक सफल व्यक्ति हूं। धन होने के बावजूद मैं सफल व्यक्ति नहीं हूं। मैं सफल हूं
तथा पद में उच्च हूं किन्तु संगठन में कुछ भी योगदान नहीं कर रहा हूं। मैं इस बैंक
का प्रबन्धक हूं। बैंक खातों की संख्या नहीं बढ़ी है। जमा धन संख्या में नहीं बढ़ा
है। मैं प्रबन्धक हूं। लेकिन मैं एक सफल प्रबन्धक नहीं हूं। इस प्रकार, एक सफल
व्यक्ति जानता है वह कौन है और उसका लक्ष्य सदा संगठन हित, संस्थान का हित होता है।
व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं। वह व्यक्ति कभी नहीं कहेगा। "मुझे मान्यता देनी चाहिए।"
मेरी प्रशंसा होनी चाहिए। मेरी पीठ थपथपाई जानी चाहिए।" नहीं, एक सफल व्यक्ति का
उद्देश्य राष्ट्रीय लक्ष्य, व्यक्तिगत लक्ष्य, संगठन का लाभ होगा, लेकिन उसका अपना
लोभ या स्वार्थ नहीं होगा। यह भी एक बिन्दु है जिस पर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना
चाहता था।
एक सफल
व्यक्ति के जीवन में भी समस्यायें होती है। लेकिन वह उस प्रकार से दिखाई नहीं पड़ता।
जब हम एक सफल व्यक्ति से, उसकी तमाम मुस्कुराहटों, उसके हंसमुख स्वभाव, यहां वहां
दौड़ते-भागते, मिलते हैं, हम समझते हैं उसके जीवन में सदा आनन्द मंगल है, अति उत्तम
तथा अति सुन्दर है। ऐसा निश्चित रूप से नहीं है। वह अपने को नियंन्त्रित कर पाने
में सक्षम है। वह उन समस्याओं को अपने वश में अपने नियन्त्रण में, इस प्रकार से
रखने में सक्षम होता है कि उसके चेहरे पर वे प्रकट नहीं होते, ताकि वह अपने मित्रों
के मनोभावों को नष्ट होने दे। वह अपने को नियन्त्रित करने में सक्षम है। वह अपनी
समस्याओं को स्वयं निगल जाने में समर्थ है। एक सफल व्यक्ति के गुणों में यह गुण है।
यही है जो भगवान सदा कहते हैं। पारिवारिक समस्यायें छिपाकर रखनी होंगी, उन्हें
दूसरों के बीच नहीं लाना चाहिए। इसलिए मेरे मित्रों! एक सफल व्यक्ति अपनी
मनोभावनाओं तथा अनुभूतियों को नियन्त्रित करने में सक्षम होगा। दुर्दिन के क्षणों
तक में वह मुस्कुराने में सक्षम होगा। एक उदाहरण, निश्चय ही शास्त्रों से हमारे पास
अनेकों उदाहरण हैं। रामचन्द्र, जब यह घोषणा हुई कि अगली सुबह उनकी ताजपोशी
(राज्याभिषेक) होगी, उनके चेहरे पर वही मुस्कुराहट थी जैसी कि जब यह घोषित किया गया
कि उनका राज्याभिषेक नहीं होने जा रहा है, उनके स्थान पर भरत का राज्याभिषेक होने
जा रहा है और उन्हें वन गमन करना है, कि उन्हें सम्पूर्ण समय निर्वासित व्यतीत करना
है, वही गम्भीरता, वही गरिमा, वही आनन्द, उसी प्रकार की दशा उनके चेहरे पर रही। कोई
परिवर्तन नहीं हुआ। यदि आप मेरा आकिस्मक अवकाश स्वीकृत करते हैं, मैं मुस्कुराता
हूं। यदि आप कहते हैं कि "नहीं भद्र पुरुष!" आप अवकाश पर नहीं जा सकते" आप मेरा
चेहरा भी देखना नहीं चाहेंगे क्योंकि वह स्वयं मेरे देखने तक में इतना बदसूरत हो
गया होगा। जब लोग हम पर अनुग्रह नहीं करते, हम बहुत बुरा महसूस करते हैं तथा परेशान
हो जाते हैं, हम क्रोधित हो जाते हैं। यही ट्रेजडी (त्रासदी) है।
एक सफल
व्यक्ति कभी क्रोध नहीं करता। बुरी से बुरी स्थिति में आप मेरे सामने कह सकते हैं -
"तुम मूर्ख हो!" ठीक है, मैं सामान्यतया हंस देता हूं क्योंकि तुम नहीं जानते मैं
क्या हूं और तुम क्या हो, वही जो तुम कहते रहे हो, इसलिए तुम मुझे किसी नाम से
पुकारो। तुम मुझे किसी अन्य नाम से पुकारो क्योंकि तुम जो कहते हो उस पर अडिग हो।
दूसरी ओर तुम्हारे शब्द, तुम्हारी संस्कृति, तुम्हारे संस्कारों की पृष्ठभूमि के
सम्बन्ध में बोलते हैं। तुम्हारा व्यवहार तुम्हारे माता-पिता या समाज जहां तुम्हारा
पालन पोषण हुआ के सम्बन्ध में बोलता है। इसलिए, तुम इस प्रकार के हो। मैं तुम्हें
क्षमा कर सकता हूं। सब यही है। एक सफल व्यक्ति सदा अपना क्रोध अपने वश में रखेगा।
वह अपने समस्त मनोवेगों और भावनाओं को नियन्त्रित रखेगा तथा अपनी समस्त समस्याओं को
निगल जायेगा, और बुरी से बुरी परिस्थितियों तक में प्रसन्न रहेगा। एक साधारण सा
उदाहरण श्री अटल बिहारी बाजपेयी का हमारे पास है। जब वे प्रधानमन्त्री बनाये गये,
सुन्दर। लेकिन जब वह एक वोट से शक्ति पीठ से बाहर हो गये, मात्र एक वोट से, वे समान
रूप से प्रसन्न थे। वे यू.एस.ए. में स्पष्ट कर रहे थे "मैं दुर्घटनावश
प्रधानमन्त्री बना और उसे एक वोट से खो दिया" उनमें कितना मानसिक सन्तुलन है।
वह ही एकमात्र
नहीं। स्वामी रंगनाथानन्द को, भारत रत्न, देश की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित किया
गया। वे उस सम्बन्ध में गर्वित नहीं हुए। आप जानते हैं उन्होंने क्या कहा - "मैं
भारत रत्न की उपाधि नहीं चाहता, मैं उसे नहीं चाहता। मैं एक संगठन रामकृष्ण मिशन का
प्रतिनिधित्व करता हूं। यदि भारत रत्न प्रदान करना है तो राम कृष्ण मिशन को प्रदान
करना चाहिए, न कि स्वामी रंगनाथानन्द को।" यह जीवन का सर्वोच्च दर्शन है। कहीं यह
मुझे या आपको दिया गया होता, अहा, हा, अखबारों में विज्ञापन होते, विशेष अंक
प्रकाशित होते, स्वागत होते, महोत्सव के आयोजन होते, कम से कम पूरे साल भर तक
बधाइयों का दौर चलता। जब यह घोषणा की गई कि मदर टेरेसा को नोबुल प्राइज प्रदान किया
गया, आप जानते हैं उन्होंने क्या कहा - "अन्तत: यह विश्व द्वारा दरिद्रता को
मान्यता देना है और यह मान्यता कुष्ठ रोगियों की दुनिया, सड़कों पर घूमते कुष्ठ
पीड़ितों की बिना देखभाल, असम्मानित, जिसके लिए कोई रोने वाला नहीं, गाने वाला नहीं
के प्रति चेतना का द्योतक है। विश्व समुदाय में कौन है जो गरीबों की परवाह करता है?
यह गरीब की मान्यता है, मदर टेरेसा की नहीं।" यह महान व्यक्ति का चिन्ह है। इसलिए
एक सफल व्यक्ति जीवन में समस्याओं द्वारा परेशान नहीं होता, व्यथित नहीं होता। वह
सदा उन्हें नियन्त्रित करने में सक्षम होता है। वास्तव में यही वह बिन्दु है जिसकी
ओर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।
इस सबके ऊपर
एक सफल व्यक्ति में विनोदशीलता होती है। हमें लोगों को अपने साथ हंसाना चाहिए, अपने
पर कभी नहीं। हमें किसी पर कभी नहीं हंसना चाहिए, हमें लोगों के साथ हंसना चाहिए।
जब हम लोगों पर हंसते हैं, आपके शत्रु बनते हैं, जब आप लोगों के साथ हंसते हैं,
आपको मित्र मिलते हैं। विनोदशीलता क्या कभी आप भगवान को किसी समय गम्भीर पाते हैं?
भई, मैंने तो उन्हें कभी नहीं पाया। वह सदा प्रसन्न, सदा
आनन्दित, सदा विनोदी,
सदा खेल करते रहते हैं। एक सज्जन हैं डॉ. हारवर्ड मरफेट! आप में से अधिकतर लोगों ने
उनका नाम सुना है। उन्होंने चार किताबें लिखीं, पहली किताब "साई बाबा दि मैंन ऑफ
मिरेकिल" सम्पूर्ण विश्व में विख्यात है। पश्चिमी गोलार्ध के अधिकतम भक्तों ने श्री
सत्य साई के दिव्य महल में प्रवेश उनकी पुस्तक "मैन आफ मिरेकिल" के द्वार से किया
है। बहुत ही सुन्दर रचना है। अपेन्डिसाइटिस की समस्या के लिए उनको शल्य चिकित्सा
करानी पड़ी। उसके उपरान्त वे स्वामी के दर्शन हेतु आये, मैं देख रहा था कि किस
प्रकार हमारे भगवान उनका स्वागत करते हैं, इस आदमी, इस अति वृद्ध व्यक्ति से क्या
कुछ पूछेंगे। "हां - मरफेट, तुम बिल्कुल ठीक तो हो? यह विनोदी स्वभाव का गुण है।
उससे, यद्यपि उस आदमी में थोड़ा दर्द रहा हो सकता है, वह निश्चित ही उस समय चला गया
होगा। अब यहां एक और आदमी है सिन्क्लेयर नाम से। सिन्क्लेयर उस समय कोड़ाई कैनाल में
थे, वे अपनी पत्नी के आने की आशा कर रहे थे। वह उनसे, उनके रुकने के अन्तिम सप्ताह
में मिलने वाली थीं। ठीक इसी समय, स्वामी ने परीक्षा लेना प्रारम्भ किया।"
"सिन्क्लेयर क्या तुम बता सकते हो कि तुम्हारी पत्नी कब यहां आने वाली है?" उस
व्यक्ति ने इतनी प्रसन्नता महसूस की जैसे कि उसी क्षण वह आ गई हों। विनोदशीलता -
क्योंकि वह हमें जीवन्त रखती है, लोगों के साथ हमें मित्रवत रखती है।
मेरे मित्रों,
कृपया याद रखें, गम्भीरता, आध्यात्मिकता का चिन्ह नहीं है। गम्भीरता एक बीमार आदमी
का चिन्ह है, आध्यात्मिक का नहीं, क्योंकि आनन्द ईश्वर है और ईश्वर आनन्द हैं।
भगवान एक कदम आगे जाकर कहते हैं - "वह जो मुस्कुराता है, वह जो आनिन्दत है,
ईश्वर है और वह जो रोता है मानव है।" यदि आप वास्तविक रूप से आध्यात्मिक होना
चाहते हैं, हम में यह विनोदप्रियता होना चाहिए। एक प्रकार की हंसी, हमें उसका आनन्द
लेने में सक्षम होना चाहए। हां, ऐसा हुआ कि एक भक्त यहां आया। वह एक गांव वाला था,
गंवार, पागल होती भीड़ और सभ्यता से दूर, उसके पास केवल एक बनियाइन थी और एक धोती जो
घुटने तक उठी हुई थी और शक्तिशाली व्यक्तित्व, गहरा काला वर्ण, एक किसानी करने वाला
शरीर, मेरे जन्म स्थान के नगर से लगभग 40 मील दूर स्थान का रहने वाला। वह भगवान के
दर्शन हेतु बैठता था। उसने चार दिन प्रतीक्षा की। स्वामी ने उसकी ओर नहीं देखा। वह
बहुत अधिक परेशान हो गया। गंवार व्यक्ति। उन्हें शुद्ध दूध, शुद्ध घी, ठोस भोजन
मिलता है, वह सब अत्यन्त भावोत्तेजक है। उसके परेशान होने का कारण उसका भोजन है। हम
मिलावटी भोजन पाते हैं। इसीलिए मिलावटी भावनायें भी हममें हैं। वह आदमी खड़ा हो गया
और लगभग चिल्ला कर बोला, "हे ईश्वर!" अन्तत: तुमने मेरी ओर नहीं देखा। मैं यहां चार
दिन से आया हुआ हूं। शायद तुम अधिकारियों की परवाह करते हो, तुम ऊंचे लोगों की
परवाह करते हो। ठीक है, मैं जा रहा हूं।" सभी लोग उसकी ओर देखने लगे कि क्या हो
गया। हां, वह भजन का समय था। स्वामी सीधे उसके पास पहुंचे और कहा "रेड्डी! तुम मुझ
पर इतना क्रोधित क्यों हो? मैं यहां तुम्हारे लिए हूं। तुम्हारा, घर में अपनी पत्नी
से झगड़ा हुआ, वह घर में है और तुम यहां ठीक हो। तुम परेशान क्यों हो? मैं तुम्हें
यहां कुछ दिन शान्ति से रखना चाहता हूं ताकि वापस जाने पर तुम्हारी शान्ति भंग न
हो। यहां प्रसन्नता से रहो। मैं तुम्हें यहां रखना चाहता हूं।" यह है विनोदशीलता।
वह आदमी अत्यन्त प्रसन्न हो गया।
एक अन्य घटना,
मैं जानता हूं। एक महिला दु:खी थी कि स्वामी उसे साक्षात्कार के लिए नहीं बुला रहे
हैं और उसने सोचना शुरू किया, "मेरे पास हीरा जड़ित चूड़ियां नहीं हैं। इसलिए तुम
मुझसे बात नहीं करना चाहते। मैं किसी अति महत्वपूर्ण व्यक्ति (वी.आई.पी.) की पत्नी
नहीं हूं कि तुम मेरी ओर देखो।" ये उसकी भावनायें थीं। वह महिला यहां परिसर में है।
स्वामी सीधे उसके पास आये और कहा "मैं हीरा जड़ित चूड़ी वालियों से बात करता हूं। हां
बताओ तुम कैसी हो?" उन्होंने पूछा। तुमने देखा, वह इस तरह वार्ता करते हैं।
सामान्यत: लड़कों से बात करते हुए, स्वामी कहते हैं - "तुम कहां चले गये थे?" "भगवन!
मैं मद्रास में था" तुमने क्या किया वहां? "स्वामी! मैं वहां घूमने के लिये गया
था।" "तुम वहां घूमने का सुख लेने गये थे? तुम इस सुख का क्या अर्थ समझते हो? अन्त
में जो सुख पाते हो वह सुख का अन्त है और तथाकथित जीवन का सुख, सुख नहीं है।
तुम्हें आध्यात्मिक आनन्द लेना चाहिए।" यह वह है जो भगवान ने इतने सरल शब्दों में
कहा। वह कैसे अपने कार्य के बीच, इतने व्यस्त कार्यक्रमों में से विनोद के क्षण
निकाल लेते हैं? मैं नहीं समझता, कार्य के भार के सम्बन्ध में कोई भी उनसे मुकाबला
नहीं कर सकता है। एक बार वे एक छोटे बच्चे से बात कर रहे थे। वे पूछ रहे थे,
"तुम्हारे कितने भाई हैं?" और उस लड़के ने कहा "सभी मेरे भाई हैं।" उन्होंने एक अन्य
लड़के से पूछा "तुम्हारी कितनी बहने हैं?" "सभी मेरी बहने हैं" उस लड़के ने कहा
"नहीं, नहीं!" स्वामी बोले "एक को छोड़कर।" विनोदशीलता हमें स्वस्थ रखती है, और हमें
सफल बनाती है। एक अध्यापक एक विद्यार्थी को डांटना चाहता है, ऐसा लगता है, उसने कहा
"ओ लड़के! तुम जानते हो वाशिंगटन तुम्हारी आयु में कक्षा के नेता थे। उनमें नेतृत्व
के समस्त गुण थे। लड़का खड़ा हुआ और बोला - "महोदय, आपकी आयु में वह अमेरिका के
राष्ट्रपति थे" यह इस प्रकार से होता है। विनोदप्रिय लोग एक स्वस्थ जीवन व्यतीत
करना चाहते हैं। हमें अपने आपको मुक्त कर देने की आवश्यकता है ताकि हम थक न जायें,
ताकि हम कठिन परिस्थितियों में तनावग्रस्त न हो जायें। हमें आखिरकार प्रसन्न रहना
है।
एक अन्य अवसर
पर स्वामी ने लोगों को एक छोटा सा हास्य बताया। दर्शन, फिलासफी पठन के स्तर तक नीचे
आ गया हैं। दर्शन सुनने के स्तर तक नीचे आ गया है, प्रवचन सुनना, मन्दिर में वार्ता
सुनना, वे सोचते हैं कि इससे स्वर्ग में उनका स्थान आरक्षित हो गया। निश्चित रूप से
नहीं। वह न तो आरक्षित हुआ, न सुरक्षित हुआ और न ही पात्र बना। मात्र सुनना, मात्र
पढ़ना स्वर्ग पहुंचने की गारंटी नहीं है। इसको स्पष्ट करने के लिए भगवान ने एक
उदाहरण दिया। एक घरेलू महिला एक मंदिर में अनेक महीनों से प्रवचन सुनती थी। अन्तत:
उसकी समझ में आ गया। एक दिन वह घर आई। उसने कुएं से पानी नहीं भरा। वह फर्श पर
लेटी रही। गरीब पति आया और बोला "तुम कुएं से पानी लाने क्यों नहीं गई?" पत्नी ने
कहा "तुम्हें कुएं के पानी की क्या आवश्यकता है?" क्या तुम नहीं जानते, हमारे शरीर
में तीन तन्त्रिकायें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना है? एक गंगा, दूसरी यमुना और तीसरी
सरस्वती का प्रतीक हैं। मानव शरीर में पानी सदा बना रहता है, यह मैंने मंदिर में
होने वाले प्रवचन से सीखा है।" उसने कहा। वह समझ गया कि पत्नी आध्यात्मिक नहीं,
उन्मादी हो गई है। उसे क्या करना है? वह उसे समझा नहीं सकता था। उसने खाना पकाना
शुरू किया, उसने अपनी पत्नी के लिए एक विशेष रसदार सब्जी खूब मिर्च डालकर बनाई। रस
में और अधिक काली मिर्च तथा मिर्च मिला दी, यह सब विशेष कर अपनी पत्नी के लिए और
फिर उसने उसे परोस दिया। जब उसने खाना शुरू किया, मिर्च की कड़ुवाहट से
विह्वल, वह चिल्लाई
पानी! पानी! तब उसके पति ने कहा तुम्हारे शरीर में गंगा, यमुना, सरस्वती हैं और
इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना भी। क्यों नहीं तुम अपनी सहायता कर लेतीं?" ये व्यवहारिक
बातें हैं जो भगवान सदा बताते रहते हैं। सुन्दर तथा अत्यन्त रोचक कहानियां और बड़ी
संख्या में हास्य, वे सुनाते हैं। विनोदशीलता सफल व्यक्ति की पहचान है। वास्तव में
आधुनिक प्रकार की शिक्षा पर एक हास्य उनके पास है। कैसे हम अध्यापक अपने
विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं और कैसे विद्यार्थी हमसे सीखते हैं और कैसे हम प्रश्न
को मोड़ देते हैं? चलिए यह तो हो गया।
भगवान ने एक
उदाहरण दिया। एक सैनिक शिविर था। वहां लगभग 100 सैनिक थे, जिनका प्रशिक्षण पूरा हो
गया था और वे शिविर से जाने वाले थे। अन्तिम दिन शिविर में मेजर आने वाले थे और
प्रमाण पत्र वितरित करने वाले थे लेकिन कैप्टन जो शिविर का प्रभारी था सैनिकों को
तैयार करना चाहता था। हो सकता है मेजर कोई प्रश्न करना चाहें। कैप्टन ने कहा "हे
सैनिकों! चिन्तित न हों। कल तुम्हारा अन्तिम दिन है, तुम अपने-अपने स्थान पर उसके
बाद जाने वाले हो, हो सकता है मेजर तीन प्रश्न पूछना पसन्द करे, कुल तीन प्रश्न।
पहला प्रश्न यह है "तुम्हारी आयु क्या है? तुम कह सकते हो "बीस या इक्कीस" दूसरा
प्रश्न "कितने दिनों से तुम यहां हो?" तुम कह सकते हो "छ: माह"। तीसरा प्रश्न -
"क्या तुम यहां प्रसन्न हो या घर में? कहो कि तुम दोनों स्थानों पर प्रसन्न हो।"
क्योंकि यदि तुम कहते हो कि यहां प्रसन्न हो तो, तो उसका अर्थ है तुम वहां भूखे
रहते थे। भोजन की कमी के कारण तुम सेना में सम्मिलित हुए। यदि तुम कहते हो कि घर पर
तुम प्रसन्न हो, इसका अर्थ होगा कि हमने ठीक प्रकार से तुम्हारा ध्यान नहीं रखा।
इसलिए बेहतर होगा तुम कहो - "दोनों स्थान समान हैं" मेजर आये पहला प्रश्न दूसरा हो
गया और दूसरा पहला, "तुम कितने दिनों से यहां रह रहे हो?" "बीस वर्ष से महोदय।"
"तुम्हारी आयु क्या है?" "छ: माह।" "तुम पागल हो या मैं पागल हूं?" "दोनों समान
हैं।" कितना ही भाषण देना, कितना ही वर्णन करना, कितनी ही उच्चस्तरीय वार्ता, इतनी
अच्छी तरह से हमारे मस्तिष्क में नहीं घुसती, जितना भगवान के बोधगम्य शब्द।
वे लड़कों से
कहते हैं "तुम्हें अपनी सहज बुद्धि का उपयोग करना चाहिए, जब तुम कक्षा में अपने पाठ
को सुनते हो। उन्होंने एक व्यंग हमें सुनाया। ऐसा लगता है उन दिनों स्थान-स्थान पर
जाकर एक अध्यापक स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित करते थे। वह एक बैलगाड़ी में अपने
विद्यार्थियों के साथ और अपना सारा सामान लेकर यात्रा कर रहे थे। उन्होंने अपने
विद्यार्थियों से सारा सामान देखते रहने हेतु कहा और गुरू खर्राटे भरने लगे। एक
वस्तु के बाद दूसरी गाड़ी से बाहर आने लगी और रास्ते पर गिरने लगी। यकायक गुरू जाग
गये और कहा "मेरा बहुत सा सामान चला गया, क्या हुआ था? विद्यार्थियों में से एक ने
कहा - "महोदय, आपने मुझसे क्या कहा था? आपने मुझसे देखने के लिए कहा था। मैं देख
रहा था। बस! "मैं अब तुम्हें स्पष्ट निर्देश देता हूं। जो कुछ भी गाड़ी से जमीन पर
गिरे, उसे उठाओ और गाड़ी पर रखो। अच्छा, महोदय, बैल दौड़ने लगे और बैलों ने गोबर
किया। विद्यार्थी उसे एकत्र कर गाड़ी पर रखने लगे। गोबर गुरू के चेहरे पर गिरा। "यह
तुमने क्या किया?" महोदय, आपने कहा था कि, जो कुछ भी भूमि पर गिरता है, उठाकर उसे
पुन: गाड़ी में रखो। गुरु ने कहा "तुमने मेरी बात नहीं समझी।" गुरू ने समझाया और उन
वस्तुओं की सूची बनाकर दी जिसे उठाना था, उनमें से यदि कोई गिर जाये, वे उन्हें
उठाकर गाड़ी में रख लें। विद्यार्थियों ने कहा "ठीक है महोदय।" गाड़ी चलने लगी, कि एक
मील के पत्थर से जा टकराई और गाड़ी एक ओर झुक गई तथा गुरू जी गाड़ी से नीचे जा गिरे,
गाड़ी बढ़ी जा रही थी। गुरू जी चिल्लाये - "तुम क्या कर रहे हो। तुम गाड़ी रोकते क्यों
नहीं? महोदय, सूची में आपने अपना नाम नहीं लिखाया है। इसलिए हम जा रहे हैं। इस
प्रकार मेरे मित्रों, यह एक विनोदी स्वभाव है, खुलकर हंसना, स्वस्थ रहने एवं जीवन
में सफल होने के लिए अति आवश्यक है तथा एक सफल व्यक्ति प्रमुख रूप से सदा अपने
विचारों के प्रति जागरूक रहता है, विभिन्न प्रकार के विचार जो उसके मन में आते रहते
हैं। क्यों? विचार से क्रिया होती है। क्रिया से आदत बनती है। आदत
चरित्र में परिणित होती है। चरित्र भविष्य का निर्माण करता है। इस प्रकार भविष्य
विचारों पर निर्भर है। यदि विचार शुद्ध तथा श्रेष्ठ हैं, हमारे कार्य शुद्ध तथा
स्वच्छ होंगे। जब कार्य स्वच्छ हैं, हमारी आदतें श्रेष्ठ हैं। जब आदतें श्रेष्ठ
हैं, हमारे पास अनुपम चरित्र होगा, जो एक सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करता है।
इसलिए एक सफल व्यक्ति को सदा अपनी विचार प्रक्रिया के प्रति सतर्क रहना चाहिए।
एक सफल
व्यक्ति एक कृतज्ञतापूर्ण या कृतज्ञ व्यक्ति होता है। व्याकरण की दृष्टि से दोनों
ही स्वीकार्य हैं। एक सफल व्यक्ति सदा कृतज्ञ होता है।
महात्मा
गांधी, जवाहर लाल नेहरू या किसी अन्य महान व्यक्ति का इस सम्बन्ध में जीवन चरित्र
पढ़ें। वे सदा अपने माता-पिता, अपने अध्यापकों, मित्रों, सम्बन्धियों जिन्होंने उनके
जीवन के विभिन्न स्तरों पर मार्गदर्शन दिया है, के प्रति कृतज्ञता के कुछ शब्द कहते
हैं। भगवान को लो, सर्वोत्तम उदाहरण हैं। वे अपने प्राइमरी स्कूल के अध्यापकों को
याद करते हैं। भले ही उन्होंने अत्यन्त साधारण पाठ ककहरा ही पढ़ाया है। वे अपने सभी
अध्यापकों को याद करते हैं, कोन्डप्पा, झीनाप्पा और बहुत से अप्पाओं को वे याद करते
हैं। बहुत से अध्यापकों के नामों को वे याद करते हैं, तथा उत्साहित हो जाते हैं।
महबूब खां! वे इन अध्यापकों के सम्बन्ध में बताते ही रहते हैं। आह! उन्हें देखें!
ऐसा लगता है जैसे कि भगवान उर्वाकोण्डा चले गये हैं। मानो कैसेट घूम गया हो। वे
बोलते जाते हैं और अपने मित्रों के सम्बन्ध में, उनकी बहुत प्रशंसा करते हैं, उनमें
से आज कोई नहीं है।
कुछ समय
पूर्व, मुझे भलीभांति याद है, एक व्यक्ति जो स्वयं से चल नहीं सकता था, अपने पोते
के साथ आया था और दर्शन के लिए एक खम्भे पर झुका हुआ था। स्वामी ने घूमने का अपना
चक्र पूरा कर लिया था। उन्होंने उस सुबह वह सब वितरित किया जो वह चाहते थे। लेकिन
यकायक वे एक बैग लेकर बाहर आये और सीधे उस व्यक्ति के पास गये। "यह धोती तुम्हारे
लिए है, यह कुर्ता है तुम्हारे लिए और यह साड़ी तुम्हारी पत्नी के लिए" वे उन्हें
समझा रहे थे। उत्सुकतावश मैं जानना चाहता था, कौन है वह। जानकारी करने पर मुझे
ज्ञात हुआ कि वे बुक्कापटनम के सत्यनारायण शेट्टी, उनके सहपाठी हैं, और भगवान स्वयं
वह बैग देने के लिए गये। यह कार्य, आखिरकार कोई भी सेवादल सदस्य कर सकता था और मुझे
इस अवसर के लिए अति प्रसन्नता होती, लेकिन वे स्वयं गये और दिया।
वे
लोगों को याद रखते हैं वे कभी भूलते नहीं। मुझे भलीभांति महालेखाकार कार्यालय के एक
व्यक्ति की याद है। वे हम लोगों के साथ राजामुन्दरी में थे। स्वामी ऊपर चले
गये थे, यकायक वे आ गये और कहा "एक व्यक्ति बाहर निकले हुए दांत वाला
हैदराबाद से आया है। उसके पास धन नहीं है, उसे रहने का स्थान दिला दो।" यह वह है जो
भगवान ने कहा, उन्होंने उसके नाम का उल्लेख नहीं किया। वे कभी किसी को नहीं
भूलते। कुछ दिनों पूर्व उन्होंने "बिवकीना" नाम का उल्लेख किया जो एक परिवार का
अन्तिम नाम है। उन्होंने इस परिवार का उल्लेख तीस या चालीस बार किया और वे उन लोगों
से 40 वर्ष पहले मिले थे। मैं आश्चर्य चकित रह गया था। वे सब पूर्वी गोदावरी जनपद
के लोग थे। मैंने स्वामी से पूछा, "आप किस प्रकार इतने पुराने नाम जानते हैं?"
भगवान ने कहा "मैं सनातन हूं, मैं नया नहीं हूं। मैं प्रत्येक वस्तु जानता हूं।"
कृतज्ञता सहित भगवान वेंकट गिरि के राजा, माता जाम नगर, बरगुला के रामकृष्ण राव और
ऐसे ही अनेक लोगों के बारे में बातें करते हैं। जब वे इन लोगों के बारे में बात
करते हैं उस समय वे समय की समस्त सीमायें भूल जाते हैं। कोडाई कनाल में उनके
साथ व्यतीत किये क्षणों के सम्बन्ध में भगवान ने कम से कम अपनी दो वार्ताओं में
सन्दर्भित किया था। बरगुला रामकृष्ण राव, वेंकटगिरि के राजा और राज माता नवानगर,
क्योंकि आप जानते हैं वह प्रारंभिक काल था और वे पूर्व जन्म के भक्त थे, अन्यथा
उनके दिव्यत्व को कौन जान सकता था। यह है एक सफल व्यक्ति का चरित्र। जिसे हमें
स्वामी से सीखना है। यदि तुम समझते हो, तुम ईश्वर हो और कुछ नहीं सीखते, ठीक है। हम
यहां हैं तथा हम वहां भी हो सकते हैं। ईश्वर अवतरित हुए हैं, हमें अपने व्यवहार
द्वारा सिखाने के लिए, अपने स्वयं के जीवन के माध्यम से वे हमें सिखाना
चाहते हैं।
एक सफल
व्यक्ति सदा कृतज्ञता का यह गुण अपने साथ रखता है और यहां इस सम्बन्ध में हमारे पास
दो बिन्दु हैं। जैसा कि भगवान ने कहा - "दूसरों ने जो तुम्हारे साथ भलाई की है,
उसे सदा याद रखो, भूल जाओ जो भला काम तुमने दूसरों के लिए किया है, क्योंकि यदि तुम
अपने द्वारा किये गये कार्यों को याद करते हो तो तुम्हें बदले में कुछ मिलने की आशा
होगी। तुम्हें कृपा के किसी कार्य, धन्यवादिता के कार्य, कुछ याद रखने वाले कार्य
के लिये धन्यवाद आदि की आशा होगी। भूल जाओ, अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गये
भले कार्य। याद रखो वे सभी भले कार्य जो दूसरों ने तुम्हारे लिए किये हैं।" दूसरी
बात जो स्वामी सदा कहते हैं वह है "याद
रखो, उन कष्टों को जो
तुमने दूसरों को दिया है। भूल जाओ उन कष्टों को जो दूसरों ने तुमको दिया है। यदि
तुम दूसरों के द्वारा दिये कष्टों को याद रखते हो तो तुम बदला लेना चाहोगे, तुममें
बदले की भावना होगी। तुम मुंह तोड़ जवाब देने तथा विरोध करने के लिए सदा कटिबद्ध
रहोगे। यह एक सफल व्यक्ति का गुण नहीं है। क्षमा करो और भूल जाओ। हर एक को क्षमा
करना तथा भूल जाना चाहिए।"
यही वह है जो भगवान ने कहा। सफल व्यक्ति या इस सन्दर्भ में एक सामान्य व्यक्ति के
लिये एक अन्य महत्वपूर्ण बिन्दु है। दूसरों की बुराइयां खोजने के लिए जीवन अत्यधिक
संक्षिप्त है। जीवन बहुत छोटा है कि हम दूसरों की समस्त कमियों के बारे में सोचते
रहें, हमारा अन्त होने की गति तीव्र तथा अत्यन्त निकट हो जायेगी। इसके स्थान पर एक
सफल व्यक्ति के समान क्यों नहीं हम सकारात्मक बिन्दु ले सकते हैं, नकारात्मक
बिन्दुओं पर चिन्तन करने के बजाय। यही वह है जो भगवान ने कहा -
ढूंढ़ो नहीं दूसरों की
बुराइयां
ढूंढ़ो स्वयं
अपनी बुराइयां
ढूंढ़ो दूसरों
के गुण
प्राप्त करो
दूसरों के गुण
जानो स्वयं
अपनी कमियां।
यह एक सफल
व्यक्ति का गुण है, और पवित्र बाइबिल कहती है -
"निन्दा मत
करो अन्यथा तुम्हारी निन्दा होगी" (Judge not lest ; Thou shall be judged) यह एक
अनिवार्य गुण है। अन्तिम नहीं, लेकिन कम से कम सकारात्मक दृष्टिकोण होना आवश्यक है।
अध्याय
-2
पंच कोष
मैं विश्वास
करता हूं कि सत्य की खोज करना सभी उपलब्धियों से श्रेष्ठतम है और उसका प्रकाशन करना
प्रत्येक का कर्तव्य। आगे, बार-बार कहना व्यक्ति को उसे याद रखने तथा स्मरण कराने
में सहायता करता है। मौलिक रूप से प्रत्येक जीव में पांच कोष होते हैं -
1. अन्नमय कोष
:- अन्न का कोष। अन्न का कोष पृथ्वी मां की कोख से जन्मता है। यह स्थूल शरीर, इस
अन्न के कोष से निर्मित है। इस प्रकार पहला अन्न कोष पक्षियों, जानवरों तथा मानव
में समान रूप से है। पक्षी और पशु जब भूखे होते हैं, खाते हैं, जबकि हम भूखे न होने
पर भी खाते हैं। पक्षी एवं पशु प्यासे होने पर पीते हैं, जबकि हम प्यासे न होने पर
भी पीते हैं और हानिकारक पेय जैसे शराब और अल्कोहल का उपयोग करते हैं। निद्रा मानव
और पशुओं दोनों में समान रूप से होती है। सावधानी, दोनों में समान रूप से है। इस
प्रकार हम अन्न के कोष, अन्नमय कोष के सन्दर्भ में गौरवान्वित नहीं हो सकते। हम
समझते हैं कि शरीर के सम्बन्ध में विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी(टेक्नोलोजी) का हमारा
ज्ञान गौरव का विषय है, लेकिन वह निश्चित रूप से नहीं है। बल्कि यह शर्म की बात है
क्योंकि पशु बगैर इंजीनियरिंग की शैक्षणिक डिग्री प्राप्त किये तथा ज्ञान के, अपने
घर स्वयं बनाते हैं। कृषि के क्षेत्र में बगैर निपुणता प्राप्त किये, वे अपना भोजन
स्वयं प्राप्त कर लेते हैं। बिना आरामदायक बिस्तरों के वे बेहतर नींद लेते हैं
क्योंकि वे कल के सम्बन्ध में नहीं सोचते। यह केवल मनुष्य है जो समुचित प्रकार से
भोजन भी नहीं कर सकता, उसे कल के भोजन के सम्बन्ध में सन्देह रहता है। यह केवल मानव
है जो समुचित नींद नहीं ले पाता क्योंकि वह भविष्य के प्रति चिन्तित रहता है। पहला
कोष मानव व पशु दोनों में समान रूप से है। यही वह है जिसे हम भौतिकीकरण कहते हैं।
इस भौतिकीकरण को गायत्री भी कहा जा सकता है।
2. प्राणमय कोष
:- दूसरा कोष प्राण का कोष है। प्राण पानी से उत्पन्न है जो हम पीते हैं - जैसे
स्थूल शरीर अन्न से जन्मता है। यह कोष भी पक्षी, पशु और मानव में समान रूप से है।
यदि मात्र शरीर है तो यह काफी नहीं है। शरीर क्रियाशील होना चाहिए, आंखें देंखे और
कान सुनें। यदि शरीर सक्रिय नहीं है, बल्कि निष्क्रिय है तब वह प्रदर्शन हेतु रखी
एक मूर्ति के समान है। शरीर को समुचित रूप से क्रियाशील होना चाहिए। इसके लिए प्राण
आवश्यक (महत्वपूर्ण) है। एक साधारण सा उदाहरण एक बीस साल के लड़के ने अपनी मां खो
दी। वह चीखा "ओ मां, तुम कहां चली गई?" लड़का बिल्कुल अकेला है। मां लेटी हुई थी। एक
बुद्धिमान व्यक्ति आया और उससे कहा - "वह तो यहां है। तुम रो क्यों रहे हो? यदि तुम
समझते हो कि यह शरीर तुम्हारी मां है तो वह यहां है।" लड़के ने कहा - "प्राण चले गये
हैं" "तब तुम्हारी वास्तविक मां कौन है?" यदि तुम्हारी वास्तविक मां यह शरीर है, तो
इसे अन्दर ले जाओ।" इसके विपरीत तुम उसे बाहर ले जाने की जल्दी में हो। जिस शरीर को
तुमने पिछले 20 वर्षों से प्यार किया, तुम उसे चिता में रखने के लिए उद्यत हो।
क्यों? जब प्राण हैं केवल तभी शरीर मूल्यवान है। जिस क्षण प्राण चले गये वह जलाने
वाली लकड़ी से भी निकृष्ट है। एक अन्य उदाहरण, उस दिन वर्षा हो रही थी। एक आदमी
मन्दिर गया। चूंकि वहां चप्पलें सदा खो जाती हैं, बदल जाती हैं या चोरी चली जाती
हैं, व्यक्ति में उन्हें वहां रखकर खतरा लेने की इच्छा नहीं थी। वह निकट की एक
दुकान पर गया और दुकानदार से अपनी चप्पलें वहां रख लेने हेतु अनुरोध किया। दुकानदार
मान गया। उसी दिन, उसी समय एक अत्यन्त धनी व्यक्ति मर गया। मृत शरीर एक खुली अवस्था
में, स्ट्रेचर पर उसी सड़क से ले जाया जा रहा था। बहुत तेज वर्षा शुरू हो जाने के
कारण लोग, जो मृत शरीर ले जा रहे थे, दुकान पर रुक गये और दुकानदार से पूछा कि क्या
वह कुछ देर के लिए मृत शरीर को अपनी दुकान के अन्दर रख सकता है। दुकानदार अति
क्रोधित तथा परेशान हो गया। "यह कब्रगाह नहीं है" वह चिल्लाया। इस प्रकार जिस क्षण
इस शरीर से प्राण निकल जाते हैं, यह एक जोड़ी चप्पलों के बराबर भी नहीं रह जाता। जब
तक प्राण हैं सब प्रकार की सुगन्धि, कपड़े आदि शरीर के सौन्दर्य को बढ़ाने में उपयोगी
हैं। जिस क्षण प्राण निकल गये, वह कूड़े के ढेर के बराबर भी नहीं रहता। इसलिए
प्राणों का कोष, प्राणमय कोष, अन्नमय कोष से अधिक मूल्यवान है। यह प्राण जल से
उत्पन्न होता है। यदि तुम दो दिन भी पानी बन्द कर दो, तुम मर जाओगे। इसलिए जीवन
द्रव मेरुदण्ड में रहता है। नवीं और बारहवीं कशेरुका के बीच प्राण रहता है, एक
विद्युत प्रवाह की चमक के समान। यह प्रकाश शरीर के प्रत्येक कोष में विद्यमान है।
इसलिए शरीर से अधिक प्राण महत्वपूर्ण है।
3. मनोमय कोष
:- तीसरा कोष मन का है। प्राण से अधिक मन महत्वपूर्ण है 'मन' को संस्कृत में 'मनस'
कहा जाता है। इसलिए वह जिसके पास मनस या मन है मानव है। यदि मन नहीं है तो मानव
नहीं है। भगवान बाबा के अनुसार मन है क्या? मन विचारों का गुच्छा है। विचार, भोजन
के प्रकार, जो हम खाते हैं पर निर्भर है। यदि हम पशु खाद्य खाते हैं हममें पशुवत
विचार होंगे। इसलिए मानव मन रखने के लिए हमें पशुजनित खाद्य पदार्थों को नहीं खाना
चाहिए। लोग मन के मात्र तीसरे कोष तक यात्रा करते हैं। वे अन्य दो कोषों के
अस्तित्व को भूल जाते हैं। वे अन्तिम दो कोषों का उपयोग करना भूल जाते हैं। वे इन
तीन कोषों से ही सन्तुष्ट हो जाते हैं।"
उदाहरण
- तुम्हारे पास बैंक के बचत खाते में धन है, तुम्हारे पास कुछ धन आवर्ती जमा खाते
में है। तुम्हारे पास बैंक में कुछ स्वर्ण भी हो सकता है। तुम ये सब भूल जाते हो और
मात्र बचत खाते के सम्बन्ध में सोचते हो। तुम्हारे पास धन विभिन्न खातों में है।
तुम्हारे पांच खाते हैं, लेकिन तुम केवल तीन खातों के बारे में विचार करते हो। बाबा
तुमको बताने के लिए यहां हैं कि तुम्हारे पास दो अन्य खाते भी हैं और तुम उनसे भी
धन प्राप्त कर सकते हो। यदि तुम दिवालिया हो जाते हो, तुम इन अन्य दो खातों से धन
निकाल सकते हो। ये दो अतिरिक्त खाते क्या हैं, जिनमें तुम अधिक एवं उच्च ब्याज पाते
हो?
4. विज्ञानमय कोष
:- विवेक का कोष, अच्छे बुरे का भेद करने की इन्द्रिय। यह पशुओं और पक्षियों में
नहीं पाई जाती। विज्ञान साइंस नहीं है। विज्ञान निर्णय करने, विवेक, बुद्धि तथा
समझदारी का ज्ञान है। यह वह है जो आंकलन करता है तथा बुराई से अच्छाई को अलग करता
है। यह वह है जो क्या सही तथा क्या गलत है का निर्णय करता है। यह चौथे कोष का काम
है। मानव ही केवल निर्णय कर सकता है कि क्या ठीक है और क्या गलत, क्या अच्छा है या
बुरा। इसीलिए पाप व पुण्य केवल मानव के लिए है। हम कभी नहीं कह सकते कि अमुक पाप
टाइगर या शेर ने किया है या शेर ने एक हत्या की है या एक बैल स्वर्ग जायेगा या चीता
नर्क जायेगा, क्योंकि वे अपनी क्रियाओं के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं। वे आवश्यकता
से प्रेरित हो उसी क्षण क्रिया करते हैं। वे बस उसी क्षण कार्य करते हैं। यह पशु
जगत का प्राकृतिक गुण है। इसलिए हम पाप या पुण्य पशुओं के लिए निर्धारित नहीं कर
सकते। लेकिन आदमी में निर्णय करने की शक्ति है। जब वह कुछ ऐसे कार्य करता है जो
अच्छे हैं, वह पुण्य होता है। अब मैं समझता हूं कि हम मानव और पशु के बीच अन्तर को
समझ गये हैं। कभी-कभी जानवरों में समझदारी के लक्षण मिलते हैं। चिड़ियां अपने अण्डे
सुरक्षित और आरामदायक स्थान पर रख देती हैं। वे घोसला बनाती हैं। नवजात गाय का
बच्चा स्वयमेव मां गाय का दूध पीने थन पर पहुंच जाता है। नवजात बछड़ा दूध के लिए दुम
या पैर की ओर नहीं जाता।
विचार मन में
आते हैं। विचार, क्रोध व विद्रोह के हो सकते हैं। तुम तुरन्त ही उन पर कार्य नहीं
करते, क्योंकि यदि तुम करते हो, तुम पशु हो, मानव नहीं। तुम्हें प्रतीक्षा करनी
चाहिए अन्यथा फिर तुम नष्ट हो जाओगे। जब विचार आते हैं, विवेक के इस चौथे कोष का
उपयोग करें जो अच्छे-बुरे का भेद कर सकता है। मैं किसी पर क्रोधित हूं, क्या मैं
सही हूं या गलत? मैं अत्यधिक उद्वेलित हूं, क्या मैं सही हूं या गलत? समय लो और
प्रतीक्षा करो। यदि कोई व्यक्ति प्रतीक्षा नहीं कर सकता वह दुगुना पशुवत है। सोचो
और भेद करो, यही वह है जो एक आदमी से आशा की जाती है। सर्वप्रथम विचार करने के बाद
कि क्या अच्छा व बुरा है तुम्हें केवल तब ही कार्य करना चाहिए। बाबा सदा लड़कों से
कहते हैं कि जब कभी बुरे विचार आयें, तुम्हें स्वयं से पूछना चाहिए। मैं मानव हूं
या पशु?" तुम्हें यह प्रश्न दस बार अपने से करने चाहिए। यदि तुम यह प्रश्न दस बार
प्रत्येक बुरे विचार के सम्बन्ध में करते हो तब तुम कभी भी गलत तरीके से काम नहीं
करोगे। उसके बाद जो क्रिया होगी उसे अच्छा ही होना है। पशु और पक्षियों में भी
अतिरिक्त ज्ञान बोध होता है। मात्र इस स्थूल शरीर, इस पहले अन्नमय कोष को ही सब कुछ
समझना काफी नहीं है।
5. आनन्दमय कोष
:- पांचवा कोष आनन्द का कोष है। यह पशुओं और पक्षियों में नहीं होता है। इस प्रकार
पांच कोषों में तीन मानव एवं पशु जगत में समान रूप से हैं जबकि मानव में दो
अतिरिक्त हैं। यह कोष आपको सदा आनन्द की स्थिति में रखता है। वास्तव में, हमारी दशा
निरन्तर आनन्द की रहती है, लेकिन हम उसे अपने मनोवेगों से नष्ट करते हैं। हमें
व्यक्तियों, परिस्थितियों तथा पदों से आसक्ति हो जाती है। हम उसी प्रकार कार्य करना
चाहते हैं जैसी इच्छा करते हैं। उदारणार्थ - रूमाल सफेद है, तुम उसका प्रयोग करते
हो और इसलिए वह गन्दा हो जाता है। गन्दगी रूमाल का गुण नहीं है। तुमने उसे गन्दा कर
दिया है। इसी प्रकार हम सदा आनन्द की दशा में रहते हैं। वास्तविक आनन्द तुम्हारे
अन्दर है, जो ईश्वर है, हमने उसे इन्द्रियजनित सुख के लिए खो दिया है। इस प्रकार
अपने समस्त मानसिक उद्वेलन, अस्त-व्यस्तता तथा कष्टों के लिए एक मात्र हम ही
उत्तरदायी हैं, कोई दूसरा नहीं।
अध्याय
-3
शरीर सम्बन्धी समझदारी
आज हम शरीर के
सम्बन्ध में जानने का प्रयास करेंगे। जहां पर समझदारी है वहां समाधान होगा। जहां
समझदारी नहीं है, वहां समाधान नहीं होगा। कुछ लोग कहते हैं, "हम सामंजस्य नहीं कर
सकते।" मेरा पति बहुत भयंकर है, मैं उसके साथ समायोजित नहीं हो सकती। "मेरी पत्नी
अत्यन्त कठोर है, मैं उससे सामंजस्य नहीं बिठा सकता।" हम अक्सर शिकायत करते हैं कि
हम समझौता नहीं कर पाते। घर या कार्यालय कहीं पर भी सामंजस्य क्यों नहीं है? जहां
कहीं भी समझदारी होगी वहां सामंजस्य होगा। मान लीजिए, पति शाम देर से घर लौटता है।
यदि पत्नी में पूर्ण समझदारी है, वह अपने पति से कहेगी। "तुम्हें देर हो गई, मुझे
अत्यन्त दु:ख है। तुम बहुत थके भी होगे। मुझे नहीं मालूम कि तुम दोपहर का भोजन या
चाय भी ले सके हो या नहीं।" वह उसका स्वागत दरवाजे पर करेगी तथा उसके नहाने के लिए
गरम पानी तैयार रखेगी। वह अपने पति से समझौता करेगी यद्यपि वह देर से आया है। इस
प्रकार से उसका इस देर से आने वाले पति से सामंजस्य, पूर्ण समझदारी का परिणाम है।
मान लीजिए
वहां समझदारी नहीं, मान लीजिए वहां गलतफहमी है। यदि पति आधा घण्टा देर से आता है,
वह विस्तार से स्पष्टीकरण की मांग करेगी। "तुम्हें क्यों देर हुई, तुम कहां पर थे?"
वही पति और वही पत्नी, लेकिन समझदारी और समन्वय में भिन्न। परस्पर समझदारी के अभाव
में सामंजस्य नहीं होता। यह समझदारी है क्या? जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में
आवश्यक है। उस व्यक्ति में समझदारी होनी चाहिए जो व्यापार कर रहा है। व्यापार में
समझदारी क्या है? तुम्हें कच्चा माल जान लेना चाहिए। तुम्हें उत्पादन प्रक्रिया
जाननी चाहिए। तुम्हें उत्पादित वस्तु की पैकिंग करने के सम्बन्ध में भी जानना
चाहिए। तुम्हें प्रचार के उपायों को जानना चाहिए। तुम्हें बाजार में और वितरण के
सम्बन्ध में भी जानकारी होनी चाहिए। यह समझदारी है जो एक व्यापारी से आशा की जाती
है ताकि वह कर्मचारियों तथा निदेशकों से पूर्ण सामंजस्य बिठा सके। यदि किसी
व्यापारी को वस्तु के बारे में जानकारी नहीं है जिसका वह उत्पादन कर रहा है,
कर्मचारियों के कार्य की प्रकृति, एजेंटों और वितरकों की कोई जानकारी नहीं है,
प्रचार माध्यमों की जानकारी नहीं है, बाजार के सम्बन्ध में यदि उसमें जानकारी का
अभाव है तो वह निश्चित ही नुकसान उठायेगा।
एक अध्यापक व
विद्यार्थी के बीच समझदारी का होना आवश्यक है। अध्यापक को समझना है कि उसे क्या
पढ़ाना है, विद्यार्थी का स्तर क्या है, शिक्षण का उद्देश्य और वह सब जो परीक्षा के
लिए आवश्यक है। शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थी के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक
है। एक विद्यार्थी में यह पूर्ण समझ होनी चाहिए कि वह यहां क्यों है? वह क्या चाहता
है, परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए कैसे अध्ययन करे तथा उसके बाद क्या करना है?
आध्यात्मिकता
में भी समझदारी का होना आवश्यक है। क्या समझना है? किनके बीच समझदारी विकसित करनी
है? कैसे, क्यों और क्या समझना है? क्या होगा यदि वहां पूर्ण समझदारी नहीं है। क्या
नुकसान या लाभ होगा? हमें अपने स्वयं की पूर्ण समझदारी होनी चाहिए। हमें ईश्वर की
पूर्ण समझदारी होनी चाहिए। मैं यहां एक भक्त की स्थिति में हूं। बाबा यहां ईश्वर की
स्थिति में हैं। हमें दोनों की ही जानकारी होनी चाहिए। यही वह है जो आध्यात्मिकता
के लिए आवश्यक है।
दो दिन पूर्व
बाबा ने कहा "सैकड़ों वर्षों से मानव ने ईश्वर से अलगाव महसूस किया है।" जब
तक तुम सोचते हो, तुम ईश्वर से भिन्न हो, तुम ईश्वर की अनुभूति कभी नहीं कर सकोगे।"
यह समझदारी है। मुझे जानना चाहिए कि मैं कौन हूं। मुझे जानना चाहिए कि वह कौन हैं।
यह शक्कर है, यह पानी है। पानी, पानी है, शक्कर शक्कर है। जब हम दोनों को मिला देते
हैं, तो वह न तो शक्कर रह जाता है और न पानी। वह मीठा शरबत हो जाता है। वह
साधारणतया न तो पानी रह जाता है न शक्कर। इसी प्रकार एक भक्त एक साधारण जीव नहीं
है। वह मात्र शरीर नहीं है। वह मात्र हड्डियों की गठरी तथा मांस का पिण्ड नहीं है।
प्रत्येक को अपने स्वयं की समझ होना आवश्यक है।
आइये मैं
सर्वप्रथम भक्त के रूप में समझदारी की चर्चा करता हूं। मुझे एक भक्त के रूप में
जानना चाहिए कि मैं कौन हूं? आज हम अन्य सबके बारे में जानना चाहते हैं। हम पूछते
हैं "तुम कौन हो?" तुम कहां से आये हो? तुम क्या करते हो? कब तक तुम यहां रहोगे?
आपके अनुभव क्या-क्या हैं? हम प्रत्येक अन्य के सम्बन्ध में सब कुछ जान लेना चाहते
हैं, लेकिन हम अपने बारे में कुछ नहीं जानते। हम सारी खबरें जानना चाहते हैं, लेकिन
हम अपने अन्दर की बुराइयों की उपेक्षा करते हैं।
हम अपने को
शरीर के रूप में मानते हैं। जब मैं कहता हूं - "मैं आ गया हूं।" इसका अर्थ है शरीर
आ गया है। जब मैं कहता हूं "मैं अनिल कुमार हूं" इसका अर्थ है यह शरीर अनिल कुमार
है। जब मैं कहता हूं "मैं अध्यापक हूं" इसका अर्थ है कि इस शरीर ने अध्यापक की
भूमिका अपनाई है। जब मैं कहता हूं "मैं भारतीय हूं, इसका अर्थ है कि इस शरीर का
जन्म भारत में हुआ है। यदि मैं एक मध्यम आयु के व्यक्ति से बात करता हूं। यह शरीर
है जिसके बारे में बात कर रहा हूं। इस प्रकार समस्त कार्यों के लिए हम अपनी पहचान
शरीर से करते हैं, लेकिन खोज करने पर आप जानोगे कि आप शरीर नहीं हैं।"
जरा अपना
परीक्षण करें। 20 वर्ष पहले आप अति प्रसन्न तथा सुन्दर थे। मध्यम आयु आने तक पचास
प्रतिशत आकर्षण चला गया। साठ साल के बाद लोग आपकी उपेक्षा करने लगते हैं। घुंघराले
बालों के स्थान पर गंजी खोपड़ी ने ले ली। आपको नकली दांत लगाने पड़ गये। आपको चश्मा
लगाना पड़ गया। आपकी सुनने की शक्ति चली गई। आपको श्रवण यन्त्र उपयोग करना पड़ता है
और आपकी स्मरण शक्ति भी चली गई। इसलिए यदि आप वास्तव में शरीर हो, फिर ये परिवर्तन
क्यों होने चाहिए? एक स्थिति में आप अत्यधिक शक्तिशाली थे और बाद में आप शक्तिहीन
हो गये। शरीर को अन्त में जल जाना पड़ता है।
यदि आप शरीर
हो तब क्या आप कह सकते हो कि आप शरीर हो? क्या आप उसके लिए प्रसन्नता, गौरव या
घमण्ड महसूस कर सकते हो?
यदि एक वृद्ध
व्यक्ति कहता है कि वह जवान और खूबसूरत था, लोग उसकी उपेक्षा करेंगे यहां तक सन्देह
भी करेंगे। यह प्रत्येक व्यक्ति की कहानी है जो अपनी पहचान शरीर से करते हैं।
तुम्हारे पास शरीर है जो शक्तिशाली है, बाद में वह कमजोर हो जाता है। शरीर जब युवा
होता है, पेट्रोल के रूप में भोजन से शरीर क्रियाशील होता है। बाद में वह दवाइयों,
कैपसूलों और गोलियों से कार्य करता है। क्या हम वास्तव में शरीर से प्रसन्न हैं?
यदि हम एक दिन स्नान नहीं करते हैं लोग हमसे दूर भागेंगे। उससे अच्छी सुगन्ध नहीं
आती है। इसलिए हम सुगन्ध का उपयोग करते हैं। आदमी बीमार पड़ता है और उसका मांस कम
होकर हड्डियों से चिपक जाता है। यह शरीर किसी भी क्षण, आयु का ध्यान न रखते हुए,
नष्ट हो सकता है। एक फोटोग्राफर तुम्हारी फोटो खींचने के पहले तुमसे मुस्कराने के
लिए कहता है। मृत्यु का देवता भी एक कैमरामैन है, लेकिन वह तुमको चेतावनी नहीं
देता। इस प्रकार से क्या है जो इस शरीर के सम्बन्ध में निश्चित है? नहीं, नहीं, सही
समझदारी शरीर के सम्बन्ध में यही है कि हमें उसके साथ अपनी पहचान नहीं बनाना चाहिए।
एक उदाहरण।
खेत में तुम बीज बोते हो, फसल उगाते हो, और उससे भोजन मिलता है। यह शरीर भी एक खेत
के समान है। इसे "क्षेत्र" कहा जाता है। यह संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ खेत होता
है। संस्कृत में शरीर को "देह" भी कहा जाता है, वह जो शीघ्रता से जल जाता है। जब तक
हम जीवित हैं हम इच्छाओं से जल रहे हैं। जिस क्षण प्राण निकल जाते हैं शरीर जला
दिया जाता है। जब जीवित रहते हैं हम जलते हैं और मृत्यु के बाद भी हम जलते हैं। इस
प्रकार से जो जलता है वह देह है, शरीर है।
देह को शरीर
भी कहा जाता है अर्थात जो सड़ता है। इस प्रकार से शरीर के तीन नाम हैं, क्षेत्र,
देह, और शरीर। इसलिए क्या तुम इस प्रकार शरीर से अपनी पहचान कर सकते हो? नहीं!
इसलिए किसी को भी तार्किक, बौद्धिक, वैज्ञानिक एवं भौतिक रूप से नहीं कहना चाहिए कि
वह शरीर है। यह एक भक्त के रूप में स्वयं अपने को समझने की प्रक्रिया में पहला कदम
है।
भगवान ने हाल
ही में कहा - "आध्यात्मिकता क्या है?" कुछ लोगों ने कहा कि यह सेवा, अर्चना, ध्यान
और तप है। बाबा ने कहा - "यह आध्यात्मिकता नहीं है" ये मात्र भले कार्य हैं, समय
को सार्थक करने के लिए, इनका कोई सम्बन्ध आध्यात्मिकता से नहीं है। सच्ची
आध्यात्मिकता अन्वेषण का मार्ग है। आध्यात्मिकता आत्मा का ज्ञान है।" इस
प्रात: हम अन्वेषण का प्रयास करते रहे है कि क्या हमें इस शरीर से अपनी पहचान करनी
चाहिए?" अब, यह जानने के बाद कि क्यों हम शरीर के साथ अपनी पहचान नहीं बनाना चाहते।
हमें जानना है फिर भी हम क्यों उससे अपनी पहचान मानते हैं। पहला बिन्दु है
शक्तिशाली इन्द्रियों का खिंचाव। वे प्रबल होती हैं तथा अधिकार कर लेती हैं।
फैक्टरी के निदेशक कर्मचारियों के अधिकार में है। कोई भी निदेशक की परवाह नहीं
करता। इस प्रकार आत्मा निदेशक है। इन्द्रियां कर्मचारी हैं। निदेशक अब कर्मचारियों
के नियन्त्रण में है। सत्य है कि इन्द्रियां गुलाम हैं तथा आत्मा स्वामी है। लेकिन
स्थिति अब उलट गई है। स्वामी गुलाम बन गया है और गुलाम स्वामी हो गये हैं। इसलिए
इन्द्रियों की शक्ति के कारण हम अपने को शरीर के साथ पहचान करते हैं। इन्द्रियां
शक्तिशाली हैं, जो इन्द्रियजनित सुख के लिए बाह्य वस्तुओं की ओर बहिर्मुखी हो जाती
हैं। यह इन्द्रियजनित सुख भौतिक संसार में भौतिक वस्तुओं से मिलता है। यदि तुम
इन्द्रियों का इस प्रकार से अनुसरण करते रहते हो, तुम एक पशु के समान निम्न स्तर तक
चले जाते हो।
भौतिक वस्तुएं
बाहर हैं। आंखें बाहर की ओर खुलती हैं, कान बाहर हैं, मुख बाहर की ओर खुलता है। इस
प्रकार सभी इन्द्रियां बाहर की ओर खुलती हैं। बाहर की भौतिक वस्तुएं उन्हें आकर्षित
करती हैं। इसी प्रकार इन्द्रियां जो बाहर की ओर खुलती है, भौतिक वस्तुओं से आकर्षित
होती हैं तथा इन्द्रियजनित सुख प्रदान करती हैं। इस प्रकार समस्त कार्य व्यापार
बाहर होता है। मैं भूखा हूं, मुझे खाने की इच्छा है, जिव्हा खाना चाहती है। अब मैं
प्रसन्न हूं। लेकिन यदि मैं अत्यधिक खा लूं, मैं बीमार और दु:खी हो जाऊंगा। इस
प्रकार जिव्हा की प्रसन्नता अस्थायी है।
मैं पॉप संगीत
सुनता हूं। मैं नृत्य करता हूं फिर एक घंटे बाद ध्वनि प्रदूषण से मैं दु:खी हो जाता
हूं। मैं टी0वी0 और वीडियो कैसेट घण्टों देखता हूं। बाद में आंखों में दर्द हो जाता
है। इस तरह इन्द्रियां जो बाहर की ओर खुली हुई हैं, भौतिक वस्तुओं की ओर बाहर
आकर्षित होती हैं लेकिन वे तुम्हें इन्द्रियजनित सुख अस्थायी रूप से देती हैं। वे
सुख देती हैं तदुपरान्त तुरन्त ही दु:ख भी। वे प्रसन्नता देती हैं तथा तदुपरान्त ही
कष्ट भी। वे प्रशंसा देती हैं, तदुपरान्त निन्दा भी। वे मौज देती हैं और तदुपरान्त
निराशा भी। यह वह व्यापार है जो चलता रहता है जब तक हम बर्हिमुखी हैं। हमें निर्णय
करना चाहिए कि हम शरीर नहीं हैं। यह अन्वेषण का मार्ग है।
अध्याय
-4
समझदारी मन की
पूर्व में
हमने आध्यात्मिकता की पहली बाधा पर चर्चा की थी। हमने शरीर से सम्बन्धित सभी
विवरणों तथा उसके साथ अपनी पहचान के सम्बन्ध में विस्तार से विचार किया था,
परिणामस्वरूप यह एक परदा है जो हमें अपने बारे में सत्य जानने की स्वीकृति नहीं
देता। अब हम सब दूसरी दीवाल, बाधा पर चर्चा करेंगे जो तुम्हारें और ईश्वर के बीच
खड़ी है। अध्ययन के द्वारा हम पहली बाधा जान सके। अब हम गहरें में जाते हैं। मान लो
तुम अपना वक्षस्थल देखना चाहते हो, तुम्हें कोट, कमीज और बनियान निकालना पड़ेगा।
पहले निकालो -
कोट - शरीर
कमीज - मन
बनियान - बुद्धि
इस प्रकार
पूर्व वार्ताओं में चर्चा करके तथा सिद्धान्त के अनुसार हमने कोट, जो शरीर है, उतार
दिया है। मैं अध्ययन के द्वारा तथा सिद्धान्त कहने में अत्यन्त सावधान हूं। मैं
आपके बारे में नहीं जानता, लेकिन जहां तक मेरा सम्बन्ध है। मैं शारीरिक चेतना से
मुक्त नहीं हुआ हूं। मुझ में कुछ गहरी आदतें तथा इच्छायें हैं।
इसलिए मैंने
कहा सिद्धान्तत: तथा अध्ययन द्वारा हमने बाह्य कोट उतार दिया है। शारीरिक चेतना
उतार दी है। अनुभूति व्यक्त नहीं की जा सकती। जब तक आप व्यक्त करते हैं, इसका अर्थ
है आपने अनुभूति नहीं की है। शहद की मक्खी को लें। वह कमल के फूल पर गुंजन करती
रहती है। जिस क्षण वह अमृत पीना शुरू करती है।, वह कोई ध्वनि नहीं करती। एक चम्मच
शक्कर और एक गिलास पानी में मिला दिया गया है। शक्कर का क्या हुआ? चम्मच भर शक्कर
कहां है? वह मिल गई है, घुल गई तथा कोई रंग भी नहीं है। कैसे जाना जाये। शक्कर पानी
में है या नहीं? मैं कहता हूं कि शक्कर पानी में नहीं है। आप कहते हैं कि वहां है।
कैसे जानें? एक बूंद अपनी जिव्हा पर रखें, यदि वह मीठा है तो उसमें शक्कर है।
तुम्हें जानकारी होगी। पढ़ने से नहीं, देखने से नहीं, बल्कि स्वाद लेने से होगी
अर्थात् अनुभूति करने से। यह अनुभूति बोलती नहीं है। मिठास एक अनुभूति है, लेकिन
उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता। इसलिए मैं अनुभव करता हूं उस दशा तक पहुंचने के लिए
मुझे अभी एक लम्बा मार्ग तय करना है। कल्पना करिये, जब मैं उसके सम्बन्ध में
बात करके इतना प्रसन्न होता हूं तो कितनी प्रसन्नता मुझे मिलेगी जब मैं उसकी
वास्तविक अनुभूति करूंगा? कदाचित बाबा चाहते हैं कि मैं कुछ दिन इस प्रकार से बातें
करता रहूं। लेकिन यदि मैं उसे अनुभव कर लूंगा तब आप से वार्ता कौन करेगा?
एक बार चर्चा
के बीच बाबा ने पूछा - "मुक्ति कौन चाहता है? कौन चाहता है मोक्ष?" मैंने उत्तर
दिया - "मैं मुक्ति नहीं चाहता।" उन्होंने कहा "क्यों?" मैंने कहा - "मैं उसकी
क्यों इच्छा करूं जिसे मैं नहीं जानता। मैं नहीं जानता कि वह मीठा है या नहीं, मुझे
नही मालूम है कि वह गोरा है या काला, लम्बा या ठिंगना। मैं नहीं जानता कि मैं वहां
अकेला होऊंगा या नहीं। मैं नहीं जानता कि मुझे वहां भोजन मिलेगा या भूखा रहना
पड़ेगा। कोई भी मोक्ष से कभी लौटा नहीं जो मुझे बताता कि वहां कैसा लगता है? इसलिए
मेरे पास कोई धारणा नहीं और किसी ने कोई धारणा मुझे दिया नहीं। मैं उसे क्यों चाहूं
जिसे कोई जानता नहीं? लेकिन मैं यह जानता हूं कि जब मैं आपके सम्बन्ध में बोलता
हूं, लोग प्रसन्न होते हैं और मैं भी प्रसन्न होता हूं। जब मैं आपका सन्देश सुनता
हूं, वह मीठा लगता है, जब मैं उसे प्रसारित करता हूं, वह और अधिक मीठा लगता है और
जब वे सुनते हैं वह सर्वोत्तम मिठास से युक्त होता है। तब फिर क्यों मैं मोक्ष की
इच्छा करूं? यदि मुझे दुबारा जन्म लेना है, स्वामी। कृपया ध्यान रखें कि मैं अगले
जन्म में भी आपके सन्देश का भागीदार बनूं। मैं, "बाबा" केवल आप के बारे में निरन्तर
बोलना चाहता हूं।"
इसलिए
मित्रों, हम शिक्षार्थी की दशा में हैं। हम अध्ययन की प्रक्रिया में हैं। हमें अभी
भी अभ्यास के मार्ग को पकड़ना है। हमें अभी अनुभूति की झलक पानी है। वह किसी भी दिन
घटित हो जायेगा।
अब कोट, शरीर
पर अध्ययन तथा सिद्धान्त रूप से चर्चा समाप्त होती है।
अब हमें कमीज
- मन पर आना है। मन क्या है? हम मनोवैज्ञानिकों के दृष्टिकोण पर चर्चा नहीं करेंगे।
हम बाबा के दृष्टिकोण को देखेंगे। बाबा के अनुसार मन विचारों की गठरी है। यह वह है
जो संक्षेप में, दोहराता है और याद कराता है। जब कोई विचार नहीं होते, इसका अर्थ है
कि मन नहीं है। वहां केवल दो दशायें हैं विचार या विचारों की अनुपस्थिति। विचारों
की शून्यता नहीं। विचारों की शून्यता, विचारों के न आने से भिन्न है। हमारा मन
विचारों से भरा हुआ है। लेकिन साधना द्वारा हम अपने विचारों को रोक सकते हैं, जिसे
संस्कृत में "अमनस्क" कहा जाता है।
मन से विचारों
को हटाना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मन कभी स्थिर नहीं होता। हाल ही में भगवान ने कहा
शरीर को स्थिर करना सरल है, लेकिन शरीर को दौड़ाना या मेहनत कराना कठिन है। दूसरी ओर
मन को भौतिक संसार में वस्तुओं के पीछे दौड़ाना आसान है, लेकिन उसे स्थिर रखना
अत्यन्त कठिन है। यह स्वाभाविक है। इसलिए मन सदा आगे-पीछे झूलता, कूदता और दौड़ता
रहता है। हमें मन की प्रकृति समझनी है। वह चाहता क्या है, तथा क्या नहीं चाहता और
उसे कैसे नियन्त्रित किया जाय? अनेकों गुरू कहते हैं कि कोई भी मन को नियन्त्रित कर
सकता है। बाबा के अनुसार यह असम्भव है। इसलिए वे स्पष्ट करते हैं कि वह क्यों चंचल
है, वह स्थिर क्यों नहीं। बगैर यह जाने कि वह स्थिर क्यों नहीं होता, कोई कैसे उसे
नियन्त्रित कर सकता है? हमें उसे क्यों नियन्त्रित करना चाहिए?
उदाहरण - एक पेड़ है
जिसमें बहुत सी पत्तियां हैं, पत्तियां डोलती हैं, क्यों? चलती हवा के कारण। जब हवा
नहीं चलती पत्तियां नहीं डोलतीं। इस प्रकार से पत्तियां मात्र चलती हवा के कारण
डोलती हैं। स्वयं अपनी इच्छा से नहीं डोलतीं। इसलिए मन एक पत्ती है और बहती हवा
इच्छायें हैं। इस प्रकार इच्छाओं की बयार, पत्ती मन को हिलाती है। बयार जितनी ही
अधिक होगी पेड़ की पत्तियों में उतना ही 'दोलन' अधिक होगा। कम बयार कम दोलन। इसलिए
यदि हम पत्तियों को नियन्त्रित करना चाहते हैं, ध्यान रहे कि वहां कोई बयार, कोई
इच्छा न हो। बाबा कहते हैं - "कम सामान, अधिक आराम एवं सुखमय यात्रा।" यहां
सामान क्या है? सामान इच्छाओं का है जो हमारी यात्रा को असुविधाजनक तथा कष्टकर बना
देतीं हैं। हमें कम सामान (इच्छायें) रखना चाहिए ताकि मन का दोलन नियन्त्रित हो
सके। एक अन्य उपाय भी है मन को नियन्त्रित करने का, बाबा के अनुसार - खाली दिमाग
शैतान का कारखाना है। यदि कोई निरर्थक बैठा है, मन एक बन्दर के समान आचरण करता
है। इसलिए मन को नियन्त्रित करने के लिए हमें शरीर के द्वारा क्रिया करना है। सेवा
करो।
अपने मन को
सेवा में लगा दो, तुम सफल हो जाओगे। सेवा अर्थपूर्ण हो जायेगी। सेवा उद्देश्य पूर्ण
होगी। सेवा का उद्देश्य पूर्ण हो जायेगा। जब शरीर काम करता है और मन वहां निर्देशित
करने के लिए नहीं होता, तो सम्पूर्ण कार्य बिगड़ जाता है। मानसिक रूप से अनुपस्थित
रहने पर, शारीरिक रूप से उपस्थित होना व्यर्थ है। इसलिए सेवा करने के लिए शरीर और
मन को मिलकर कार्य करना चाहिए।
मन के सम्बन्ध
में एक अन्य बिन्दु है। मन सोचता चला जाता है, लेकिन रोका भी जा सकता है। भगवान एक
उदाहरण देते हैं। एक सर्प है। वह अपना सिर हिलाता तथा ऊपर नीचे करता रहता है।
संपेरा क्या करता है? संपेरा बीन बजाता है और सर्प नाचता है। जब विषधारी सर्प
नियन्त्रित हो सकता है, तो आदमी का मन क्यों नहीं? सरकस में हाथी को एक छोटी-सी तीन
पैर वाली मेज पर खड़ा कर लेते हैं। इतना बड़ा शरीर एक तीन पाये वाली मेज पर। किस
प्रकार से वह यह कर पाता है? क्या हम हाथी या सर्प से कम हैं। हम लोग कोशिश नहीं कर
रहे हैं। इसलिए हम आनन्द का उपभोग नहीं कर पा रहे हैं। एक हाथी का उदाहरण फिर लें।
हाथी का स्वामी उसे नहलाता है। कुछ देर बाद ही हाथी अपनी सूंड़ से अपने सम्पूर्ण
शरीर पर बालू छिड़क लेगा। यद्यपि उसे साफ किया गया था, वह फिर गन्दा हो जाता है।
क्योंकि जब वह संसार में रहता है, वह गन्दा हो जाता है। जब वह संसार से बाहर रहता
है, वह स्वच्छ रहता है। मन में एक अन्य गुण है। वह बहुत प्रसन्न होता है, जब उसकी
प्रशंसा होती है। वह नाचता है, जब उसकी प्रशंसा की जाती है, लेकिन जब आलोचना होती
है तो निराश हो जाता है। इसलिए मन अति विचित्र है।
हम बाबा की
शिक्षाओं को नहीं सुनते, हम मात्र चिन्तित हैं कि वे हमारे पत्र ले लें। हम बाबा को
फूल अर्पित करते हैं, लेकिन बाबा के शब्द रूपी फूलों को नहीं सुनते। हम व्यक्तिगत
साक्षात्कार के सम्बन्ध में अधिक चिन्तित हैं, लेकिन अन्तर्दृष्टि के लिए नहीं। जब
कभी वे हमें कुछ देते हैं, हम गौरवान्वित महसूस करते हैं, लेकिन जब हम उनसे कुछ
नहीं प्राप्त करते तो हम निराश होते हैं।
बाबा एक गुलाब
के फूल का उदाहरण देते हैं। एक बार दो मित्र थे। एक दिन एक मित्र ने दूसरे को एक
गुलाब का फूल भेंट किया। कुछ दिनों बाद कुछ मतभेद दोनों में उभर आये। वे अब मित्र
नहीं थे। जब उसी मित्र ने दूसरे को फिर एक गुलाब का फूल भेंट किया तो उस ने उसे गलत
भावना से लिया। उसने महसूस किया कि गुलाब का फूल इसलिए दिया गया कि उसके कांटे उसकी
खाल में चुभ जायें। वही गुलाब का फूल - वही मित्र। एक समय मित्रता और दूसरे ही समय
शत्रुता। क्या यह मन नहीं है, जिसने इस प्रकार का अन्तर उत्पन्न किया है। इस प्रकार
मन ही प्रशंसा और निन्दा के प्रति प्रतिक्रिया करता है। मन सदा असुरक्षित रहता है।
आदमी के पास भले ही बहुत सा धन हो या वह बहुत से कुत्ते पाल ले, वह तब भी असुरक्षित
महसूस करता है। क्यों? क्योंकि मन का अपना कोई आधार नहीं है। भय और असुरक्षा मन के
गुण हैं क्योंकि उसके पास कोई खिवैया नहीं है। चूंकि हमारा मन असुरक्षित महसूस करता
है, इसलिए हम एक चौकीदार, एक बन्दूक तथा बीमा करवाते हैं। इस सबके साथ मन में एक
गुण अक्खड़पन का होता है। रोम में सम्राट अपने रथ पर जाता है। सम्राट के पीछे एक
आदमी खड़ा होता है। वह कान में कुछ कहता रहता है ताकि वह अपने को देवता न मान ले,
बल्कि वह मानव है और उसी प्रकार आचरण करे। इसी प्रकार मन को भी एक विश्वस्त सहायक
रखना चाहिए।
भगवान ने कहा
कि पुराने समय में भाइयों के बीच सर्वोत्तम प्रेम होता था। लेकिन आज भाइयों और
बहनों का प्रेम उन्हें सुप्रीम कोर्ट पहुंचा देता है। समाज में हो या परिवार में,
मन अपने को असुरक्षित महसूस करता है। इसलिए उसे एक शक्तिशाली विश्वस्त आधार की
आवश्यकता है। इसके लिए उसे पूर्ण समर्पण करना चाहिए। आंशिक रूप से नहीं वरन् पूर्ण
समर्पण। मन कब समर्पण करता है? समर्पण क्या है और कैसे होता है? आगे देखते हैं।
भगवद्गगीता
में श्रीकृष्ण कहते हैं - "मनमनाभव मदभक्तो मद्याजी मां नमस्कुरू।" अपने मन
को मेरी ओर लगाओ। जब तुम अपने मन को ईश्वर की ओर मोड़ते हो, तुम ईश्वर की सम्पत्ति
बन जाते हो। तब यह उसका कर्तव्य होता है कि वह तुम्हारा ध्यान रखे। मन को ईश्वर के
चरण कमलों में पूर्णतया अर्पित कर देना ही पूर्ण समर्पण है। तब आपका सोचने का तरीका
भिन्न हो जाता है। प्राप्ति या सफलता के समय आप विनयी रहेंगे। आप सफलता के समय
ईश्वर के प्रति कृतज्ञता से परिपूर्ण होंगे, क्योंकि आप जानते हैं कि आप कर्ता नहीं
हैं। इसलिए सफलता के समय समर्पण के द्वारा कृतज्ञता और मानवीय नम्रता की प्रवृत्ति
विद्यमान होगी। लेकिन असफलता नुकसान या हार के समय आपकी प्रवृत्ति भिन्न होगी।
समर्पण में भक्त असफलता को जीवन में एक सबक के समान, ईश्वर से एक सन्देश के समान
स्वीकार करेगा। इस प्रकार पूर्ण स्वीकार्य की मानसिक स्थिति लाभ या नुकसान से अधिक
महत्वपूर्ण हो जाती है। आखिरकार तुम्हें आज लाभ है तो कल नुकसान या आज कष्ट है तो
कल सुख मिल सकता है। ये सब गुजरते बादलों के समान हैं, इनमें से कोई भी स्थायी नहीं
है। आते हैं और जाते हैं। बस यही सब कुछ है।
सुख, दो
दु:खों के बीच एक मध्यान्तर है। यदि तुम एक वातानुकूलित कमरे में बैठे हो, तुम
वास्तव में उसके मूल्य को नहीं जान पाओगे जब तक तुम बाहर धूप में नहीं जाते। इसी
प्रकार सुख का मूल्य मात्र दु:ख के द्वारा ही ज्ञात होता है। प्रकाश का महत्व मात्र
अन्धकार द्वारा ही जाना जाता है। यदि प्रत्येक रात्रि पूर्णमासी हो, हम चन्द्रमा के
प्रकाश का मूल्य नहीं जान पायेंगे। जीवन का मूल्य मृत्यु के कारण जाना जाता है। एक
मां बच्चे को प्यार करती है और निरन्तर उसकी सुरक्षा के सम्बन्ध में चिन्तित रहती
है। उसे क्यों नहीं प्रसन्नता होगी कि उसका बच्चा अब भली प्रकार से है, भले ही वह
कल ठीक न रहे। इसलिए निरपेक्ष सुख या पूर्ण दु:ख जैसा जीवन में नहीं है। दु:ख और
सुख एक के बाद दूसरे आते रहते हैं।
बाबा द्वारा
एक साधारण सा उदाहरण दिया गया है। तुमने चावल खाया है। हो सकता है, कभी चावल में
पत्थर मिल गये हों। पति पत्थर मिलने के कारण पत्नी पर क्रोधित होता है। वह बगैर
पत्थर के चावल के लिए धन्यवाद नहीं देता। वह पत्नी को पिछले वर्षों से बराबर बिना
पत्थर चावल के लिए प्रशंसा नहीं करता। मात्र एक दिन एक पत्थर के लिए वह
दुर्भाग्यपूर्ण दिन, दु:खों का पहाड़ टूटा और वह चिल्लाता है। इन तमाम वर्षों से जो
चावल उसने खाया अच्छा था। केवल एक पत्थर, एक दिन एक अवसर पर उसे अस्त-व्यस्त कर
देता है। इसलिए जीवन में सुख अधिक है। दु:ख कम। सामान्यत: हम किसी व्यक्ति से नहीं
पूछते - "तुम क्यों मुस्कुराते हो?" कोई समस्या? स्वामी भी कहते हैं - "क्या ही
उदास चेहरा इस सुबह तुमने बना रखा है। क्यों? क्योंकि प्रसन्नता हमारी प्रकृति है।
प्रसन्नता हमारी वास्तविक प्रकृति है।
हम नहीं कहते
हैं - "आप क्यों प्रसन्न हैं, आप क्यों मुस्कराते हैं?" हम कहते हैं - "आप दु:खी
क्यों हैं?" आप बीमार क्यों हैं? क्योंकि बीमारी और दु:ख अप्राकृतिक हैं। इस प्रकार
हम एक या दो घटनाओं से जीवन में दु:खी हो जाते हैं, लेकिन उन तमाम आशीर्वादों के
लिए ईश्वर को धन्यवाद नहीं देते जो उसने जीवन में दिया है।
हाल ही में
बाबा ने कहा - "यदि तुमको बिच्छू काटता है, चीखो मत बल्कि ईश्वर को धन्यवाद दो
कि सर्प ने नहीं काटा है। सर्प के काटे जाने से बुरा मत महसूस करो, वरन् प्रसन्न हो
कि तुम मरे नहीं। उदास मत हो कि यात्रा करने के लिए तुम्हारे पास कार नहीं है, वरन्
प्रसन्न हो कि चलने के लिए तुम्हारे पास पैर हैं। कांटा चुभने से दु:खी मत हो, वरन्
प्रसन्न हो कि वह तुम्हारी आंख में नहीं लगा जो तुम्हें अंधा बना देता। दु:खी मत हो
कि तुम्हारे पास बहुत सा धन नहीं है, वरन् प्रसन्न हो कि खाने के लिए काफी है।"
यह मन की
प्रवृत्ति है। इच्छाओं की पूर्ति और अधिक इच्छाओं को जन्म देती हैं। बाबा ने कहा-
"यू0एस0ए0 में यदि वे सभी कारों को एक के ऊपर एक रख दें तो चन्द्रमा तक पहुंच
जायेंगी। इसी प्रकार हमारी इच्छायें भी आकाश तक पहुंच जायेंगी। कितनी दूर? कब तक?
बिन्दु यह है। हमें मन की प्रकृति को समझना है, जो बाह्य संसार में प्रतिक्रिया
करता है। यह मन की त्रुटि नहीं, वरन यह उसकी प्रकृति है। जब तुम समझ लेते हो कि वह
कैसे कार्य करता है तो वह कार्य करना बन्द कर देगा। स्वामी ने एक उदाहरण दिया।
एक शादी हो रही थी, एक ओर दूल्हे के लोग थे। दूसरी ओर दुल्हन के लोग थे। एक नौजवान
सज्जन पुरुष दुल्हन वालों की तरफ से आये तथा प्रबन्धों के सम्बन्ध में पूछने लगे।
तदुपरान्त वह दुल्हन के दल की ओर गया और पूछा कि वे किस प्रकार आगे के कार्यक्रम
करेंगे। इसलिए दोनों दलों ने सोचा कि वह दूसरे दल का प्रतिनिधि है। शादी के बाद
दोनों दल परस्पर मिले और बातें कर रहे थे। दुल्हन के दल ने पूछा कि वह आदमी उनके दल
का था। दूल्हा के दल ने नहीं में उत्तर दिया। बल्कि उन्होंने पूछा कि क्या वह उनके
दल का था, क्योंकि वह सारे प्रबन्धों के बारे में पूछ रहा था। एकाएक उस आदमी
ने महसूस किया कि वह पकड़ा गया और गायब हो गया। इसी प्रकार, एक बार तुम मन की
प्रकृति का अन्वेषण करो, वह तुरन्त गायब हो जायेगा।
जब तुम सोचते
हो कि तुम शरीर हो, तुम भौतिक स्तर पर कार्य करते हो। जब तुम समझते हो कि तुम मन
हो, तुम मानसिक स्तर पर कार्य करते हो। जब तुम जान जाते हो कि तुम शरीर से भिन्न
हो। तुम शरीर को नियन्त्रित करने में सक्षम हो जाओगे। जब तुम मन के परे हो जाते हो।
तुम उसकी क्रियाओं की निगरानी करने में सक्षम हो जाओगे। इसीलिए हम किसी-किसी को
सान्त्वना नहीं दे पाते जो अवसाद में है, क्योंकि वह कल्पना करता है कि वह मन है।
यही कारण है, पश्चिमी देशों में, क्यों मनोचिकित्सकों की बहुत मांग है। भारत में
यहां जो शल्य चिकित्सक हैं, विदेश जाकर मनोचिकित्सक बन जाते हैं। यहां के हृदय
विशेषज्ञ वहां मनोचिकित्सक हो जाते हैं। सम्पन्न समाजों एवं पश्चिमी देशों के साथ
जो समस्या है, वह है उनका मन से पहचान बनाना।
कुण्ठा,
निराशा, अवसाद ये सभी समस्यायें मन से पहचान के कारण हैं। इस प्रकार से 'कोट' शरीर
पर विचार करने के बाद उसे छोड़ देना है। अब आता है, कमीज, मन। इसे भी छोड़ देना है,
क्योंकि अब आप जानते हो कि यह एक बाधा, हस्तक्षेप है और वह आपको अहंकारी बनाता है।
इसलिए अब हम
बनियान, बुद्धि, पर इसके बाद विचार करेंगे ताकि हम अपने सीने को देख सकें।
अध्याय
-5
बुद्धि
हमने क्रम से
दो विषयों पर पहले चर्चा की है। पहला दिव्यता की ओर बाधा के रूप में शरीर के साथ
पहचान से सम्बन्धित था और हमें क्यों नहीं पहचान करनी चाहिए, कितना क्षणिक वह है और
किस प्रकार वह परिवर्तित होता रहता है। इसके उपरान्त हमने मन का अध्ययन किया। मन जो
चंचल है, सदा बदलते रहने वाला मन, अपने उछल-कूद के साथ मन, आगे-पीछे हिलने वाला,
ऊपर और नीचे थपेड़े खाने वाला मन, जो स्थिर नहीं है और दिव्यता की ओर एक बाधा के रूप
में मन। अब हम तीसरे पक्ष के रूप में बुद्धि पर विचार करेंगे। बुद्धि है क्या? अब
हम इस विषय पर स्वामी का दृष्टिकोण जानेंगे। उदाहरण के रूप में, हमने पूर्व में
शरीर को ढकने वाली तीन वस्तुओं का उपयोग किया था।
1. कोट 2. कमीज
3. बनियान
सीना देखने के
लिए हमें इन तीनों को हटाना है। सीना आत्मा है। सर्वप्रथम हमने आत्मा को कोट शरीर
से पहचाना जैसा कि हमने पूर्व की वार्ता में चर्चा की है। तदुपरान्त कमीज आती है,
जो मन की पहचान है। अब हम आते हैं, बनियान, आखिरी बाधा पर, बुद्धि से पहचान पर,
जिसे भी अपना सीना, आत्मा, देखने के लिए हटाना है। हम कहते हैं कि अमुक-अमुक
व्यक्ति बुद्धिवादी हैं। कौन बुद्धिवादी है? बुद्धि क्या है? ये सभी विद्वान लोग
शब्दों के व्यक्ति हैं। लेकिन बुद्धिवादी नहीं हैं। बुद्धि का कार्य विभेदीकरण करना
है। वह बुरे से अच्छा, अस्थायी से सनातन, भौतिकता से आध्यात्मिकता और इन्द्रियों से
आत्मा का विभेदीकरण करता है, क्योंकि बुद्धि आत्मा की प्रतिछाया है। इसलिए सच्चा
बुद्धिवादी, शब्द के सच्चे अर्थों में वह है जो आत्मा का मानस दर्शन और अनुभूति
करता है।
वे जो विज्ञान
के क्षेत्र में हैं, वैज्ञानिक हैं, बुद्धिवादी नहीं। वे जिनकी महान स्मरण शक्ति
है, वे मेधावी हैं, लेकिन बुद्धिवादी नहीं। इस प्रकार कोई मेधावी हो सकता है, लेकिन
बुद्धिवादी नहीं। आवश्यक नहीं कि वह बुद्धिवादी हो। मेधावी तथा बुद्धिवादी होने के
बीच अन्तर है। मेधा का सम्बन्ध दैनिक सांसारिक परिस्थितियों से है। तुम अपने
व्यापार में सफल होगे, यदि तुम मेधावी हो, लेकिन तुम एक बुद्धिवादी नहीं हो सकते।
तुम यदि मेधावी हो तो चुनाव जीत सकते हो, लेकिन तुम बुद्धिवादी हो, आवश्यक नहीं।
यदि तुम मेधावी हो, पी0एच0डी0 की डिग्री पा सकते हो, लेकिन तुम्हारा बुद्धिवादी
होना आवश्यक नहीं। क्योंकि मेधा मन का गुण है और विवेक एक भिन्न वस्तु है। इस
प्रकार पहला शरीर है, उसके ऊपर मन है और मन के ऊपर है विवेक। विवेक सर्वोपरि है।
बाबा के विवेक पर क्या विचार हैं? प्रवचनों में बाबा ने कहा कि जैविक संसार में तीन
वर्ग हैं।
1. पौधे 2. पशु
3. मानव
लोग कहते हैं
कि पौधों में भावनायें होती है। एक वैज्ञानिक जो बैंगकाक के जुमसाई नाम के हैं, ने
कुछ पौधों पर प्रयोग किया। उन्होंने एक वर्ग के पौधों के निकट पॉप संगीत बजाया,
दूसरे के निकट सरल शास्त्रीय संगीत बजाया। पौधे जिन्होंने पॉप संगीत सुना, उनका
बढ़ाव सही प्रकार से नहीं हुआ। जबकि वे पौधे जिन्होंने सरल शास्त्रीय संगीत सुना,
उनमें समुचित बढ़ाव देखा गया तथा यहां तक उन्होंने जल्दी बढ़ना शुरू कर दिया। इस
प्रकार पौधे भी संगीत के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं। भावनायें और मनोवेग सभी तीनों
वर्गों, पौधे, पशु और मानवों में हैं। जुमसाई ने यहां तक कहा कि यदि तुम पौधे के
पास जाओ और कोमलता से उसे स्पर्श करो तथा उसकी ओर प्रेम पूर्वक देखें तो पौधे में
शीघ्र बढ़ाव होगा, उनकी अपेक्षा जिन्हें तिरस्कृत किया जाता है।
यू0एस0ए0 में
मैं जानता हूं, लोगों को पालतू पशुओं से कितना प्रेम है। वहां उनके लिए अलग से
अस्पताल हैं, जबकि यहां भारत में मानवों के लिए भी अस्पताल जरूरत भर के नहीं हैं।
यू0एस0ए0 में कुत्तों के लिए स्कूल तक हैं। एक बार जब मैं एक अमेरिकन परिवार से
मिलने गया, मेरा परिचय परिवार से कराया गया और पहले लड़के से हाथ मिलाया और तब दूसरे
लड़के से। एकाएक वे चीखे "सीजर"। मैंने सोचा कि तीसरा लड़का आ रहा है, लेकिन उसके
स्थान पर चौपाया लड़का आया। वह पालतू कुत्ता सीजर था। वह मेरे ऊपर चढ़ना चाहता था।
उन्होंने बताया कि उसने कोलिम्बया विश्वविद्यालय से स्नातक किया है और कम से कम
मुझे स्वीकारोक्ति में "हाय" कहना चाहिए।
इस प्रकार
पशुओं और पौधों में भावनायें व मनोवेग होते हैं। सभी तीनों में भोजन की आवश्यकता
समान रूप से होती है। अब "भय" पक्ष को लें। कुछ पौधों का नामकरण किया गया है। "मुझे
स्पर्श मत करो।" क्योंकि स्पर्श के तुरन्त बाद, वे अपने जीवन के भय के कारण अपनी
पत्तियां दोहरी कर लेते हैं। वे डरते हैं, जब उनके जीवन को खतरा आता है। सर्प
सामान्य रूप से आपको नुकसान नहीं पहुंचाता, जब तक वे यह न जान लें कि आप उस पर
आक्रमण पहले कर दोगे। इस प्रकार से भोजन और भय पौधों, पशुओं एवं मानवों में समान
रूप से है। मानव वास्तव में निम्न है। पौधे एक निश्चित मात्रा में अपना भोजन
प्रतिदिन तैयार करते हैं। पशु केवल तभी खाते हैं, जब वे भूखे होते हैं, लेकिन आदमी
हर समय खाता है। भले ही वह भूखा हो या न हो। भय के सन्दर्भ में आदमी पशुओं से निम्न
है। एक पुलिस वाला या आयकर अधिकारी ही एक आदमी में भय उत्पन्न करने के लिए काफी है।
एक अन्य पक्ष,
निद्रा सभी में समान रूप से है। निद्रा पौधों तथा पशुओं में है। मानव कहीं भी, किसी
भी समय कोई मतलब नहीं, उसके आसपास क्या है, सो जाता है। वह सो सकता है, ड्यूटी पर
है या ड्यूटी से मुक्त, और कभी-कभी अपनी नींद में घोर ध्वनि कर खर्राटे लेता है। वह
अपने पड़ोस की शान्ति भंग करता है, जैसे कि कोई बस गुजर रही हो।
पौधे बीज
उत्पन्न करते हैं, वे अंकुरित होकर पौधों में परिवर्तित होते हैं। मानव इस सन्दर्भ
में निम्न हैं। पशुओं के लिए एक निश्चित मौसम है और कारण होता है, जबकि मानव के लिए
न किसी मौसम की बाध्यता है और न किसी कारण की। इस प्रकार भोजन, भय, निद्रा, प्रजनन
सब जैविक जगत के पौधों, पशुओं और मानवों के लिए समान हैं।
मानव की
विशेषता क्या है? मानव में अतिरिक्त गुण, विवेक या बुद्धि है। तुम नहीं कहते कि
पौधा बुद्धिवादी है। तुम नहीं कहते कि कोई कुत्ता बुद्धिवादी है। मात्र मानव
बुद्धिवादी होने का प्रयास करता है। शरीर और मन सभी में समान रूप से है। लेकिन
बुद्धि केवल मानव में है, उसकी क्रिया क्या है? बुद्धि में क्या अच्छा और क्या बुरा
के बीच निर्णय करने की क्षमता है। बुद्धि वह है जो निश्चित करती है कि क्या अच्छा
है और क्या बुरा है। बुद्धि सामान्य जीवन से ऊपर उठने में हमारी सहायता करती है।
कैसे?
एक टाइगर है।
टाइगर केवल मांस खाता है। शेर भी मांस खाते हैं। वे रोटी और सूप नहीं खाते। पशुओं
के आचरण प्राकृतिक होते हैं, और इसलिए वे अपनी आदतों में परिवर्तन नहीं कर सकते।
उनके पास महसूस करने और अनुभव करने के लिए मन तो है, लेकिन इस सबसे ऊपर उठने के लिए
बुद्धि नहीं है। इस प्रकार बुद्धि वह विशेष गुण है, जो मनुष्य को अपने पशुवत गुणों
से ऊपर उठने के लिए दिया गया है। बुद्धि उसे अपने जीवन में गुणात्मक परिवर्तन करने
और अपने आचरण में बदलाव लाने में सहायता करती है।
बुद्धि में
निर्णय या भेद करने की क्षमता होती है। बाबा के अनुसार दो प्रकार का विभेदीकरण हो
सकता है।
1. मौलिक विभेदीकरण
2. व्यक्तिगत
विभेदीकरण
प्रत्येक
व्यक्ति में मौलिक और व्यक्तिगत विभेदीकरण की शक्ति है। व्यक्तिगत विभेदीकरण
स्वार्थ है। व्यक्तिगत विभेदीकरण द्वारा वह, उसके लिए क्या अच्छा है, उसके लिए क्या
सहायक है तथा उसके लिए क्या लाभप्रद है, का विभेद करता है। यहां विभेदीकरण है,
लेकिन उसका आधार स्वार्थ है। इसके उपरान्त मौलिक विभेदीकरण है। यह भी बुद्धि की
शक्ति से होता है। मौलिक विभेदीकरण ईश्वर का वरदान है। यह नि:स्वार्थ और आध्यात्मिक
होता है। यह ऊपर उठाने वाला तथा प्रोन्नति करने वाला होता है, जबकि व्यक्तिगत
विभेदीकरण पूर्ण स्वार्थ आधारित तथा गिरावट व विनाश का कारण होता है। मौलिक
विभेदीकरण दिव्य है। व्यक्तिगत विभेदीकरण स्वकेन्द्रित है। मौलिक विभेदीकरण क्या
है? यह वह है जो प्रत्येक के लिए अच्छा और सहायक, सर्वत्र तथा सदैव सच्चा है। यह वह
है जो किसी के लिए भी नुकसानदेह नहीं है। इसलिए, ईश्वर ने मानव को बुद्धि दी है कि
वह मौलिक विभेदीकरण के मार्ग पर चले।
लेकिन
दुर्भाग्यवश हम उस स्तर तक नहीं जाते हैं। एक साधारण सा उदाहरण है। बुद्धि की तुलना
एक अधिकारी से हो सकती है। मन, लिपिक है और इन्द्रियां लोग हैं। ये लोग लिपिक स्तर
पर अपनी आवश्यकतायें निपटा लेते हैं। वे अधिकारी के पास नहीं जाते। वे अनुग्रह
प्राप्त करने लिपिक के पास जाते हैं। लेकिन यदि वे सीधे अधिकारी के पास जायें, तब
हर बात ठीक से होगी। लेकिन लिपिकीय स्तर पर, लिपिक धन चाहता है और तब बदले में कुछ
करता है। अब कुछ समय के लिए समस्या हल हो गई, लेकिन कुछ समय बाद एक अन्य लिपिक आ
जाता है और परेशानी फिर शुरू हो जाती है। वह और अधिक धन चाहता है। मन और इन्द्रियों
की यही स्थिति है। जबकि यदि यह समस्या अधिकारी बुद्धि के पास ले जायी गई होती, वह
सदा के लिए हल हो गई होती।
इन्द्रियां मन
के अनुसार कार्य करती हैं। मन इन्द्रियों से कहेगा - "आओ मैं तुम्हें मदद करूंगा।"
इन्द्रियां भोग का आनन्द लेंगी तथा मन सन्तुष्टि अनुभव करेगा। इस प्रकार से
इन्द्रियों का भोगानन्द तथा मन की सन्तुष्टि का सम्बन्ध इन दोनों के बीच है। लेकिन
बाबा के अनुसार यह कहना कि हम इन्द्रियों से उपभोग करते हैं तथा इन्द्रियों के
द्वारा प्रसन्नता मिलती है, मूलत: गलत है। तुम अपनी आंखों से टेलीविजन देखकर
प्रसन्नता नहीं प्राप्त कर रहे हो। तुम्हें टी.वी. देखकर बल प्राप्त होना चाहिए।
क्या ऐसा नहीं है? लेकिन इसके विपरीत तुम्हारी आंखें दोषपूर्ण हो जाती हैं। इस
प्रकार इन्द्रियों द्वारा उपभोग तुम्हें कमजोर बनाता है। तुम इन्द्रियों के कारण
कमजोर होते हो। इसलिए कौन किसका उपभोग कर रहा है? तुम्हें शक्तिशाली होना चाहिए।
क्या ऐसा नहीं होना चाहिए? नहीं। इन्द्रियों के उपभोग से तुम कमजोर होते हो। इस
प्रकार मानव इन्द्रियों के सुख का उपभोग नहीं कर रहा है वरन कमजोर हो रहा है।
अब हम बुद्धि
के स्तर पर आते हैं। हम सोचते हैं कि कोई एक व्यक्ति मन के स्तर पर अत्यन्त महान
व्यक्ति है। लेकिन यहां बाबा कहते हैं "वह जो मन के आदेशों के अनुसार कार्य करता
है, एक पशु है, वह जो बुद्धि के आदेशों के अनुसार कार्य करता है "दिव्य" है।"
मन भावावेशों, भावनाओं और इच्छाओं से बना है, जबकि बुद्धि विभेदीकरण, विवेक तथा
निर्णय करने की शक्ति द्वारा निर्मित है। बाबा सदा कहते हैं कि विवेक-बुद्धि
इन्द्रियों के परे है। बुद्धि में आत्मा की प्रतिछाया है, जैसा कि आइने में। बाबा
एक उदाहरण देते हैं। सूर्य है, सूर्य का प्रकाश (बुद्धि) है जो खिड़की (मन) के
माध्यम से छन-छन कर आता है। सूर्य आत्मा है। आत्मा, सूर्य खिड़की (मन) के माध्यम से
गुजरता है और सभा भवन (शरीर) में प्रवेश करता है। सूर्य का प्रकाश बुद्धि है। सूर्य
आत्मा है। सूर्य और सूर्य का प्रकाश साथ-साथ हैं। जहां भी सूर्य है वहां सूर्य का
प्रकाश है, वे अलग नहीं हैं। इस प्रकार सूर्य, आत्मा और सूर्य का प्रकाश , बुद्धि
दोनों साथ-साथ रहते हैं। यदि तुम बुद्धि को सुनना चाहते हो तब खिड़की (मन) बन्द कर
दो। यदि तुम इन्द्रियों के आदेशानुसार चलते हो, तुम तब कमजोर और बीमार हो जाओगे।
हम सब युवा
दिखना चाहते हैं। कोई भी बुड्ढा आदमी कहलाना पसन्द नहीं करता। प्रत्येक युवा, लड़के
के समान होना चाहता है। व्यक्ति इन्द्रियों में अत्यधिक लिप्त होने के कारण वृद्ध
हो जाता है। मन की समस्त इच्छायें इन्द्रियों के माध्यम से सन्तुष्ट होती हैं,
इसलिए शरीर कमजोर और बूढ़ा हो जाता है। मन को सन्तुष्ट करने के लिए हम इन्द्रियों का
दुरुपयोग करते हैं। बाबा कहते हैं - "मैं उन्हत्तर का हूं और मैं चश्मा नहीं
पहनता। मैं एक छोटी सी वस्तु दूरी से देख सकता हूं। "मैं उनहत्तर का हूं और दूर की
ध्वनि सुन सकता हूं।" "मैं उनहत्तर का हूं और मेरा कोई बाल सफेद नहीं है। मैं
उन्हत्तर का हूं और मेरे सभी दांत मजबूत हैं और किसी काष्ठ फल को तोड़ सकते हैं।
मेरा रक्तचाप सामान्य है और मेरा वजन पिछले पचास वर्षों से एक ही है।" लेकिन हम
वैसे नहीं हैं। बाबा कहते हैं कि हमारी इन्द्रियां कमजोर होती हैं क्योंकि हम उनका
दुरुपयोग करते हैं। बाबा सदा युवा हैं क्योंकि वे अपनी इन्द्रियों का कभी दुरुपयोग
नहीं करते। बाबा कहते हैं कि उनका रक्तचाप, भले ही वह किसी पर चिल्लायें, नहीं बढ़ता
है। वे किसी पर चिल्लाते या किसी को डांटते हैं तो उसमें सुधार करने के लिए। वे
क्रोधित होने का नाटक करते हैं। उद्देश्य प्रेम होता है। लेकिन अपने मामले में जब
हम क्रोधित होते हैं, हम उस व्यक्ति को समाप्त होता देखना चाहते हैं। हमारा अहं
खण्डित होता है और इसलिए हम क्रोधित होते हैं।
वह जो बुद्धि
का अनुसरण करता है, सदा सक्रिय रहेगा। क्योंकि सूर्य का प्रकाश सूर्य के निकट है,
आप कोई भी वस्तु उसमें देख सकते हैं। जैसे कि आप सूर्य के प्रकाश में वस्तुओं को
स्पष्टत: देख सकते हैं। उसी प्रकार बुद्धि के प्रकाश में आप वस्तुओं को स्पष्ट देख
सकते हैं। जहां प्रकाश नहीं है वहां भय है। इसलिए भय है क्योंकि आप बुद्धि का उपयोग
नहीं करते। भय मन में होता हे। आप में भय मन के कारण है। लेकिन यदि आप बुद्धि का
प्रकाश देखते हो तो आपके मन में वह भय नहीं होगा। एक छोटा सा उदाहरण एक रस्सी का
टुकड़ा, प्रकाश की कमी के कारण सर्प समझा (के रूप में लिया) जाता है, जिससे भय
उत्पन्न होता है। अब प्रकाश है। इसका स्रोत क्या है? यह रोशनी, सूर्य, आत्मा की है।
इस प्रकार से
हमने कमरा-शरीर का अध्ययन कल के एक दिन पूर्व किया था। हमने खिड़की - मन पर कल विचार
किया। आज हमने प्रकाश-बुद्धि का अध्ययन किया। कल हम प्रकाश के स्रोत, सूर्य, आत्मा
को जानेंगे।
अध्याय
-6
आत्मा-स्रोत
शरीर, मन और
बुद्धि के सम्बन्ध में चर्चा करने के बाद हम अपने स्रोत आत्मा पर आते हैं। वास्तव
में, वे चार हैं जब अलग-अलग देखे जाते हैं। हमने उन्हें अलग-अलग अध्ययन किया है और
उन पर एक के बाद दूसरे की चर्चा की है। लेकिन कोई भी आत्मा के बिना काम नहीं कर
सकता। यह आत्मा है जो शरीर को काम करने योग्य बनाती है। बगैर आत्मा के शरीर कुछ
नहीं कर सकता। आत्मा के बगैर शरीर निरर्थक है, निष्क्रिय है। इसी प्रकार मन के काम
करते रहने का कारण आत्मा है। आत्मा मुख्य स्विच है। केवल इस मुख्य स्विच के कारण ही
सारे शरीर में विद्युत संचालित होती है। जब ऊर्जा का मुख्य स्रोत नहीं रहता है,
शरीर मन और बुद्धि निरर्थक हो जाते हैं।
एक छोटे से
उदाहरण से प्रारम्भ करते हैं। एक सफेद परदा है। वह सफेद है, जैसा कि सिनेमा हॉल में
होता है, और एक प्रोजेक्टर भी है। प्रोजेक्टर से प्रकाश आता है। वह परदे पर गिरता
है और आप फिल्म देखते हो। मान लीजिए फिल्म में पानी बरसता है, सभी लोग पानी से भीग
जाते हैं। सभी घर गीले हो जाते हैं और डूब जाते हैं, लेकिन परदा सूखा रहता है। जब
सारे लोग वर्षा से भीगे हुए होते हैं, जब सारे घर पानी से प्रभावित होते हैं, परदा
सूखा, उसका एक इंच तक गीला नहीं हुआ। दूसरे दृश्य में हीरो और हिरोइन सुन्दर
रोमांटिक गीत की धुन पर नाच रहे होते हैं। वे नाच रहे हैं, लेकिन परदा नहीं नाचता
है।
तीसरे दृश्य
में हिरोइन रो रही है। हीरो ने कदाचित उसे कष्ट दिया हो। पहला दृश्य रोमांटिक है,
दूसरे में मत भिन्नता है। तीसरे में रोना है। लेकिन, परदा नहीं रोता है। वे सब जो
सिनेमा देख रहे हैं, रो रहे हैं। हीरो रो रहा है। हिरोइन रो रही है, निदेशक रो रहा
है। हिरोइन रो रही है, क्योंकि वह प्रोड्यूसर से धन पाती है। हम रोते हैं क्योंकि
हम फिल्म देखने के लिए टिकट खरीदते हैं। अत: एक रोने के बदले धन पाता है और एक धन
व्यय कर रोता है। लेकिन परदा नहीं रोता, पैसा मिले या न मिले। यदि परदा न हो तो हम
दृश्य नहीं देख सकते। मात्र सफेद परदे पर आंसू, मुस्कराहट, नृत्य और रोना सब कुछ
प्रदर्शित किया जा सकता है। परदा अप्रभावित रहता है। फिल्म दिखाने के पूर्व परदा
वहां रहता है। फिल्म देखने के समय परदा है। फिल्म समाप्त होने के बाद भी परदा वहीं
रहता है। परदा न आता है और न जाता। वह सदा वहीं रहता है।
यह उदाहरण
बाबा द्वारा दिया गया है। बाबा जानते हैं कि हम सब सिनेमा देखते हैं। हमारा जीवन
भी फिल्मी है। हमारा जीवन नकली है और इसलिए हमारे आंसू भी नकली हैं। हमारी
मुस्कुराहट नकली है। जीवन पर एक फिल्म बन गई है। इसलिए बाबा फिल्म से उदाहरण देते
हैं। लोग सिनेमा का उदाहरण समझते हैं। अब परदा आत्मा है। जो हमारे जन्म के पूर्व
था, जीवन की अवधि में है और हमारी मृत्यु के उपरान्त भी रहेगा सिनेमा में परदे के
समान। आत्मा न आती है और न जाती है। परदा आत्मा है और सभी फिल्में मन हैं। यह मन है
जो नृत्य करता है, रोता है, मुस्कराता है और सुख का भोग करता है। थियेटर शरीर है।
यह मात्र आत्मा का परदा है, जिसके कारण शरीर, मन और बुद्धि कार्य करते हैं और
सक्रिय हैं। परदे के बगैर ये तीनों निरर्थक हैं।
बाबा एक अन्य
उदाहरण देते हैं। तारों के माध्यम से विद्युत प्रवाहित है, लेकिन तुम विद्युत
प्रवाह को देख नहीं सकते। एक बल्ब लगा दो। तुम्हें प्रकाश मिल जायेगा। तुम्हें
विद्युत की अनुभूति केवल तब ही होती है जब तुम बल्ब लगाते हो। बल्ब लगाने के पूर्व
भी विद्युत प्रवाह वहां था। इस प्रकार विद्युत प्रवाह सदा रहता है। लेकिन तुम
विद्युत प्रवाह को बल्ब के माध्यम से ही जान सकते हो। इसी प्रकार आत्मिक शक्ति है।
तुम उसे तभी अनुभव कर सकते हो, जब वह शरीर, मन और बुद्धि के माध्यम से क्रियाशील
होती है।
आत्मा + शरीर
= शारीरिक क्रियायें
आत्मा + मन =
चिन्तन
आत्मा +
बुद्धि = विभेदीकरण - जीवात्मा
यह आत्मा
उच्चतम चेतना है, जो परमात्मा है। आत्मा को जान लेने से तुम्हें क्या मिलता है?
क्यों नहीं सोचते कि मैं मात्र एक शरीर हूं? क्या नुकसान है यदि तुम सोचते हो कि
तुम मन हो? क्या लाभ है यह जानने में कि तुम मन नहीं हो। क्या घाटा है यदि तुम
सोचते हो कि तुम बुद्धि हो? क्या लाभ है यदि तुम सोचते हो कि तुम बुद्धि नहीं हो?
तुम्हें क्यों जानना चाहिए कि तुम आत्मा हो। क्या नुकसान है, यदि तुम वह नहीं जानते
हो?
मुझे इतना समय
और धन व्यय कर इतनी दूर भारत यह सीखने के लिए कि मैं आत्मा हूं, क्यों आना चाहिए?
कृपया इसे समझने का प्रयास करें। यह एक ऐसा प्रश्न है कि जिसमें प्रत्येक व्यक्ति
को अनन्त रुचि लेनी चाहिए। मेरे मित्रों, यह जानकारी, यह प्राप्ति तथा यह लाभ
अनुमान से परे है। शरीर, मन और बुद्धि की अनुभूति सीमित है। उनकी अपनी सीमायें हैं।
उदाहरण के लिए शरीर को ले लीजिए। आप केवल कुछ निश्चित मात्रा में खा सकते हैं। यदि
आप खाते ही जायें, अधिक और अधिक तो समस्या उत्पन्न हो जायेगी। अत: भोजन करना सीमित
है। हम केवल छ: घण्टे सोते हैं। यदि हम आठ घंटे सोते हैं तो हममें कोई कमी है। यदि
हम दस घण्टे सोते हैं तो हमें चिकित्सकीय जांच की आवश्यकता है। यदि आप बारह घण्टे
सोते हैं, तब फिर आपके दिन गिनती के हैं। अत: नींद और भोजन सीमित है। समस्त अंग
सीमित हैं। शरीर इस प्रकार एक सीमित लिमिटेड कम्पनी है। मन भी सीमित है। यदि कोई
व्यक्ति सोचता, सोचता ही रहे तो वह पागल हो जायेगा। इसी कारण मनोचिकित्सकों की इतनी
अधिक मांग हो गई है। अत्यधिक तनाव, अत्यधिक चिन्ता आदमी को पागल बना देती है। एक
आदमी जो अभी विवाहित भी नहीं, बच्चों के सम्बन्ध में चिन्ता करता है। एक लड़का जिसने
अभी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया है, नर्सिंग होम स्थापित करने की चिन्ता करने
लगता है, जिसे उसको बाद में स्थापित करना है। इस प्रकार हृदय विशेषज्ञ बनने के
स्थान पर वह बहुत सोचने के कारण हृदय रोगी बन जाता है। हम बस और ट्रेन के लिए दौड़ते
हैं। जीवन में शीघ्रता, चिन्ता का विषय बन गया है। एक ओर शीघ्रता है और दूसरी ओर
चिन्ता। इस प्रकार हम इन दो के बीच सैन्डविच बन गये हैं। हम प्रतीक्षा नहीं कर
सकते।
हमें तुरन्त
कॉफी और तुरन्त भोजन चाहिए। हम कम्प्यूटर युग में हैं और इसलिए हम हर कार्य के लिए
शीघ्रता में रहते हैं। शीघ्रता और चिन्ता जुड़वा बच्चों की तरह हैं जो हमारे रक्त को
उच्च गति से दौड़ाते हैं। इसके अतिरिक्त चिन्ता उच्च रक्तचाप की ओर अग्रसर करती है
और अधिक चिन्ता आपको हृदय रोगी बना देगी। अत्यधिक चिन्ता करने से हम समस्या हल नहीं
कर रहे होते हैं, वरन् चिकित्सा सम्बन्धी व्यय को बढ़ा लेते हैं। इस प्रकार चिन्ता
से कोई समस्या का हल नहीं होता। इसी प्रकार मन की भी अपनी सीमायें हैं। हम बुद्धि
के द्वारा उन वस्तुओं के सम्बन्ध में निर्णय करने में सक्षम हैं जो हमें ज्ञात हैं।
वह उन वस्तुओं में क्या अच्छा है या बुरा, नहीं निर्णय कर सकता जिसे वह नहीं जानता
और नहीं समझ सकता। इसलिए बुद्धिवादी विभेदीकरण का सम्बन्ध उन वस्तुओं से है जिनका
आपको अनुभव है और केवल जिनसे आप परिचित हैं।
इस प्रकार
शरीर, मन और बुद्धि सीमित हैं, लेकिन आत्मा असीमित है क्योंकि वह अनन्त है। इसलिए
जीवन के पूर्व और बाद में, वह स्थान व काल द्वारा सीमित नहीं है। एक व्यक्ति की
आत्मा, दिव्यता का अंश है, वह जीवात्मा या चेतना कहलाता है। यह चेतना, जीवात्मा,
परमात्मा या चैतन्यता का एक अंश है। दिव्यता, एकता, ईश्वर और चेतनता सर्वत्र
विद्यमान है। वही दिव्यता प्रत्येक व्यक्ति में भी विद्यमान है। वहां उसे जीवात्मा
या व्यक्तिगत आत्मा कहा जाता है। व्यक्तिगत आत्मा, जीवात्मा, परम चेतना परमात्मा के
रूप में समान है। व्यक्ति आत्मा को चेतना कहा जाता है। इसलिए व्यक्तिगत स्तर पर
चेतना सर्वत्र विद्यमान चेतनता के समान है। बाबा इस उदाहरण को नियमित रूप से उपयोग
करते हैं। एक गुब्बारा लो और उसे फुलाओ। गुब्बारा हवा से भरता जायेगा और वह बड़े से
बड़ा होता जायेगा। गुब्बारे के अन्दर हवा जीवात्मा या व्यक्तिगत चेतना है। गुब्बारे
के चारों ओर हवा परमात्मा, दिव्यता या सर्वोच्च चेतनता है। तुम फुलाओ और गुब्बारे
को फुलाते जाओ तो वह बड़ा होता जायेगा और अन्त में वह फट जाता है। क्या हुआ? हवा जो
बाहर है अन्दर की हवा से मिल जाती है। गुब्बारे के अन्दर की हवा का गुण बाहर की हवा
के गुण के समान है। एक गुब्बारे की हवा है और दूसरी सामान्य हवा है।
चेतना अन्दर
है और उसके चारों ओर चेतनता है। जब यह शरीर मरता है, अन्दर की हवा बाहर चेतनता से
मिल जाती है। इस प्रकार वही ईश्वर मानव रूप में भी है। वही ईश्वर सर्वत्र है। हमें
इस सिद्धान्त को समझना है। इसलिए शरीर एक चलता-फिरता मंदिर है।
जब तुम समझते
हो कि तुम ईश्वर हो, जब तुम समझते हो कि तुम आत्मा हो, तुम और अधिक स्नेहिल और
समझदार, अधिक आनिन्दत और अधिक त्यागी हो जाते हो। समस्त दैविक गुण तुम में आ
जायेंगे। यदि तुम सोचते हो कि तुम शरीर हो, तुम में शरीर के गुण आ जायेंगे। यदि तुम
सोचते हो कि तुम मन हो, तुम में मन के गुण आ जायेंगे। यदि तुम सोचते हो कि तुम
बुद्धि हो, तब तुम में घमण्ड और अहं होगा। यदि तुम सोचते हो कि तुम आत्मा हो,
जीवात्मा, जो वही है, जो सर्वत्र है, जो और कुछ नहीं बल्कि दिव्यता है, तब तुम कभी
भी अपने को निम्न, हीन या असन्तुष्ट नहीं अनुभव करोगे। तुममें कभी भी कमजोरियां
जैसे अहंकार, ईर्षा, लोभ कंजूसी या प्रदर्शन करने वाले सस्ते गुण नहीं होंगे। तुम
नाम और यश तथा प्रतिष्ठा के पीछे नहीं भागोगे। वह जो मानता है कि वह मन है, में
क्रोध, अहंकार आदि होगा। तुम्हें ऐसे निम्न एवं हीन गुण जीवात्मा या आत्मा में नहीं
मिलेंगे। तुम पूछ सकते हो कि मैं यह कैसे जानता हूं? क्या मैंने आत्मा को देखा है?
आइये हम फिर उसी उदाहरण को वापस हों। सफेद परदे पर क्रोध, मुस्कराहट, रोने या ईर्षा
का कोई चिन्ह नहीं है। वह बिल्कुल शुद्ध "सनातन साक्षी" है।
एक दूसरा
उदाहरण यहां आग है। आग से चिंगारियां निकल रही हैं। एक चिंगारी का रूप और उसका लाल
रंग आग के समान ही है, चिंगारी भी आग के समान जलाती है। चिंगारी भी आग के समान
प्रकाश देती है, आग के गुण चिंगारी में भी हैं। वे क्या हैं? वे हैं रंग, जलाने की
क्षमता और प्रकाश निस्तारित करना। इसलिए चिंगारी और आग समान हैं, एक हैं। तुम उसे
चिंगारी कहते हो क्योंकि वह आग से निकलती है। चिंगारी आग से है यदि तुम उसके गुणों
की ओर देखो तुम समझ जाओगे कि चिंगारी और आग एक हैं तथा समान हैं। इसी प्रकार
व्यक्तिगत आत्मा या सर्वोच्च आत्मा या ईश्वर एक और समान है।
सागर को
लीजिए। सागर के एक बूंद जल में वही गुण हैं जो सागर में हैं। जो अन्तर है वह मात्र
मात्रा का है। ईश्वर सागर है और व्यक्ति बूंद है। उनके गुण समान हैं उनमें से कुछ
गुण क्या हैं? सागर का जल वस्तुओं को भिगो देता है। उसी प्रकार पानी की बूंद भी
भिगो देती है। सागर का जल ठण्डा है और बूंद का जल भी ठण्डा है। सागर का जल नमकीन है
और बूंद का जल भी नमकीन है। इस प्रकार तापक्रम, स्वाद, भिगोने की क्षमता तीन गुण
हैं जो सिद्ध करते हैं कि सागर और बूंद समान हैं। अब हम क्या करें? इस बूंद को सागर
में डाल दें, वह फिर सागर हो जाती है। लेकिन तुम सागर को बूंद में नहीं बदल सकते
हो। इसी प्रकार तुम भी ईश्वर के रूप में विचार करो, तुम ईश्वर हो जाओगे। ईश्वर
समुद्र है। तुम एक बूंद हो। यह बूंद सागर में जाती है तो सागर हो जाती हैं। ईश्वर
में तीन गुण हैं। प्रथम है अस्तित्व।
1. अस्तित्व
- सत कहलाता है। मनुष्य सदा सोचता है कि वह सदा-सदा के लिए रहने वाला है। वह कभी
नहीं सोचता कि वह मरने वाला है। यही "सत" कहलाता है।
2. चित
- मैं एक मानव हूं, मैं अमुक और अमुक हूं कोई भी मुझसे प्रतिदिन नहीं कह रहा है कि
मैं मानव हूं या मैं अनिल कुमार हूं। किसी को यह मुझसे कहने की आवश्यकता भी नहीं
है। एक साधारण सा उदाहरण - नवजात गाय का बच्चा, बछड़ा, गाय के थन की ओर दूध पीने
जायेगा। वह गरदन या पूंछ या सींग की ओर नहीं जायेगा। उसमें यह अन्तर्निहित गुण है।
यह चित या चेतना है। एक व्यक्ति में यह चित और चेतनस्वरूपा ईश्वर है।
3. आनन्द
- प्रत्येक व्यक्ति प्रसन्न रहना चाहता है। प्रत्येक व्यक्ति में आनन्द है। आनन्द
का रूप ईश्वर है। सत, चित, आनन्द प्रत्येक व्यक्ति में है। ये तीनों ईश्वर में भी
हैं। इसलिए तुम ईश्वर हो। "तत त्वम असि" मैं ईश्वर हूं "दैट दाऊ आर्ट" अहम्
ब्रह्मास्मि, मैं
ब्रह्म हूं।
ये महावाक्य हैं। यह चेतना ही प्रज्ञानाम ब्रह्म है, जो दिव्यता है। इसलिए इस
प्रकार की चेतना वास्तविक आध्यात्मिकता है। जानकारी करने का मार्ग ही वास्तविक
आध्यात्मिकता है।
हाल ही में
बाबा ने कहा - "
मंदिर
जाना आध्यात्मिकता नहीं हैं, न ही पूजा, ध्यान, पुस्तकों का अध्ययन, प्रसाद खाना,
जप करना या योगासन करना है। ये मात्र अच्छे कार्य हैं। ऐसे कार्य जो समय को
पवित्रता प्रदान करते हैं।"
तब आध्यत्मिकता क्या है?
वह आत्म अन्वेषण है। अपने को जानना सर्वोच्च प्रकार की आध्यात्मिकता है। अपनी आत्मा
को ब्रह्माण्डीय आत्मा के रूप में जानना सही आध्यात्मिकता है। इस व्यक्तिगत आत्मा
को जिसे प्रत्येक रूप में, खनिज पदार्थ, पौधे आदि सर्वत्र अनुभव करना वास्तविक
आध्यात्मिकता है। मैं और मेरा की भावना को दूर करना और नाम तथा रूप से परे जाना,
आध्यात्मिकता के क्षेत्र में सफलता है। समय और स्थान से परे जाना तथा अमृत्व,
मृत्यु न होने की भावना ही वास्तविक आध्यात्मिकता है। आनन्द की सर्वोच्च स्थिति का
उपभोग करना वास्तविक आध्यात्मिकता है। यह समझना कि शरीर में प्रत्येक कोषाणु
दिव्यता के कारण कार्य कर रहा है, वास्तविक आध्यात्मिकता है कि आंखें जो देखती हैं
और मन जो सोचता है एक और समान हैं, वास्तविक आध्यात्मिकता है, कि अनुभव करना तथा
अनुभवकर्ता एक है और वही वास्तविक आध्यात्मिकता है।
आभूषण विविध हैं, स्वर्ण
एक है।
गायें विविध हैं, दूध एक
है।
राष्ट्र विविध हैं,
पृथ्वी एक है।
तारे अनेक हैं, आकाश एक
है।
फूल अनेक हैं, पूजा एक
है।
(विचार) धागे अनेक हैं,
ईश्वर एक है।
ईश्वर के रूप
जैसे राम, कृष्ण, अल्लाह अनेक हैं, लेकिन ईश्वर एक है। यह विभिन्नता में एकता है,
जो वास्तविक आध्यात्मिकता है। दिव्यता के बिना आप एकता नहीं पा सकते।
शुद्धता का
विकास दिव्यता में होता है, अन्यथा जातीयता और शत्रुता होती है। विविधता में ही
एकता का तत्व समूह में विद्यमान है जिसे हम विविधता में एकता कह सकते हैं, जो हमें
आध्यात्मिकता की ओर बढ़ने में सहायता करता है। ईश्वर से प्रार्थना है कि यह एक
बिन्दुई लक्ष्य हमें आध्यात्मिकता में अग्रसर होने के लिए हमारा मार्गदर्शन करे। हम
देशों, भाषाओं आदि द्वारा पृथक न हों। हम सब आध्यात्मिक रूप से संगठित हों, अन्यथा
सामाजिक एकता बिखर जायेगी। राजनैतिक एकता मात्र आवश्यकता के कारण होगी। आर्थिक एकता
असम्भव है। शारीरिक एकता सम्भव नहीं है। सामाजिक एकता अचिन्तनीय है।
सामाजिक,
आर्थिक, राजनैतिक आदि क्षेत्रों में एकता आज जो दिखती है, सब नकली और असंगत है। यदि
इन स्तरों पर एकता पा ली भी गई वह मात्र अस्थायी होगी। लेकिन आध्यात्मिक एकता
वास्तविक और स्थायी है।
अध्याय-7
ज्ञातम्, दृष्टम, प्रविष्टम्
(जानना, देखना, अनुभव करना)
आइये हम इन
तीन बातों पर विचार करें जो आध्यात्मिक पथ के लिए आवश्यक हैं। ये तीन बातें क्या
हैं? संस्कृत में इसे "ज्ञातम्" कहते हैं। ज्ञातम् का अर्थ है समझना या जानना। बगैर
समझे हुए इस संसार में हम कुछ भी नहीं कर सकते। एक विद्यार्थी को अपना विषय निश्चित
रूप से समझना चाहिए। एक डॉक्टर को अपना काम जानना चाहिए। एक इंजीनियर को अपने
दायित्व को पूर्णतया जानना चाहिए। एक लेखाकार को लेखा (एकाउन्ट) के सम्बन्ध में
पूर्ण जानकारी होनी चाहिए। सांसारिक जीवन में इस प्रकार का ज्ञान महत्वपूर्ण है। जब
यह सांसारिक जीवन में इतना महत्वपूर्ण है तो आध्यात्मिक क्षेत्र में यह और भी अधिक
महत्वपूर्ण हो जाता है।
समझदारी एक
प्राकृतिक गुण के रूप में हममें से प्रत्येक को मिली हुई है। समझदारी किसी देश से
आई भेंट नहीं है। यह ऐसी कोई वस्तु भी नहीं जो किसी दुकान में बिकती हो। दूसरे
शब्दों में समझदारी जन्मजात गुप्त दैविक गुण है। लेकिन हम ईश्वर से मिली समझदारी का
उपयोग अपने सांसारिक हितों और लाभ के लिए करते हैं। यदि कोई कहता है "मैं
आध्यात्मिकता नहीं समझता, इसका अर्थ है कि वह धोखेबाज या बनावटी है। जालिया है। जब
वह राजनीति, ललित कलायें, घरेलू प्रबन्धन समझ सकता है तो आध्यात्मिकता क्यों नहीं?
वह उन्हें समझता है क्योंकि चाहता है तुरन्त लाभ और अपना हित, जो वहां है। वह
उन्हें समझता है क्योंकि उनमें तुरन्त सुविधा और सुख है। वह उस समझदारी को
आध्यात्मिक क्षेत्र में उपयोग नहीं करना चाहता। कारण क्या है? क्योंकि उससे तुरन्त
कोई हित या लाभ नहीं है। तुम्हें प्रोन्नति या धन भी तुरन्त नहीं मिल जाता।
ईश्वर द्वारा
मिली बुद्धि का उपयोग सांसारिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्र में होना चाहिए। हमें ईश्वर
द्वारा दी गई यह भेंट उन्हें समझने के लिए है। क्या हम छल नहीं रहे हैं?
क्या हम पाखण्डी नहीं हैं? क्या कोई ऐसा है जो कह सकता हो कि मैंने स्वयं अपने से
बुद्धि विकसित की है। क्यों? ईश्वर को जानने के लिए। इसलिए पहला पक्ष है ज्ञातम् या
बुद्धि। हमें जानना चाहिए कि दिव्यता क्या है, दिव्यता के गुण क्या हैं? हमें
दिव्यता की क्षमता समझनी चाहिए। हमें दिव्यता की आवश्यकता भी समझनी चाहिए।
इस प्रकार जब
हम उसकी आवश्यकता, पद्धति, क्या है, वह कहां है वह कैसा है, समझते हैं तब समझदारी
पूर्ण होती है। लेकिन हम में वह समझ है नहीं। हम में वह धैर्य नहीं है। हम समझते
हैं कि हम जानते हैं, लेकिन वह भ्रम है। समझदारी पूर्ण होती है, आंशिक नहीं। इसलिए
क्या हमें दिव्यता की समझ है? नहीं। हम में दिव्यता की समझ मात्र एक व्यापार, एक
सौदागरी के रूप में है। हम ईश्वर को उस समय पुकारते हैं। जब हम उसे चाहते हैं। जब
हमें पानी की आवश्यकता होती, हम नल खोल देते हैं और जब आवश्यकता नहीं होती, हम उसे
बन्द ही रहने देते हैं। इसी प्रकार हम ईश्वर को याद करते हैं जब हम उन्हें चाहते
हैं। जब हमें उनकी आवश्यकता नहीं होती, हम उन्हें याद नहीं करते।
क्या यह समझदारी हो सकती है? क्या हम कह सकते हैं कि हम दिव्यता को समझते हैं? पहली
बात तो हमें यह जान लेना है कि ईश्वर किसी दूरस्थ स्थान पर नहीं है। यहां एक कलम
है। वह मुझसे अलग है। उसमें कैप है, बॉडी है और स्याही है। जो तुमसे भिन्न हैं और
जो तुम में नहीं हैं, उसे तुम समझ सकते हो। उदाहरण के लिए मैं अनिल कुमार हूं। यदि
मैं कहूं कि मैं अपने को नहीं जानता। आप यह सोचकर कि मैं पागल हूं मुझ पर दया करने
लगेंगे। यह कहना कितना आसान है कि मैं अपने को जानता हूं और यह कहना कि मैं अपने को
नहीं जानता कितना हास्यास्पद तथा शर्म की बात है। यही बात है ईश्वर को समझने में।
यह शरीर ईश्वर
का मंदिर है। यह मंदिर मक्का या वैटिकन अथवा तिरुपति में नहीं। शरीर एक चलता फिरता
मंदिर है। ईश्वर आप से अलग किसी आनन्द धाम या स्वर्ग में नहीं है। आप में वास्तविक
अपनापन (आत्मा) ईश्वर है। आपका शरीर मंदिर है। संसार में बने मंदिर स्थिर, गतिहीन
मंदिर है, जबकि मानव शरीर उसका गतिमान मंदिर है, जिसने अपने अन्तस में ईश्वर को पा
लिया है। आप चकित हो सकते हो कि क्या ऐसा हो सकता है? क्या मैं इसी कारण नि:सहाय
यहां बैठा हुआ हूं और यह आदमी मूर्खतापूर्ण बातें करता जा रहा है। मुझे दु:ख है कि
ऐसा इस प्रकार से नहीं है। आप और मैं अलग-अलग महसूस करते हैं। हम महसूस करते हैं कि
हम अमुक और अमुक हैं हमारी शारीरिक आसक्ति, शरीरधारी की भावना होने के कारण और
इसलिए कि हमारा मन इन्द्रिय-जनित सुखों में लिप्त है तथा इसलिए कि हम पूर्णतया
संसार में लिप्त हैं। प्रत्येक व्यक्ति महसूस करता है, मैं अमुक और अमुक हूं, लेकिन
हम वह नहीं हैं। जब हम एक बार समझ लेते हैं कि हम शरीर नहीं हैं तब हम समझ
पाते हैं कि हम वास्तविक आत्मा हैं, स्वयं ईश्वर से कम नहीं। यह ज्ञातम् है - विवेक
है। आध्यात्मिकता और जो भी साधना हम करते हैं, का यह पहला पग है।
कल बाबा ने
विनोदपूर्वक स्पष्ट किया कि हम जप किस प्रकार करते हैं। जप माला को हाथ में लिए पति
चिल्लाता है। हे प्रिये, क्या सब्जी तैयार है? क्या तुम इसे जप कह सकते हो। इसे जप
कहना शर्म की बात है। एक व्यक्ति ध्यान में बैठता है, कहता है कि वह कितने ही लम्बे
समय तक ध्यान कर सकता है। किन्तु जब एक मच्छर उसकी पीठ पर बैठता है, वह तुरन्त उसे
मार देता है। ध्यान का क्या हुआ? यह ईश्वरीय ध्यान नहीं है यह मच्छर ध्यान है।
भाइयों तथा बहनों, यह साधना या आध्यात्मिकता नहीं है। सच्ची साधना, सच्ची
आध्यात्मिकता, समझदारी, ज्ञातम में है।
अब हम दूसरे
पग दृष्टम् - "देखना" की ओर बढ़ते हैं। मान लीजिए मैं कहता हूं "वाशिंगटन
सुन्दर है या डिज़नीलैंड एक आकर्षक स्थान है" मान लीजिए मैं पृथ्वी पर एक स्वर्ग के
सम्बन्ध में सुनता हूं। उससे मुझे प्रसन्नता नहीं होगी। यह मात्र समाचार है। मात्र
समाचार आपको सन्तुष्टि या प्रसन्नता नहीं देगा। एक साधारण सा उदाहरण। 1 बजे अपरान्ह
जब आप अत्यन्त भूखे हैं, यदि मैं मिल्क शेक, पाइज और पुडिंग का वर्णन करूं, क्या
उससे आपकी भूख मिटेगी? चॉकलेट, आइसक्रीम की बात समझ, उसे खाने का उत्साह व रोमांच
नहीं देगा। उसे खाने के पूर्व आपके पास उसकी जानकारी होना है। इसलिए जानकारी आवश्यक
है। जानकारी होने के बाद तुम्हें उसे देखना चाहिए। यह आध्यात्मिकता में दूसरा स्तर
है, दृष्टम्, अपनी आत्मा को स्वयं देखना। इसलिए ज्ञातम, समझदारी पहला है।
समझ लेने पर द्रष्टम् उसे देखना। मैंने ताजमहल के सम्बन्ध में जान लिया है, लेकिन
मुझे उसे देखना भी चाहिए। इसलिए समझदारी को देखकर, व्यक्तिगत अनुभव की ओर अग्रसर भी
होना चाहिए। उसे देखकर तुम प्रमाणित कर सकते हो कि तुम्हारी जानकारी सही थी या
नहीं। इसलिए जानकारी को देखकर तुम्हें वास्तविक अनुभव की ओर ले जाना चाहिए। जो
समझा, उसे जाना गया है।
हम भगवान
बाबा, पुट्टपर्ती, प्रशान्ति निलयम, साई अभियान और उनके सन्देशों को सुनते हैं।
क्या वह काफी है? आपने समझ लिया, बहुत अच्छा। लेकिन फिर आप यहां क्यों हैं? क्या
हवाई जहाज कम्पनी पर व्यय करने के लिए या हॉस्टल में समस्त प्रकार की असुविधाओं के
लिए या बैंगलोर के मच्छरों का संगीत सुनने आये हैं? आप, वह देखने आये हैं जो समझा
है। वह देखने, जो आपने सीखा है। उसका प्रत्यक्ष बोध प्राप्त करने, जो आपने सुना है,
आये हैं। केवल समझना, मात्र कल्पना है। वह मात्र सैद्धान्तिक है, एक परिकल्पना है।
कुछ भी सच्चाई नहीं भी हो सकती है।
अब यह कि आप
यहां हैं, जो कुछ आपने पढ़ा और सुना है, आप उसे स्वामी को देखकर महसूस कर रहे हैं।
आप जब उन्हें चलते हुए देखते हैं, उत्तेजित हो जाते हैं। आपमें विद्युत प्रवाह आ
जाता है, जब वे आपकी ओर एक दृष्टि डाल देते हैं। आप प्रसन्नता से कूदने सा महसूस
करते हो, जब वे आपको साक्षात्कार की स्वीकृति देते हैं। जानकारी से प्रसन्नता मिलती
है, लेकिन वास्तविक बोध दूनी प्रसन्नता देता है। यह दूनी प्रसन्नता पाने के लिए जो
कुछ हमने समझा है, हमें अवश्य देखना चाहिए।
वह क्या है जो
हमें देखना चाहिए? क्या वह शरीरधारी बाबा हैं। नहीं, आपको शरीर के परे कुछ देखना
चाहिए। बाबा हम सब में हैं। यह बाबा हैं जो हमें बोलने, काम करने और सोचने के लिए
अन्दर से प्रेरित करते हैं। आप बाबा को बाहर देखते हैं ताकि उन्हें आप अन्दर महसूस
कर सकें। यही है जो भगवान ने कल कहा है। आप एक लम्बी दूरी चलकर आते हैं और इतना
अधिक धन इस स्थान पर पहुंचने के लिए, हवाई जहाज या टैक्सी में व्यय करते हैं और जब
आप यहां ईश्वर के सामने होते है, उनकी ओर देखने के स्थान पर आप आंखें बन्द कर लेते
हैं। आप अपनी आंखें घर में बन्द कर सकते हैं। यदि मैं यहां वक्ता के रूप में आया
हूं, मैं अपना मुंह बन्द रखने के लिए नहीं आया। यदि मैं भूखा हूं और एक होटल में
जाता हूं, मैं वहां अपना मुंह बन्द रखने के लिए नहीं जाता। जब कोई राग बजाया जा रहा
हो, मैं अपने कान नहीं बन्द करता। जब मैं सिनेमा जाता हूं, मैं वहां अपनी आंखें
बन्द करने नहीं जाता। आप क्यों ईश्वर के सामने अपनी आखें बन्द कर लेते हैं? कारण
सहज है। हे ईश्वर, आप जो मेरे सामने हो, मेरे अन्दर भी हो। आप उन्हें बाहर देखते
हैं ताकि अन्दर महसूस कर सकें। यह प्रत्यक्ष बोध या दृष्टम्, देखने का वास्तविक
अर्थ है। मैंने उन्हें बाहर देखा और अब उन्हें अन्दर देखना शुरु कर
दिया यही वास्तविक दृष्टि है, दृश्य है। जब आप उन्हें बाहर देखते हैं और अन्दर
महसूस करने लगते हैं, आप दृष्टा हो जाते हैं। जब आप उनको बाहर देखते हैं,
वह दृश्य है, आप दृष्टा हैं।
एक कृष्ण की
मूर्ति है। कृष्ण की मूर्ति दृश्य है, मैं दृष्टा हूं। मैं उस मूर्ति को देख रहा
हूं। इस प्रकार तीन बातें होती हैं। दृष्टा, दृश्य और देखने की क्रिया। ये सब उस
समय तक रहते हैं जब तक आप ईश्वर को बाहर महसूस करते हो। जब आप ईश्वर को अन्दर महसूस
करने लगते हैं, आप किसे देखते हैं? दृश्य का क्या हो जाता है? देखना कहां चला गया?
अब तीनों एक हो जाते हैं। जब आप ईश्वर को बाहर देखते हैं, सभी तीनों विद्यमान रहते
हैं, दृष्टा, दृश्य और देखने की क्रिया, लेकिन जब आप ईश्वर को अन्दर महसूस करते
हैं, ये तीनों एक हो जाते हैं। इसे त्रिपुटी कहते हैं। त्रिपुटी दिव्यता है।
त्रिमूर्ति, तीन की एक में एकता है और यह एकता जो दिव्यता है, अद्वैतवाद है। इसलिए
अद्वैतवाद का दर्शन सही प्रकार की समझदारी है। द्वैत विहीन अद्वैत है। केवल एक
अस्तित्व में है, दो नहीं। इसलिए जब ईश्वर बाहर है तब भी मात्र एक है। तुम और
ईश्वर, दो नहीं। बाहर एक पत्थर पर लिखा है, "दोहरे मन का व्यक्ति आधा अन्धा है।"
इसलिए हमें अद्वैतवादी मार्ग अपनाना चाहिए। अद्वैतवाद का अर्थ है अस्तित्व में
मात्र एक है दूसरा नहीं। जब आप ईश्वर को अन्दर महसूस करने लगते हैं, आप अनुभव करने
लगते हैं कि आप और ईश्वर एक हैं। ईश्वर आपसे अलग बिल्कुल नहीं है। ईश्वर दृश्य नहीं
है, आप दृष्टा नहीं हो, आप ईश्वर को नहीं देख रहे हो। यहां तीनों एक हैं, त्रिपुटी।
प्रथम पग है
ज्ञातम्, समझदारी, दूसरा पग है दृष्टम् - वास्तविक दृष्टि या ईश्वर की ओर देखना।
तीसरा पग है प्रविष्टम् - अनुभूति करना। आध्यात्मिकता की सीढ़ी में प्रविष्टम् चरम
है। प्रविष्टम् का अर्थ है अनुभूति। आइये हम देखें कि हम अब क्या कर रहे हैं? हम
आध्यात्मिकता के विषय में लिप्त हैं। हम और सब कुछ भूल गये हैं। हम दोनों ही विषय
पर चिन्तन कर रहे हैं। आप और मैं दिव्यता का चिन्तन कर रहे हैं, इसलिए आप और मैं
अस्तित्व में नहीं हैं। हम समय, स्थान और अपना देश भूल चुके हैं और हम सब विषय के
चिन्तन में एक हो गये हैं। यही त्रिमूर्ति है जब देखना, दृष्टा और दृश्य एक हो
जायें। इस प्रकार हम प्रसंग की चर्चा करते हुए एक हैं।
तीसरा पग है
प्रविष्टम्। जब कोई अनुभूति प्राप्त कर लेता है। वह कैसा दिखता है? कोई भी आपको
नहीं बतायेगा। "मैंने अनुभव किया है" कोई भी अनुभूति का वर्णन नहीं कर सकता। मैं
अपनी समझ ज्ञातम् पर बोल सकता हूं, मैं अपने वास्तविकता के प्रत्यक्ष बोध - दृष्टम्
के सम्बन्ध में स्पष्ट कर सकता हूं। मैं बता सकता हूं कि मैंने क्या समझा है। लेकिन
तीसरे पग प्रविष्टम् का वर्णन नहीं हो सकता, उसकी अनुभूति ही करनी है। प्रत्येक
व्यक्ति को उसके लिए प्रयास करना चाहिए और उसकी अनुभूति करनी चाहिए। वह
बुद्धी तथा वर्णन से परे हैं। मान लीजिए आपको पिछली रात गहन निद्रा आई है। कोई
स्वप्न नहीं थे, बस मात्र पूर्ण गहन निद्रा। मैं आपसे पूछता हूं "गहन निद्रा कैसी
दिखती है या उसका स्वाद क्या है?" आप अपनी अनुभूति स्पष्ट अथवा उसे सिद्ध नहीं कर
सकते। यदि आप किसी से पूछें - "आप क्यों शराब पीते हैं? वह आपको क्या देती है?" वह
कहेगा, "तुम्हें उसे पीना चाहिए स्वयं उसके झटके की अनुभूति कर लो।" लेकिन दैविक
शराब आपको गर्भ से कब्र तक झटके देगी। बाबा के सन्देश (इन्ट्रावेनस इंजेक्शन) हैं।
वे आपको कुदाने और दौड़ाने लगेंगे। वे आपको गाने के लिए तड़प पैदा कर देंगे और आपने
जो सुना है, उसे दूसरों को सुनाना चाहेंगे।
बाबा आपकी
समस्त समस्यायें सुलझा देते है।, जबकि आप यहीं हैं। जब स्विच ऑन किया जाता है, हम
तुरन्त प्रकाश पा जाते हैं। बाबा भी प्रत्युत्तर देते हैं, वे कहते हैं "मैं
तुम्हारी ओर देखता हूं यदि तुम मेरी ओर देखते हो। मैं तुम्हारी समस्याओं और
तुम्हारे जीवन की गहराई देखता हूं।" स्वामी भक्तों को आशीर्वाद देंगे, भले ही उनमें
कमजोरियां हों। उत्साहित करते हुए, वह कहेंगे - "जो गुजर गया सो गुजर गया, गुजरे
हुए को भूल जाओ, लेकिन कम से कम आज से परिवर्तन करो। जो गुजर गया उसे नहीं पाया जा
सकता है, भविष्य के सम्बन्ध में आप निश्चित नहीं हैं। इसलिए "अच्छे बनो, अच्छा करो
और अच्छा देखो, यही ईश्वर की ओर जाता मार्ग है।"
बाबा को देखकर
हम अपनी समस्यायें भूल जाते हैं, उनके चरणों का स्पर्श पाते ही हमारी
समस्यायें भी सुलझ जाती हैं। उनसे बातें करते हुए हम अपने को भूल जाते हैं।
जब आप उनसे वार्ता करते हो, वह जो कहते हैं उसका प्रत्येक शब्द पा लेना
चाहते हो। जब आप उनको देखते हैं आप उनके अत्यन्त सुन्दर रूप का
प्रत्येक इंच देखना चाहते हैं। जब आप उनको स्पर्श करते हैं, आप उन्हें
उठा लेना चाहते हैं। मानों उन्हें निगल लेना चाहते हों। इसलिए
आध्यात्मिकता में ज्ञातम् - समझदारी, दृष्टम् - प्रत्यक्ष बोध और प्रविष्टम् - सत्य
की वास्तविक अनुभूति की अतीव आवश्यकता है। - बाबा आपको आशीर्वाद प्रदान करें।
अध्याय
- 8
पूजा : विधि, प्रक्रिया और लक्ष्य
इस सुबह हम
पूजन विधि, पूजन की प्रक्रिया तथा पूजन के लक्ष्य पर चर्चा करेंगे। आध्यात्मिक पथ
में पूजन, भक्ति की एक क्रिया है। भक्ति के पथ पर दो हैं, एक भक्त है और दूसरा
भगवान। भक्त की ईश्वर के प्रति की गई प्रार्थनाओं को ही हम भक्ति कहते हैं। वह
ईश्वर का पूजन पूर्ण प्रेम तथा पूर्ण विश्वास के साथ करता है। ईश्वर के प्रति प्रेम
भक्ति है। शब्द भक्ति, केवल ईश्वर के प्रति मानव प्रेम के सम्बन्ध में ही उपयोग
होता है। मां और उसके बच्चों के बीच प्रेम को वात्सल्य (स्नेह) कहते हैं। प्रेम जो
व्यक्ति भौतिक वस्तुओं के प्रति रखता है, आसक्ति है। दो यौन लिंगों के बीच प्रेम
वासना है। स्नेह, आसक्ति और वासना, शारीरिक, सांसारिक और अस्थायी हैं। लेकिन, ईश्वर
के प्रति प्रेम, जिसे हम भक्ति कहते हैं, आध्यात्मिक है।
यदि हम
सांसारिक आसक्ति नहीं छोड़ते, वह हमें किसी दिन छोड़ देगा। या तो आप संसार छोड़ देंगे
अथवा संसार आपको छोड़ देगा। जैसा कि बाबा सदा मजाक में कहते हैं। यदि अपने साथ
स्वर्ग में बालू तक ले जाने का प्रावधान होता, तो हमारे लिए बालू न बची होती। इसलिए
भौतिक वस्तुओं और सम्बन्धों को या तो किसी दिन तुम छोड़ दो अन्यथा वे हमसे ले ली
जायेंगी। माता-पिता के रूप में हमें अपने बच्चों से स्नेह है, उन्हें हम बहुत ध्यान
देकर बड़ा करते हैं, लेकिन जैसे ही वे बड़े हो जाते हैं उनका प्रेम हमारे प्रति कम और
कम होता जाता है। उनकी आसक्ति अपने परिवार की ओर अधिक हो जाती है। इस प्रकार बच्चों
के प्रति स्नेह सदा के लिए उतना गहरा और शक्तिशाली नहीं रहेगा। सांसारिक वस्तुओं तक
के प्रति आसक्ति सदा के लिए स्थिर नहीं है।
जब सिकन्दर
महान मरा, वह चाहता था कि उसके हाथ कफन के बाहर फैले हुए रखे जायें ताकि संसार जाने
कि वह खाली हाथ आया और खाली हाथ गया था। एक प्रधानमन्त्री ने अपने राजा की सेवा
अत्यन्त विश्वसनीयता से की थी। लेकिन एक दिन जब उसको आरोपित किया गया, राजा ने आदेश
दिया कि उसे फांसी पर लटका दिया जाये। वह उन्हें फांसी पर लटकाते, उसके पहले उसने
कहा "काश मैंने अपने स्वामी की सेवा राजा की सेवा से आधे उत्साह के साथ भी की होती,
उन्होंने मुझे इस वृद्वावस्था में न छोड़ दिया होता।" बाबा कहते हैं, "इतने सारे
समय में से, जो हम परिवार, मित्रों और सम्पत्ति पर व्यय करते हैं, यदि मात्र दो
सेकेण्ड हम स्वामी के चरणों में पूर्ण एकाग्रता के साथ दे दें तो हमें मौत से डरने
की आवश्यकता नहीं।" लेकिन हम दो सेकेण्ड का समय भी ईश्वर के लिए नहीं निकाल
पाते। हम सदा कहते हैं कि हमारे पास समय नहीं है। लेकिन दुर्भाग्यवश, समय हमारे लिए
प्रतीक्षा नहीं करता। प्रत्येक को समय का अनुसरण करना है, लेकिन समय किसी का अनुसरण
नहीं करेगा, किसी भी समय, किसी भी स्थान पर। क्योंकि समय ईश्वर है, ईश्वर समय है।
यह केवल वह हैं जो समय पर नियन्त्रण कर सकते हैं। वह समय के स्वामी
हैं। इसलिए परिवार या संसार के प्रेम से अधिक ईश्वर के प्रति प्रेम विकसित करना
प्रत्येक के लिए अत्यन्त आवश्यक है। सत्य कहा जाय तो संसार और परिवार के सदस्यों से
प्रेम करने से, ईश्वर से प्रेम करना अधिक आसान है। ईश्वर को प्रसन्न करना सरल है,
जबकि आदमी को प्रसन्न करना कठिन है। लेकिन हम सरल बातें पसन्द नहीं करते। एक साधारण
सा उदाहरण। हम जो अपने बच्चों को देते हैं, की तुलना में हम ईश्वर को क्या देते
हैं? हम अपने बच्चों को, अपना जीवन, अपना समय, रक्त, धन और सब कुछ देते हैं। एक बार
जब कोई आदमी कार्यरत हो जाता है, जैसा कि बाबा कहते हैं - "तदुपरान्त वाइफ(पत्नी)
उसका लाइफ (जीवन) हो जाती है, तब उसको काटने वाली नाइफ (चाकू) हो जाती है। वह जब
पूरी तरह अपने बच्चों से परेशान, बन्धा हुआ और अपनी समस्याओं में डूब जायेगा, केवल
तब ही क्या वह ईश्वर का चिन्तन करेगा?"
कोई भी बच्चों
या मित्रों के रहते हुए नहीं कहेगा कि जो कुछ भी उसे मिला है, उससे वह प्रसन्न है।
आज बच्चे कृतघ्न हैं। सांसारिक सम्बन्धों और प्रेम की यह दशा किसी भी परिवार या देश
में है। एक क्षण ईश्वर के प्रति प्रेम के लिए विचार करो। तुम्हें सन्त ऑगस्टीन की
कथा सुनाता हूं। अपने बचपन और युवावस्था में वह अत्यन्त शरारती लड़के थे। उनकी मां
जीसस से प्रार्थना करती थीं। वह प्रवचन मंच के निकट बैंठी और जीसस से रोईं। वही
शरारती लड़का सन्त ऑगस्टीन बना क्योंकि स्वामी जीसस ने उनकी प्रार्थनाओं का
प्रत्युत्तर दिया।
बाबा भी कहते
हैं "यदि तुम एक अश्रु मेरे लिए बहाते हो, मैं तुम्हारी आंखों से दु:ख के हजारों
आंसू पोछूंगा।" जबकि हमारा परिवार हमें अन्तिम स्वांस तक दु:ख के आंसू बहाने को
मजबूर करेगा। हम उन्हें मौज और प्रसन्नता के अश्रु देते हैं, लेकिन प्रत्युत्तर में
वे हमारे दु:ख के अश्रु बहाते हैं। किन्तु भगवान बाबा के साथ वैसा नहीं है। यदि आज
हम उनके नाम का गान करते हुए आंसू बहाते हैं, वे कल हमारे हजारों दु:ख के अश्रु
पोछेंगे। जब हम अपने बच्चों के घर, उनके जीवन में व्यवस्थित हो जाने के उपरान्त
जाते हैं। वे हमारी समस्या को सुनने के लिए तैयार नहीं होते, क्योंकि हमारी
समस्याओं के लिए उनके पास कोई हल नहीं होता, लेकिन दूसरी ओर वे अपनी समस्याओं से
हमें दु:खी करते हैं। आप अपने बच्चों के पास एक भारी हृदय लेकर कुछ आराम तथा
परिवर्तन के लिए जाते हैं, लेकिन इसके स्थान पर और अधिक भारी हृदय लेकर वापस आते
हैं। इनके पास जाने से आपका बोझ बढ़ जाता है। इसलिए बाबा कहते हैं। "वे सम्पत्ति
नहीं हैं, हमें समुचित सम्बन्ध रखना चाहिए।"
दूसरी ओर, जब
हम भगवान के पास आते हैं, वे कहते हैं - "अपने समस्त बोझ के साथ मेरे पास आओ और
आनन्द लेकर जाओ।" क्या किसी ने ऐसी भेंट का वादा किया है? इसके विपरीत प्रत्येक
अन्य हमारा बोझ और तनाव बढ़ा देता है। परिवार लम्बे समय तक सहायता की आशा में रहेगा,
जब तक आप पूर्णतया थक न जायें। आप उनके बच्चों को खिलाने वाले या चौकीदार बन जाओगे।
लेकिन बाबा क्या कहते हैं? "यदि तुम मेरे साथ एक पग चलते हो, मैं तुम्हारे साथ
सौ पग चलूंगा।" जबकि संसार में यदि आप संसार के साथ चलें, आप दस पग पीछे धकेल
दिये जायेंगे। ऐसा लगता है कि हम संसार के साथ मात्र पूर्ण नुकसान के लिए व्यापार
कर रहे हैं। लेकिन आश्चर्यजनक बात यह है कि हम जान ही नहीं पाते कि हम नुकसान से
पीड़ित हैं। इस प्रकार मानवों के साथ हमारे व्यापार में पूर्ण हानि है, जबकि हमारा
व्यापार ईश्वर के साथ पूर्ण लाभ का है। कम से कम लागत और अधिकतम लाभ। मैं इन
शब्दावलियों में इसलिये बोल रहा हूं क्योंकि जीवन आज व्यापार का विषय हो गया है। हम
हर ओर मात्र धन के रूप में हिसाब लगाते हैं। कुछ भी करने के लिए हम कुछ भुगतान की
बदले में आशा करते हैं। इस प्रकार जीवन व्यापारिक हो गया है। यदि आप व्यापार के
दृष्टिकोण से देखें, दैविक व्यापार अत्यधिक लाभ का है। आपको कभी कोई हानि नहीं
होगी। संसार में जब तक आप लोगों को मूल्यवान भेंटें न दें, वे आप पर अनुग्रह नहीं
करेंगे।
आध्यात्मिक व्यापार कैसा
है? रुकमणी ने एक तुलसी की पत्ती भेंट की और वह ईश्वर को पा गई। एक अन्य भक्त
सत्यभामा, भगवान को अपने सम्पूर्ण धन से पाना चाहती थी। वह अपने समस्त गहने
हीरे-जवाहरातों को ले आई। लेकिन वह उन्हें नहीं पा सकीं, जबकि रुकमणी ने एक पत्ती
तुलसी से कृष्ण को जीत लिया। कम से कम लागत और अधिकतम लाभ। एक अन्य भक्त कुचेला
(सुदामा), उन्होंने मात्र भुने चावल दिये, लेकिन उन्होंने पाया एक महल और बहुत सा
धन।
एक बार कृष्ण
ने बहाना बनाया कि अंगुली कट गई है। रक्त बहने लगा। उस समय वहां आठ पत्नियां और
अन्य भक्त थे। सत्यभामा उठीं और डॉक्टर को बुलाने दौड़ीं, रुक्मिणी पट्टी लेने
भागीं। एक अन्य महिला कुछ नहीं कर सकी तो कृष्ण के लिए रोने लगी। द्रौपदी जो पास
में ही खड़ी थी, अपनी महंगी सिल्क की साड़ी से एक टुकड़ा फाड़ कर रक्तस्राव करती कृष्ण
की अंगुली पर पट्टी बांध दी। बाद में जब द्रौपदी दरबार में अपमानित की जा रही थी और
लगभग नंगी कर दी गई थी, ईश्वर ने उसे अनन्त संख्या में साड़ियां प्रदान कीं। उसने
मात्र एक छोटा सा टुकड़ा दिया था, लेकिन बदले में साड़ी के अनेकों गज पा गई।
एक और कथा है।
पाण्डव और द्रौपदी जंगल में कुछ समय व्यतीत कर रहे थे। उन्होंने अभी-अभी खाना
समाप्त किया था और बर्तन धोकर रख दिये गये थे। उनकी भक्ति की परीक्षा लेने ऋषि
दुर्वासा अपने साथ सौ शिष्यों को लेकर आ गये। उन्होंने कहा कि वे भोजन करना
चाहेंगे। पाण्डव निर्वासन काल में होने के कारण अत्यधिक कठिनाइयों से पीड़ित थे।
द्रौपदी सामान्य नारी नहीं थी, बल्कि पतिव्रता स्त्री थी। वह आधुनिक महिलाओं की तरह
नहीं थी जो ऋषि से कह देती, उन्हें अपना भोजन लेकर आना चाहिए था अथवा कि यह कोई
होटल नहीं है। द्रौपदी एक महान भक्त थी। उसने ऋषि से नदी में स्नान कर वापस आने के
लिए कहा, उस समय तक भोजन तैयार हो जायेगा। वे चले गये। द्रौपदी ने देखा कि सभी
बर्तन खाली थे, अत: उसने अपनी रक्षा करने हेतु कृष्ण से प्रार्थना की। कृष्ण तुरन्त
ही वहां भक्तिपूर्ण प्रार्थना सुन कर आये। कृष्ण ने पूछा - "तुम क्या चाहती हो?"
क्या कोई दूसरा आप से पूछेगा कि आप क्या चाहते हैं? उसने कहा "हमने अपना सम्पूर्ण
खाना समाप्त कर लिया है और अब ऋषि अपने सौ शिष्यों के साथ आ गये हैं। मेरे पास
उन्हें देने के लिए भोजन नहीं बचा है।"
कृष्ण ने जोर
देकर कहा - "देखो, बर्तनों में कुछ तो हो सकता है।"
उसने कहा -
"नहीं हम छ: सदस्य हैं और सबने अपना खाना समाप्त कर लिया है।"
उन्होंने
बर्तन में झांककर देखा और एक छोटी सी पत्ती उसमें लगी पाई। कृष्ण ने वह पत्ती खा ली
और दावा किया कि वे भोजन कर पूर्ण सन्तुष्ट हैं। इसी समय ऋषि और उनके शिष्यों ने
महसूस किया कि उनके पेट भी भर गये हैं। वे बालू पर लोटने लगे जैसे कि उन्होंने बहुत
खा लिया हो।
इसलिए वह क्या
है जो ईश्वर लेता है और वह क्या है जो वह देता है? वह हमारा दु:ख और
समस्यायें लेता है और हमारे हृदय का प्याला खुशियों से भर देता है। वह अकेला
है जो हमारा किसी भी समय परित्याग नहीं करेगा। क्या उसके साथ दैविक व्यापार करना
सार्थक नहीं है? वह हमें शत-प्रतिशत या हजार गुणा अधिक लाभ की गारण्टी देता
है। आदमी दूसरे दिन भूल जाता है कि उसने कुछ पाया था, जबकि कृष्ण ने द्रौपदी द्वारा
दिया एक छोटा सा टुकड़ा, उसके जीवन के अत्यन्त कठिन समय में याद रखा। कृतज्ञता
दैविक गुण है। पाना मानवीय गुण है। क्षमा करना दैविक गुण है। भूल जाना मानवीय गुण
है। प्रेम दैविक गुण है, स्वार्थपरता मानवीय गुण है। कुछ समय पूर्व स्वामी
तुमकुर में एक ग्रेनाइट फैक्ट्री देखने गये। फैक्ट्री का निदेशक भगवान का एक अच्छा
भक्त है। मैं भी गया। वहां बेहतरीन प्रबन्ध था। एक बड़ा सा शामियाना उस अवसर के लिए
खड़ा किया गया था। एक विस्तृत पुष्पों का पथ भगवान के लिए बनाया गया था। भगवान की
कुर्सी की सज्जा की गई थी और मंच पर रखी गई थी। भगवान आये और निदेशक ने उनका अनेक
प्रकार से स्वागत करते हुए द्वार खोला। भगवान ने भी अपना हाथ उठाकर सभी को आशीर्वाद
दिया। वे कुर्सी पर बैठे। एकाएक वह उठे और संगीतकारों के लिए हीरे की अंगूठी प्रकट
की। तब निदेशक ने कहा - "श्रोतागणों के इस विशाल भीड़ में मेरी पुत्री वहां एक कोने
में बैठी है। मैं उसे सम्पूर्ण संसार में अनेकों चिकित्सकों के पास ले गया और वे
उसे स्वस्थ न कर सके। लेकिन यहां, मात्र भगवान की विभूति ने उसे स्वस्थ कर दिया।"
कृतज्ञ होकर उन्होंने वृन्दावन में पैंसठ लाख की लागत से साई रमेश हाल का निर्माण
कराया। वह आगे कह रहे थे कि जब न्यूयार्क में उनकी पुत्री का ऑपरेशन होने को ही था,
डॉक्टरों के ध्यान में यकायक एक परिवर्तन आया। मिस्सा जो वहां था वह गायब हो गया
था। यह रहस्यमय था। भगवान स्वयं वहां प्रकट हो गये थे। भक्त ने यह भी बताया कि उसके
भाई की पत्नी भी एक रोग से पीड़ित थी, जिसे भगवान ने अति कृपा कर ठीक कर दिया।
उत्सव समाप्त
होने के बाद मैं एक कोने में स्वामी की जानकारी के बिना खड़ा था। मैं, भगवान द्वारा
इतना उपेक्षित होने पर दु:खी था क्योंकि हर कोई मुझे छोड़कर उनका ध्यान पा रहा था।
तदुपरान्त सुन्दर मेजों पर मध्यान्ह का भोजन परोसा गया। दुर्भाग्यवश मैं किसी मेज
पर स्थान न पा सका क्योंकि वहां बड़ी संख्या में कार्यकारी अधिकारी थे। इसलिए मैं
रसोई में चला गया। रसोइयों ने मुझे एक गिलास नींबू का रस दिया। वह ही मेरा भोजन था।
भोजन के बाद स्वामी अपनी कार में बैठे और चल दिये। मैं अत्यन्त दु:खी था कि वह मुझे
अपनी कार में नहीं ले गये। मैंने अत्यन्त एकाग्रता के साथ प्रार्थना की। यकायक बाबा
ने अपनी कार रुकवा दी और मुझे अन्दर आने के लिए कहा। बाबा ने पूछा - "भोजन कैसा
था"। मैंने कहा - "बहुत शानदार स्वामी" बाबा ने उत्तर दिया - क्यों? नींबू रस?"
मार्ग में हम
एक भक्त के घर पर रुके। मैं इस बार उनके साथ ही अन्दर गया। मैं सभी का ध्यान पा रहा
था। कुछ समय बाद हमें भोजन कक्ष में भोजन करने के लिए कहा गया। बहुमूल्य मिठाइयां
परोसी गईं। भगवान ने घर के मालिक से मुझे तीन मिठाइयां और भोजन की तीन खुराक परोसने
के लिए कहा क्योंकि मैंने कुछ भी नहीं खाया था। मैं आपसे जो कहना चाहता हूं वह यह
है कि प्रार्थना सुनी जाती है और तुरन्त उत्तर दी जाती है। बाबा ने बाद में
आनन्दाश्रु का इनाम दिया। यहां संसार में हमें रुलाया जाता है। संसार में हम सब कुछ
देते हैं और बदले में कुछ नहीं पाते। ईश्वर को हम कुछ नहीं देते फिर भी हम सब कुछ
पाते हैं। यही पूजन है जिसकी मैंने इस प्रात: चर्चा करने की योजना बनायी थी।
अध्याय-9
तब और अब
आज का विषय है
"तब और अब" पहले हमें "तब" जानना है और उसकी पृष्ठभूमि पर हम "अब" समझ सकते हैं।
भूतकाल के वे दिन, वे सदाचरण के दिन तथा वर्तमान के दिन जिसमें हम रह रहे हैं।
(भगवान बाबा ने "तब" और "अब" का उल्लेख अपने ही तरीके से निम्नवत किया है।)
प्रत्येक
सम्प्रदाय में, प्रत्येक समाज में, सर्वत्र बचपन से ही, पुराने दिनों में बाबा और
दादी लोग शाश्वतत्व के सुन्दर पद्द, लोरियां और पवित्र स्त्रोत, बच्चों को सिखाते
थे। इस प्रकार बच्चे दिव्यता के सुन्दर पदों, ईश्वर के रूपों से सम्बन्धित कहानियों
को सुनते हुए सो जाया करते थे। दादा लोग पवित्र भजन गाया करते थे। यह उस समय का
दैनिक व्यवहार था और अब? अब कहानियां क्या हैं? नर्सरी के पद जिन्हें ईश्वर या
दिव्यता से कुछ लेना-देना नहीं। हम बा... बा... ब्लैक शीप, हैव यू एनी ऊल सुनते हैं
"रेन, रेन गो अवे, कम अगेन अनेदर डे" अर्थहीन। कुछ भी याद रखने वाला या सुरक्षित
करने वाला नहीं। पवित्र पुस्तकें कालातीत हो गईं। वे पुस्तकें सजावट भर के लिए रह
गईं। शाश्वतत्व के पद स्वादहीन और असंगत हो गये हैं।
वेद, जो सनातन
धर्म के पवित्र ग्रन्थ हैं, वे आज बहस के विषय हो चुके हैं। वे प्रमाण हेतु
पुस्तकें थीं, लेकिन अब वे पुस्तकें झगड़ों की ओर अग्रसर करती हैं। सभी धर्मों के
सभी पवित्र ग्रन्थ स्वादहीन हो गये हैं। पवित्र ग्रन्थ जैसे बाइबिल, कुरान, धम्म पद
जिन्होंने मानव को उत्साहित तथा साहसी बनाया, जिन्होंने मानव को जीवन में एक
उद्देश्य दिया, अब वे नीरस, स्वादहीन और अर्थहीन हो गये हैं।
सभी पवित्र
पुस्तकें जो आदर्श प्रस्तुत करती थीं कि किस प्रकार हम अपना जीवन व्यतीत करें,
राष्ट्रीय वीरों की कहानियां और आत्मकथायें तथा राष्ट्रों का इतिहास आज उपेक्षित हो
गया है। कोई भी आज इन पुस्तकों को पढ़ने की आवश्कयता नहीं समझता। तब वे जीवन में
अपनाने योग्य उदाहरण थे। अब वीडियो और रेडियो, हत्या, हिंसा और कलाबाजी दिखाते हुए,
हमारे बच्चों को प्रेरित कर रहे हैं।
गुरू, अध्यापक
आज समाज पर एक बोझ बन गये हैं। किसी के पास दिव्यता के सम्बन्ध में सुनने के लिए
समय नहीं है। इसके बजाय आदमी कहता है - "क्या आप मुझसे कम्प्यूटर विज्ञान और खाद्य
प्रौद्योगिकी के सम्बन्ध में बात करेंगे?" खाद्य प्रौद्योगिकी। क्या कभी आपको,
पक्षियों तथा पशुओं के खाने के सम्बन्ध में किसी खाद्य प्रौद्योगिकी की आवश्यकता
नहीं, ऐसा लगा है? सभी गुरूजन एक बोझ हो गये हैं। उन्हें समुचित आदर तक प्राप्त
नहीं होता। यदि कोई कहता है- मैं आपसे मानवीय मूल्यों पर बात करूंगा।" हम कहते हैं
"खेद है। हमारे पास समय नहीं है" हमारे पास मानवीय मूल्यों को सुनने का समय नहीं
है। लेकिन हमारे पास समय अमानवीय बनने का है। हमारे पास समय मानव बनने का नहीं है।
इसी कारण
ईश्वर इस दिन अध्यापक बनकर नहीं आये हैं। आज पृथ्वी पर ईश्वर, गुरू या अध्यापक के
रूप में नहीं हैं, क्योंकि वह जानते हैं कि कोई भी उन्हें नहीं सुनेगा। यदि ईश्वर
हमसे पवित्र बाइबिल पर बात करता है, हम कह देंगे - "तुम्हें सुनने के लिए समय नहीं
है, अपनी पुस्तक की एक प्रति मुझे दे दो। मैं आपको धन्यवाद दूंगा, यदि आप सारांश दे
दें या दो वाक्यों में उसे संक्षिप्त कर दें, क्योंकि ये दिन कम्प्यूटर विज्ञान के
हैं।" यदि ईश्वर आता है और आपको गीता सीखने के लिए कहता है, आप उन्हें सुनना नहीं
चाहेंगे। यदि गीता शब्द को उलट दें तो तेलगू में "तागी" हो जाता है। इसका अर्थ शराब
पीना, नशा है। इसके स्थान पर आदमी शराब पीकर नशे में होना पसन्द करता है।
भगवान ने एक
बार बैकुण्ठ में भगवान विष्णु और उनकी पत्नी महालक्ष्मी की कथा सुनाई। एक दिन नारद
बैकुण्ठ गये, वहां महाविष्णु लेटे हुए थे और माता लक्ष्मी उनके पैर दबा रहीं थीं।
विष्णु ने नारद से पूछा- "तुम कैसे हो" नारद ने उत्तर दिया "आपकी कृपा से मैं सुखी
हूं और लोग भी सुखी हैं" देवी कुछ चिन्ताग्रस्त हुईं क्योंकि वह धन की देवी हैं और
मानती है कि लोग ठीक हैं तो मात्र उनके धन के कारण। उन्होंने नारद से पूछा "क्या
तुम नहीं जानते कि लोगों की प्रसन्नता के लिए मैं ही उत्तरदायी हूं।"
नारद बोले -
"धन्यवाद देवी, कृपया यह आप आपस में ही निर्णय कर लें। मैं आपको कुछ समय दूंगा।
कृपया मुझे बता दें, आप दोनों में कौन उत्तरदायी है।" नारद चले गये। तब विष्णु और
लक्ष्मी ने इस विषय पर चर्चा की।" "आज हम निर्णय कर लें, वास्तव में मानव की
प्रसन्नता का कारण कौन है" इसलिए विष्णु पृथ्वी पर एक साधु के वेष में उतर आये।
उन्होंने कहा, हे लोगों! मैं यहां आया हूं, और मैं वेदों पर वार्ता देने जा रहा
हूं।" लोगों ने सोचा - "आह! श्री महाविष्णु स्वयं वेदों पर वार्ता करने जा रहे हैं।
वेदों का दूसरा रूप विष्णु हैं। वेद और विष्णु अलग-अलग नहीं हैं। जब वेद स्वरूपा ने
प्रवचन देना शुरू किया तो वहां लोगों की भारी भीड़ एकत्र हो गई। भीड़ बढ़ती गई और लोग
आनन्द ले रहे थे।"
यही समय था
लक्ष्मी को अपनी शक्ति को प्रदर्शित करने का। लक्ष्मी ठीक विष्णु के श्रोता भवन के
सामने उतरीं। उन्होंने कहा - "मैं लक्ष्मी हूं, मेरे कुछ निश्चित नियम हैं, मैं एक
गृहस्थ के आवास पर नाश्ता करूंगी, दोपहर का भोजन दूसरे के यहां, डिनर किसी अन्य के
घर। जहां भी मैं जाती हूं, मैं अपने स्वर्ण बर्तन साथ ले जाती हूं और मेजबान को
नि:शुल्क दे देती हूं।" शीघ्र ही सभी लोगों ने उनके श्रोता भवन की ओर घूम जाने का
निर्णय किया और श्री विष्णु का श्रोता भवन पूर्णतया खाली हो गया। इस प्रकार
उन्होंने महाविष्णु पर विजय पायी। श्री महाविष्णु के पास कुछ भी करने को नहीं रह
गया। इसलिए वापस बैकुण्ठ आ गये। देवी लक्ष्मी भी तब बैकुण्ठ वापस आ गईं और भगवान की
सेवा करना शुरू कर दिया। एक दिन नारद आये। उन्होंने कहा - "नारद, तुम तीनों लोकों
में जाते हो, तुमने अवश्य देखा होगा कि हजारों विष्णु के प्रवचनों को सुनने के लिए
उपस्थित होते थे। लेकिन मेरी सभा में लाखों लाख लोग उपस्थित हुए।" नारद ने कहा,
"मुझे कोई सन्देह नहीं लेकिन अब आप कहां हैं?"
उन्होंने
उत्तर दिया - "क्या तुम मुझे श्री महाविष्णु के चरण दबाते नहीं देखते?"
"आप कहां गई
थीं?" नारद ने पूछा।
"मैं पृथ्वी
पर प्रवचन देने गईं थी।" लक्ष्मी ने उत्तर दिया। नारद ने एक बार फिर पूछा - "आप
क्यों गईं थीं?"
देवी ने उत्तर
दिया- "पहले श्री महाविष्णु नीचे पृथ्वी पर गये, इसलिए मैंने उनका अनुसरण किया।"
उसके बाद क्या
हुआ? नारद ने पूछा।
"क्या हुआ?
श्री विष्णु वापस आये तो मैं भी वापस आ गई" देवी ने कहा।
नारद हंसी
दबाते हुए बोले - हां देखो! अत: आप वहां हो, जहां नारायण हैं। जब नारायण पृथ्वी पर
थे आप वहां गईं। जब नारायण वापस आये, आप भी आ गईं। इसलिए, मैं कहता हूं कि नारायण
के कारण सम्पूर्ण विश्व सुख में है क्योंकि आप स्वमेव उनका अनुसरण करतीं हैं।"
यदि हमें
भगवान नारायण का आशीर्वाद प्राप्त है, उनकी पत्नी, लक्ष्मी स्वमेव आयेंगी। आज हम
लक्ष्मी को तो चाहते हैं, लेकिन नारायण को नहीं। पुरातन काल में लोग नारायण को
चाहते थे और लक्ष्मी स्वमेव आती थीं। अब हम लक्ष्मी को चाहते हैं, लेकिन नारायण को
नहीं। दूसरी ओर जब नारायण और लक्ष्मी साथ-साथ हैं, हम पूर्ण सुखी और शान्तिमय
होंगे।
दूसरा बिन्दु
है, सर्वश्रेष्ठ, अत्यन्त सफल व्यक्ति कौन है तब और अब? तब, अत्यन्त सफल व्यक्ति था
सत्यव्रती या जिसने सत्य के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया और अब एक झूठा और धोखेबाज
व्यक्ति है जो अत्यन्त सफल है। उन दिनों कौन अत्यन्त आदरणीय तथा प्रतिष्ठित आदमी
था? वह जो सद्चरित, विश्वसनीय, श्रेष्ठगुणों से युक्त और त्यागी था। अब आदरणीय कौन
है? धनी व्यक्ति। आपको अपने बैंक खाते और अपने क्रेडिट कार्ड के अनुसार आदर मिलता
है। इस प्रकार तब और अब में हम एक सागर का अन्तर पाते हैं। भगवान कहते हैं। दो वर्ग
के लोग होते हैं। बुरे और अच्छे। तब ईश्वर आये और उन्होंने बुरे लोगों को मार डाला
और अच्छे लोगों की रक्षा की। और अब बुरे लोग! वे हैं कहां?
वे अच्छे लोग
कैसे दिखाई देते हैं? अब बुरे या अच्छे लोग अलग-अलग नहीं हैं। प्रात: कोई अच्छा है
शाम होते-होते वह बुरा है। वह दिन योगा से शुरू करता है, सम्पूर्ण दिन भोग,
इन्द्रिय सुख में व्यतीत करता है और अन्त रोग में होता है। इस प्रकार एक ही व्यक्ति
में हमें अच्छाई और बुराई का मिश्रण मिलता है। लेकिन पुरातन काल में अच्छे लोग एक
स्थान पर रहते थे और बुरे लोग दूसरे स्थान पर रहते थे। ईश्वर का कार्य तब आसान था।
जहां पर अच्छे लोग थे, वह उन्हें उत्साहित कर सकता था। भौगोलिक रूप से उनका काम सरल
था, लेकिन आज कुछ भी आसान नहीं है। उदाहरण के लिए, रामायण काल में सभी बुरे लोग
लंका में थे और अच्छे सर्वत्र थे। इसलिए राम का काम बिल्कुल आसान था। वह लंका गये
और बुरे लोगों को नष्ट कर दिया। बाद में परिस्थितियां ईश्वर के लिए कठिन हो गईं। अब
यहां मानव की ईश्वर के ऊपर जीत है। आदमी कहता है - "तुम सोचते हो कि तुम मुझे बदल
सकते हो, असम्भव।"
द्वापर युग,
पिछले युग में, कृष्ण के लिए परिस्थितियां अधिक जटिल थीं। अच्छे और बुरे अलग-अलग
नहीं रहते थे। वे एक ही स्थान हस्तिनापुर में रहते थे। कौरव और पाण्डव साथ-साथ रहते
थे। इसलिए कृष्ण के लिए वे निरन्तर चिन्ता व तनाव का कारण थे। और अब अधिक जटिल। एक
ही व्यक्ति में प्रात: उसमें अच्छाइयां हैं और सायं को वह बुरा है। उन दिनों कृष्ण
ने सभी बुरे लोगों जरासन्ध, शिशुपाल आदि को मार डाला था। लेकिन आज, यदि ईश्वर, बुरे
लोगों को मारना शुरू करे तो वह अकेला ही बचेगा। आज जो बाहर से हमें अच्छा और
सुरुचिपूर्ण दिखाई पड़ता है, वही अन्दर से कुछ गलत हो गया, लगता है। हम एक ही शरीर
में अच्छे और बुरे हैं। जो हम सोचते हैं, हम महसूस नहीं करते। जो हम महसूस करते
हैं, हम सोचते नहीं। जो हम महसूस करते हैं और जो सोचते हैं, हम कहते नहीं। जो हम
महसूस करते हैं, जो हम सोचते हैं और जो हम कहते हैं, करते नहीं।
तब वह शल्य
चिकित्सा थी, लेकिन अब यह चिकित्सकीय उपचार है। बाबा अब एक शल्य चिकित्सक नहीं हैं।
वह चिकित्सक हैं। पहले वह एम.एस., मास्टर ऑफ सर्जरी थे, अब वह
एक मास्टर ऑफ मेडिसिन हैं। वह हमें प्रेम की विशेष औषधि देना चाहते हैं,
क्योंकि यदि वह हमें कोई अन्य औषधि देते, हम उसे फेंक देते। उन्हें हमको
देनी पड़ीं होम्योपैथिक गोलियां, औषधि मीठी गोली में मिलाकर। इसी कारण भगवान की
वार्तायें इतनी बड़ी संख्या में विभिन्न प्रकार के लोगों को आकर्षित करती हैं। हम
जानते हैं कि हम रोगी हैं और हमें उपचार की आवश्यकता है। हम जानते हैं कि वे सारी
कहानियां व व्यंग्य परिहास मात्र हमारे बारे में हैं। समस्त मूर्खता और स्वार्थपरता
जिसकी वह निन्दा करते हैं, मात्र हमसे सम्बन्धित है। हम हंसते हैं और तालियां बजाते
हैं क्योंकि वह हमारी अपनी कहानी है। वह आपको एक छोटा सा उदाहरण किसी मूर्ख
के सम्बन्ध में बतायेंगे और आप क्या करते हैं। आप हंसते हैं और ताली बजाते हैं -
लेकिन कौन है वह मूर्ख? आप और मैं केवल। क्या ही मीठी गोली वह है। वह सब जिसकी
वह निन्दा करते हैं, मजाक बनाते हैं और उपहास करते हैं, क्या वे विशेषतायें
नहीं हैं जिन्हें वह हमसे त्याग करा देना चाहते हैं? इसलिए हम तालियां बजाते हैं।
क्यों? प्रेम के औषधि की मीठी गोलियां। जब यह प्रेम की औषधि दी गई, हम जानना शुरू
करेंगे कि हमारे अन्दर क्या घट रहा है?
हम जानना
प्रारम्भ करेंगे कि हममें गलत क्या है? क्या हो रहा है? केवल औषधि दिया जाना काफी
नहीं है। भोजन भी निर्धारित होना है। यदि कोई मात्र औषधि लेता है और निर्धारित भोजन
का अनुसरण नहीं करता, स्थितियां बिगड़ जाती हैं। भोजन साधना और आध्यात्मिक प्रयास
है। इसीलिए प्रेम की औषधि तथा साधना का पथ्य ईश्वर ने पृथ्वी पर निर्धारित किया, जो
भगवान श्री सत्य साई के रूप में अवतरित हुए हैं। हमें स्वस्थ, धनी तथा बुद्धिमान
बनने के लिए यह पाठ्यक्रम पास करना है। हमें उपचार का अनुसरण करने की आवश्यकता है।
तब और अब के उपचार में अन्तर है। तब लोगों के विचारों, शब्दों तथा कार्यों में
पूर्ण समानता थी। भगवान ने बार-बार कहा है कि तब चित्त शुद्धि, हृदय की शुद्धता थी।
वह चरित्र का वर्णन, विचार, शब्द और कार्य की एकता के रूप में करते हैं। वह तब था
और अब चरित्र गायब है। उन दिनों लोग जो महसूस करते थे, वही कहते और करते थे। आज हम
जो कहते और करते हैं हम महसूस नहीं करते हैं।
जैसा कि भगवान
ने हाल ही में कहा - "पुस्तकें बार-बार पढ़ने और रटने के लिए नहीं हैं।" कुछ लोग टेप
रिकॉर्डर या ग्रामोफोन रिकार्ड के समान श्लोकों का जप करते हैं। तुम्हें बाइबिल से
छन्दों एवं श्लोकों को बार-बार पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। पुस्तकें जप या पूजा करने
के लिए नहीं हैं। वे आचरण या अभ्यास के लिए हैं। अब भगवान का जोर, जो पढ़ा जाये,
सुना जाये, विचारा जाय और बातें की जाय, उसके अनुसार आचरण पर है। तब जनसंख्या
सैकड़ों में थी। अब जनसंख्या कई गुणा बढ़ गई है। तब राम केवल अपने परिवार और गुरू से
बात करते थे। कृष्ण केवल एक अर्जुन से बोले और अब यदि वह पांच और दस व्यक्तियों से
भी बात करें, उससे समस्या का हल नहीं होगा। संचार माध्यमों ने अब संसार को निकट कर
दिया। तब ईश्वर कुछ लोगों से बोले थे। आज, बाबा विश्व संचार व्यवस्था का उपयोग
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वैश्विक चेतना के लिए करते हैं। अब, हजारों हैं जो उनके
दिव्य प्रवचनों को सुनते हैं।
आज भगवतगीता
में सात सौ श्लोक हैं। उसे सिखाने के लिए कितना समय लगेगा? वह एक युद्धभूमि था कोई
सभा भवन नहीं। कृष्ण ने केवल संक्षेप में कहा था जिसे बाद में कवियों ने विस्तार
दिया। मूल वाचन में सात सौ श्लोक नहीं थे। यह तो बाद का विस्तार तथा स्पष्टीकरण है
जिसके परिणामस्वरूप सात सौ श्लोक हो गये। भगवान के अनुसार मूल रूप में यह बहुत
भिन्न था और आज यद्यपि वे अत्यन्त सरलता से समझाते हैं, फिर भी हम समझ नहीं पाते और
इसलिए हम अनुसरण नहीं कर पाते। इसी कारण नि:स्वार्थ दिव्य मां को, प्रेम का
प्रत्येक बिन्दु आत्मा और चेतना के सम्बन्ध में अपने प्रत्येक प्रवचन में बार-बार
दोहराने का कष्ट उठाना पड़ता है। हम में वह एकाग्रता नहीं है, हम बाबा के प्रवचन के
अलावा अन्य प्रत्येक वस्तु के सम्बन्ध में चिन्तित रहते हैं।
तब पूर्ण
एकाग्रता। अब? बाबा ने एक उदाहरण दिया। पुरातन काल में राजा, गृहस्थ और सामान्य
जनता सभी प्रेरक प्रवचनों में भाग लेते थे। कुछ ऐसा हुआ कि राजा जनक भी प्रवचन में
उपस्थित हुए। वक्ता कौन थे? ऋषि शुक। ऋषि, राजा के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे,
राजा को विलम्ब हो गया था। विद्यार्थियों ने सोचा, "हम सब क्यों प्रतीक्षा करें?
हमें भाग नहीं लेना है। ऋषि समझ गये कि उनके मन में क्या चल रहा है और इसलिए, उनको
सबक सिखाना चाहा। एक दिन राजा देर से आये, ऋषि ने तब अपना प्रवचन प्रारम्भ किया।
एकाएक ऋषि शुक चिल्ला उठे। "महिलाओं और सज्जनों! मुझे सूचित करते हुए खेद है कि
मिथिला का नगर जल रहा है! सारे घर आग की चपेट में हैं, पूरा महल धुएं से ढक गया है।
प्रत्येक व्यक्ति अपने सामानों को बचाने दौड़ पड़ा। लेकिन राजा जनक खड़े तक नहीं हुए।
ऋषि ने राजा से पूछा वह क्यों नहीं अपनी सम्पत्ति की रक्षा करने दौड़े। राजा ने
उत्तर दिया - हे स्वामी! एक या दूसरे दिन आपको अपनी सम्पत्ति छोड़नी ही है या आपकी
सम्पत्ति आपको छोड़ कर चली जानी है। आज या कल हमें इन्द्रिय जनित सुख त्यागने हैं,
या इन्द्रियां हमको छोड़ देंगी जैसे ही आप संज्ञाहीन हो जाते हैं। आप उन्हें स्वयं
अपने से छोड़ दें अन्यथा उनके द्वारा आप छोड़ दिये जायेंगे। मैं यह जानता हूं, और
इसलिए मैं यहां आया हूं। प्रत्येक वस्तु स्वाहा हो सकती है, लेकिन मैं जानता हूं
"एक है जो तेज हवाओं द्वारा उड़ाया नहीं जा सकता या पानी द्वारा भिगोया नहीं जा सकता
या आग द्वारा जलाया नहीं जा सकता है और वह है सर्वोच्च आत्मा, जिसके बारे में आप
पढ़ा रहे हैं। इसलिए मैं यहां हूं।" तब लोग एकाग्र होकर बैठ गये। अब, विभाजित
एकाग्रता है।
तब लोग अनेक
अच्छे काम करते थे और उनके परिणाम ईश्वर को समर्पित कर देते थे और आज हम अच्छा और
बुरा दोनों करते हैं। अत: अब हम क्या करेंगे? कोड़ाई कनाल में स्वामी से मेरा यही
प्रश्न था। "स्वामी हम ईश्वर को क्या भेंट करें?" मैं क्या अच्छा आपको भेंट करूं?
मैं कैसे कर सकता हूं? मैंने कुछ भी नहीं किया और कोई बुरी वस्तु आपको भेंट कर नहीं
सकता।" बाबा ने उत्तर दिया। "हां, क्यों नहीं? मान लो तुम्हारे पास 500 रुपये का
नोट है। तुम कहीं भी जाते हो तुमको चिन्ता रहती है कि कोई उसे चुरा लेगा। इसलिए तुम
सदा अपना हाथ जेब पर रखोगे। यदि तुम उसे बैंक में जमा कर दो, वह सुरक्षित हो
जायेगा। यह भी कि जो भी तुम ईश्वर को भेंट करते हो, उसका कर्तव्य हो जाता है कि वह
उसका ध्यान रखे। अब बुरे के सम्बन्ध में, मान लो तुम्हारे पास गन्दा 500 रुपए का
नोट है और फटा हुआ है। तुम क्या करते हो? तुम उसे फेंक नहीं दोगे और न ही कोई उसे
स्वीकार करेगा। यदि तुम यह नोट रिजर्व बैंक ले जाओ, वे एक साफ-सुथरा नोट तुमको दे
देंगे। इसी प्रकार ईश्वर भी बुराई के बदले, जिसे तुमने उन्हें भेंट में दिया है,
अच्छाई दे देंगे।"
तब लोग सब
अच्छा करते थे और इसलिए वे सभी अच्छाइयां ईश्वर को भेंट कर देते थे। आज वे 50/50 या
60/40 सब विभिन्न अनुपात में हैं, इसलिए हमें वह सब भेंट ईश्वर को करना है, अच्छा
और बुरा दोनों। तब और अब। हमें यह भी जानना चाहिए कि तब लोग अपने बुरे कार्यों का
परिणाम अपने अगले जन्म में भोगते थे। लेकिन अब जो भी हम बुरे काम करते हैं, हम इसी
जन्म में भोगते हैं। क्योंकि बुरे कामों का योग इतना अधिक है कि हमें उसे
चक्रवृद्धि ब्याज सहित चुकाना है। एक जीवन इन बुरे कार्यों के परिणामों के भुगतान
हेतु काफी नहीं है। इसलिए कष्ट इसी जीवन में प्रारम्भ हो जाते हैं। इसलिए बुरे
कर्मों के परिणामों के सम्बन्ध में तब और अब में महान विभिन्नता है।
तब, सादा जीवन
और उच्च विचार का समय था। आज जीवन तड़क-भड़क और दिखावे के साथ विलासप्रिय है। तब,
जीवन आदर्श गुणों से परिपूरित था। अब व्यक्ति का जीवन शक्ति, पद, धन, छोटी वस्तुएं,
कूड़े, कचरे से भरा है। तब आध्यात्मिकता थी। आज जीवन स्वार्थपरता और निजी लाभ के
अतिरिक्त कुछ नहीं है। तब वह प्रेम का था और अब वह छद्म प्रेम का है। तब, मानव का
भ्रातृत्व और ईश्वर का पितृत्व मानकर एक परिवार था। अब, प्रत्येक अलगाव चाहता है और
कुछ नहीं बल्कि अहंकार, घृणा और द्वेष प्रबल रूप से हैं। तब, केवल एक रोग था, लेकिन
आज अनेकों बीमारियां हैं और युवावस्था में भी आती हैं। तब ईश्वर कुछ लोगों के लिए
अवतरित होता था, अब ईश्वर सभी स्थानों पर सभी लोगों में परिवर्तन करने तथा सुधार
लाने के लिए आया है।
मैं आपसे
अनुरोध करता हूं कि विचार करें और सोचें कि हम कितने भाग्यशाली हैं। हम अपने लिए
खेद न महसूस करें, हम वर्तमान में अपने सौभाग्य पर विचार करें। उन दिनों ऋषिगण
तपस्या किया करते थे। दूसरी ओर हमें एक सरल सा सूत्र दे दिया गया है। ईश्वर, अपनी
अपार करुणा से हमें ईश्वर के नाम जप का सरल सूत्र देता है। इसलिए, आइये हम सब ईश्वर
के नाम का जप करें।
- साईं राम
अध्याय
- 10
उद्देश्य सहित जीना
मैं
विनयपूर्वक आपसे निवेदन करता हूं कि मैंने जो कुछ थोड़ा भी भगवान के चरण कमलों में
रहकर पाया और समझा है, उसमें आपको सहभागी बनाने के प्रत्येक अवसर का मैं उपयोग करता
हूं। आइये हम समझें कि जीवन अस्थायी है। यह शरीर एक प्रकार का होटल है। मन चौकीदार
है। आप होटल में सदा के लिए नहीं रह सकते। आप उसके मालिक भी नहीं बन सकते। यह मात्र
सुविधा हेतु अस्थायी रूप से ठहरने के लिए एक स्थान है। हमारा जीवन बर्फ के समान है,
जो कुछ समय में पिघल जाता है। जीवन एक बहती नदी के समान है, जिसमें मगरमच्छ है। ये
मगरमच्छ आपके पैर पकड़ कर गहरे नदी में ले जाते हैं। यह नदी इतनी खतरनाक है कि
यद्यपि हम उसे तैर कर पार करना चाहते हैं, किन्तु ऐसा करना उतना सुरक्षित भी नहीं
है।
इसके अतिरिक्त
जीवन एक गांठ है। गांठ इतनी उलझी हुई है कि उसे ढीला कर पाना कठिन है। आप गांठ को
ढीला या खोल नहीं सकते। इस प्रकार जीवन एक जटिलता से बांधी गई गांठ के समान है और
इसलिए प्रसन्नता की बात नहीं है। जो सुख हम अनुभव करते हैं उसमें स्थिरता नहीं है।
दर्द जिससे हम पीड़ित हैं, वह भी स्थायी नहीं है। जीवन दु:ख और सुख का एक संयुक्त
रूप है। वे एक के बाद एक आते हैं। भगवान कहते हैं, "सुख, दो दु:खों के बीच
मध्यान्तर के समान है।"
हमने अभी समझा
है कि जीवन क्या है। हम एक नयी कार जगुआर या मर्सडीज बहुत अधिक कीमत देकर खरीदते
हैं, जो नवीनतम उपकरणों से सज्जित है तथा कार की समस्त अत्याधुनिक सुविधाओं सहित
है। हम उस कार का क्या करते हैं? क्या हम उसे गैराज में रखेंगे और उसकी धुलाई
करेंगे? नहीं। कार हमारे लक्ष्य की ओर यात्रा के लिए है। शरीर ईश्वर द्वारा निर्मित
एक सुन्दर कार है। यह मानव द्वारा निर्मित कार से ज्यादा दिन चलती है। ईश्वर द्वारा
निर्मित इस कार में भाव, चिन्तन, आनन्द, सुख सब कुछ है। जबकि मानव निर्मित कार, नट,
बोल्ट, पेंच आदि से बनी है। बस यही कुछ है उसमें। लेकिन दोनों कारें बहुत कुछ समान
हैं। दोनों में चार पहिये हैं। शरीर में चार टायर हैं - दो पैर और दो हाथ।
खूबसूरत
मर्सडीज बेन्ज में रोशनियां हैं। हम में भी रोशनियों का जोड़ा है - आंखें। कार की
रोशनी कम दूरी वाली है। लेकिन हम अपनी आंखों से दूर की वस्तुओं को भी देख सकते हैं।
मानव निर्मित प्रकाश बैटरी आधारित है। ईश्वर की रोशनी आत्मिक शक्ति द्वारा संचालित
है। तुम उन्हें "स्विच ऑन" कर सकते हो और अपनी पलकें भी बन्द कर सकते हो। कार में
सुन्दर हार्न हैं। हमारे पास भी एक हॉर्न है। जबकि कार में हॉर्न मानव निर्मित है,
वह केवल बीप-बीप ही कहता है, जबकि ईश्वर निर्मित हॉर्न गा सकता है, चिल्ला या
मधुरता से बातें कर सकता है। तदुपरान्त कार में एक स्टीयरिंग व्हील है। अगर हम
स्टीयरिंग व्हील को दाहिने मोड़ते हैं, कार दाहिने मुड़ती है। हमारे पास भी स्टीयरिंग
मन है। मन को ईश्वर की ओर मोड़ो तो वह मन्दिर जाता है। स्टीयरिंग मन को संसार और
शरीर की ओर मोड़ दो तो वह नाइट क्लब जायेगा। वही कार, वही स्टीयरिंग लेकिन मोड़ना
भिन्न-भिन्न है। ईश्वर की ओर
मन्दिर, संसार की ओर
क्लब।
मानव शरीर, जो
एक कार के समान है, का समुचित उपयोग करना है। कार के टायरों में हवा है। हम में भी
हवा है ताकि शरीर क्रिया कर सके। इसे स्वांस कहते हैं। अन्दर लेना और बाहर निकालना।
शरीर में प्राण हवा है, टायर में हवा है। इस शरीर में प्रतिदिन श्वसन क्रिया द्वारा
21,600 बार हवा भरी जाती है। टायर वाली हवा की शिक्षण हेतु कोई भूमिका नहीं है।
जबकि शरीर की हवा हमें जीवन का उद्देश्य सिखाती है। जब आप सांस खींचते हैं आप कहते
हैं "सो" और जब आप सांस बाहर निकालते हैं - "हम। "सोहम" जिसका अर्थ होता है" "मैं
ईश्वर हूं।" इस प्रकार टायरों की हवा यान्त्रिक, भौतिक, मानव निर्मित उद्देश्य हेतु
है, जबकि शरीर में ईश्वर निर्मित हवा के पीछे दार्शनिक उद्देश्य है। इसलिए जो भी
आदमी बनाता है भौतिक और यान्त्रिक है, जबकि जो ईश्वर बनाता है, आध्यात्मिक है। इस
प्रकार हम शरीर रूपी कार का उद्देश्य जान गये। इस शरीर का उद्देश्य हमें हमारे
लक्ष्य तक पहुंचाना है। वह लक्ष्य क्या है? वह कहां है, वहां तक पहुंचने में कितना
समय लगेगा? कितने किलोमीटर दूर है वह? कितनी तेज गति से हम जा सकते हैं? हमें किस
प्रकार के ड्राइवर की आवश्यकता होगी? हमारा लक्ष्य अपने मूल स्थान को वापस जाना है।
एक साधारण सा
उदाहरण, आप लन्दन से आये हैं। आपको लन्दन वापस जाना है। लन्दन से आये हुए आप लॉस
एंजिल्स नहीं जाते। आप लन्दन के निवासी हैं, आपका परिवार और कार्य वहां है इसलिए
लन्दन से आकर आपकी यात्रा लन्दन वापस होकर ही पूरी होगी। क्या मैं स्पष्ट हूं?
इसलिए जीवन का उद्देश्य अपने मूल स्थान को वापस होना है। पहले प्रश्न का उत्तर बहुत
सरल था। लेकिन इस उत्तर ने एक अन्य प्रश्न उठा दिया है। हमारा मूल स्थान क्या है?
सागर है, सूर्य की रोशनी के कारण पानी भाप में परिवर्तित होता है। भाप आसमान में
बादल बन जाता है, बादल बरसते हैं। बरसात का पानी नदियों में बहता है। ये नदियां
अन्त में सागर में विलीन हो जाती हैं। इस प्रकार उनका मूल स्थान सागर है।
भाप-बादल-वर्षा, नदियां वापस सागर में। इसी प्रकार आदमी ईश्वर से आया है, और उसे
ईश्वर को ही वापस जाना है। कितना सरल। हम कह सकते हैं, हम कैसे जान पाये कि हम
ईश्वर से हैं? मैं सोचता हूं, मैं जर्मनी या अर्जेन्टाइना से हूं, ईश्वर से नहीं।
मैं वहां का नागरिक हूं और मुझे वहां मताधिकार भी है। मैं टैक्सों का भुगतान करता
हूं। तब क्यों आप कहते हैं कि मैं ईश्वर से हूं, मैं नहीं जानता ईश्वर कहां है,
लेकिन मैं जानता हूं अर्जेन्टाइना कहां है। इसलिए मैं स्पष्ट रूप से कह सकता हूं कि
मैं अर्जेन्टाइना से हूं ईश्वर से नहीं। लेकिन एक बात समझ लें। अर्जेन्टाइना एक
स्थान है, यह आप जान सकते हैं। अर्जेन्टाइना एक निश्चित स्थान पर है जहां आप जा
सकते हैं और वापस आ सकते हैं। वह आपसे भिन्न है। आप जा और आ सकते हो, लेकिन ईश्वर
सर्वत्र है। आप कही भी जा सकते हैं और वहां से वापस हो सकते हैं?
एक सरल सा
उदाहरण, हवा सर्वत्र है। मान लीजिए मैं आप से हवा में जाने और आने के लिए कहता हूं।
हवा सर्वत्र है, इसलिए आप कैसे हवा के अन्दर जा सकते हैं और बाहर निकल सकते हैं।
इसी प्रकार ईश्वर सर्वत्र है, आप कैसे कहते हैं, आप ईश्वर में जाओ और ईश्वर से निकल
आओ। आप कह सकते हैं कि मैं अर्जेन्टाइना को देख सकता हूं किन्तु मैं ईश्वर को नहीं
देख सकता। अब, जब ईश्वर सर्वत्र है, हम कैसे कह सकते हैं, हम उससे बाहर जाते हैं और
उसमें लौटते हैं? एक उदाहरण लें। एक गाय है, गाय के सम्पूर्ण शरीर में रक्त संचालित
होता है, यह रक्त ही है जो दूध में परिवर्तित हो जाता है। दूध रक्त का उत्पाद है।
यदि तुम गाय से दूध निकालना चाहते हो, तुम्हें उसके थन दबाने और खींचने पड़ते हैं,
लेकिन रक्त सर्वत्र है। रक्त से दूध बनता है, लेकिन आपको दूध मात्र एक स्थान से
मिलता है। इसी प्रकार ईश्वर सर्वत्र है, लेकिन आप उसे केवल निश्चित बिन्दुओं, एक
निश्चित स्थान पर, एक निश्चित मानसिक दशा में, चेतना के एक भाव में या समझदारी के
एक स्तर पर, अनुभव कर सकते हैं।
एक अन्य
उदाहरण, एक जमीन्दार के पास बहुत बड़ी भूमि है। उसमें एक स्थान पर फूलों के पेड़ हैं,
फलों के पेड़ एक दूसरे स्थान पर, धान के खेत, सड़कें और नहरें भी हैं। सम्पूर्ण
सम्पत्ति उसकी है। मान लीजिए जमीन्दार आता है। वह कहां बैठेगा? वह उस स्थान पर
बैठेगा जो साफ सुथरा है। वह नाले या नहर या पेड़ो अथवा फूलों पर नहीं बैठेगा। इसी
प्रकार ईश्वर सर्वत्र है, लेकिन वह आयेगा और एक ऐसे हृदय में बैठेगा जो शुद्ध है,
जब हम उसका चिन्तन या ध्यान करते हैं या उसे बुलाते हैं। मान लीजिए, आप किसी को
बुलाना चाहते हैं, क्या वह आयेगा, यदि आप नहीं पुकारते? लेकिन यदि आप चिल्लाते हैं
- "हे डेविड आओ" वह तुरन्त प्रतिक्रिया देगा। इसी प्रकार ईश्वर को बुलाना भजन है,
और रूप को सोचना ध्यान है। जब आप डेविड को पुकारते हैं, आप उसका रूप देखते हैं और
उसका नाम पुकारते हैं। डेविड एक लम्बा गोरा आदमी है। इसलिए जब आप उस आदमी को चाहते
हैं, आप दूसरे को सोच ही नहीं सकते। इसलिए आपको उस व्यक्ति के रूप का चिन्तन करना
चाहिए जिसे आप बुलाना चाहते हैं। इसी प्रकार भजन ईश्वर को बुलाना है। रूप का चिन्तन
एकाग्रता है। उनके गुणों का चिन्तन धारणा है और उनके चिन्तन की
निरन्तरता ध्यान है। मान लीजिए आप एक चित्र देखते हैं। आप उस समय अन्य कुछ नहीं
देखते। आप शीघ्र ही समय भूल जायेंगे। इस प्रकार आध्यात्मिकता में एकाग्रता, धारणा
और ध्यान ये तीन सोपान हैं।
उन्हें बुलाना
भजन है, जो आध्यात्मिकता में एक पग है। जब हम भजन करते हैं और जब ध्यान करते हैं,
मन में बातें नहीं करते और हृदय में कोई अशुद्धता नहीं रखते। जब आप दर्द से पीड़ित
हैं, आप ध्यान नहीं कर सकते। इस प्रकार, आप ईश्वर की अनुभूति करते हैं, जब आप
उन्हें बुलाते हैं, और जब आप शुद्ध हृदय एवं स्वच्छ मन के साथ उन पर ध्यान लगाते
हैं। फिर भी ईश्वर सर्वत्र है। इसलिए ऐसे ईश्वर से, जो सर्वत्र है, हम सब आये हैं।
दिव्यता हमारा जन्म स्थान है। यही हमारा मूल स्थान है। यह आपसे स्वर्ग या नर्क में
स्थान या काल के प्रभाव से अलग नहीं हो सकता। आप ईश्वर हैं। आपकी चेतना ईश्वर है।
आपका जन्म ईश्वर से है जो आप में है। आप ईश्वर को वापस जायें जो आप में ही है। यही
जीवन का उद्देश्य है। यही आध्यात्मिक लक्ष्य है। मैं इटली वैटिकन के चर्च में जाता
हूं। मैं मक्का की मसज़िद में जाता हूं। मैं जापान व थाइलैण्ड में बौद्ध मन्दिर में
जाता हूं। मैं पुट्टपर्ती जाता हूं। मैं यात्रा में अत्यधिक धन व समय व्यय करता
हूं। मैं अनेक भाषाई तथा आवासीय समस्याओं से गुजरता हूं। मैं वहां करता क्या हूं?
जब बाबा निकट आते हैं मैं अपनी आंखें बन्द कर लेता हूं और नमस्कार करता हूं। मैं
कहीं भी अपनी आंखें बन्द कर सकता हूं और प्रार्थना करूं। क्या मैंने अपनी आंखें
बन्द करने के लिए धन व्यय किया। क्या आंखें बन्द करने के लिए मुझे चौबीस घंटे की
यात्रा करने की आवश्यकता है। नहीं। एक अन्य उद्देश्य है। जब मैं अपनी आंखें बन्द
करता हूं, इसका एक मात्र अर्थ है "हे ईश्वर, जो बाहर है, वही मेरे अन्दर भी है।"
यही अनुभूति आध्यात्मिकता का लक्ष्य है। यही बाबा की शिक्षाओं का तत्व है।
हमें विश्वास
की आवश्यकता है। यदि वह हमें उपचारित कर देतें हैं या हमारी पारिवारिक
समस्याओं को हल कर देतें हैं, हम उनकी ओर दोड़ने लगेंगे। भगवान हमारी सभी इच्छाओं की
पूर्ति अपनी ओर आकर्षित करने के लिए करते हैं। एक बार जब हम उनके निकट आ जाते हैं
और ये समस्यायें हल हो जाती हैं, तब वास्तविक समस्या शुरू होती है। वास्तविक समस्या
ईश्वर को अपने अन्दर खोजने की होती है। यह समस्या क्यों हैं? हम भगवान के पास
इच्छाओं सहित आते हैं। वह उन्हें सन्तुष्ट कर देंगे और तब आपको एक
आध्यात्मिक समस्या देते हैं, जिसका हल आपके अन्दर है। वह हल क्या है? बाबा कहते हैं
- "कम सामान अधिक आराम यात्रा को आनन्दमयी बनाता है।" इसलिए कोई इच्छा मत
रखो। यही एक मात्र आध्यात्मिक समस्या का समाधान है। इस प्रकार हम सांसारिक
समस्यायें लेकर आते हैं, जिनका समाधान उनके पास है। तब वह आध्यात्मिक समस्या हमको
देते हैं जिनका समाधान हमारे पास है। हमें उसे पूरा करना है। बाबा कहते हैं - "जीवन
+ इच्छा = मनुष्य, मनुष्य - इच्छा = ईश्वर" इस प्रकार जीवन दोनों ओर है। जब वह
इच्छाओं से संयुक्त होता है, वह मानव है। एक बार जब इच्छायें चली जाती हैं वही जीवन
दिव्य हो जाता है। बस।
तीन प्रकार के
लोग होते हैं। पहले प्रकार के संसार में नीचे की ओर चलते हैं। वे मूर्ख हैं और
संसार में सुख का उपभोग पशुओं के समान भोजन, वस्त्र और मकान के लिए करते हैं। दूसरे
प्रकार का मनुष्य वह है जो ईश्वर के साथ, संसार के कारण या दूसरे शब्दों में
इच्छाओं की पूर्ति हेतु, चलता है। तीसरे प्रकार के लोग अपनी समस्त इच्छाओं को छोड़कर
केवल उसके लिए ईश्वर की ओर, ऊपर की ओर चलते हैं। यदि मनुष्य ईश्वर की ओर चलता है,
वह दिव्य हो जायेगा। इस प्रकार मनुष्य के पास चुनाव करने का अधिकार है। मनुष्य के
बिना संसार को समझने का कोई उपयोग नहीं है। यदि मनुष्य नहीं है, फिर संसार किसके
लिए है? इसलिए संसार मनुष्य के लिए है। मनुष्य के कारण ही संसार का महत्व है।
क्योंकि आप सब यहां उपस्थित हैं, हम एक सभा कर रहे हैं। मैं खाली कुर्सियों से
बातें नहीं करता। मनुष्य के बिना संसार व्यर्थ है। एक मात्र मानव संसार को मूल्यवान
बनाता है।
एक सरल सा
उदाहरण, एक जंगल में भूमि बहुत सस्ती है, गांव में भूमि कुछ महंगी है और नगर में
भूमि बहुत महंगी है। सब जनसंख्या पर निर्भर है। जनसंख्या के कारण कीमतों में अन्तर
है। इसी प्रकार मनुष्य संसार में समस्त भूमि से अधिक मूल्यवान है।
इसलिए यदि आप
मनुष्य को स्पष्टतया समझ लेते हैं, आप संसार को आसानी से समझ लेंगे। क्योंकि यह
मनुष्य है जो संसार को मूल्यवान बनाता है।
एक अन्य
उदाहरण - सोना, चांदी, हीरा सब बहुत महंगा है, जबकि बालू, शीशा और पत्थर सस्ता है।
कोई भी उन्हें नहीं खरीदता। क्योंकि मनुष्य सोना और हीरा खरीदता है। इसलिए उसकी
कीमत ऊंची है। यदि कोई भी सोना या हीरा न खरीदे तब वे पत्थर के समान सस्ते हो
जायेंगे। वे क्यों कीमती हैं? केवल इसलिए कि मनुष्य सोने को मूल्यवान मानता है। इस
प्रकार सोने में कोई मूल्य नहीं है। सोना मूल्यवान है क्योंकि आप खरीदते हैं।
अन्तत: यह मनुष्य है जो वस्तुओं को मूल्यवान बनाता है। हमें मनुष्य की प्रकृति और
मनुष्य के गुणों को संसार से अधिक समझना चाहिए।
अध्याय
- 11.
तीन से मुक्त हों
इस प्रात:
"तीन से मुक्त हों" विषय चुना गया है, जिसे भगवान ने आध्यात्मिकता के एक महत्वपूर्ण
बिन्दु की ओर एक पग बताया है। हम अक्सर पूछते हैं, "किसी को आध्यात्मिक होने की
आवश्यकता क्यों है?" प्रत्येक के पास अपने कारण हैं, प्रत्येक अपने तर्क देता है,
लेकिन भगवान इस प्रश्न का उत्तर सरलतम तथा सर्वोत्तम प्रकार से देते हैं। आपको
आध्यात्मिक होना क्यों आवश्यक है? मुझे विश्वास है आपने यह उत्तर कदाचित पहले कभी
नहीं सुना है।
भगवान ने कहा
- "आपका जन्म, फिर न जन्म लेने के लिए हुआ है।" जन्म लेकर, यदि आप
आध्यात्मिक हैं, तब फिर आपका जन्म नहीं होगा। प्रत्येक को आध्यात्मिक होना है।
इसीलिए आध्यात्मिकता की आवश्यकता है। यह आध्यात्मिकता का उद्देश्य है। जीवन का
प्रारम्भ जन्म से होता है और अन्त मृत्यु से होती है और इनके बीच यात्रा जन्महीन और
मृत्युहीन होने हेतु हमारे दोहरे कर्तव्य के लिए होती है। यही आध्यात्मिकता का
उद्देश्य है। यह इच्छाओं की पूर्ति या बढ़ाने के लिए नहीं है। ये इच्छायें वे हैं जो
आपको अपने लक्ष्य से दूर ले जायेंगी।
इसलिए इस सुबह
मैं आपसे "तीन से मुक्त हों" पर वार्ता करना चाहता हूं। वे कौन सी तीन वस्तुएं हैं,
जो आपके और ईश्वर के बीच बाधा के रूप में आती हैं? वे तीन क्या है जो आपसे आपका
अपना आनन्द ठग लेती हैं? भगवान ने बार-बार कहा है - "आप एक नहीं, तीन हैं। एक वह
जो तुम सोचते हो तुम हो, एक वह जो अन्य लोग सोचते हैं, तुम हो और एक जो तुम वास्तव
में हो।" तुम अपने बारे में क्या सोचते हो? तुम कौन हो? प्रत्येक व्यक्ति सोचता
है कि वह मात्र एक शरीर है, इससे अधिक कुछ नहीं।
पहला जो आप
सोचते हो, आप हो, एक शरीर है जिससे आप अपनी पहचान करते हो। शरीर इतना महत्वपूर्ण है
कि आप उसे स्वच्छ करते हैं, कपड़े पहनाते हैं और सजाते हैं। शरीर इतना महत्वपूर्ण है
क्योंकि आप समझते हैं कि आप शरीर हैं। इसलिए वह जिसे आप सोचते हो, आप हो, शरीर, देह
है। जैसे ही बच्चा जन्म लेता है, वह रोता है। जीवन रोने से प्रारम्भ होता है। क्या
उसका अन्त भी रोने से होना चाहिए? नहीं, आवश्यक नहीं। जीवन, जो रोने से प्रारम्भ
हुआ, उसका अन्त मुस्कराहट के साथ होना चाहिए। यदि हम अन्त में रोते हैं, तब हमारा
जीवन में रुकना व्यर्थ हो गया। जैसा कि भगवान बताते हैं - "कोई भी वही समाचार पत्र
अगले दिन फिर नहीं पढ़ता। इसलिए जीवन एक समाचार पत्र के समान है जो कल के लिए व्यर्थ
का कागज मात्र है, यदि उसका अन्त रोने से होता है।"
मान लें आप एक
होटल जाते हैं। वहां आपसे औपचारिक रूप से कुछ प्रश्न पूछे जायेंगे। आप से अपना नाम,
पता जहां से आप आये हैं और वह पता जहां आप जा रहे हैं, लिखने के लिए कहा जायेगा।
यदि आप कहते हैं कि आप अपना नाम और पता आदि नहीं जानते तब स्वाभाविक रूप से आप से
जाने के लिए कहा जायेगा। आपको कहा जायेगा कि यह मानसिक चिकित्सालय नहीं है। इसलिए
हमें जीवन का उद्देश्य, दिशा और लक्ष्य जानना चाहिए अन्यथा जीवन पागलखाना हो
जायेगा, जो नहीं जानता, क्यों कहां या किस प्रकार जन्म और मृत्यु के बीच जीवन का
ठहराव हो। इस प्रकार पहली वस्तु जो हमारे मार्ग में आती है, वह है शरीर, सभी प्रकार
की भिन्नतायें उसमें हैं। कोई दो शरीर एक से नहीं हैं। कोई दो पत्तियां या फूल या
जुड़वां बिल्कुल एक से नहीं होते। एक लम्बा है, तो दूसरा ठिंगना है। एक सुन्दर है तो
दूसरा नहीं है। एक बुद्धिवादी है तो दूसरा नहीं है। जहां तक शरीर का सम्बन्ध है,
उसमें विविधतायें हैं, भिन्नता है और किसी प्रकार की समानता न होने के साथ-साथ
परिवर्तनशील हैं। कोई दो समान नहीं हो सकते। इस प्रकार विविधता, विभिन्नता और
भिन्नता का कारण "मैं शरीर हूं" की भावना है। जब आप सोचते हैं कि आप शरीर हैं, वहीं
विभिन्नता आ जाती है। इसलिए तीन से मुक्त होने के लिए, पहला है शरीर की भावना से
मुक्त होना।
अब एक दूसरी
बात है आप मन हैं। आप सोच सकते हैं कि दूसरे लोग सोचते हैं कि आप महान हैं। निश्चित
रूप से नहीं। वे जो ऐसा कहते हैं निश्चित रूप से ऐसा महसूस नहीं करते। यह तो मात्र
वह है, जो वे तुम्हारे सामने कहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति, किसी अन्य व्यक्ति को,
दूसरे व्यक्ति के रूप में लेता है। यह व्यक्तिगत अलगाव व्यक्तिगत मन की भावना है।
यह अलगाव मानसिक स्तर पर वह है जो दूसरे तुम्हारे बारे में सोचते हैं। हां, हमें इस
अलगाव के पक्ष से भी मुक्त होना चाहिए। क्यों? कृपया समझें कि दूसरा व्यक्ति जैसे
आप हैं वैसा ही है। भोजन, वस्त्र, पीना, सोना प्रत्येक में समान है। इसलिए हम सब एक
समान हैं। खाल सफेद या काली हो सकती है, लेकिन इच्छा, भूख, प्यास हम सबमें समान है।
हमें विभिन्नता में एकता समझनी चाहिए, लेकिन यदि हम व्यक्तिगत अलगाव की भावना पर
चलते हैं, तब मात्र विविधता ही रहेगी।
यह एक बाधा है
जो समुचित परिदृश्य, सच्ची दृष्टि और सही बोध होना अत्यन्त कठिन बना देता है। इसलिए
तीन से मुक्त होने हेतु दूसरा, व्यक्तिगत पहचान और अलगाव की भावना से मुक्त होना
है।
अब हम तीसरे
पर आते हैं, वह जो आप वास्तव में हैं - मैं आत्मा हूं। प्रत्येक व्यक्ति कहता है
मैं आत्मा या जीवात्मा हूं। उससे भी आपको मुक्त होना है। क्यों? जब वह
स्थायी, सनातन, अपरिवर्तनीय, अद्वैत है, फिर क्यों आपको उससे मुक्त होना है। "मैं
जीवात्मा हूं?" यह भी एक बाधा है। कैसे? जो आत्मा आप में है, वह सभी जीवों एवं
निर्जीव वस्तुओं की आत्मा से भिन्न नहीं है। आत्मा या जीवात्मा जो पक्षी को उड़ने की
शक्ति देता है या पेड़ को फूल, और जो कुत्ते को विश्वास पात्र बनाता है, वही आत्मा
मनुष्य में भी विद्यमान है। आत्मा एक और समान है, यद्यपि उसका प्रकटीकरण भिन्न है।
यह कहना मैं आत्मा हूं भी एक संकुचित बोध है। यह भावना कि आप पूर्ण के एक अंश हैं,
सम्पूर्ण के एक भाग हैं। समुचित बोध है। इस प्रकार आपकी आत्मा पूर्ण आत्मा का भाग
है। आपकी आत्मा बिल्कुल वैसी ही है जैसी सर्वव्यापक, सर्वविस्तृत, सर्व प्रभुत्व,
सर्व सम्मिलित करने वाली, सर्व विद्युत प्रवाही, सक्रिय चेतना है। वह किसी भी
प्रकार से उससे भिन्न नहीं है। इसलिए आपको इस विचार से मुक्त हो जाना है "मैं
जीवात्मा हूं।" आपकी आत्मा पूर्ण चेतना का अंश है।
इसे कैसे
जानें? भगवान एक उदाहरण देते हैं। एक गुब्बारा लो। जैसे-जैसे तुम फूंकते हो, वह
आकार में बढ़ता है और अधिक हवा भरने पर वह फूट जाता है। गुब्बारे के अन्दर हवा है और
साथ ही बाहर भी। अन्दर की हवा न तो आयात की गई है और न बनाई। वह वही है जो उसके
चारों ओर है। यह अलगाव गुब्बारे के आकार, रूप और नाम के कारण है। जब हवा का विलय
होता है आप समझ जायेंगे कि अन्दर की हवा, वही हवा है, समान प्रकृति, गुण एवं पहचान
वाली जैसी बाहर की हवा है। गुब्बारे के चारों ओर की हवा पूर्ण चेतनता है, जो
सर्वत्र विद्यमान है। वह चेतना या सर्वत्र हवा गुब्बारे में भी व्यक्तिगत स्तर पर
अन्त:कारण के रूप में विद्यमान है। अन्त:करण व्यक्तिगत स्तर पर है, चेतनता सामूहिक
स्तर पर है। इसलिए यह चेतनता जो सर्वव्यापक है गुब्बारे में अन्त:करण के रूप में
विद्यमान है और वह है जो इन्द्रियों और शरीर के विभिन्न अंगों की सक्रियता एवं
क्रिया का कारण है। हम अपना जीवन विभिन्न प्रकार के कर्तव्य करते हुए जीते हैं। वह
चेतना है -
चेतना
- इन्द्रियों के स्तर पर
अन्त:करण
- इन्द्रियों से परे
चेतनता
- जो सर्वव्यापक है।
इसलिए यह
महसूस करना कि मैं अकेली चेतना हूं भी एक सीमित और सीमाबद्ध विचार है। हमें जानना
चाहिए कि - "मैं चेतनता हूं, यह वह चेतनता है जो सर्वत्र व्याप्त है।"
अब एक दूसरा
बिन्दु तीन से मुक्त होने के लिए। पहला है मैं शरीर हूं का विचार, दूसरा व्यक्तिगत
सत्ता, जीव होने की भावना है और तीसरा है व्यक्तिगत आत्मा या जीवात्मा होने की
भावना। आप व्यक्तिगत आत्मा जीवात्मा नहीं हैं, बल्कि परमात्मा की पूर्ण चेतना,
सर्वोच्च चेतनता के समान ही हैं। इसलिए इन तीनों से मुक्त होने का एक उपाय है। आइये
हम एक दूसरा तरीका सोचें।
तीन से मुक्त
हो - प्रथम है प्रकृति, प्रत्येक व्यक्ति में तीन मौलिक गुण होते हैं। कोई नहीं कह
सकता मैं तीन में एक गुण रखता हूं। प्रत्येक व्यक्ति में सभी तीनों गुण हैं, लेकिन
वह गुण, जो हमें अच्छा या बुरा बनाता है, वह गुण है जो प्रभावी होता है, और वह जो
हमारी प्रकृति या प्रवृत्ति का निर्धारण करता है, हमारे सम्बन्धों को प्रभावित करता
है और हमारे चरित्र को आकार देता है, ही प्रभावी गुण होता है। ये तीन गुण क्या हैं?
पहला तामसिक गुण है। तामसिक भैंसे के गुण वाला है। वह अधिकता से खाने और सोने के
लिए जाना जाता है। इस प्रकार का अधिक खाना या सोना एक पशु का गुण है। पहले, गुण
तामसिक से मुक्त हों। द्वितीय है राजसिक भावना। हम नहीं कह सकते क्या या क्यों या
कब कोई भावुक हो जायेगा। लोग किसी भी समय परिवर्तित हो सकते हैं। हम केवल अपना
दृष्टिकोण देखते हैं। हम आनन्दाश्रु बहाते हैं जब हम स्वामी को देखते हैं, लेकिन
जैसे ही हम फाटक पार करते हैं, हम सिगरेट पीने या घर अथवा दुकानों पर जाने सा महसूस
करते हैं। जब हमारे अन्तस में समस्त दिव्य तरंगे हैं, फिर क्यों हम उन्हें खो देते
हैं जब हम बाहर जाते हैं? भावुकता। वास्तविक आध्यात्मिकता भावुकता विहीन स्थिर और
अपरिवर्तनीय है। इसलिए हमें इस प्रकार की भावुकता से मुक्त होना है।
अंजन पुत्र,
हनुमान सीता की खोज में लंका गये। उन्होंने वहां लाल फूलों को देखा। रामायण के
लेखक, तुलसीदास ने उल्लेख किया है कि वहां लंका में सफेद फूल थे। तुलसीदास ने राम
से प्रार्थना की, यह कैसे है कि हनुमान उन्हें लाल फूल कहते हैं जबकि मैं कहता हूं
कि वे सफेद हैं? राम ने कहा कि हनुमान के लिए वे लाल थे क्योंकि वह उस समय पूर्ण
भावुकता एवं क्रोध में थे। वह सारी बुरी ताकतों के विरुद्ध बदले की भावना से पूरित
थे इसलिए वे उन्हें लाल दिखाई दिये। तुलसीदास पवित्र और शान्त, ठण्डे और प्रकृतिस्थ
थे। इसलिए उन्होंने फूलों को सफेद देखा। इस प्रकार, यह भावुकता आपकी दृष्टि धुंधली
कर देती है। भावुकता से रंगीन दृष्टि आप पाते हैं। वह आपको नकारात्मक प्रवृत्ति की
ओर ले जाती है। वह व्यक्ति जो जीवन में सकारात्मक प्रवृत्ति चाहता है, उसे भावुक
नहीं होना चाहिए।
तीसरा है
सात्विक गुण। यह शान्त, समचित्तता और सन्तुलन का गुण है। यह शुद्ध, निष्कलंक और
सनातन है। यह तक भी एक रोड़ा या बाधा है। आपको एक पवित्र स्वभाव से भी ऊपर होना
चाहिए। उदाहरण - एक चोर लोहे की हथकड़ी में है और मैं सोने या चांदी की चेन पहने
हूं। वे दोनों एक और समान हैं अर्थात चेन में। चेन एक बन्धन है। लोहे की चेन पशुता
तामसिक गुण है। चांदी की चेन राजसिक गुण भावुकता का गुण है और सोने की चेन सात्विक
गुण है - सम चित्तता और शान्तता का। इसलिए व्यक्ति को इन तीनों सात्विक, राजसिक और
तामसिक गुणों से मुक्त होना चाहिए।
अगले तीन,
हाथ, सिर और हृदय से मुक्त होना है। कैसे? हाथ कार्य के लिए हैं, कर्म योग - कर्म
का पथ। सिर का अर्थ है विद्वता। यह सब सांसारिक हैं, यह सब बाह्य हैं। हम संसार को
बुद्धि से पहचानते हैं। बुद्धि का अर्थ होता है स्मृति, सार कथन, सामान्य ज्ञान और
पुस्तकीय ज्ञान। इसलिए कर्म का मार्ग हाथ - "मैं कर्ता हूं" के विचार को त्याग दें।
ज्ञान का पथ, बुद्धि, अहंकारी विचार कि मैं जानकार हूं त्याग दें।
अगला है हृदय।
इसका अर्थ है भावना और अनुभव करना। यह भक्ति योग है, भक्ति का मार्ग। भक्ति आती है
जब आप महसूस करते हैं कि आप ईश्वर से अलग हैं। जहां भक्त और भगवान हैं, वह भक्ति
है। एक भक्त की भक्ति केवल तब ही होती है जब वहां दो हैं, ईश्वर और भक्त। जब केवल
एक है, तब कौन किसका भक्त है। लेकिन जब एक ही है बगैर दूसरे के, जब आप ही ईश्वर
हैं, किसे किसका भक्त होना? इसलिए भक्त की एक मात्र यह भावना कि मैं ईश्वर से अलग
हूं तक त्याग देना है। भक्ति की यह भावना कि मैं ईश्वर से अलग हूं, निश्चित रूप से
छोड़ना है। ज्ञान में बौद्धिक ज्ञान को छोड़ना है। इस प्रकार दिव्यता के साथ अपनी
पहचान के लिये इन तीनों - हाथ, सिर और हृदय आपको त्याग देना चाहिए।
भगवान ने कुछ
दिन पूर्व कहा - "बहुत, बहुत समय बीत जाने और कई युग चले जाने के बावजूद मानव
अभी तक न साक्षात्कार कर पाया है, न अनुभूति कर पाया है। क्यों? क्योंकि वह
विश्लेषण करता रहा है, अन्वेषण नहीं। वह प्रयोग करता रहा है, अनुभव नहीं। उसके बोध
होना शुरू हुआ, लेकिन तत् त्वम् असि, तुम वह हो, मैं ईश्वर हूं - "अहम्
ब्रह्मास्मि", मैं ब्रह्म हूं - "
अयम् आत्म ब्रह्म" की
वास्तविक पहचान की अनुभूति उसको नहीं हुई।"
तीन से मुक्त
हो। व्यक्ति शरीर के रूप में, व्यक्ति मन के रूप में, व्यक्ति जीवात्मा के रूप में,
मन के तीन गुणों राजसिक, तामसिक, सात्विक से मुक्त हो। सर, हाथ और हृदय के स्तर पर
अहंकार से मुक्त हो। भूत, वर्तमान और भविष्य से मुक्त हो। ये काल हैं। ईश्वर काल के
परे है। ईश्वर समय का निर्धारण करता है। हमें कब तक पृथ्वी पर रहना है, कब हमें
छोड़ना है, लेकिन वह समय व स्थान से परे है। आप यहां हैं, आप इसी समय अमरीका
में नहीं हो सकते क्योंकि आप स्थान से बंधे हुए हैं।
आप यहां कुछ
समय के लिए हैं। आप यहां सदा के लिए नहीं हो सकते। इसलिए आपको इन तीनों भूत,
वर्तमान और भविष्य से दूर हो जाना है। क्यों? भगवान कहते हैं "जो गुजर गया उसे
वापस नहीं लाया जा सकता" यदि हमने कुछ बुरा कल किया था, उसके लिए सदा के लिए और
कभी-कभी रोने का कोई अर्थ नहीं। इसलिए भूत को भूल जाओ क्योंकि उसे वापस पाया नहीं
जा सकता। बाबा करुणामय हैं। वह हमारे पूर्व के कर्मों के आधार पर निर्णय
नहीं करते, न ही वह हम पर पूर्व के वर्षों की आय के आधार पर टैक्स लगायेंगे।
भविष्य के बारे में मत सोचो क्योंकि हम उसके लिए विश्वस्त नहीं हैं। स्वामी कहते
हैं तुम्हें कुछ भी कल के लिए स्थगित नहीं करना चाहिए। वह जो आज कार्य को स्थगित
करता है, वह कल भी कार्य करने को स्थगित करेगा और इस प्रकार जीवन में अच्छी बातें
खो देगा।
यहां तक
वर्तमान की भावना भी त्याग देना है, क्योंकि "मैं" का भूत, भविष्य और वर्तमान नहीं
होता है "मै" सनातन सत्य है। समय व्यतीत होने के साथ-साथ केवल हमारे शरीर परिवर्तित
होते हैं। भूतकाल में मैंने एक लड़के का शरीर लिया था, मध्य में एक युवा का और
भविष्य में यह शरीर बूढ़ा हो जायेगा। मैं तब एक लड़का था, अब मैं एक पिता हूं और बाद
में सनातन हूं। "मैं" समय से परे है। "मैं" स्थान से सीमित नहीं है। इसलिए, भूत,
वर्तमान और भविष्य त्याग दो। निस्त्रये गुणयो भव। इसलिए तीन से मुक्त हो,
यही मुक्ति का पथ है।
अध्याय
- 12
ईश्वर के साथ रहना, ईश्वर के लिए रहना, ईश्वर में रहना
मानव अनन्त
काल से ईश्वर की खोज में रहा है। इस सृष्टि के प्रारम्भ से मानव सुख की खोज में रहा
है। ईश्वर कहां है, वह जानना चाहता था। वह उनका वर्णन करना चाहता था। उसने ईश्वर
कौन है? खोजने के लिए जांच पड़ताल की। एक समय उसने कहा, "ईश्वर वायु देवता है।" एक
अन्य समय उसने कहा - "ईश्वर अग्नि है" बाद में, फिर प्रश्न उठा - कौन है ईश्वर?
उत्तर था - "सर्वम् विष्णुमय जगत्" - सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और कुछ नहीं बल्कि ईश्वर
का रूप है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और कुछ नहीं दिव्यता की प्रतिछाया है। यह था उत्तर।
चेतना क्या है? मैं स्वस्थ निद्रा का अनुभव करता हूं। जिसे हम सुशुप्ति कहते हैं।,
"सुशुप्ति" का ठीक अनुवाद गहन निद्रा है। (हमें स्वस्थ निद्रा नहीं कहना चाहिए
क्योंकि हम कभी-कभी खर्राटे भरते हैं) जिस समय मैं अगली सुबह उठता हूं, मुझे यह
बताने की आवश्यकता नहीं होती कि मैं मानव हूं या कि मैं अनिल कुमार हूं, मैं वह
जानता हूं।
गहन निद्रा
में मैं अपने को भूल जाता हूं, मैं नहीं जानता, मैं कहां हूं या मेरी इन्द्रियों को
क्या हुआ। जैसे ही मैं जाग जाता हूं, मैं जानने लगता हूं कि मैं अमुक और अमुक हूं।
यह तुमसे किसने कहा? आप कैसे जानते हैं कि आपको पिछली रात्रि आनन्दमयी और स्वस्थ
निद्रा मिली थी? यह और कुछ नहीं बल्कि चेतना प्रज्ञानम है। इसलिए वहां कौन है?
प्रज्ञानम ब्रह्म। इस प्रकार ईश्वर प्रज्ञानम है, तब ईश्वर कहां है? "तत त्वम असि"
वह तुम हो? यहां, दो हैं वह और यह।
दूसरा उत्तर -
"अयम् आत्म-ब्रह्म" - "यह आत्मा ब्रह्म है" यहां भी दो हैं। लेकिन भगवान ने कहा,
मैं, मैं हूं। ब्रह्म और मैं भिन्न नहीं हैं। मैं कहता हूं "अहम् अहम्" मैं हूं
मैं। विष्णु सहस्त्र नाम में एक समय ईश्वर कौन है के सम्बन्ध में भ्रम उत्पन्न हो
गया था। उन्होंने कहा - "ईश्वर यह है, ईश्वर वह है ..... प्रत्येक वस्तु ईश्वर है
... आदि आदि ..." फिर भी, खोज जारी रही। अन्तत: उपनिषदों ने बुद्धिमानीपूर्वक कहा
"चुप रहो, तुम ईश्वर की परिभाषा नहीं कर सकते। तुम ईश्वर को नहीं जान सकते।" ईश्वर
का विश्लेषण नहीं किया जा सकता। ईश्वर की अनुभूति हो सकती है। ईश्वर पर प्रयोग नहीं
हो सकते। ईश्वर की केवल अनुभूति ही हो सकती है "याथू वाचू निवृतन्ती अप्राप्य
मनसा स:।"
"वह,
जिसे मन द्वारा सोचा नहीं जा सकता, वह, जिसे बुद्धि द्वारा समझा नहीं जा
सकता, वह, जिसका वर्णन नहीं हो सकता, वह, जिसे बताया नहीं जा सकता -
वह दिव्यता है। इस प्रकार ईश्वर कौन है? मात्र अनुभूति। लेकिन हम आधुनिक युग
के, कम्प्यूटर युग के हैं। भगवान ने एक सरल सा उत्तर दिया "ईश्वर प्रेम है। प्रेम
ईश्वर है, प्रेम में रहो" बाबा ने कहा वेद और कुछ नहीं "वेदना" उत्कंठा, जिज्ञासा
है। लेकिन तुम्हें अवेदना होना चाहिए। तुम्हें शास्त्रों पर आश्रित होने की
आवश्यकता नहीं है।
भगवतगीता, वेद, और सभी
शास्त्र मात्र शाब्दिक एवं सैद्धान्तिक हैं, लेकिन ईश्वर भिन्न है। ईश्वर प्रेम
है, प्रेम ईश्वर है, प्रेम में रहो।
अब बिन्दु यह
है। जब आप किसी वस्तु से प्रेम करते हैं, आप उसे पाना चाहते हैं। जब आप किसी से
प्रेम करते हैं, आप उस व्यक्ति के निकट रहना चाहते हैं। इस प्रकार प्रेम निकटता या
सानिध्य की ओर प्रेरित करता है। यह विषय का पहला पक्ष है - ईश्वर के साथ रहना,
क्योंकि आप ईश्वर से प्रेम करते हैं। आप उसके साथ रहना चाहते हैं। ईश्वर के साथ
रहने से हम क्या समझते हैं? यह एक सामान्य बात नहीं है। जैसा कि बाबा ने स्वयं कहा
है - यह आग में रहने के समान है। प्रत्येक वस्तु राख हो जायेगी। यह इतना सरल
नहीं है। आइये हम अपने शास्त्रों से कुछ उदाहरण लेते हैं।
एक मां अपने
पुत्र को राजा बनाना चाहती थी। उसने राजा से एक वरदान मांगा। वह उसे खोने के लिए
तैयार थी जो उसके इतने निकट था। वह अपने पति तक को भी निराश करने के लिए तैयार थी।
उसकी एक मात्र इच्छा अपने पुत्र को राजा के रूप में देखना था। वह कैकेयी थी - रानी,
और भरत वह पुत्र। भरत ने पूर्णतया इन्कार कर दिया, वास्तव में वह अपनी मां को मार
देना चाहता था। इस प्रकार ईश्वर की निकटता के प्रश्न पर, जब "मैं" और ईश्वर के बीच
चुनने की बात आती है, वह ईश्वर को चुनता है।
एक अन्य घटना
थी जब एक पिता ने अपने पुत्र से कहा कि वह उन्हें राज्य सौंप देंगे। पिता ने पुत्र
और राज्य को बहुत वर्षों के तप के बाद पाया था। उसने कुछ शर्तें रखीं कि पुत्र को
उनकी इच्छा के अनुसार अध्ययन करना चाहिए। उसने उससे डींग मारी कि वह सभी पांच
तत्वों और सभी ग्रहों तथा तारों पर नियन्त्रण कर सका था। यहां तक सूर्य भी उसके
शासन में था। पिता था हिरण्यकश्प और उसका पुत्र प्रहलाद। प्रहलाद ने स्पष्टत: मना
कर दिया, क्योंकि वह इसके स्थान पर नारायण को चाहता था। इस प्रकार जब पिता और ईश्वर
के बीच चुनाव करने का अवसर था, प्रहलाद ने ईश्वर को चुना।
एक अन्य घटना
जब एक आदमी ने अपने भाई से अधार्मिक मार्ग न अपनाने हेतु अनुनय-विनय किया, उसने कहा
कि चूंकि उसका भाई महान विद्वान और एक महान शैव भक्त है, उसे राम की पत्नी को वापस
कर देना चाहिए, सीता भगवान राम को। यह विभीषण था, बड़ा भाई रावण, लंका का राजा।
चूंकि रावण ने इस सुझाव पर ध्यान नहीं दिया। विभीषण ने लंका छोड़ दी और भगवान राम को
समर्पण कर दिया। इस प्रकार जब ईश्वर और भाई के बीच चुनने का अवसर आया, विभीषण ने
ईश्वर को चुना, अपने भाई को नहीं। एक अन्य दृष्टान्त है। उन दिनों की परम्परा के
अनुसार नवरात्रि उत्सव की अवधि में, रानी को राजा की आरती करनी होती थी। लोगों ने
मीरा से राजा को सम्मानित करने और आरती उतारने के लिए प्रार्थना की। वह अन्तत: मान
गई, जैसे ही वह राजा के पास जाने के लिए उठी, उसने एकाएक कृष्ण की बंसी की मधुर तान
सुनी और वह मंदिर की ओर भागी। जैसे ही वह मंदिर की ओर चली ध्वनि बन्द हो गई। अब वह
"करूं या न करूं" की स्थिति में आ गई वह, क्या करना है, का निर्णय नहीं कर पायी।
स्वाभाविक रूप से राजा बहुत क्रोधित हुआ और राजसभा तक मीरा को घसीट कर अपमानित
किया। फिर भी, मीरा ने अपने पति के बजाय कृष्ण को चुना। इस प्रकार ईश्वर के साथ
रहना, चुनने का विषय है। संसार एक ओर है और दूसरी ओर ईश्वर। सृष्टि एक ओर और
सृष्टिकर्ता दूसरी ओर। यह प्रश्न बहुत लम्बे समय से रहा है। एक बार दो व्यक्ति
भगवान के पास आये। एक ने भगवान से उनकी सेना के लिए कहा और दूसरे ने स्वयं भगवान के
लिए कहा। वह अर्जुन और दुर्योधन थे, जिन्होंने भगवान की सहायता चाही थी। इसलिए जब
लोगों या वस्तु आदि के बीच चुनाव करने की हुई, अर्जुन ने स्वयं भगवान को चुना।
परिवार और सम्बन्धियों से यह सारा अलगाव केवल तीव्र प्रेम (भक्ति) के कारण सम्भव
हुआ।
एक मां के
त्याग का दृष्टान्त देखिये। जब पुत्र खतरे में है, मां बच्चे के लिए अपने जीवन का
त्याग करने के लिए तैयार है। एक पत्नी अपने पति के लिए अपना जीवन का त्याग करने के
लिए तैयार है। इस प्रकार जब चुनने की बात होती है, एक का ही चुनाव होता है, दोनों
का नहीं। ईश्वर या धन सम्पत्ति। इसलिए ईश्वर के साथ रहने का अर्थ है, अस्थायी
आकर्षण एक ओर और दिव्यता दूसरी ओर के बीच चुनाव करने का। आग पर चलना या तलवार की
धार पर चलना, यह एक कठिन निर्णय है। इस प्रकार यदि आपमें केवल ईश्वर के लिए तीव्र
प्रेम है, आप उनके साथ नहीं रह सकते। केवल शारीरिक निकटता ही आध्यात्मिकता में
प्रधान विषय नहीं है। वृन्दावन के बाहर बहुत सी दुकानें हैं। क्या मैं कह सकता हूं
कि वे दुकानदार ईश्वर के साथ रह रहे हैं? बड़ी संख्या में मजदूर प्रशान्ति निलयम में
निर्माण स्थल पर हैं। वास्तव में भगवान मानवता और भवनों का निर्माण करने वाले हैं।
हर समय देखो तो भवन निर्मित हो रहा है। इस वर्ष आप एक भवन पायेंगे और अगले वर्ष दो
पायेंगे। बाद में आप दो और ध्वस्त भवनों को पायेंगे। यहां बुरी प्रवृत्तियों का
विनाश किया जाता है और मानवीय मूल्यों की रचना की जाती है। इसलिए क्या मैं कह सकता
हूं कि सारे मजदूर यहां ईश्वर के साथ रह रहे हैं? ईश्वर के साथ रहना मात्र शारीरिक
निकटता नहीं है। भगवान कहते हैं कि प्रत्येक को प्रिय और निकट होना है। इस प्रकार
से आध्यात्मिक रूप से यदि कहूं तो ईश्वर के साथ रहने का अर्थ है उनका अति प्रिय
होना। प्रत्येक को स्वयं भगवान का प्रिय बनना है।
हम उनके साथ
आध्यात्मिक रूप से कैसे रहें? ईसामसीह ने कहा, "मैं सत्य हूं, मैं वह पथ हूं,
मैं ही जीवन हूं। बाबा कहते हैं "मेरा अनुसरण करो।" शरारती कृष्ण ने भी स्पष्ट
रूप से इस महत्वपूर्ण बिन्दु को प्रदर्शित किया। वह पड़ोस के सब घरों में उथल-पुथल
कर देते। वे कृष्ण की मां के पास आतीं और शिकायत करतीं। "यशोदा तुम्हारा लड़का बड़ा
शरारती है। वह हमारा दूध और दही चुरा रहा है" यशोदा अत्यन्त दु:खी हुईं। "मेरे
प्रिय पुत्र, हमारे पास बहुतायत से दूध और दही है, तुम क्यों पड़ोसियों को परेशान
करते हो। मैं तुम्हें मारूंगी, शैतान लड़के।" वह एक छड़ी लेकर तैयार हो जाती, लेकिन
कृष्ण को पकड़ पाना इतना आसान तो नहीं है। जब वह दाहिने मुड़तीं नटखट बाल गायब होकर
बायें आ जाता, जब वे बायें मुड़तीं, वह गायब होकर दायें आ जाता। इस प्रकार वह उनको
नहीं पकड़ पाईं और वे भाग गये। वह कृष्ण-कृष्ण चिल्लाती रहीं। एकाएक उन्होंने कृष्ण
के पैर के चिन्ह देखे, कृष्ण दूध के बर्तन में घुसे थे और हर ओर दूध वाले पैरों के
चिन्ह छोड़ते चले गये। इस प्रकार कृष्ण अपने को पकड़ने के लिए दूध वाले पैरों के
चिन्ह द्वारा उन तक पहुंचने का मार्ग बता गये। भगवान ने कहा, ठीक यशोदा जिस प्रकार
कृष्ण के पद चिन्हों का अनुसरण कर अन्तत: कृष्ण को पा सकीं, तुमको भी ईश्वर के पद
चिन्हों का अनुसरण करना चाहिए। इस प्रकार ईश्वर के साथ होने का अर्थ "उनके पद
चिन्हों पर चलना" है। हमें स्वामी का अनुसरण करना चाहिए। स्वामी सत्य है। यदि
आप स्वामी का अनुसरण करना चाहते हैं, आपको सत्य पर टिकना चाहिए। यदि आप स्वामी का
अनुसरण करना चाहते हैं, आपको सद्आचरण, धर्म के पथ का अनुसरण करना चाहिए। सत्य और
धर्म दो आदर्श हैं जो भगवान बाबा के पद चिन्हों का अनुसरण करने में आपकी सहायता
करेंगे। "सत्य मेरा स्वरूप है, धर्म मेरा आधार है" यह ईश्वर के साथ रहना है।
ईश्वर के साथ रहने का अर्थ है कि आप उनसे तीव्रता से प्रेम करते हैं, अपनी सम्पत्ति
और परिवार से भी बहुत अधिक। बाइबिल में कहा गया है "एक धनी आदमी का स्वर्ग के द्वार
में प्रवेश करने से अधिक एक ऊंट का सुई के नाके से निकल जाना आसान है।" शिरडी बाबा
ने एक बार एक भक्त से कहा - "क्या तुम ब्रह्मज्ञान चाहते हो?" ठीक, तुम्हारे पास
जेब में 200/- रुपये हैं। पहले उसे त्याग दो, तब तुम्हें ब्रह्म ज्ञान मिल पायेगा।"
जब तक आप अपनी
सुविधायें, सम्पत्तियां और परिवार को ईश्वर से अधिक प्राथमिकता देते हुए जुड़े हैं,
हम नहीं कह सकते कि हम ईश्वर के साथ रह रहे हैं। ईश्वर के साथ रहना त्याग का मार्ग
है। ईश्वर पहले, दूसरा संसार और अन्त में आप। इस प्रकार ईश्वर के साथ रहना
अनासक्ति, तीव्र प्रेम, नियन्त्रण, अनुशासन, समर्पण और त्याग है। आपको हर आदेश का
पालन बिना शर्त करना है। भले ही आपको लाभ मिले या न मिले, भले ही आपको विजय मिले या
न मिले, आध्यात्मिक रूप से इसका अर्थ, उनके सन्देशों का अनुसरण ही, उनके पदचिन्हों
का अनुसरण तथा उनके आदेशों का अनुसरण है।
चार्ल्स पेन
जो कैलीफोर्निया में रहते हैं प्रात: 4 बजे सुप्रभातम् करते थे बाबा वहां प्रकट हुआ
करते थे। मेरा एक विद्यार्थी है, कनाडा में नन्द कुमार। वह वनस्पति शास्त्र में
शिक्षा लेना चाहता था, और इसलिए मैं उसे पढ़ाता था। ऐसा कुछ हुआ कि हम बाबा के साथ
उसके अनुभवों के सम्बन्ध में बातें कर रहे थे। उसने मुझे यह बताकर अचम्भित कर दिया
कि किस प्रकार भगवान उसके घर कनाडा में भी प्रकट हो जाते थे। इस प्रकार ईश्वर के
साथ कौन रह रहा है? वे अन्य देशों में या यहां व्हाइट फील्ड या प्रशान्ति निलयम
में? आध्यात्मिक सम्बन्ध, शारीरिक निकटता से कहीं अधिक चिरस्थायी है। आप सदा
शारीरिक रूप से निकट नहीं रह सकते।
"अन्तर
बहिश्च तत सर्वत्र सर्वम् व्याप्य नारायण स्थिता।" "वह अन्दर बाहर सर्वत्र हैं"
यह है ईश्वर के साथ रहना जिसका अर्थ है ईश्वर को सब समय, सर्वत्र महसूस करना और
प्रत्येक में ईश्वर को देखना। "सर्वत: पाणिपदम् तत, सर्वतोक्षी शिरोमुखम्"
"ईश्वर सर्वत्र है।" वह प्रत्येक में है।" यह ईश्वर के साथ रहना है। ईश्वर के
साथ रहना चैतन्यता, आध्यात्मिक सम्बन्ध तथा पवित्र दृष्टिकोण है।
अब मैं वार्ता
के दूसरे पक्ष पर आता हूं। ईश्वर के लिए रहना।" जब एक महिला का विवाह हो जाता है,
स्वाभाविक रूप से वह अपने पति के लिए काम करती है। जब मैं अपने कार्यालय में अपने
वरिष्ठों के साथ रहता हूं, मैं उनके लिए काम करता हूं। मैं, यहां रहूं और किसी अन्य
के लिए काम करूं, नहीं कर सकता। इसलिए भी ईश्वर के साथ रहना, उसकी सेवा करना है। इस
कथन से हम क्या समझते हैं कि हम ईश्वर के लिए रह रहे हैं। कुछ लोग डींग मारते हैं
कि वे अपना समय केवल बाबा के कार्यों में व्यतीत करते हैं। क्या बाबा के कोई कार्य
हैं? क्या उन्हें आपकी आवश्यकता है? यह सब अहंकार है। वे जो बाबा के साथ अपनी
निकटता का दावा करते हैं, सभी दया के पात्र हैं। यदि बाबा मात्र कुछ के निकट हैं और
कुछ अन्य के नहीं, तो वह ईश्वर नहीं हो सकते क्योंकि ईश्वर समान है अद्वैत है।
"द्वन्दातीतम त्रिगुणरहितम केवलम् ज्ञानमूर्तिम्।"
निकट या दूर
होना स्थान (देश) का विषय है किन्तु ईश्वर देश और काल के परे हैं। कुछ लोग शिकायत
करते हैं कि वे बाबा के निकट नहीं हैं क्योंकि वे बीसवीं लाइन में हैं और इसलिए
बाबा के पास नहीं पहुंच सकते। बन्धुवर, वे अज्ञानी हैं क्योंकि ईश्वर सर्वत्र है।
इसलिए जब आप एक बार जान जाते हैं कि ईश्वर सर्वत्र है और यह कि ईश्वर प्रत्येक में
है, आप जहां कहीं भी हैं आप महसूस करने लगते हैं कि आप ईश्वर के साथ हैं। आप हर एक
में ईश्वर को देखते हैं क्योंकि ईश्वर प्रत्येक में अन्तर्निहित है "एकोहम
बहुश्यामि" ठीक उसी प्रकार जैसे मैं तीन शीशों के सामने खड़ा होता हूं तो अपनी कुल
तीन प्रतिछायायें देख सकता हूं। इसी प्रकार ईश्वर को प्रत्येक में देखना और महसूस
करना, ईश्वर के साथ रहना है। जब आप दैविक चेतना की अनुभूति करने लगते हैं, आप ईश्वर
के साथ रहने लगते हैं। आप ईश्वर के लिए कैसे रहते हैं? जब पाण्डव निर्वासित थे, मां
कुन्ती प्रतिदिन अपने पुत्रों को भोजन परोसती थीं और यदि स्वयं उसके लिए भोजन नहीं
बचता था तो वह भूखी रहती थीं। इसलिए जहां कहीं प्रेम है, आप अपने प्रिय व्यक्ति के
लिए रहते हैं। गांधी जी देश के लिए रहे थे। जहां कहीं प्रेम है, आप उसके लिए रहते
हैं। यह देश भक्ति है। सैनिक भी देश के लिए अपना जीवन देते हैं। यहां तक कुछ
माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा के लिए प्रत्येक वस्तु बेच देते हैं अपने बच्चों
के प्रति घनिष्ठ प्रेम के कारण।
वैज्ञानिक
न्यूटन को लीजिए। उसकी शादी होनी थी। अपनी शादी के दिन, वह शादी में जाना भूल गया
क्योंकि वह अपनी प्रयोगशाला में अपने वैज्ञानिक प्रयोगों में लगा था। सभी मेहमान
प्रतीक्षा और प्रतीक्षा करते रहे अन्तत: दुल्हन स्वयं प्रयोगशाला से उन्हें लेने
गई। इसका एक ही अर्थ है कि वह अपने विज्ञान को इतना प्यार करता था कि वह उसके लिए
ही रहता था। इसलिए जहां कहीं प्रेम है, आप उसके लिए रहते हैं। जहां कहीं प्रेम है
आप सिर्फ देते हैं।
ईश्वर के लिए
रहने का अर्थ है, सब कुछ ईश्वर के लिए त्यागना। हम वास्तव में स्वार्थी हैं। हम
अपने पुत्र, अपनी पत्नी, अपने पति को प्रेम करते हैं केवल स्वयं अपने स्वार्थ के
कारण। यहां तक वे जो कहते हैं कि वे स्वामी के लिए काम कर रहे हैं, सही नहीं है
क्योंकि स्वामी का काम चलता रहेगा, भले आप करो या न करो। आप अपने स्वार्थ के कारण
कर रहे हैं न कि किसी त्याग के लिए। जब आप बाबा को फूल भेंट करते हैं, वे उसे वापस
कर देते हैं। इसका अर्थ है कि जो कुछ भी आप ईश्वर को भेंट करते हैं, आपको वापस मिल
जाता है। जब कभी आप उन्हें नारियल भेंट करते हैं, वह आपके पास वापस आ जाता है। (और
उस रात आप नारियल की चटनी पा सकते है।) लेकिन यदि ईश्वर सभी नारियल स्वीकार कर ले
तब कोई भी मंदिर न जायेगा। इस प्रकार ईश्वर, जो कुछ भी उनको भेंट किया जाता है, उसे
चक्रवृद्धि ब्याज सहित वापस करता है। हम बहुमूल्य वस्तुएं अपने लिए रखते हैं और
केवल सस्ती वस्तुयें भेंट करते हैं, जैसे तुलसी की पत्ती। लेकिन हम महंगी नेसकैफे
की कॉफी पियेंगे और ईश्वर को सामान्य नल का पानी भेंट करते हैं। हम ईश्वर को सस्ते
फूल भेंट करते हैं, जबकि हम अपने लिए और अपने मित्रों के लिए महंगे पुष्प गुच्छ और
हार खरीदते हैं। इस प्रकार ईश्वर के लिए रहने का अर्थ स्वयं अपने लिए रहना है।
कुछ लोग कहते
हैं हम "सेवा दल" हैं। वे दावा करते हैं कि उन्होंने दस शिविरों में भाग लिया है।
जब तक आप कहते हैं, आपने किया है, आपने कुछ नहीं किया। हमें कहना चाहिए कि भगवान ने
यह करने का हमें अवसर प्रदान किया। सेवा कार्यों के पीछे यही उद्देश्य है। ईश्वर
के लिए रहने का अर्थ है स्वयं अपने लिए रहना। स्वयं अपने लिए रहने का क्या अर्थ
होता है? इसका अर्थ होता है प्रसन्नता एवं सुख की भावना, सर्वोच्च आनन्द की स्थिति
में, पूर्ण सन्तुष्टि सहित रहना। हममें से कितने पूर्ण आनन्दित हैं? जब भगवान दर्शन
लाइन के बीच जाते हैं, वह अक्सर कहते हैं "ये शैक्सपियर चेहरों के समान
हैं।" वे कैस्टर आयल चेहरे के समान हैं।" क्योंकि हमारे चेहरे उस तरह के हैं। केवल
एक चेहरा है जो सदा प्रकाशित और सदा नवीन, खिलते गुलाब या कमल के फूल के समान रहता
है और वह है भगवान का चेहरा।
हमें किस
प्रकार के चेहरे से उनका सामना करना चाहिए? क्योंकि हमारे चेहरे इच्छाओं, समस्याओं
और शर्तों से आवृत्त हैं। हम सोचते हैं "क्या पाद नमस्कार हमें मिलेगा?" यही नहीं,
हम पाद नमस्कार चाहते हैं, ताकि हम दूसरों से कह सकें कि हमने पाया है। इस प्रकार
जब हम वास्तव में ईश्वर के लिए रहते हैं तब उसे हमें सन्तुष्टि और समान भावना से
पूर्ण कर देना चाहिए। लेकिन हमारे पास वह नहीं होता है। हम उनके पास बहुत सी शर्तों
के साथ जाते हैं। हम चाहते हैं "कब वे मेरी चौथी पुत्री की शादी करवायेंगे।" जैसे
कि मैंने उसके जन्म हेतु उनकी स्वीकृति ली थी। आप केवल कुछ विशिष्ट वस्तुओं के लिए
उनकी स्वीकृति चाहते हैं।
पाखण्ड नहीं
होना चाहिए। प्रत्येक अच्छा कार्य ईश्वर का कार्य है। प्रेम की प्रत्येक क्रिया
भक्ति है। इसलिए ईश्वर के लिए रहने का अर्थ है स्वयं अपने लिए रहना। यदि मैं
प्रसन्न हूं, यह मात्र स्वामी के सन्देशों के कारण, जिन्हें मैं प्रसारित करना
सर्वाधिक पसन्द करता हूं। मैं एक रविवार इस प्रकार वार्ता में व्यतीत करता हूं और
यह मुझे अगले छ: दिनों तक आनन्दित रखता है। हां, यह वास्तव में ईश्वर के साथ रहना
है। जब आप ईश्वर के साथ रहते हैं, आपको शायद मान्यता न मिले। हम में से अधिकतर लोग
वहां जाते हैं और दर्शन लाइन में बैठते हैं। वे हमारी ओर देखें या न देखें।
वे पूछ सकते हैं "क्या समाचार है?" यह एक प्रकार का दैविक रोमांस है जो कि
पिछले उनहत्तर वर्षों से चल रहा है। लेकिन जब आपके पास कोई काम नहीं है, वे पूछ
सकते हैं" "अब तुम क्या चाहते हो?" इस प्रकार ईश्वर के साथ रहने से आपको तुरन्त
मान्यता या अभिस्वीकृति कदाचित न मिले, लेकिन जब आप ईश्वर के लिए रहते हैं, आपको
मान्यता मिल सकती है। कैसे? जब आप एक रजिस्टर्ड चिट्ठी भेजते हैं, आपको अभिस्वीकृति
या पावती मिलेगी। उसी प्रकार ईश्वर भी अभिस्वीकृति देता है। वह कहेंगे - "आओ और पाद
नमस्कार करो।"
इसलिए यह कहना
काफी नहीं है कि "मैं बाबा का भक्त हूं" यह बाबा को कहना चाहिए। हममें से अधिकतर
शब्द के सच्चे अर्थों में भक्त नहीं हैं। हमें भगवद्गीता में दिये भक्ति योग से
भक्ति के सम्बन्ध में सीखने की आवश्यकता है। बाबा कहते हैं - "अधिकतर भक्त,
नौकरी या शादी आदि-आदि की इच्छा के भक्त हैं, लेकिन ईश्वर के भक्त नहीं हैं। वे
ईश्वर को छोड़ प्रत्येक वस्तु के प्रति समर्पित हैं।" जब आप ईश्वर के लिए रहते
हैं, केवल तब ही वह कहेंगे - "तुम मेरे भक्त हो"
एक बार अबू
बेन आदम, एक महान भक्त, वह अनेक लोगों की सेवा करता रहता था। उसने एक बार एक सुन्दर
सी परी को लोगों के नाम लिखते देखा। उसने पूछा "मां, आप क्या कर रही हैं?" उसने
उत्तर दिया - "मैं उन लोगों का नाम लिख रही हूं जो ईश्वर को प्यार करते हैं" उसने
पूछा - "क्या मेरा नाम उनमें हैं?" उसने पूरी सूची देखी और उत्तर दिया - "मुझे खेद
है, इसमें तुम्हारा नाम नहीं है।" वह अत्यन्त निराश हुआ क्योंकि वह अपना सारा समय
सेवा में व्यतीत करता था, फिर भी उसका नाम वहां नहीं था। दूसरे दिन उसने देखा एक
दूसरी परी नाम लिख रही है। उसने उससे पूछा - "आप क्या लिख रही हैं?" उसने उत्तर
दिया, "मैं उनके नामों को लिख रही हूं जिन्हें ईश्वर प्रेम करता है" उसने पूछा -
"क्या मेरा नाम सूची में है?" उसने उत्तर दिया "हे, बधाई हो। तुम्हारा तो सूची में
पहला नाम है।" इसलिए, ईश्वर कहे कि तुम मेरे भक्त हो, जो केवल तभी सम्भव है यदि हम
ईश्वर में रहें और अन्य प्रकार से नहीं। ईश्वर के साथ रहना केवल प्रेम के माध्यम से
सम्भव है। प्रेम पूरित हृदय ही ईश्वर का मंदिर है। आप में त्याग की भावना होनी
चाहिए। इस प्रकार ईश्वर के साथ रहना भक्ति योग है। एक बार आप भक्ति पा गये तो
आपको उनकी सेवा करनी चाहिए। मैं आप से प्रेम करता हूं, लेकिन मैं आपके लिए काम
नहीं करूंगा, कहने का कोई अर्थ नहीं। ईश्वर के लिए रहना कर्म योग है। कर्म योग हमें
वह अभिस्वीकृति प्राप्त करायेगा।
तीसरा है -
"ईश्वर में रहना"। इसका अर्थ है कि ईश्वर के अतिरिक्त कुछ नहीं है। जो कुछ भी आदमी
करता है, बातें करता या सोचता है, वह सब मात्र दैविक है। जब हम स्नान करते हैं, वह
अभिषेक है, जब हम बातें करते हैं, वह नाम स्मरण है। जो कुछ भी वह करता है
आध्यात्मिक है। इसे "ज्ञान योग" या ज्ञान का पथ कहते हैं। ज्ञान का पथ वह है जहां
आप, ईश्वर की ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ एकाकार हो जाते हैं। आप दैविक ब्रह्माण्डीय
चेतना को अपने माध्यम से गुजरने की सहमति देते हैं। चेतना की भावना ईश्वरीय चेतनता
है। कुछ लोग ईश्वर की उपस्थिति, अपने काम या भजन अथवा ध्यान में महसूस करते हैं। एक
बार एक मित्र ने मुझे बताया। "अनिल कुमार क्या आप चलती ट्रेन में ओंकार की ध्वनि
नहीं सुनते?" मैंने मात्र इतना कहा - "ओ: ! क्या वह ऐसा है?" उसने चौपहिये गाड़ी के
हार्न में ओंकार की ध्वनि सुनी। यह ईश्वरीय चेतनता है। यही ज्ञान है। इसका अर्थ है,
मैं ज्ञान स्वरूपा, दिव्यता की एक चिंगारी या दिव्य आत्मस्वरूपा - दिव्य स्वरूपा
हूं। बाबा हमें "दिव्यात्म स्वरूपा" कहकर सम्बोधित करते हैं। इसका अर्थ है ईश्वर
में रहना। जब आप ईश्वर में रहते हैं, आप ईश्वर के अंग हैं और ईश्वर के अतिरिक्त और
कुछ नहीं। सागर से एक बूंद लो। वह बूंद और कुछ नहीं सागर है। यदि तुम एक बूंद अलग
से लेते हो, तो वह केवल एक बूंद है। उसे वापस सागर में डाल दो, वह सागर है अब बूंद
नहीं। इसलिए जब आप अपने को नाम और रूप के अनुसार देखते हैं, आप सुब्बाराव, वेंकटराव
आदि हैं। जब नाम और रूप छोड़ दिया जाता है आप "वह" हो जाते हैं। आप अनन्त हो
जाते हैं।" यह केवल नाम और रूप है जो आपको अलग करता है। इसी प्रकार ईश्वर में रहने
का अर्थ है अपनी पहचान पाना और दिव्यता से एकाकार होना। इस एक चेतनता की भावना को
विभिन्न लोगों ने विभिन्न स्तर पर व्यक्त किया है। आंजनेय ने तीन व्यक्तव्य दिये।
रामचन्द्र यदि
आप राजा हैं। मैं आपका सेवक हूं। यह चेतनता का प्रथम स्तर है। "यदि मैं अपने को
मात्र एक व्यक्ति मानता हूं, मैं मात्र आपका एक अंग हूं। यदि मैं अपने को आत्मा
मानता हूं, तब मैं और आप एक हैं।" पहले वह सेवक है। सेवक चिकपेट में तथा स्वामी
यहां डोम्मुलूर में नहीं रह सकता। यदि मैं एक व्यक्ति हूं, मैं आपका अंग हूं,
अर्थात ईश्वर के लिए रहना। जब मैं आत्मा हूं, "अहम् ब्रह्मास्मि" मैं और आप एक हैं।
इसलिए शरीर के ये तीन स्तर हैं, जैसा कि आंजनेय द्वारा बताया गया, शरीर के स्तर पर,
व्यक्तिगत जीव के स्तर पर, और आत्मा के स्तर पर। स्वामी ने कहा "मैं रोशनी में
हूं, रोशनी मुझ में हैं, मैं रोशनी हूं।" इसका अर्थ है "मैं रोशनी में हूं",
अर्थात उसके साथ रहता हूं। रोशनी मुझमें है का अर्थ है उसके लिए रहता हूं। मैं
रोशनी हूं, का अर्थ ईश्वर में रहना है। यही बात ईसामसीह ने कही - "मैं ईश्वर का
दूत हूं", अर्थात् ईश्वर के साथ, "मैं ईश्वर का पुत्र हूं" अर्थात्
ईश्वर के लिए तब अन्त में "मैं और मेरे पिता एक हैं", अर्थात् ईश्वर में
रहना। जब मैं शरीर हूं यहां दो, द्वैत है। जब मैं मानता हूं कि मैं दिव्यता की एक
चिन्गारी हूं। यह विशिष्टाद्वैत है। जब मैं अपने को आत्मा मानता हूं, यह अद्वैत है।
इस प्रकार तीनों एक दूसरे के पूरक हैं। एक दूसरे की ओर अग्रसर करते है। जब आप ईश्वर
के साथ रहने लगते हैं, और ईश्वर के लिए काम भी करने लगते हैं। जब आप ईश्वर के लिए
काम करने लगते हैं आप ईश्वरमय हो जाते हैं। बस।
यह विषय
जानबूझ कर इसलिए लिया गया, क्योंकि यह प्रत्येक के लिए एक प्रकार का रहस्योद्
घाटन है, ताकि हम
में से प्रत्येक विषय वस्तु को गहनता से समझे। बाबा उन लोगों को देखते हैं जो उनकी
सेवा करते हैं (सेवादल) और जो पाद नमस्कार के लिए आते हैं और वे उनसे पूछते हैं
"तुम यहां अपनी मजदूरी के लिए आये हो? जब एक मां अपने बच्चे की सेवा करती है, वह
किसी वस्तु की आशा नहीं करती। हर कोई एक मजदूर को भुगतान करता है, लेकिन वह कभी
अपने बच्चे या पत्नी को भुगतान नहीं करता। अत: जब हम भगवान से मजदूरी की आशा करते
हैं, इसका अर्थ है हम उनके लिए नहीं रहते। जब हम उनके लिए रहते हैं, वह "निष्काम
कर्म" है। हम प्रारम्भ बदले में कुछ पाने की आशा के स्तर से करते हैं। जब हम
उनके लिए रहते हैं, वह नि:स्वार्थता है। जब मैं उनमें हूं तब वहां न तो
स्वयं का भाव है और न स्वार्थपरता का, वहां पूर्ण आनन्द की दशा होती है। ईश्वर
प्रेम है, प्रेम में रहो।"
- जय साई राम
अध्याय-13.
धर्म और आध्यात्मिकता
"कालातीत" के
सम्बन्ध में बोलना साधना है। वह जो व्यक्तता से परे है, उसे व्यक्तता द्वारा सीमित
करना भी साधना है। यह दोहरा दायित्व मुझे दिया गया है।
आध्यात्मिक
साधना शिविर, इस प्रात: का विषय है, जिसके लिए हम सब यहां एकत्र हुए हैं। श्री सत्य
साई सेवा संगठन धार्मिक संगठन नहीं है। इसका प्रथम और प्रमुख पक्ष है आध्यात्मिकता।
इसलिए प्रथम और प्रमुख आवश्यकता हमारा समझना है कि धार्मिक पक्ष क्या है तथा
आध्यात्मिक पक्ष क्या है।
दुर्भाग्यवश इस सम्बन्ध में हमारे अन्दर कुछ भ्रम की स्थिति है।
आध्यात्मिक पक्ष के अन्तर्गत हमारे पास कुछ दिये गये कार्यक्रम हैं। आइये, भजन को
लेते हैं, जो आध्यात्मिक पक्ष के अन्तर्गत पहला कार्यक्रम है। भजन, श्री सत्य साई
की दिव्यता के महल में प्रवेश द्वार हैं। भजनों के कारण सम्पूर्ण संसार खिंचा चला
आया है। सभी भजनों के प्रति आकर्षित हुए और उनका अनुसरण करना भी आसान है। रूसी तक
आज भजन गा रहे हैं। अनेकों विदेशियों द्वारा सम्पूर्ण संसार में भजन गाया जा रहा
है। हम क्या सुनते हैं या हम क्या गाते हैं, भजन में भावना है, राग नहीं। यदि हम
भजन के राग या ताल पर चले जाते हैं, तो वह धार्मिक है, आध्यात्मिक नहीं। यदि वह एक
आध्यात्मिक भजन है, हमें अतीन्द्रय आनन्द में मुग्ध हो जाना चाहिए जो आपको दूसरे
संसार में पहुंचा देता है। यदि वह मात्र राग और ताल है, वह पॉप संगीत के स्तर तक
नीचे गिर जाता है। इसलिए यह ताल या राग नहीं है जो महत्वपूर्ण है। इसी कारण
सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष है भाव। भगवान को उद्धृत करें, तो "भाव, राग-ताल" से स्वर
माधुर्य बनता है। भा-भाव है, र-राग, त-ताल, यही भारत है, हमारा देश। इस प्रकार भजन
आध्यात्मिक हो जाते हैं यदि उनके साथ भाव, राग और ताल हो, मात्र गति और धुन नहीं।
विदेशियों में अनेकों को मैंने देखा है जिन्होंने, हम में से अनेकों से कहीं अधिक
भाव की अनुभूति की है, जबकि हम राग और ताल में बह गये और अन्तत: रोग से ग्रस्त हो
गये। भजन जो घमण्ड और प्रतिद्वन्दिता को जन्म दे, आध्यात्मिक नहीं है। यह एक प्रकार
की प्रत्येक के लिए सेवा, एक
रहस्योद्
घाटन,
प्रत्येक हृदय को पुष्पित करना है, सम्पूर्ण विनय के साथ ईश्वर की प्रार्थना करने
का एक साधन है। इस प्रकार भजन आध्यात्मिक हो जाते हैं यदि वे विनयपूर्वक तथा भाव के
साथ गाये जाते हैं। दूसरी ओर वे धार्मिक होते हैं यदि हम रोमांस की ओर जाते हैं या
जब वे राग या ब्रेक नृत्य के समान होते हैं।
दूसरा
आध्यात्मिक कार्यक्रम है योग, जो जब शारीरिक व्यायाम के समान किया जाता है,
आध्यात्मिक नहीं है।
बहुत से लोग सीधे बैठते हैं और यौगिक व्यायाम करते हैं, प्रति सप्ताह 200 रुपये आदि
देकर योग केन्द्र जाते हैं। यह योग नहीं है। यदि आप इसे योग कहते हैं तब वह धार्मिक
है। यदि आप उसका आध्यात्मिकीकरण करना चाहते हैं, तब हम गहराई में जायें। एक बार कुछ
विद्वान भगवान के पास आये। स्वामी ने उनसे पूछा - "योग क्या है?" एक विद्वान ने कहा
"इन्द्रियों पर नियन्त्रण योग है।" उन्होंने दूसरे व्यक्ति से पूछा और उसने उत्तर
दिया "भगवन, हम आपकी निकटता का आनन्द पाने के लिए यह योग करते हैं। हम यह प्रसन्नता
का योग आपके निकट होने के लिए करते हैं।" योग शारीरिक अभ्यास नहीं है। वह इन्द्रिय
निग्रह भी नहीं है। योग ईश्वर के साथ मिलन है। यह आध्यात्मिक है।
अगला है
ध्यान, यदि ध्यान आध्यात्मिक है, तब उसके अर्थ बिल्कुल भिन्न हैं। हम कहते हैं कि
हम प्रात: चार से पांच के बीच ध्यान करते हैं या मैं अपने पूजा कक्ष में ध्यान करता
हूं। यह धार्मिक है। क्यों? क्योंकि धार्मिकतापूर्वक हम एक निश्चित समय के लिए
ध्यान में बैठते हैं। धार्मिकतापूर्वक आप ध्यान करते हैं, किन्तु वह आध्यात्मिक
नहीं है। क्यों? क्योंकि यदि वह वास्तविक ध्यान है, आप कैसे जान पाते हैं कि उस आसन
से उठने का समय हो गया है? असम्भव। यदि वह ध्यान है, तो आप कैसे कह सकते हो कि मैं
केवल अपने पूजा कक्ष में ध्यान करता हूं और किसी अन्य स्थान पर नहीं। ईश्वर तो
सर्वत्र है। मैं केवल अपने पूजा कक्ष में ध्यान करता हूं का अर्थ है कि मैंने ईश्वर
को अपने पूजा कक्ष में सीमित कर लिया है। यह आध्यात्मिकता नहीं है। यदि आप कहते हैं
कि मैं प्रात:काल पांच से छ: के बीच ध्यान करता हूं, यह धार्मिकता है, आध्यात्मिकता
नहीं, क्योंकि भगवान "कालातीत" हैं, वह समय से परे हैं। कैसे आप ईश्वर को समय की
सीमा में ध्यान के नाम पर बांध सकते हैं? भगवान कहते हैं कि आपका अध्ययन करना,
टहलना, बातें करना और सब कुछ जो आप करते हैं, ध्यान है। दिए हुए कार्य के साथ
आपका पूर्ण तारतम्य ध्यान है। ध्यान वह प्रक्रिया है, जहां वह, जो ध्यान करता है,
वह, जिस पर ध्यान किया जाता है और ध्यान की प्रक्रिया एक हो जाते हैं। जब आप ध्येय
से पृथक हो जाते हैं, जब प्रक्रिया समयबद्ध है, तब वह ध्यान नहीं है। ध्यान करते
समय एक मच्छर आपको काटता है और आप उसे पटाक से मार देते हैं, वह ध्यान न होकर मच्छर
ध्यान है। ध्यान में बैठे हुए, जब आप अपनी पत्नी से क्या पकाया आदि पूछते हैं, तब
वह रसोई ध्यान है।
हमें अब पूजा
के रूप पर विचार करना चाहिए। हम भगवान की मूर्ति और चित्र पर पुष्प तथा हार चढ़ाते
हैं, यह धार्मिकता है। आध्यात्मिक होने के लिए, हमें "अहिंसा" का अभ्यास करना
चाहिए। यही वह पुष्प है जो हमारे द्वारा ईश्वर को अर्पित किया जाना चाहिए। इसलिए
चमेली और गुलाब के फूलों का हार चढ़ाना धार्मिकता है, आध्यात्मिकता नहीं। आपको सत्य,
सहनशीलता, इन्द्रिय नियन्त्रण, करुणा, अहिंसा के पुष्प अर्पित करने चाहिए।
आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के बिना धार्मिक क्रिया-कलाप, कर्मकाण्ड हो जाते हैं। हमें
कर्मकाण्डों का अनुसरण करने वाला या कर्मकाण्डी नहीं बनना चाहिए। वे आपको धर्मान्ध,
पागल या हठधर्मी बना देंगे। समस्त हिंसा और मतान्धता कर्मकाण्डों और कर्मकाण्डी
प्रवृत्तियों के कारण है। लेकिन भगवान बाबा कर्मकाण्डों के पीछे छिपे आध्यात्मिक
महत्व के सम्बन्ध में कहते हैं। प्रशान्ति निलयम में हार और पुष्प हैं। किन्तु उनका
आध्यात्मिक महत्व है और यदि हम इस आध्यात्मिक महत्व को नहीं समझते, तब वह सब कुछ
नीचे उतर कर्मकाण्डी कर्म भर रह जाता है। इसीलिए सत्य साई संगठन एक आध्यात्मिक
संगठन है, जो हमें धार्मिक क्रिया-कलापों में अन्तर्निहित आध्यात्मिक महत्व को
जानने में सहायता करता है। अन्यथा वह मात्र यान्त्रिक है। उदाहरण के लिए जप,
नाम का बार-बार कहना, धार्मिक क्रिया है। यह मात्र होंठ की क्रिया है। हम उन्हें
देखते रहेंगे जो हमारी ओर देख रहे हैं। जब हम "ऊँ साई राम" कहते हैं, क्या हम भगवान
के रूप का चित्रण करते हैं? क्या हम अपने को, अपना परिवेश, अपना पद और अहं भूल गये
हैं, शरीर और मन से परे जा रहे हैं? यदि हम शरीर और मन से परे जाकर मन्त्र का जप
करते हैं, केवल तभी उसे आध्यात्मिक शब्द दिया जा सकता है। यदि हम केवल मन्त्र जप
करते हैं तब वह मात्र होठों का व्यायाम है, उस गायक के समान जो मंच पर होंठ हिलाता
है जबकि परदे के पीछे वहां एक पाश्र्व गायक है। इस प्रकार सत्य साईं आध्यात्मिकता
का अर्थ है, जानना, समस्त कर्मकाण्डों में अन्तर्निहित महत्व के प्रति जागरूक होना
है।
जन्म दिन
महोत्सव एक कर्मकाण्ड है। अन्तस में दिव्यता के जन्म की समुचित समझ आध्यात्मिकता
है। दशहरे के अवसर पर यज्ञ और यागा का आयोजन कर्मकाण्ड है। लेकिन यह समझना कि यज्ञ
वेदिका हमारा मन है और यज्ञ में आहुतियां देना व्यक्ति की अपनी कमजोरियों की आहुति
देना है, आध्यात्मिकता है। शिवरात्रि मनाना कर्मकाण्ड है, लेकिन यह समझना कि
लिंगम्, आत्मा अन्तस में है, आध्यात्मिकता है। पूरी रात्रि जागते रहना एक कर्मकाण्ड
है। जागरण का अर्थ आत्म चेतना है। निद्रा का अर्थ है आलस्य या भुलक्कड़पन। निद्रा
केवल इन्द्रियों के स्तर पर होती है। जागते रहकर मैं आत्म चैतन्य हूं। इसलिए
"जागो, उठो, रुको नहीं जब तक लक्ष्य न मिल जाये।" "उतिष्ठत जाग्रत प्राप्य
वरान्निबोधत"। उपवास करना कर्मकाण्ड है, उप का अर्थ है - निकट वास, रहना। ईश्वर
के निकट रहना, उसका चिन्तन करना उपवास है, भूखा रहना नहीं। इस प्रकार प्रत्येक
कर्मकाण्ड में अन्तर्निहित आध्यात्मिक महत्व है।
एक बार
कोड़ाईकनाल में एक वाद-विवाद प्रतियोगिता हुई। स्वामी को वाद-विवाद अत्यन्त प्रिय
है। विषय था - "क्या धर्म महान है या आध्यात्मिकता महान है?" एक ओर अनन्तपुर कॉलेज
की वारडेन जयम्मा, धर्म की विशेषज्ञ के रूप में थीं। मुझे आध्यात्मिकता के पक्ष में
बोलना था। मैं अपनी ब्रह्म समाजी पृष्ठभूमि के साथ था, जो कर्मकाण्डों और मूर्ति
पूजा में विश्वास नहीं करते थे, आध्यात्मिकता के पक्ष में मैंने अपने तर्क प्रस्तुत
किये। उधर जयम्मा जिन्होंने भगवान के चरण कमलों में पचास वर्ष व्यतीत किये थे, और
अंग्रेजी में उच्च अधिकार रखती थीं। मैंने अपनी विनयी पद्धति से कहा - "यह धर्म है
जो समाज को विभाजित करता है।" यह आध्यात्मिकता है जो समाज को जोड़ता है।" यह धर्म है
जो रक्तपात की ओर अग्रसर करता है। यह आध्यात्मिकता है जो आपको भाव की अनुभूति कराता
है और आपको आत्मा से पहचान कराता है।
"आध्यात्मिकता में एकता
है। जबकि धर्म सदा से बंटा हुआ है।" यह मेरा प्रस्तुतिकरण था। लेकिन
न्यायाधीशों के
न्यायाधीश भगवान बाबा का कथन क्या था? बाबा ने कहा "जो अनिल कुमार ने कहा वह गलत
है। उसे ठीक कहा जाना आसान नहीं है, लेकिन फिर भी मैंने उनके निर्देशों के अनुसार
अनुवाद किया है। बाबा ने कहा - "यह धर्म है जो प्रत्येक गांव में व्यवहार किया जाता
है। यह धर्म है जो प्रत्येक भोले-भाले निरक्षर किसान द्वारा स्वीकार किया गया है।
यह धर्म है जिसका पालन तथा अनुसरण किया गया है, जो हमें शान्ति, बहुलता और
सम्पन्नता की अनुभूति कराता है।"
तदुपरान्त
उन्होंने मेरी ओर देखा और कहा - "धर्म में आध्यात्मिक पृष्ठभूमि है।" इसलिए यदि आप
आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से परिचित नहीं हैं तो वह सतही धर्म है या मात्र कर्मकाण्ड
है। बस और कुछ नहीं। इसलिए धर्म का आधार आध्यात्मिकता होना आवश्यक है।
भक्ति और
समर्पण का रूप लें। भक्ति में दो हैं : भक्त और भगवान। भक्त ईश्वर के प्रति समर्पित
है। भक्त भक्ति मार्ग की प्रक्रिया के माध्यम से ईश्वर के निकट रहना चाहता है
जिसमें भक्त और भगवान हैं। यहां दो हैं। लेकिन समर्पण में, एक बार जब आप ईश्वर के
प्रति अपने को अर्पित कर देते हो, भक्त का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। एक चम्मच
शकर एक गिलास पानी में मिलाई गई, परिणामस्वरूप शर्बत मिला। उसे अब पानी या शकर नहीं
कहा जा सकता बल्कि दोनों का मिश्रण, शर्बत कहते हैं। इसी प्रकार समर्पण में दो नहीं
केवल एक है और यह आध्यात्मिकता है। जहां भक्ति है, वहां दो हैं, भक्त और भगवान और
यह धर्म है। स्वामी के अनुसार भक्ति की परिभाषा क्या है?
स्वामी के
अनुसार भक्ति, धैर्य, सन्तुलन, शान्ति और अनन्यता की भावना है। यदि हम सुख
और दु:ख समान रूप से लेते हैं तब हमें पुट्टपर्ती की भावना में अधिक स्थान प्राप्त
होगा। हम में से अधिकतर यहां केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु और स्वामी से
साक्षात्कार प्राप्त करने आते हैं। यह आध्यात्मिक नहीं हो सकता। यह धार्मिक है।
आध्यात्मिक का अर्थ है इच्छारहित होना। यदि इच्छायें आपको स्वामी के पास आने के लिए
विवश करती हैं, तब आप धार्मिक हैं, आध्यात्मिक नहीं।
दूसरी ओर,
आध्यात्मिकता आपको जानने के लिए विवश करेगी कि आत्मा है और सदा सन्तुष्ट है। वह सदा
सर्वोच्च सन्तुष्टि की दशा में रहती है। लेकिन जब स्वामी मेरी ओर नहीं देखते या
मेरा पत्र नहीं लेते, मैं सन्तुष्ट नहीं होता हूं। यह आध्यात्मिकता नहीं हो सकती,
क्योंकि एक तरफ सुख है और दूसरी ओर दुख। यहां तक यदि वह मुझसे बात करते हैं, मैं
गर्व महसूस करता हूं, क्योंकि मैंने विशेष रूप से उनका ध्यान प्राप्त किया है।
भगवान हमें अति विनम्र बनाना चाहते हैं। इसलिए यह प्रथम दृष्टि से धार्मिक है।
दूसरी और यदि मैं कहता हूं कि मुझे स्वामी से बात करने का कोई अवसर नहीं है, मैं
इसे शारीरिक निकटता कहता हूं तब वह आध्यात्मिक नहीं है क्योंकि "ईश्वर:
सर्वभूतानाम" ईश्वर सभी जीवों में विद्यमान है। यदि मैं कहता हूं "मैं ईश्वर के
निकट नहीं आया और साई जो मेरे अन्तस में है, को मैं स्वीकार करने से दूर हूं।" यह
आध्यात्मिकता है। लेकिन जब आप कहते हैं कि वह मुझसे बोले तक नहीं, तब वह धार्मिक
है। इसलिए आध्यात्मिकता में हमें पूजा, ध्यान, भजन और साधना का समुचित भाव तथा अर्थ
समझने की आवश्यकता है। साधना क्या है? साधना और कुछ नहीं बोध होना है। यह बोध,
शरीर, मन और बुद्धि के परे है। आप, न मन हैं और न बुद्धि, बल्कि आत्मा हैं। यह बोध
है और जब एक बार आप उसे अनुभव कर लेते हैं, तब साधना की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती।
उदाहरण के लिए एक बार मैं जब ककहरा सीख जाता हूं मैं उसका अभ्यास प्रतिदिन नहीं
करता। नहीं? इसलिए बोध, एक प्रकार की जाग्रति, एक प्रकार से चेतना को उच्च अवस्था
में ले जाना है। जब एक बार वह जाग्रत या बोध हो गया। वह अन्तिम है। बाबा ने कहा -
"यह सम्भव है जब आप "मैं" को जान लें।" आपको बोध के बिन्दु से संसार में आना है।
दुर्भाग्यवश हम संसार से आत्मा में जाते हैं, लेकिन हमें उल्टा परिवर्तन करना
चाहिए। प्रपंच, संसार से हम परमेश्वर, ईश्वर की ओर जाना चाहते हैं। यह निश्चित रूप
से गलत है।
यही कारण है
कि इस संगठन में, हम अत्यधिक संकुचित दृष्टिकोण, अहं तथा घमण्ड रखते हैं। जब हम
आत्मा से संसार की ओर यात्रा करें, केवल तभी हम संसार का आध्यात्मिकीकरण कर सकते
हैं। आप संसार को दैविकता प्रदान कर सकते हैं। संसार को आध्यात्मिक होने की
आवश्यकता है। इसलिए एक बार जब आप जान जाते हैं कि आप आत्मा, परमेश्वर के रूप हैं,
संसार या प्रपंच की ओर यात्रा करें, ताकि आप समझ पायें कि संसार आपसे भिन्न नहीं
है। मान लीजिए मैं कहता हूं कि वहां अब दो हैं। बाहर संगीत है, अन्दर प्रवचन चल रहा
है। लेकिन जब आप आत्मा के दृष्टिकोण से आगे बढ़ते हैं, वहां केवल एक है, वह है
अद्वैत। यदि आप कहते हैं कि बाहर अशान्ति है, तब उसका अर्थ है कि वहां मेरे अन्दर
ही एक बाह्य रूप है तथा एक अन्तस है। कुछ भी बाह्य और अन्तस नहीं हो सकता।
"अन्तर बहिष्क तत सर्वम् व्याप्य नारायण: स्थित:" ईश्वर ही अन्तर में है और
ईश्वर ही बहिष्क, बाह्य में है।" इस प्रकार जब आप दिव्यता के दृष्टिकोण से देखते
हैं, कुछ भी बाह्य संसार या अन्तर संसार के समान नहीं है। कोई भी बाहरी अथवा अन्दर
का अतिविशिष्ट व्यक्ति नहीं है .... नहीं। आत्मपरमेश्वर के दृष्टिकोण से सब कुछ
समान है।
यह ज्ञान है।
ज्ञान आध्यात्मिक है। विद्या सांसारिक है, आप डिग्रियां या डॉक्ट्रेट पा सकते हैं,
वह सांसारिक है, आध्यात्मिक नहीं। वास्तविक शिक्षा ज्ञान है। वह आध्यात्मिक है
क्योंकि ज्ञान सदा एकता की भावना की अनुभूति देता है। "ज्ञानम् समत्वम उच्यते
अद्वैत दर्शनम्" ज्ञान अद्वैत का दर्शन है।" अद्वैत की भावना ज्ञान है। दूसरी
ओर यदि मैं आपसे अधिक महत्वपूर्ण महसूस करता हूं यह महा अज्ञान है। इसलिए ज्ञान
आध्यात्मिक है और उसमें एकत्व की भावना है। आदि शंकर को, स्वयं भगवान शिव द्वारा,
एक अछूत, एक कुत्ता तथा एक विद्वान से समान रूप से व्यवहार करने हेतु निर्देशित
किया गया था। समस्त डिग्रियां, आपकी मृत्यु के समय रक्षा करने नहीं आयेंगी। वह
एकत्व की भावना है जो आप भगवान में पाते हैं। आप देख सकते हैं कि भगवान एक ग्रामीण
से उसी प्रकार बात करते हैं जैसे वह भारत के राष्ट्रपति से करते हैं। इसलिए साधना
और कुछ नहीं बल्कि आत्मबोध है। बाबा कहते हैं "आध्यात्मिकता और कुछ नहीं बल्कि
मैं के स्थान से "हम" के स्थान की यात्रा है।" जब "हम" का भाव आ जाता है तब
उच्चता और हीनता के समान कुछ नहीं रह जाता है।
"समा" का अर्थ
है "समानता" और "धी" बुद्धि है। इसलिए समाधि मात्र कड़ा हो जाना नहीं है क्योंकि शव
सदा कड़े होते हैं। इसलिए समान भावना एवं एकत्व की भावना समाधि है। समाज और कुछ नहीं
बल्कि समानता है, व्यक्ति एक अकेला व्यक्तित्व है। वह क्या है जो वह व्यक्त करता
है? यह नहीं कि वह एक एम0एस0सी0 या एक प्रिंसिपल है, नहीं। मैं आत्मा हूं। आप
अमृत्व के पुत्र हैं। क्या यह आपके प्रिंसिपल के पद से बेहतर नहीं है, क्योंकि एक
दिन आपको सेवानिवृत्त होना है। श्री सत्य साई संगठन द्वारा किये जाने वाले
कर्मकाण्ड की पृष्ठभूमि में आध्यात्मिक महत्व तथा बोध है। वह आध्यात्मिक है।
सत्य साई
संगठन में तीन अंग आध्यात्मिक अंग, सेवा अंग और शैक्षिक अंग हैं। पहला और प्रमुख
अंग आध्यात्मिक अंग है। स्वामी, सेवा अथवा शैक्षिक अंग को प्रथम स्थान दे सकते थे।
लेकिन उन्होंने उसके स्थान पर आध्यात्मिक अंग को प्रथम स्थान दिया। यह आधार है।
अन्य कार्यक्रमों में निश्चय ही आध्यात्मिक पृष्ठभूमि, आध्यात्मिक बोध, सहयोग एवं
आनन्द होता है। प्रत्येक संगठन सेवा कार्य करता है, लेकिन सत्य साई सेवा संगठन में
यह भिन्न है। अन्य संगठनों में एक व्यक्ति है जो सेवा देता है और एक अन्य है जो
आपकी सेवा लेता है। यह समाज सेवा है। यह प्रदर्शित सेवा या कमतर सेवा नहीं है।
सत्य साई संगठन में यह सेवा आध्यात्मिक है अर्थात जो सेवा करता है, वह उसे एक
साधना, ईश्वर के प्रसाद के रूप में प्राप्त करने का सुअवसर मानता है। वह इसे प्रचार
के उद्देश्य से नहीं करता। इसका अर्थ है कि आपने अपनी सेवा का अवसर देकर मुझे
कृतार्थ किया है। मैं आपको धन्यवाद देता हूं। यहां देने वाला, पाने वाले से नीचे है
और देने वाला, बाबा के सिद्धान्तों से आत्मबद्ध, देने वाले और पाने वाले के बीच
एकता का भाव पाता है। आप में एक ईश्वर देता है और उसमें एक ईश्वर लेता है। जो दिया
गया वह और कुछ नहीं बल्कि ईश्वर, अन्नम् ब्रह्म। यदि आप मात्र गरीबों को भोजन देते
हैं तब वह मात्र गरीबों को भोजन दान, एक सामाजिक सेवा होती है। लेकिन सत्य साई
संगठन में नारायण सेवा, आध्यात्मिक सेवा है। इसलिए समस्त प्रकार की सेवा की
पृष्ठभूमि आध्यात्मिक होनी चाहिए अन्यथा वह कारपोरेशन की नौकरी हो जाती है।
अगला है
शैक्षणिक अंग। आध्यापक को उसे साधना के रूप में, एक पूजा की क्रिया के रूप में लेना
है और तब वह आध्यात्मिक शिक्षा हो जाती है अन्यथा वह मात्र एक औपचारिक शिक्षा है।
बाबा आप सबको आशीर्वाद
दें।
अध्याय
- 14
सनातन धर्म
जैसे ही कोई
गीता या भगवान के प्रवचनों को पढ़ता है वह सनातन धर्म क्या है समझने का प्रयास करता
है, वह कुछ प्रश्नों से उलझन में पड़ जाता है। हम कुछ सन्देहों, भ्रमों तथा
विरोधाभासों का अनुभव करते हैं। इस सुबह मैं कुछ एक इन विरोधाभासों की ओर आपका
ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा। लेकिन इन विरोधाभासों को बताने के पहले मैं सर्वप्रथम
सनातन धर्म के मौलिक पक्षों को बताना चाहूंगा जो अद्वितीय हैं तथा दुनिया के किसी
भी धर्म में नहीं पाये जाते।
पहला बिन्दु
जो बिल्कुल अद्वितीय है वह है अवतार या पृथ्वी पर ईश्वर के अवतरण की अवधारणा। सनातन
धर्म में अवतार की यह अवधारणा अपने में अकेली है और जो अन्य विश्वासों द्वारा
स्वीकार नहीं की जाती है, और न अनुसरण की जाती है। दूसरा बिन्दु जो सनातन धर्म को
अद्वितीय बनाता है, पुनर्जन्म का सिद्धान्त है। यह अत्यन्त अद्वितीय और विशिष्ट है।
तीसरा बिन्दु है, भाग्य का सिद्धान्त - भाग्य का सिद्धान्त या प्रारब्ध का
सिद्धान्त, जो अन्य मतों के दर्शन में नहीं है। चौथा बिन्दु है दिव्यता, सर्वत्र
सभी वस्तुओं में हर समय देखा और अनुभव किया जाता है। सनातन धर्म का अगला बिन्दु
जिसने सामाजिक कुरूपतायें और राजनैतिक उथल-पुथल उत्पन्न कर दी है, जाति प्रथा है।
जाति प्रथा की आज त्रुटिपूर्ण व्याख्या की जाती है तथा उसे गलत प्रकार से समझा गया
है। वास्तव में कहा गया है कि समाज में जातियां, सामाजिक आवश्यकताओं से कार्य
विभाजन के आधार पर उत्पन्न हुई हैं, जिनका उद्देश्य सामाजिक दायित्वों को निभाना
है। उसके पीछे यह एक निश्चित उद्देश्य है।
आपको गीता में
मिलता है "चतुरवर्णनम् मया सृष्ट्म गुण् कर्म विभागस:" एक जाति प्रथा है
जिसकी रचना मैंने की है। लेकिन लोगों ने श्लोक के प्रथम भाग को स्वीकार कर लिया तथा
सहज रूप से दूसरा भुला दिया। वक्तव्य का दूसरा भाग गुणों, दायित्वों, प्रवृत्ति,
पेशा और कार्य का प्रकार जिसे कोई समाज में, सामाजिक न्याय तथा समानता सुनिश्चित
करने के लिए करता है, पर आधारित है। दुर्भाग्यवश यह एक सामाजिक बुराई या समस्त
प्रकार की कुटिलताओं के लिए निन्दित शब्द बन गया है। किसी को अपनी स्वार्थपूर्ति
हेतु शासन सत्ता पाने की कोशिश के सिवाय किसी अन्य वस्तु में रुचि नहीं है।
इसलिए मेरे
मित्रों, मैं आपको समझाने का प्रयास करता हूं कि जाति प्रथा जैसा कि गीता में
उल्लिखित है, कार्य पर आधारित है जो कोई सामाजिक न्याय तथा समानता को सुनिश्चित
करते हुए करता है। सोसायटी के लिए संस्कृत में शब्द समाज है। इसका अर्थ है समा-
समानता, ज - उससे उत्पन्न हुआ। इस प्रकार समाज की जड़ें समानता में हैं। समाज की
जड़ें न्याय में हैं! जहां असमानता और अन्याय है आप उसे समाज नहीं कह सकते। इस
प्रकार संस्कृत
शब्द, हमें बताता है कि वहां समानता है। प्रत्येक आदमी यहां संस्कृत में व्यक्ति
कहलाता है।
व्यक्ति कौन
है? व्यक्ति वह है जो व्यक्त करता है। क्या व्यक्त होना चाहिए? दंभ या दान नहीं
बल्कि दिव्यता। इस प्रकार संस्कृत अर्थ के अनुसार व्यक्ति वह एक इकाई है जो अपने
अन्तस में गुप्त दिव्यता को व्यक्त करता है। वह एक मनुष्य है जो अपने अन्तस में
छिपी दिव्यता को व्यक्त करता है। इस ब्रह्माण्डीय शरीर का प्रत्येक अंग एक समुदाय
का प्रतिनिधित्व करता है। सिर (ब्राह्मण) बुद्धि के लिए, कंधे साहस और वीरता के
लिए, (क्षत्रिय) पेट, भण्डार के लिए (वैश्य), पैर कठिन व कठोर कार्यों के लिए
(शूद्र), इस प्रकार एक बुद्धिवादी है, एक रक्षक है, एक कठिन कार्य करने वाला है और
एक पोषण के लिए है। ये विभिन्न समुदाय हैं। यह उद्देश्य है जिसके लिए इस देश में
जाति प्रथा रही, लेकिन दुर्भाग्यवश अब उसे गलत प्रकार से समझा जाता है।
अब मैं भाग्य
या प्रारब्ध के सिद्धान्त पर आता हूं। यदि मैं कुछ अच्छा करता हूं, क्या मैं स्वर्ग
पहुंचूंगा? यदि मैं कुछ गलत करता हूं, क्या मुझे सदा के लिए नर्क में डाल दिया
जायेगा? सदा के लिए दोषी मान लेना क्या दयाभाव का अभाव होना नहीं लगता? हम मानव हैं
और आसानी से त्रुटि कर जाते हैं। हम कमजोर हैं। पूर्णता की सड़क बहुत लम्बी है। हम
किए हुए अपराधों के लिए सनातन नर्क यातना से पीड़ित नहीं रहेंगे। परीक्षा में असफल
रहने वाले विद्यार्थी को उन्नति करने हेतु अवसर दिया जाना चाहिए। भाग्य का
सिद्धान्त न्याय संगत रूप में स्पष्टत: व्याख्या करता है कि जैसा तुम करते हो,
तुम्हें उसका सामना करना है। हम सदा कल्पना करते हैं कि ईश्वर हमें सुख या कष्ट दे
रहा है। जब कुछ भी अच्छा घटित हो जाता है उसका श्रेय हम लेते हैं और जब कुछ भी बुरा
हम पर होता है तो ईश्वर को आरोपित कर देते हैं।
इस विषय में
भगवान का क्या दृष्टिकोण है? ईश्वर ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, वनस्पति जगत, पशु जगत,
धातु संसार, पांच तत्वों सहित उत्पन्न किया। उन्होंने आदमी को बुलाया और कहा
"देखो, मेरे बच्चे, यह सृष्टि तुम्हारे लिए है, मेरे लिए नहीं। सम्पूर्ण सृष्टि
तुम्हारे सुख और आनन्द के लिए है, इसका उपभोग करो, किन्तु एक शर्त पर। तुम्हें अपने
क्रिया-कलापों के परिणामों को भोगने के लिए तैयार रहना है। यदि तुम अच्छा करते हो,
तुमको अच्छे परिणाम मिलेंगे और यदि तुम बुरा करते हो, तुम बुरे प्रभावों से बच नहीं
सकते।" "जैसी क्रिया होगी, वैसी ही प्रतिक्रिया" जैसे बादल हैं वैसी ही वर्षा।
इस प्रकार अच्छे या बुरे परिणाम ईश्वर द्वारा प्रदत्त नहीं हैं।
एक अन्य
उदाहरण, जब एक पोस्टमैन आता है, मैं उससे शादी का आमन्त्रण मुझे देने के लिए विवश
नहीं करता जिसे वह मात्र पहुंचता है। तीन दिन बाद जब मैं धमकी भरा पत्र पाता हूं,
मैं पोस्टमैन की हत्या नहीं करता, पोस्टमैन केवल सन्देशों को हम तक पहुंचाता है।
ईश्वर डाकिया की तरह है, जो परिणामों को देता है, जो हमारे अपने कार्यों पर आधारित
होते हैं। "उपदृष्टा अनुमन्त: च भारता भोक्ता।" ईश्वर एक सनातन साक्षी है।
अब अगला है
अवतरण या पुनर्जन्म। पुनर्जन्म का सिद्धान्त भी विकास के सिद्धान्त के पक्ष में
बोलता है। जैव विज्ञान स्पष्टत: व्याख्या करता है कि धातु पदार्थ से जैव पदार्थ
विकसित हुआ है। जड़ पदार्थ से जैव पदार्थ विकसित हुआ है।
जैव पदार्थों
में वनस्पति जगत आता है तदुपरान्त आता है पशु जगत और अन्त में मनुष्य। यह विकास का
सिद्धान्त है। पशुओं में सर्वप्रथम जलचर थे। अगले थे जलस्थलचर। (वे जो जल और थल में
रह सकते थे) अन्त में वे आये जो भूमि पर रहे। इस प्रकार जीवन पानी से प्रारम्भ हुआ।
ईश्वर "मत्स्य अवतार" के रूप में अवतरित हुआ। "मच्छ अवतार", जल स्थल
चर जीवन के विकास के कारण हम भूमि और पानी में जीवन पाते हैं। वह कूर्म अवतार है,
कछुआ, जो जल और थल दोनों में रहता है। इसके बाद जो पशु विकसित हुआ वह केवल भूमि पर
रहता है - "वाराह अवतार"। तदुपरान्त अधिक विकसित पशु मानवीय गुणों से युक्त
आया। यहां से प्रारम्भ करते हैं, क्योंकि हम पशुओं से आये हैं। एक अन्य विकसित रूप
है जहां पशु और मानव साथ-साथ हैं - नरसिंह अवतार। अन्त में आया मानव, मानव
का अवतार। सनातन धर्म में विकास के इस सिद्धान्त का भलीभान्ति पोषण हुआ है।
मानव का जन्म
या पुनर्जन्म उसके अपने पूर्व कर्मों पर आधारित है। यह प्रारब्ध है। भाग्य का
सिद्धान्त और कुछ नहीं बल्कि क्रिया और प्रतिक्रिया है। न्यूटन का आकर्षण शक्ति का
नियम। प्रत्येक क्रिया की, उसके बराबर तथा विरोधी प्रतिक्रिया होती है। यदि मैं
आध्यात्मिकता और विज्ञान को मिला दूं, तो वह हो जाता है आध्यात्मिकता का विज्ञान।
हमें विज्ञान की भावना रखनी चाहिए, लेकिन साथ ही साथ हमें आत्मा के विज्ञान को भी
जानना चाहिए। आत्मा का विज्ञान निश्चित रूप से स्पष्ट कर देगा कि जन्म और पुनर्जन्म
व्यक्ति के अपने कर्मों पर आधारित हैं। बेहतर जीवन के लिए, अब हम अच्छे हो जायें और
हमने जो कुछ भी पूर्व में अज्ञानवश किया है उस सबमें अब हम सुधार कर लें। यह सनातन
धर्म के अनुसार पुनर्जन्म की अवधारणा है। ये बिन्दु हैं जो उसे दूसरे सम्प्रदायों
के दर्शन से अद्वितीय बनाते हैं।
आइये देखें,
किस प्रकार से भगवान, सम्प्रेषित करते हैं, उत्तर देते हैं और हमें जाग्रत करते हैं
तथा विरोधाभासों के स्थान पर संश्लेषित करते हैं। एक बार मैंने भगवान से पूछा क्या
वह जो चर्च नहीं जाता, क्रिश्चियन हो सकता है? व्यक्ति जो मंदिर जाता है या नहीं,
हिन्दू ही रहता है। क्यों? वह भले ही मंदिर न जाये फिर भी हम उसे हिन्दू कहते हैं।
यह न्यायसंगत नहीं। भगवान ने उत्तर दिया - एक हिन्दू से उसके घर में मौन साधना और
आत्म निरीक्षण, आत्म विलोपन तथा आत्म साक्षात्कार हेतु एक पूजा का कमरा, एक पवित्र
मंदिर की आशा की जाती है। इस प्रकार प्रत्येक घर में प्रार्थना हेतु एक कमरा होगा,
वह चाहे मंदिर जाता है या नहीं। हां! यह उत्तर अनूठा है। कोडाई कनाल में एक दिन, हम
लोग भगवान के साथ बस में विद्यार्थियों तथा अध्यापकों के साथ यात्रा कर रहे थे। बस
के आगे उनकी कार में मात्र उनका ड्राइवर था। कार देख कर लोग जान गये
थे कि स्वामी उसमें हैं, अत: इस कारण रास्ते में भीड़ एकत्र हो गई थी। सभी लोगों ने
उनकी कार को नमस्कार किया। भगवान ने कहा - "यह संग रहने का परिणाम है - जैसे कि
मैं कार में हूं, वह भी प्रत्येक द्वारा नमस्कार पा रही है। मेरे संग रहने के कारण,
वह भी पूजी जा रही है। जबकि अब, चूंकि मैं तुम्हारे साथ हूं, मैं अपना नमस्कार खो
रहा हूं। बुरी संगत है तुम्हारी।"
जैसे ही बस
आगे बढ़ी, वह खिड़की से बाहर देख रहे थे। उन्होंने कहा - "लगता है ईश्वर के पास
बुद्धि नहीं है। तुम देखते हो, वहां धान के खेत हैं, कितने कोमल तथा छोटे-छोटे।
तुम्हें यूकेलिप्टस के लम्बे पेड़ भी दिखते हैं। उन लम्बे यूकेलिप्टस के पेड़ों में
एक दिन तक का पानी नहीं है, जबकि धान में बहुत अधिक पानी है, यद्यपि वे बहुत छोटे
हैं। ईश्वर के पास बुद्धि नहीं है। बड़े पेड़ों को ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है।
एक बच्चा अधिक नहीं खाता। चालीस साल के आदमी को अधिक भोजन की आवश्यकता होती है।"
हम मात्र सुन
रहे थे, इसलिए भगवान ने स्वयं उत्तर दिया। उन्होंने कहा - धान को प्रतिदिन पानी की
आवश्यकता होती है, क्योंकि उसकी जड़ें उथली होती हैं। यदि पानी न दिया जाये तो पौधा
सूख जाता है और धान नहीं होगा, जबकि यूकेलिप्टस पेड़ों की जड़ें बहुत गहरी होती हैं।
वे पानी स्वयं खींच सकती हैं। इसी प्रकार वे जिज्ञासु जिनका विश्वास दृढ़ है,
कभी-कभी साधना कर सकते हैं क्योंकि उनका विश्वास अटल है क्योंकि उनकी जड़ें बहुत
गहरी चली गईं हैं। उन्होंने फिर कहा "तुम सब धान हो, तुमको प्रतिदिन साधना करनी
चाहिए।"
अब मेरी
वार्ता का दूसरा भाग, दिखने वाले विरोधाभासों का है। एक दिन, जब मैं अकेला भगवान के
साथ उनकी लाल जगुआर में यात्रा कर रहा था, उन्होंने कहा "कोई प्रश्न पूछो?" मैंने
कहा "स्वामी गीता में विरोधाभास हैं। एक समय गीता कहती है कि ईश्वर साकार है। अन्य
समय उसका कथन है ईश्वर का कोई आकार नहीं, निराकार है। वह साकार है या
निराकार? क्या ये दोनों विरोधी वक्तव्य नहीं हैं? ईश्वर साकार है और बाद के
अध्यायों में वह कहती हैं ईश्वर निराकार है। इसलिए जब हम विषय में गहरे उतरते हैं
तो भ्रमित हो जाते हैं। एक और विरोधाभास है। ईश्वर में सहज गुण हैं जैसे करुणा,
प्रेम और त्याग। बाद में गीता कहती है ईश्वर में कोई गुण नहीं है। एक तीसरा
विरोधाभास, "एकम् इवा अद्वितीयम् ब्रह्म।" "केवल एक अस्तित्व में है" एक
दिव्यता अनेक रूपों में प्रकट होती है। इसके विरोध में कहा गया है कि ईश्वर मात्र
सत्य है और यह संसार भ्रम, माया है। मुझे विश्वास है कि प्रत्येक व्यक्ति में ये
शंकायें होंगी।
पहले
विरोधाभास, साकार और निराकार के सम्बन्ध में बाबा ने कहा "दोनों विरोधी नहीं
हैं, वे एक हैं तथा वही हैं। दोनों में विरोधाभास नहीं हैं, वे एक दूसरे के पूरक
हैं। एक दूसरे की ओर ले जाता है। वे एक ही दिव्यता के चित और पट हैं।" यह मेरे
सन्देह को दूर करने के लिए काफी नहीं था, इसलिए मैंने दबाव बनाया। बाबा ने यह कहते
हुए और विस्तार दिया - "तुम्हारा आकार है इसलिए तुम आकार सहित ईश्वर का चिन्तन
कर सकते हो।" जब तक तुम्हारे अन्दर शारीरिक चेतना है और यह भावना कि तुम शरीर
हो, किस प्रकार से आप शरीर रहित ईश्वर की सोच सकते हैं? साकार ईश्वर, शरीर सहित
ईश्वर की आवश्यकता तभी तक रहेगी जब तक हम में शरीर की चेतना है। यदि भैंस ईश्वर के
सम्बन्ध में सोचेगी, तो वह ईश्वर को भैंस के रूप में ही कल्पना करेगी। यदि मछली
ईश्वर के सम्बन्ध में सोचती है तो वह भी ईश्वर को एक बड़ी मछली के रूप में कल्पना
करेगी। इसी प्रकार मनुष्य जब ईश्वर का चिन्तन करता है, वह ईश्वर को अति मानव के रूप
में कल्पना करेगा। इसलिए यह साकार पक्ष उस समय तक रहेगा जब तक हमारा आकार है। बाबा
ने एक और उदाहरण दिया, मान लीजिए आप एक कप दूध पीना चाहते हैं। आप उसे केवल एक कप
में पी सकते हैं। इस प्रकार दूध दिव्यता है और कप उसका आकार है। इसलिए एक कप में
दूध ईश्वर के समान एक रूप में है। ईश्वर वैसा ही हमारे सम्मुख प्रकट होता है जैसा
कि हम उसकी संकल्पना करते हैं। "यद भावम् तद् भवति" जैसी भावना है, वैसी ही
अनूभूति। वह राम, कृष्ण, जीसस के रूप में हमारी अपनी धारणा के अनुरूप प्रकट होते
हैं।
दूसरा :
निराकार - आकार रहित। जब आप कहते हैं, सब रूप उसके हैं तब आप नहीं कह सकते
कि यह रूप उसका है या वह रूप उसका है। इसका यह अर्थ नहीं कि उसका
कोई रूप नहीं है। इसका अर्थ है कि सभी रूप उसके हैं। इस प्रकार निराकार का
अर्थ, रूप का न होना नहीं है। अच्छे गुण का अर्थ कमजोर गुण का न होना नहीं है।
बुराई की अनुपस्थिति का अर्थ गुणों की विद्यमानता नहीं है। इसी प्रकार आकार की
अनुपस्थिति निराकारत्व नहीं है। सभी रूप उसके हैं। हम विशेष रूप से नहीं कह सकते कि
यह उसका रूप है। इस प्रकार, आकार सहित साकार ईश्वर और आकार रहित निराकार ईश्वर जब
आप विशेष कर उल्लेख करते हैं, वह रूपवान हो जाता है, जब आप उसे सामान्य रूप से
वर्णन करते हैं, वह निराकार हो जाता है। जब आप उसे सार्वभौमिक करते हैं, वह निराकार
हो जाता है। इस प्रकार साकार, आकार सहित ईश्वर और निराकार, आकार रहित ईश्वर एक
दूसरे के विरोधी नहीं वरन पूरक हैं।
दूसरा
विरोधाभास ईश्वर के गुण सहित और गुण रहित का है। "सर्वेइन्द्रियां गुणाभासम्"
जब तक आप पंखे
के नीचे हैं, बिजली का विचार नहीं आता, बल्कि घूमती हवा का होता है। जब तक ट्यूब
लाइट जल रही है, बिजली नहीं केवल प्रकाश का विचार आता है। इस प्रकार हवा, प्रकाश
आदि विशेषतायें हैं। आप प्रत्यक्ष रूप में विद्युत का अनुभव नहीं करते, जब तक आप
उसके झटके या विद्युत मृत्यु नहीं चाहते। जबकि विद्युत का उपयोग विभिन्न प्रकार से
होता है।
विद्युत में
स्वयं कोई गुण नहीं है, लेकिन अपने को विभिन्न रूप में प्रकट करती है, हमारे उपयोग
के लिए। यदि आप हवा चाहते हैं, आप नहीं पूछते - "बिजली कहां है, आप पूछते हैं, पंखा
कहां है? जब आप पढ़ना चाहते हैं, आप बिजली के लिए नहीं कहते, बल्कि आप प्रकाश कहां
है, कहते हैं।" इस प्रकार हमारे अर्थों में विद्युत के कोई गुण नहीं है।
ईश्वर सत्य है
- सत्य ईश्वर है। क्यों? क्योंकि हमें सत्य की आवश्यकता है। ईश्वर प्रेम है, प्रेम
ईश्वर है। क्यों? क्योंकि प्रेम की हमें आवश्यकता है। धन, भोजन, परिवार आदि की हमें
कमी नहीं है। हमारे पास कमी केवल प्रेम की है। प्रत्येक वस्तु गुजरते बादलों की तरह
है। इसलिए मुझे प्रेम की जरूरत है। ईश्वर प्रेम है, प्रेम में रहो। दिन का
प्रारम्भ प्रेम से करो, प्रेम से दिन व्यतीत करो और दिन का अन्त प्रेम से करो, यही
ईश्वर की ओर जाता मार्ग है, ईश्वर शान्ति है। हमें शान्ति की आवश्यकता है।
यद्यपि हमारे पास जीवन की प्रत्येक वस्तु है, किन्तु हमारे पास शान्ति नहीं है। धनी
व्यक्ति शान्ति कभी नहीं पाते, क्योंकि उनको शान्ति तब ही मिलेगी, यदि उनके पास घर
के सामने अल्शेशियन कुत्ते हैं। इस प्रकार धन होने से उन्हें शान्ति नहीं, लेकिन
कुत्ते से उन्हें शान्ति मिलती है। शान्ति कुत्ते में है या धन में? केवल कुत्ता!
चूंकि धन होते हुए भी हमें शान्ति नहीं है, इसलिए हम शान्ति की खोज करते हैं। इसलिए
ईश्वर शान्ति है, शान्ति ईश्वर है। शान्ति में रहो।
ईश्वर आनन्द
है, आनन्द ईश्वर है, आनन्द में रहो। इसलिए ये सब विशेषतायें हैं। वास्तव में वह
समस्त विशेषताओं से परे है। वह प्रेम और घृणा से परे है। वह जन्म और मृत्यु
से परे है। वह अद्वैत - गुण रहित है। वह गुणों से परे है, लेकिन
हमारी सुविधा हेतु गुण हैं, हमें हमारी आवश्यकता में सहायता करने के लिए। इस प्रकार
ईश्वर सगुण और निर्गुण दोनों है। वह केवल क्रियात्मक उद्देश्य के लिए है।
"सत्यम्
ज्ञानम् ब्रह्मानन्दरूपम् अमृतम्"
अगला
विरोधाभास ईश्वर अकेला अस्तित्व में है।
"ब्रह्म
सत्यम् जगत मिथ्या" ईश्वर सत्य है, संसार भ्रम है। मैंने स्वामी से अगला सवाल
पूछा भी यही था - स्वामी - आप कहते हैं मैं न शरीर, न मन और न ही बुद्धि हूं, केवल
आत्मा हूं। मान लीजिए आप मुझसे पूछते हैं - अनिल कुमार तुम कब आये? क्या मैं कहूंगा
कि शरीर आ गया है, लेकिन आत्मा न जाती है और न आती है? जब आप कहते हैं, मैं शरीर
नहीं हूं, मैं कैसे कह सकता हूं, मैं आत्मा हूं, जो न आती है और न जाती है। अपने
उसी अनुकरणीय तरीके से, स्वामी ने उत्तर दिया - "यदि तुम वास्तव में अनुभव करते
होते कि तुम आत्मा हो, यह प्रश्न तुमने बिल्कुल न पूछा होता" तब मैंने यह प्रश्न
किया। मान लीजिए आप मुझसे पूछते हैं "तुम कब आये?" मैं कहता, "अब" इसका अर्थ है
शरीर आया है। "तुम कब जा रहे हो?" "कल" इसका अर्थ है शरीर कल जा रहा है। "तुम्हारा
उत्तर इंगित करता है कि तुम शरीर हो। कुछ समय बाद आप कहते हैं - "मेरा पैर दर्द कर
रहा है, मेरा पेट गड़बड़ हो गया है" यहां मैं और पेट अलग-अलग हैं। इस प्रकार आप अपने
पेट और अपने पैर से भिन्न हैं। यह मेरा कलम है। आप कलम से भिन्न हैं। इस प्रकार आप
उसके मालिक हैं। इसलिए आप शरीर से भिन्न हैं और जब आप कहते हैं, आप आ गये हैं या आप
जा रहे हैं, इसका अर्थ है कि आप शरीर हैं। क्या सही है? यह भी सही है और वह भी सही
है। क्योंकि जब आप पहचान शरीर से करते हैं, आप कहते हैं मैं अभी आया हूं या मैं कल
जा रहा हूं। जब आप महसूस करते हैं आप शरीर से भिन्न हैं, आप कहते हैं "मेरा हाथ"
"मेरा पैर"। इस प्रकार शरीर से पहचान आपको महसूस करायेगा कि "जगत मिथ्या", यह संसार
एक भ्रम है। ईश्वर सत्य है। केवल शारीरिक अनुभूति आपको अनुभव करायेगी, एक सत्य है
तथा एक भ्रम है। जब शारीरिक अनुभूति नहीं है, प्रत्येक वस्तु मात्र
विष्णु-ब्रह्माण्डीय स्वरूप है। "सर्वम् विष्णुमयम् जगत्।"
मैं समझता
हूं, मैंने इन तीन विरोधाभासों को, जो हमें गीता में मिलते हैं, जिनके कारण भ्रम और
शंकायें उत्पन्न हुई हैं, स्पष्ट कर दिया है। समाप्त करने से पहले मैं आप सबसे
विस्तार से साई साहित्य और वेदान्त दर्शन पढ़ने के लिए आग्रह तथा अनुरोध करता हूं ।
हम समझते हैं कि गीता को तभी बेहतर ढंग से समझा जा सकता है यदि हम (बाबा द्वारा
लिखित) गीतावाहिनी पहले फिर बाद में श्रीमदभगवद्गीता पढ़ते हैं। हम उपनिषदों को
बेहतर समझ सकते हैं, यदि हम पहले उपनिषद वाहिनी (बाबा द्वारा) पढ़ते हैं तथा बाद में
उपनिषद। मैं आपसे भजनों में अपना समय व्यतीत करने का अनुरोध करता हूं ताकि आप
उनके निर्देशों का अनुसरण करते हुए और सदा सत्संग में रहते हुए उनके
चमत्कारों का चिन्तन करते हुए यह अनुभव करें कि हम कितने भाग्यशाली हैं। हमें
कृतज्ञता पूर्वक उन्हें धन्यवाद देना चाहिए तथा आश्रम के पवित्र वातावरण में
रहें, और अपने को उसके बाहर जाकर प्रदूषित न करें।
साई राम!
अध्याय
15
मननम्, पुनरावर्तन
उनके
दैविक सन्देश को याद रखने की हमारी सतत् इच्छा एवं अभिलाषा हमें यहां परस्पर मिलने
हेतु खींच लाती है। हम भली भांति जानते हैं कि स्वामी के प्रवचनों को सुनना एक बात
है, उसे दोहराना और याद करना दूसरी और मानसिक विचारों में बार-बार वापस लाना उससे
भी अधिक महत्वपूर्ण है।
सुनने की
क्रिया संस्कृत में श्रवणम् कहलाती है। यही वह है जो हम कर रहे होते हैं, जब
हम भगवान के सामने होते हैं। अब हम जो कर रहे हैं, वह दूसरी अवस्था मननम्,
पुनरावर्तनम अर्थात दोहराने की है। तीसरी अवस्था अभी भी हम सभी के लिए प्रतीक्षा
में है निदिध्यासन - व्यवहार में लाना, वह सब जो हमने सुना और दोहराया है।
भगवान के सम्भाषण विभिन्न व्यंजनों से सजे बड़े भोज के समान हैं। उसमें अनेक पक्ष
होते हैं - जैसे - राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और प्रोद्यौगिक प्रत्येक वार्ता में
सम्मिलित होते हैं। भगवान की वार्तायें अपनी पहुंच में बहुआयामी हैं, क्योंकि
श्रोताओं में लोग जीवन के विभिन्न वर्गों से होते हैं। ऐसा कोई क्षेत्र या विषय
नहीं जो भगवान द्वारा सम्मिलित न किया जाता हो। इसलिए, बाबा के सन्देश अनेकों
उपस्थित लोगों के प्रश्नों के उत्तर होते हैं और जीवन के विभिन्न वर्गों के अनेकों
लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति भी करते हैं। अत: हम यहां जो कर रहे हैं वह है मननम्
या पुनरावर्तन का एक नम्र प्रयास।
भगवान ने कुछ
ऐसे वक्तव्य दिए हैं जिन्हें दोहराने की आवश्यकता है। उन्होंने एक अति महत्वपूर्ण
वक्तव्य दिया। "वर्तमान में विश्व आणविक विध्वंस से गुजर रहा है। एक आणविक बम
सम्पूर्ण पृथ्वी को क्षण मात्र में भस्म कर देगा। बम किसने बनाया? वैज्ञानिकों ने।
हम बम बनाने वाले वैज्ञानिकों से भयभीत नहीं हैं, लेकिन हम बम से भयभीत हैं।"
भगवान ने यह वक्तव्य दिया जिस पर हमें पूरी गम्भीरता से चिन्तन करना चाहिए। ईश्वर
ने ब्रह्माण्ड की सृष्टि की। एक सृष्टिकर्ता है और उसकी सृष्टि है। हम सृष्टि से
भयभीत हैं, लेकिन हम सृष्टिकर्ता से भयभीत नहीं हैं। यही आज मनुष्य के सोच की
त्रासदी और भ्रमात्मकता है। वास्तव में यदि आप सृष्टिकर्ता को जानते हैं, आप स्वमेव
सृष्टि को जान जाते हैं। यदि आप सृष्टि को पूर्णता से जान लें, तब भी यह आवश्यक
नहीं कि आप सृष्टिकर्ता को जान पायें। बाबा ने कहा कि वैज्ञानिक, सृष्टि पर शोध
करते हैं, जबकि एक सन्त सृष्टि का चिन्तन करता है। इस प्रकार सन्त सृष्टिकर्ता का
चिन्तन करते हैं, वैज्ञानिक सृष्टि का चिन्तन करते हैं। चूंकि सन्त सृष्टिकर्ता को
जानता है, उसे उसकी सृष्टि की भी जानकारी होगी, दूसरी ओर वैज्ञानिक केवल सृष्टि
जानते हैं वे सृष्टिकर्ता के सम्बन्ध में कुछ नहीं जानते।
सृष्टि स्थायी
नहीं है। वह प्रत्येक क्षण परिवर्तित होती रहती है। समस्त उत्पन्न वस्तुएं
परिवर्तित होने के लिए बाध्य हैं। यही उत्पन्न पदार्थों का नियम है। हमारा शरीर वह
नहीं है जो वह 20 वर्ष पहले था। वह तेजी से बदल रहा है। मन सदा जवान रहता है, लेकिन
शरीर कभी जवान नहीं रहता। मन विचारों का बण्डल है, जबकि शरीर पदार्थ से निर्मित है।
पदार्थ बढ़ता है, नष्ट होता है और सड़ता है, जबकि विचार, समय और स्थान से परे है।
विचार सदा हरे और ताजे रहते हैं। विचार मृत्यु के उपरान्त तक रहते हैं। संस्कृत में
विचार संकल्प कहलाते हैं। संकल्प एक बीज के समान है जो हमारे अगले जन्म में पीछे से
आ जायेगा। यही कारण है कि क्यों कुछ लोग सन्त स्वरूप, राक्षसी या पशुवत प्रवृत्ति
के होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति संकल्प के अनुसार जन्म लेता है। पिछले जन्म के
संकल्प हमारे साथ होंगे, जिन्हें हम वासनायें कहते हैं। वर्तमान के व्यवहार में
वासना, पूर्व जन्म के संकल्पों से उत्पन्न हुई है। इसलिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि
हम अपने मन को जहां तक सम्भव हो, शुद्ध रखें। क्योंकि शरीर का हिसाब-किताब किसी भी
दिन बन्द हो सकता है (मृत्यु द्वारा), लेकिन मन का नहीं। शरीर जा सकता है, लेकिन
विचार नहीं, संकल्पों की यात्रा अनन्त तक होती है। यह जीवन का वेदान्तिक दृष्टिकोण
है।
भगवान ने हाल
ही में एक और वक्तव्य दिया। वह एक गणितज्ञ, चिकित्सक और वैज्ञानिक सब एक में
हैं। प्रत्येक मानव में तीन बातें रहती हैं। यह सरल गणितीय सूत्र है। शरीर+मन+आत्मा
= आदमी। वह जो केवल शरीर के आधार पर व्यवहार करता है, पशु होगा। पशु केवल शरीर के
आधार पर कार्य करते हैं। जो कुछ भी इन्द्रियां चाहती हैं, पशु तुरन्त ही उनको
सन्तुष्ट करने का प्रयास करते हैं। शरीर के स्तर पर हमारी क्रियायें मात्र एक पशु
के समान हैं।
मन - दूसरा
पक्ष। वह जो मात्र मन द्वारा चलता है, राक्षस है क्योंकि उसका मन भावुक, वासना
जनित, द्वैत, विद्रोह से पूर्ण, क्रोध, बदले की भावना, प्रचण्डता और बात-बात में
उखड़ जाने वाला होगा। वास्तव में दोनों अतिवाद मन में हैं। राक्षस तप करने के लिए
जाने जाते हैं जब उनके मन एक अति में होते हैं और जब उनके मन एक दूसरे अति की ओर
होते हैं, वे प्रत्येक की हत्या करने लगते हैं। इस प्रकार, व्यवहार जो मन की सनक से
आता है, एक राक्षसी गुण है, वह जो सभी तीनों शरीर, मन और आत्मा के साथ जीवित रहता
है, मानव है।
आत्मा तीसरा
पक्ष है।
वह जो केवल
आत्मा का चिन्तन करता है दिव्य है - "ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति"। यदि आप
आत्मा का चिन्तन करते हैं, आप आत्मा हो जायेंगे।" इसलिए बाबा के अनुसार ये सब
प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान हैं। वह जो शरीर का अनुसरण करता है पशु प्रवृत्ति
रखता है। वह जो मन का अनुसरण करता है, राक्षस है। वह जो आत्मा के साथ अपनी पहचान
करता और आत्मा में रहता है, दिव्य है। ये गुण हममें से प्रत्येक में विद्यमान हैं।
इसके उपरान्त भगवान ने एक अन्य वक्तव्य दिया। हमारा विश्वास स्थिर या स्थायी नहीं
है। यह एक पेन्डुलम के समान झूलता रहता है। यह ऊपर, नीचे झूलता है। भगवान कहते हैं,
तुम्हारा विश्वास दृढ़ और स्थिर होना चाहिए।
उदाहरण : एक
कागज के टुकड़े पर फूलों सहित एक बेल का चित्र बना है। कागज हिलेगा लेकिन फूल नहीं
हिलेंगे। इसी प्रकार हमारा शरीर चलायमान हो सकता है, हमारा मन हिल सकता है, लेकिन
हमारा विश्वास कागज पर चित्र के समान दृढ़ होना चाहिए। एक बार विश्वास के सम्बन्ध
में दो प्रश्न भगवान के समक्ष प्रस्तुत किये गये। एक सज्जन ने पूछा, "स्वामी, क्या
विश्वास पहले आता है या प्रेम पहले आता है?" दूसरे शब्दों में क्या यदि तुम प्रेम
करते हो तो तुमको विश्वास मिलता है या प्रेम करने के लिए तुममें पहले विश्वास होना
चाहिए।
आइये भगवान से
ऐसे प्रश्नों के उत्तर के लिए हम प्रार्थना करें। अवतार का उद्देश्य यह जानकारी
देने और उपलब्ध कराने का है जो अन्यत्र नहीं है। इन दिव्य उत्तरों को प्राप्त करने
में रोमांच और उत्तेजना है। क्या था बाबा का उत्तर? "विश्वास पहले और प्रेम बाद
में।" हम आधुनिक लोग इन वक्तव्यों को स्वीकार नहीं करते, जब तक उन्हें विस्तार
से स्पष्ट न किया जाय। जब तक आप में विश्वास नहीं है कि अमुक महिला तुम्हारी मां
है, तुम उसे प्रेम नहीं कर सकते। जब तक तुम नहीं जानते कि अमुक-अमुक तुम्हारा पति
या पत्नी है, तुम उससे प्रेम नहीं कर सकते। इसलिए ईश्वर में विश्वास पहले आता है और
प्रेम बाद में आता है। उदाहरण : यह कोट शरद ऋतु में मेरा मित्र है क्योंकि यह मुझे
गरम रखता है। लेकिन यह कोट ग्रीष्म ऋतु में मेरा शत्रु है क्योंकि तब यह बहुत अधिक
गर्मी देता है। यह कोट क्या मित्र है या शत्रु? एयरकन्डीशनर गरमी में मित्र है और
शरद में शत्रु। हीटर शरद में मित्र है और वही हीटर ग्रीष्म में शत्रु है।
एक अन्य
उदाहरण बाबा द्वारा दिया गया। एक नवयुवक शैक्षिक डिग्रियों वाली उच्च शिक्षा
प्राप्त लड़की से विवाह करना चाहता था। यद्यपि वह स्वयं अध्ययन में असफल था और केवल
बारहवीं कक्षा तक पहुंचा था। एक लड़की ने उससे विवाह कर लिया। लड़के को बहुत गर्व था
कि यद्यपि वह बारहवां पास था, उसने ऐसी लड़की से विवाह किया। वह अपने को बहुत
भाग्यशाली महसूस करता था। विवाह के बाद पति ने कुछ कामकाज करने के लिए कहा जैसे एक
कप कॉफी बनाना। उसने यह कहते हुए इन्कार कर दिया कि चूंकि वह डिग्री धारक है और वह
केवल बारहवां है, उसे कॉफी बनानी चाहिए। चीजें बदल गईं। इसलिए शत्रुता और मित्रता,
समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं।
इसलिए मानव
होने के कारण हम इन सभी तीनों शरीर, मन और आत्मा में रहते हैं। हमें एक पशु के समान
शरीर का अनुसरण करते हुए नहीं रहना है। हमें एक राक्षस के समान मन की तरंग पर नहीं
रहना है। हम सभी तीनों के साथ काम करें और केवल तभी हम एक मानव कहे जायेंगे। मानवीय
गुणों का व्यवहार करें। हमें प्रमाणित करना चाहिए कि वे सभी गुण जो हममें अब हैं,
मानवीय गुण हैं। जब हम अपने चरित्र का अवलोकन करते हैं हम में से कुछ में हो सकता
है मानवीय गुणों की कमी हो। कुछ में एक या दो मानवीय गुण हो सकते हैं तथा शेष सब
पशु जनित गुण हों। कुछ में राक्षसी गुण हो सकते हैं। कुछ में सभी तीनों का मिश्रण
हो सकता है, लेकिन बाबा सर्वप्रथम हमें मानव बनाना चाहते हैं। एक पशु होने के कारण,
हम मानव नहीं हो सकते हैं।
जब कभी कुछ भी
मन में आता है और आप जब उसके अनुसार कार्य करना चाहते हैं, अपने से एक प्रश्न
पूछें, "मैं पशु हूं या मानव? यदि मैं इस प्रकार से क्रिया करता हूं, मैं एक पशु
हूं, मानव नहीं और यदि मैं इस प्रकार से कार्य करता हूं मैं मानव हूं, पशु नहीं।"
इसलिए, हमें
पशुजनित गुणों को छोड़ना तथा मानवीय गुणों को विकसित करना चाहिए। यदि हममें आधा
मानवीय तथा आधा पशुजनित गुण है, हम पूर्ण नहीं होंगे। जब तक हम पशुजनित गुणों से
रहित नहीं होते, दूसरा आधा पूरा नहीं होगा। इसलिए हम समझ लें कि हम केवल तभी
वास्तविक रूप से मानव होंगे जब हम पशु जनित गुणों को त्याग देते हैं।
मानवीय गुण
क्या हैं? पहला मानवीय गुण है, यह मात्र मानव है, जो प्रश्न कर सकता है। "कौन
हूं मैं" कोई कुत्ता या बैल नहीं पूछ सकता, "कौन हूं मैं?" तदुपरान्त "कहां से
आया हूं?" "मैं यहां से कहां जाता हूं? ये प्रश्न केवल मनुष्य में ही उठते हैं, यह
पहला मानवीय गुण है। यदि कोई कहता है "इसकी चिन्ता मत करो कि तुम कौन हो या तुम
कहां से आये हो? तुम ऐसे प्रश्न क्यों करते हो? वह पशु है।
एक बन्दर जब
भगवान के निकट पहुंचता है, उसका चंचल स्वभाव नष्ट हो जाता है और वह हनुमान सा एक
महान भक्त बन जाता है। एक पक्षी, जो कभी स्थिर नहीं रहता, जब वह भगवान के निकट जाता
है, एक गिद्ध गरुड़ हो जाता है और वह ईश्वर का वाहन बनकर दिव्य हो जाता है। एक बैल
जो अपने अक्खड़पन तथा घमण्ड के लिए जाना जाता है, जब वह ईश्वर के पास होता है नन्दी,
भगवान शिव का वाहन हो जाता है। एक दुर्दान्त शेर जब वह देवी के पास जाता है, उनका
वाहन बन जाता है। एक राक्षस, जो भयंकर एवं वीभत्स गुणों के लिए जाना जाता है, जब वह
ईश्वर के पास जाता है, एक महान भक्त प्रहलाद बन जाता है। इस प्रकार सभी पशु जब वे
ईश्वर के निकट जाते हैं, वे उच्चता प्राप्त करते हैं। मानव के सम्बन्ध में क्या है?
क्या हम वास्तव में ईश्वर के पास जाने से उच्च हो रहे हैं? हम कहते हैं, हम पिछले
कई वर्षों से आते रहे हैं, लेकिन कोई प्रगति नहीं हुई। हम परिवर्तित नहीं हुए। कुछ
भक्त भूतकाल में रहते हैं और कुछ भविष्य में और वर्तमान में जो सुनहरा अवसर है, उसे
खो देते हैं। इसी कारण हम प्रगति नहीं कर पाते। ईश्वर के लिए हमारे पास समय होना ही
चाहिए। ईश्वर के निकट और निकट होने के प्रत्येक अवसर का पूर्ण उपयोग करें। पशु अधिक
बेहतर हैं। वे खाद्य पदार्थों का संग्रह नहीं करते और न अपने पौत्रों, प्रपौत्रों
की चिन्ता करते हैं। इसी कारण पशु सदा प्रसन्न रहते हैं। हम प्रसन्न नहीं है,
क्योंकि हम नहीं जानते कि हमारे पास कल के लिए काफी है। इस प्रकार पहला मानवीय गुण
प्रश्न करना है "कौन हूं मैं?" "मुझे कहां जाना है?"
दूसरा मानवीय
गुण, अपने स्वभाव में परिवर्तन करने की क्षमता का होना है। हम एक पशु से इडली सांभर
का नाश्ता करने हेतु नहीं कह सकते। वे अपने खाने अथवा मारने की आदत को बदल नहीं
सकते, लेकिन आदमी बदल सकता है, यदि वह ऐसा चाहता है और वह ऐसा करने का निश्चय करता
है। मानव परिवर्तित हो सकता है, यदि उसमें दृढ़ इच्छाशक्ति है। यह मानवीय गुण है।
यदि कोई कहता है "मैं नहीं परिवर्तित हो सकता" तब वह प्राणि उद्यान का निवासी है।
एक अन्य
मानवीय गुण है। उसमें दैविक गुणों की बहुत अधिक झलक मिलती है, यद्यपि वह उसे भूला
हुआ है या उसके प्रति जागरूक नहीं है वह पशुजनित गुणों को बहुत अच्छी तरह व्यक्त
करता है। वह राक्षसी गुणों को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता है। वह मानवीय गुण
कभी-कभी ही प्रकट करता है और दैविक गुणों के लिए उसके पास समय ही नहीं हैं, यद्यपि
ये सभी उसमें हैं। इसलिए सर्वप्रथम हम मानवीय गुणों को प्रदर्शित करें, दैविक गुणों
के सम्बन्ध में जानकारी करें और तदुपरान्त दैविक गुणों को शरीर, मन और आत्मा से
व्यक्त करें।
दैविक गुण
क्या हैं? सत्य - ईश्वर सत्य है, सत्य में रहो। दूसरा दैविक गुण है धर्म - सदाचरण,
सदाचरण में रहो और अर्जित करो। यदि आप ऐसा करते हैं, शान्ति है। तीसरा मानवीय गुण
है शान्ति। शान्ति प्राकृतिक दिव्य गुण है। वह बाहर नहीं है, वह आपके अन्तस में है।
जैसे पुस्तक में दो आवरण पृष्ठ होते हैं और उनके बीच होते हैं पृष्ठ। पृष्ठों को
देखने के लिए हमें दोनों आवरणों को हटाना होता है। इसी प्रकार केन्द्र में शान्ति
है। एक ओर अहं है और दूसरी ओर इच्छायें। अहं और इच्छा त्याग दो और आप शान्ति पा
जायेंगे। इसे कहीं से लाया नहीं गया है। वह पहले से ही वहां है। हमें केवल आवरण
हटाने हैं। इसलिए जब हम कहते हैं, "मैं शान्ति चाहता हूं - "मैं" अहं है और चाहना"
इच्छा है, दोनों को हटा दो तो शान्ति रह जायेगी। इस प्रकार शान्ति दैविक गुण है जो
इच्छा और अहं के कारण नष्ट हुई है, जो हमारे अपने द्वारा निर्मित है। जब भोजन सामने
है और आप नहीं खाते, किसकी गलती है वह? आपकी अपनी ही गलती है।
अगला दैविक
गुण प्रेम है। "प्रेम ईश्वर है, प्रेम में रहो।" यह सर्प है जो बदला लेने वाला होता
है और एक कुत्ता है जिसमें अपनापन है। निरन्तर दूसरों को डंक मारना बिच्छू का गुण
है। अत्यधिक निद्रा भैंस का गुण है। लेकिन मानव का गुण है प्रेम। लोग कहते हैं "मैं
ईश्वर से प्रेम करता हूं, लेकिन मैं लोगों से घृणा करता हूं।" आप लोगों से घृणा
नहीं कर सकते, यदि आप ईश्वर से प्रेम करते हैं, क्योंकि ईश्वर उन सब में है। इसीलिए
बाबा कहते हैं - "सबसे प्रेम करो और सबकी सेवा" "दिन का प्रारम्भ प्रेम से करो,
प्रेम सहित दिन व्यतीत करो और प्रेम सहित दिन का समापन करो। यह ईश्वर का मार्ग है।"
मानवीय प्रेम सीमित है। सीमित मानवीय प्रेम को असीमित दैविक प्रेम से सम्बन्धित
होना है। एक बड़ी पानी की टंकी से नल को जोड़ना है। टंकी पानी से भरी है। वह दैविक
प्रेम है। जब आप नल खोलते हैं आपको सीमित पानी मिलता है, यह मानवीय प्रेम है, इसलिए
नल को असीमित पानी, जो दैविक प्रेम है, से जोड़ देना चाहिए। वे निकट तथा जुड़े होने
चाहिए। अत: ईश्वर प्रेम है, मानव प्रेम है और जोड़ने वाला भी प्रेम है।
अध्याय
- 16
प्रसन्नता की कुन्जी
दु:ख का कारण
क्या है? कष्ट क्यों है और प्रसन्नता का उपाय क्या है? यह जीवन की वास्तविक समस्या
है, सुख तथा दु:ख आदि के इन विरोधों की। हम किस प्रकार सदा सफल तथा प्रसन्न रह सकते
हैं? क्या करें, कि हम दु:खी या नुकसान के भागी कभी न हों? यह प्रत्येक समाज व
राष्ट्र की समस्या है। उदाहरण के लिए यह कलम है, मैं एक कलम से प्रसन्न हूं। क्या
कलम ने मुझे प्रसन्न किया है? नहीं। प्रसन्नता मेरे अन्दर है और मैंने उसे कलम में
स्थानान्तरित कर दिया है। कलम न प्रसन्नता का कारण है, न अप्रसन्नता का। यदि कलम
प्रसन्नता का साधन होता, वह मुझे सदा हर समय प्रसन्न रखता। प्रसन्नता मुझमें है जो
कलम में प्रतिरोपित होती है।
प्रसन्नता आप
में है। हम ही उसे यहां और वहां स्थानान्तरित करते रहते हैं। प्रसन्नता भौतिक
वस्तुओं में नहीं है। यदि यह सत्य होता कि प्रसन्नता भौतिक वस्तुओं में है, लोग
सबका संग्रह कर अति प्रसन्न हो गये होते। इसके स्थान पर जितना अधिक उन्होंने संग्रह
किया उतना ही वे दु:खी हुए। धन होने के बावजूद वे असुरक्षित हैं। यद्यपि वे अत्यन्त
धनी हैं फिर भी वे अप्रसन्न हैं तथा उनको शान्ति नहीं है। शरद ऋतु में कोट मुझे
प्रसन्न करता है, लेकिन ग्रीष्म काल में नहीं। प्रसन्नता कोट में नहीं है। मित्रता
या शत्रुता लोगों में नहीं है। यह हमारी प्रवृत्ति में है, सम्बन्धों में नहीं।
प्रसन्नता एक स्थान पर है, जबकि आप उसे किसी दूसरे स्थान पर खोज रहे हैं। एक बार
यदि मैं समझ लूं कि प्रसन्नता बाह्य वस्तुओं या व्यक्तियों में नहीं है, तब मैं
केवल उसे अपने अन्दर देखूंगा।
एक सरल सा
उदाहरण। एक वृद्धा सड़क के खम्भे पर लगे बल्ब के प्रकाश में सुई खोज रही थी। एक
नवयुवक आया और पूछा "हे दाई, आप क्या कर रही हैं? उसने उत्तर दिया "मेरी सुई खो गई
है, मैं यहां रोशनी में उसे ही खोज रही हूं।"
लड़के ने पूछा
- "आपने सुई कहां खोई थी?"
उसने उत्तर
दिया, "मैंने उसे घर में खोया था, लेकिन घर में रोशनी नहीं है, इसलिए मैं उसे यहां
खोज रही हूं।"
"जब कोई सामान
एक स्थान पर खो चुका है और आप उसे अन्य स्थान पर खोजते हैं, उसे पाना किस प्रकार से
सम्भव है?"
ये सभी उदाहरण
बाबा द्वारा दिये गये हैं। एक लड़के को बिच्छू ने डंक मार दिया। डॉक्टर आया। उसने
पूछा, "तुम बिच्छू द्वारा काटे जाते समय कहां थे?" लड़के ने उत्तर दिया "कमरे के एक
कोने में, इसलिए मैंने मलहम वहां रख दिया।" डॉक्टर ने टिप्पणी की "जब तुमको
तुम्हारे अपने शरीर में काटा गया है, फिर कमरे के कोने में मलहम रखने का क्या उपयोग
है।" इसी प्रकार, जब प्रसन्नता एक स्थान पर है फिर उसे दूसरे स्थान पर खोजने का
क्या उपयोग है? इसलिए संक्षेप में, जब तक हम सोचते हैं कि प्रसन्नता भौतिक वस्तुओं
या व्यक्तियों में है, हम उससे बहुत दूर हैं। यह संसार और आप से बाहर की वस्तुएं
मात्र गुजरते बादलों के समान हैं। हमें प्रसन्नता स्वयं अपने अन्दर खोजनी चाहिए।
कैसे कोई
स्वयं अपने अन्दर प्रसन्नता पाये? क्या किसी के द्वारा लिखी कोई पुस्तक है, कोई
जुगत है जो सहायता देगा? क्या वह आकाश में या चांद पर उपलब्ध है? लगता है ईश्वर ने
उत्तर दिया। मानव बहुत बुद्धिमान है। यदि वह समुद्र में प्रसन्नता रखता,
मनुष्य इतना महान है कि वह एक पनडुब्बी लेकर उसके लिए गहरे पानी में चला जाता। यदि
वह प्रसन्नता को किसी पहाड़ पर रखता, मनुष्य एवरेस्ट पर भी चढ़ जाता और उसे पा
लेता। यदि वह प्रसन्नता को संसार के किसी कोने में रखता, मनुष्य सैटेलाइट से
उसके चित्र लेता और पा लेता। इसलिए ईश्वर कहता है "मेरा मनुष्य जिसको मैंने उत्पन्न
किया है, मुझसे अधिक चतुर बनने का प्रयास कर रहा है। लेकिन ईश्वर अधिक बुद्धिमान है
क्योंकि उसने मनुष्य को उत्पन्न किया है। पुत्र मां को उल्लू नहीं बना सकता। वह
जितना अपने बारे में जानता है, उससे वह बेहतर जानती है।"
ईश्वर कहता है
"इसलिए साथियों ! प्रसन्नता पहाड़ की चोटी पर हो या समुद्र में अथवा पृथ्वी पर, तुम
पाने का प्रयास करते हो, लेकिन मैंने उसे किसी अन्य स्थान पर रखा है। हे
मानव! तुम्हारी एक आदत है जो तुम्हारी कमजोरी है। तुम सदा बाहर की ओर अपनी आंखों से
देखते हो। आंखों के परदे, पलकें है। आंखें बन्द नहीं करते। तुम उन्हें खुला रखते हो
और बाहर देखते हो। इसलिए मैंने उसे बाहर नहीं रखा है, अपने पैरों से तुम
सर्वत्र चले जाते हो। इसलिए मैंने उसे बाहर नहीं रखा है, जहां तुम चलते हो,
दौड़ते और कूदते हो। मैंने उसे अन्दर रखा है। तुम्हारे पास उसे पाने के लिए
हाथ हैं। यदि वह अत्यन्त ऊंचे स्थान पर भी है तुम एक क्रेन लोगे और उसे पा जाओगे।
लेकिन मैंने उसे तुम्हारे हाथों की पहुंच में नहीं रखा है। मैं जानता
हूं कि तुम अपने कानों से सुन सकते हो। इसलिए उसे मैंने इस प्रकार से रखा है
कि वह कोई ध्वनि न उत्पन्न कर सके। चिकित्सा विज्ञान में एक यन्त्र है, जिसके
द्वारा तुम दूर पर गिरी, एक सुई की ध्वनि को भी सुन सकते हो। मैंने उसे ऊपर,
नीचे, समुद्र में या घाटी में कहीं भी नहीं रखा है। मैंने प्रसन्नता का वह हीरा,
आनन्द की स्वर्णिम खान, तुम्हारे अन्दर ही रखी है।"
इस प्रकार जब
वह अन्दर है, आप अपने अन्दर नहीं देखते। आप केवल बाहर चारों ओर देखते हो। आपने जीवन
को म्यूजिकल चेयर का खेल बना लिया है आप हार जाते हो। क्योंकि वह जो अन्दर, और
वास्तव में आपके अन्दर है, आप उसको बाहर खोजते हैं। इसलिए वह कभी भी उपलब्ध नहीं
होगी।
बिन्दु यह है
कि प्रसन्नता बाहर व्यक्तियों और वस्तुओं में नहीं है, बल्कि केवल अन्दर है। वह सब
जो हम बाहर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं, अस्थायी और नकली है। आपको नकली सोना तथा
सिन्थेटिक हीरे मिलते हैं। कुछ कपड़ों की दुकानों पर, प्रचार के उद्देश्य से एक कपड़े
में किसी पशु जैसे शेर, सुअर आदि के रूप में आदमी होते हैं। बच्चे नहीं जानते कि
वहां अन्दर आदमी है और वे इन पशुओं को चलते-फिरते देखकर आनन्दित होते हैं।
इसी प्रकार हम
भी बच्चों की भांति व्यवहार कर रहे हैं जो अनुभूति हम बाहर पाते हैं, नकली, व
अस्थायी प्रसन्नता की है, जैसे दुकान में शेर, हाथियों आदि का पहनावा, जबकि अन्दर
की अनुभूति स्थायी है। वह आनन्द है।
प्रसन्नता
मानवीय है, आनन्द दैविक है। प्रसन्नता सांसारिक है, जबकि आनन्द आध्यात्मिक है।
प्रसन्नता वह है जो तुम भौतिक वस्तुओं को प्राप्त कर पाते हो, जबकि आनन्द, ईश्वर के
साथ सम्बन्ध के द्वारा मिलता है। प्रसन्नता इन्द्रियों से सम्बन्धित है जबकि आनन्द
आन्तरिक आध्यात्मिक चेतनता का है। हमें इन दोनों प्रसन्नता और आनन्द में अन्तर समझ
लेना है।
एक अन्य
बिन्दु है, हम क्यों किसी समय प्रसन्न होते हैं और कभी सारे समय अप्रसन्न? कैसे हम
इन दोनों स्थितियों से मुक्त हों? याद रखें आप सदा प्रसन्न या अप्रसन्न नहीं रह
सकते। सुख, दो दु:खों के बीच मध्यान्तर है। आप प्रसन्नता से अप्रसन्नता नहीं
प्राप्त करते। जब तक रात्रि में अन्धकार नहीं होता, दिन के प्रकाश का मूल्य नहीं
होता। जब तक ग्रीष्म में गरमी नहीं होती, शरद ऋतु में ठण्ड का मूल्य नहीं मालूम
होता। यदि दु:ख न होता सुख की पहचान न हो पाती। इसलिए दु:ख भी ईश्वर की उत्पत्ति है
ताकि हम सुख को बेहतर रूप में उपभोग कर सकें।
यह प्लास्टिक
से ढका हुआ तांबे का तार है। अन्दर तांबे का तार सुख है और प्लास्टिक आवरण दु:ख है।
एक सन्तरे का फल लें। अन्दर मीठा रस सुख है और बाहरी कटु आवरण दु:ख है। एक लोहे की
तिजोरी में जवाहरात और सोना है। लोहे की तिजोरी दु:ख है जबकि अन्दर रखा सोना सुख
है। जब आप चलते हैं, आपकी छाया होती है। आप सुख हैं छाया दु:ख है। इस प्रकार वस्तु
और उसकी छाया के समान सुख और दु:ख कभी न अलग होने वाले हैं। आप अपनी छाया से मुक्त
नहीं हो सकते। जब भोजन करते हैं, आपको सुख मिलता है। भूख मिट जाने के बाद यदि आप और
अधिक खायें तो कष्ट हो जायेगा। जब आप प्यासे होते हैं, आप पानी पीते हैं, वह सुख
है, यदि आप अधिक और अधिक पियें तो कष्ट हो जायेगा। इस प्रकार सुख व कष्ट भोजन, पानी
आदि में नहीं है। बिन्दु जिस पर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं वह है कि
सुख और दु:ख सदा साथ-साथ हैं और कुछ भी स्थायी नहीं है।
जब आप कैमरा
चमक के साथ क्लिक करते हैं, उसके तुरन्त बाद अन्धकार हो जाता है। प्रकाश सुख है
जबकि अन्धकार दु:ख। बिना तुरन्त अन्धकार के आप फिल्म नहीं पा सकते। अत: फोटो लेने
के लिए प्रकाश और अन्धकार दोनों की आवश्यकता है। जीवन में भी सुख और दु:ख साथ-साथ
प्रसन्नता देते हैं। कष्ट भी हमें प्रसन्नता देता है। वह हमें कुछ शिक्षायें
देता है कि हम कैसे प्रगति करें। वह हमको प्रगति करने हेतु निश्चित सन्देश
देता है। ईश्वर प्रेम है और प्रेम ही ईश्वर है। वह हमें कभी भी बिना
उद्देश्य के कष्ट नहीं देगा। एक उद्देश्य होता है, एक श्रेष्ठ तथा उच्च उद्देश्य।
जहां कहीं भी कष्ट है, वह आपको सुख में सराबोर करेगा। ईसा सलीब पर कष्टों में चढ़ाये
गये, अनन्त सुख के लिए, उन्हें यशस्वी बनाया गया। काश ईसा क्रूसारोपण के कष्ट से न
गुजरे होते, उन्हें कदाचित अनन्त का सुख न मिला होता। इस प्रकार कष्ट भी अन्तत: सुख
और प्रसन्नता देता है। अत: आनन्द ऐसा है, जिसके एक पटल को हम प्रसन्नता कहते हैं,
तथा दूसरे पटल को दु:ख। वास्तव में दोनों आनन्द देने वाले हैं। इस प्रकार प्रसन्नता
और कष्ट, लाभ और हानि, जय और पराजय, अच्छा और बुरा ये सब द्वन्द हैं तथा सुख और
दु:ख देने वाले हैं। लेकिन आनन्द अद्वैत है और आध्यात्मिक है।
यदि कोई आपकी
आलोचना न करे, आप अपनी गुणवत्ता में वृद्धि नहीं करेंगे। यदि कोई नहीं बताता कि आप
में क्या कमियां हैं, आप अपनी कमी को नहीं जान पायेंगे। यदि कोई आपको आपकी गलतियां
नहीं दिखाता आप अपनी गलतियों को नहीं जान पायेंगे। इस प्रकार आपके शत्रु तक आपकी
सहायता करते हैं। शत्रु या मित्र सुख या दु:ख जैसा कुछ नहीं है। दोनों ही लाभप्रद
हो सकते हैं। एक मित्र आपकी सहायता कर उत्साहवर्धन करता है और शत्रु आलोचना कर आपकी
सहायता करता है। उत्साहवर्धन एक उपाय है और आत्म परीक्षण, आत्मदण्ड एक दूसरा है। फल
का बाहरी कटु आवरण अन्दर मीठे रस की रक्षा करता है। मिठास की रक्षा हेतु हमें कटु
आवरण, दु:ख भोगना ही है। अत: सुख, दु:ख द्वारा सुरक्षित है। यदि दु:ख का आवरण नहीं
होता सन्तरे का सुख नष्ट हो गया होता। यह कैसी प्रक्रिया है?
एक पुराने
फैशन के ग्रामोफोन का उदाहरण लें। एक सुई है और एक भोंपू है। ग्रामोफोन की प्लेटों
में अनेकों ध्वनियां हैं। ग्रामोफोन की प्लेट रेखाओं सहित काली डिस्क है, लेकिन आप
कुछ नहीं सुन पाते। यदि आप उसे स्पर्श करें, वह समतल है। यदि आप उसे कान के पास
लायें, आप कुछ भी नहीं सुनते। यदि आप उसे देखो, वह केवल एक काली डिस्क है। क्या
अन्तर है? डिस्क को ग्रामोफोन पर रखो, चाभी घुमाओ, डिस्क घूमती है। सुई को डिस्क पर
रखो और गीत बजता है। अत: आप संगीत तभी सुन सकते हैं, जब सूई घूमती डिस्क पर होती
है। बगैर सुई के डिस्क केवल घूमती है। गीत तभी तक है जब तक डिस्क और सुई परस्पर
मिले रहते हैं।
रूपक के रूप
में डिस्क सांसारिक इन्द्रियों द्वारा निर्मित है। स्पर्श की इन्द्रियां, ध्वनि की
इन्द्रियों, नेत्रों की इन्द्रिय, बोलने की इन्द्रिय, समस्त इन्द्रियजन्य वस्तुएं
मिलकर डिस्क बनती है, डिस्क जो घूमती है। वह केवल सुई है, जो ध्वनि उत्पन्न करती
है। वह सुई क्या है? सुई मन है। अत: जब मन संसार के साथ सम्बन्धित हो जाता है, आप
सुख के गीत तथा दुख के गीत सुनते हैं। जब यह सुई डिस्क से हटा ली जाती है तब वहां
कोई संसार नहीं रहता। अत: यदि आप कहते हैं कि ग्रामोफोन आपको हंसाता या रुलाता है,
तो आप गलती पर हैं। ग्रामोफोन में कोई ध्वनि नहीं है। वहां केवल रेखायें हैं। सुई
है जो ध्वनि उत्पन्न करती है। इस प्रकार आप गीत सुखदायी है या दु:खदायी तभी जानेंगे
जब मन, सुई संसार रूपी डिस्क को स्पर्श करती है। अब दु:ख और सुख ग्रामोफोन प्लेट
में नहीं, बल्कि सुई में है। अत: ग्रामोंफोन प्लेट में सुख तथा दु:ख दोनों प्रकार
के गीत हैं। मुझे क्यों चिन्ता करनी चाहिए? मैं सुई हटा लूंगा। इस प्रकार सुख और
दु:ख संसार में नहीं है बल्कि हमारे मन में हैं। प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि जॉन
मिल्टन ने कहा - "यह केवल मन है जो नर्क को स्वर्ग और स्वर्ग को नर्क बनाता
है" भगवान कहते हैं "यह मन ही है जो बन्धन और मुक्ति हेतु उत्तरदायी है।"
अत: मेरे
मित्रों! प्रसन्नता का रहस्य मन को संसार से हटा लेने में है, मन को लिप्त करने में
नहीं। हमें केवल एक काम, मन को हटा लेने का करना है। मन की सुई को हटा दो, बस! कल
का उदाहरण दोहराता हूं, "जब आप सोचते हैं कि सभी फिल्में परदे पर प्रक्षेपित की
जाती हैं" आप रोते या मुस्कराते नहीं। जब आप परदे के बारे में सोचते हैं आप फिल्म
से विचलित नहीं होते। इसी प्रकार जब आप समझ चुके हैं कि प्रसन्नता और अप्रसन्नता
मात्र मन का खेल है, आप प्रभावित नहीं होते। जब आप स्वर्ण के सम्बन्ध में सोचते
हैं, आप अंगूठी का विचार नहीं करते। जब आपको अंगूठी पाने का मन होता है, आप स्वर्ण
सोचते हैं। जब आपके मन में लकड़ी की सोच आती है, आप कुर्सी नहीं सोचते। इसी प्रकार,
जब एक बार आप समझ जाते हैं कि प्रसन्नता और अप्रसन्नता मन के नकारात्मक और
सकारात्मक पक्ष हैं, आप प्रभावित नहीं होंगे।
दूसरा बिन्दु
है इच्छा। मात्र इच्छा हमें प्रसन्न या अप्रसन्न करती है। इच्छा की पूर्ति व्यक्ति
को प्रसन्न कर देगी तथा पूर्ति न होना उसे अप्रसन्न कर देगी। भगवान बार-बार कहते
हैं "कम सामान, अधिक आराम यात्रा को सुखदायी बनायेगा।" इसी प्रकार इच्छायें
और विचार वे धागे हैं जिनसे मन बनता है। मन और कुछ नहीं इन धागों का बण्डल है। कपड़ा
मन है - धागे विचार हैं। धागों को निकाल दो, कपड़े का अस्तित्व समाप्त। एक बार आप
विचारों को हटा दो, मन का अस्तित्व समाप्त। इसलिए, हमें जो समझना है, वह है मन को
हटाना, धागों, इच्छाओं को त्यागना। मैं मन को नष्ट करने के लिए नहीं कहता हूं, मैं
केवल मन को वापस ले आने की बात कहता हूं। आप मन को वापस लायें ताकि आप उसे अन्दर की
ओर मोड़ सकें। कैमरे का लेंस बाहर की ओर होता है। लेंस को बाहर की ओर घुमाने पर फोटो
खींची जाती है। कलम में कैप, शरीर और निब बाहर रहती है। स्याही, जो अन्दर रहती है,
लिखने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इसी प्रकार आत्मा अन्दर है। शरीर, मन और बुद्धि सब
आवरण हैं। यदि आप मन को अन्दर की ओर घुमायें, आप आत्मा को अन्दर देख सकते हैं। जब
तक मन, शरीर की टोपी से ढका है, आप अन्दर नहीं देखते। इसलिए सदा प्रसन्नता की दशा
में रहने के लिए यह जानना है कि वास्तविक प्रसन्नता कहां है। यह भी आपको जानना
चाहिए कि सांसारिक प्रसन्नता अस्थायी है। पूर्णतया मान लें कि वह बाह्य वस्तुओं या
व्यक्तियों में नहीं है, बल्कि अन्दर है। जो सब बाहर है मात्र अपूर्ण है, पूर्ण
नहीं। वह सब इन्द्रिय जन्य, बाह्य और सांसारिक है। लेकिन वास्तविक प्रसन्नता जो
अन्दर है, स्थायी और आध्यात्मिक है।
संसार में
समस्त उथल-पुथल मन के इन्द्रियों के साथ संलिप्त होने के कारण है। इन्द्रियां
निष्क्रिय हो जायेंगी, जब आप मन को खींच लेंगे। यह केवल मन और इन्द्रियों का खेल
है, जो हमें हानि या प्राप्ति कराता है। यह केवल मन और इन्द्रियों के बीच की
राजनीति है, जो हमें विजय या पराजय देता है। जो गन्दी राजनीति यहां चल रही है,
आइये! हम समझें। हम बाहर की राजनीति से परेशान रहते हैं, लेकिन जो अन्दर राजनीति चल
रही है, उसका क्या? मन और इन्द्रियां बिना बुद्धि की आज्ञा के कार्य कर रही हैं।
मन और
इन्द्रियां, आत्मा की जानकारी के बिना, कार्य व्यापार संचालित कर रही हैं। यह कुछ
इस प्रकार का है कि मेरे कार्यालय के लोग प्रशासन चला रहे हैं। मेरी तरफ से, बिना
मेरे ज्ञान के हस्ताक्षर कर रहे हैं। मान लीजिए एक बाबू एक कागज पर हस्ताक्षर करता
है या एक चपरासी इस कार्यालय का संचालन करता है। यह किसकी गलती है? मेरी गलती,
क्योंकि मैं इस विद्यालय का प्रधानाचार्य हूं। यदि चपरासी और बाबू लोग विद्यालय का
संचालन करते हैं, इसका अर्थ है मैं अयोग्य हूं। मुझे मुक्त हो जाना चाहिए। इसी
प्रकार हम इन्द्रियों, नौकरों के निर्देशों पर चल रहे हैं। हम मन, बाबू द्वारा
चलाये जा रहे हैं। बेचारा कार्यालय अधीक्षक, बुद्धि असहाय है। सर्वोच्च चेतन आत्मा
को पूर्णरूपेण भुला दिया गया है। अस्तु यह प्रशासन गुलामों का है, मालिक द्वारा
नहीं। यह बुरा प्रशासन है।
अत: मेरे
मित्रों हमें समझना है कि गलती कहां है। कहां कुछ गलत हो गया है। इस प्रात: की
चर्चा पूर्णतया समझ में आ जायेगी, यदि हम प्रसन्नता का रहस्य, प्रसन्नता की
उपलब्धता, प्रसन्नता की ओर जाने वाला मार्ग, सब जो मन और उसके वापस लौटने पर
केन्द्रित है, समझ लेते हैं। वास्तविक प्रसन्नता ईश्वर के साथ मिलने में है। पेड़ की
वास्तविक प्रसन्नता फल उत्पन्न करने में है। इसी प्रकार मानवीय जीवन एक पेड़ है।
वास्तविक प्रसन्नता आनन्द का फल प्राप्त करने में है, जो ईश्वर के साथ मिलन में है।
अध्याय
- 17
बालक बाबा
पुट्टपर्ती
में एक गांव का मुखिया था। वह मुखिया बुरे चरित्र का था। पांच वर्ष की अवस्था पर
बाबा उनमें सुधार करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने एक गीत की रचना की। उन्होंने गीत
लिखा और उसे अन्य लड़कों को सिखाया। उन्होंने उनसे, मुखिया के घर के निकट वह गीत
गाने के लिए कहा।
उस गीत का सार
था "यदि तुम्हारा चरित्र बुरा है, तुम्हारे लोग तुम्हें घर में नहीं जाने देंगे।
यदि तुम्हारा चरित्र बुरा है, तुम्हारे सम्बन्धी तुम्हारे चेहरे पर थूकेंगे। यदि
फिर भी तुम्हारा चरित्र बुरा बना रहा, तुम अपने मित्रों द्वारा त्याग दिये जाओगे।"
मुखिया ने इस गीत को सुना। तुरन्त ही उसने बच्चों को बुलाया और उन्हें मिठाइयां
दीं। उसने उनसे पूछा - "तुम्हें यह गीत कहां से मिला?" उन्होंने उत्तर दिया "सत्या
से" दूसरे दिन मुखिया ने सत्या राजू को बुलाया और कहा "तुमने मेरी बुराइयां खोल दी
हैं, इसके पहले कि दूसरे लोग भी उन्हें जान सकें, मैं अपने चरित्र में परिवर्तन कर
लूंगा। अब से यह गीत मत गाना।"
भगवान ने अपने
बालपन की एक अन्य घटना का भी वर्णन किया। उन्होंने, पालने पर किस प्रकार बच्चे को
सोने के लिए रखना चाहिए, एक गीत की रचना की थी। मातायें अक्सर बच्चे को सुलाने के
लिए गोद में लेटे बच्चे के लिए लोरी गाती हैं। वह विश्व युद्ध का समय था जब हिटलर
रूस के साथ युद्ध कर रहा था। बाबा ने तीन पद का एक गीत लिखा -
हे बाल! तुम
क्यों नहीं सोते?
क्या तुम
भयभीत हो कि हिटलर रूस पर आक्रमण कर रहा है?
परेशान मत हो,
रूस हिटलर पर फिर आक्रमण करेगा। इसलिए सो जाओ।
हे बालक! क्या
तुम नहीं सो रहे हो क्योंकि भारत में वे स्वतन्त्रता का आनन्द नहीं ले पा रहे हैं?
क्या तुमको भय
है कि लोग एक होकर स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष नहीं करेंगे?
परेशान मत हो,
भारत एक होगा और स्वतंत्रता के लिए लड़ेगा।
मत भयभीत हो!
पुरुष और महिलायें संगठित होंगे और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करेंगे।
इसलिए सो
जाओ।"
इस प्रकार से
कवि बाबा ने अपना काम पांच वर्ष की अवस्था में प्रारम्भ कर दिया था। बाबा ने एक और
गीत स्कूल पर लिखा था। उन्होंने गांव की बहुत सी वास्तविकताओं को खोला था।
प्रधानाचार्य ने वह गीत गाने की स्वीकृति देने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि इस
खुलासे से उनकी और स्कूल की बदनामी होगी। सभी मेहमान उनकी हंसी उड़ायेंगे। "इसलिए
हमें यह गीत नहीं चाहिए।" उन्होंने बताया। वह वहीं निरस्त हो गया।
वहां एक दवा
की दुकान थी। दुकान मालिक ने बाबा से अपनी दुकान के प्रचार के लिए लिखने हेतु कहा।
सार था "आइये, आइये हे लोगों। जानो यह एक औषधि है, जो सर दर्द हो या पेट दर्द अथवा
कब्ज हो, सबमें आराम देती है।" वह औषधि कम दाम पर बेची गई और इस प्रकार सोलह दिन के
अन्दर सारा माल बिक गया। ये थे बाल साई बाबा के पद। उन्होंने अपने अध्यापक
के बारे में भी कहा है, जो उनकी कविताओं को बहुत पसन्द करते थे। उन्होंने
अध्यापक से कहा "मैं राजाओं का राजा हूं।" इस प्रकार बाबा अपने बचपन से ही अति
प्रसिद्ध थे। बाबा के प्रवचन के अन्त में एक बार मैंने कहा - "यही व्यापार आप बचपन
से करते आ रहे हैं, लोगों का मजाक बनाना? इस प्रकार आपने बचपने से ही लोगों का मजाक
बनाना शुरू कर दिया था।" क्या आप जानते हैं, बाबा ने क्या कहा? "बचपन से ही मुझ
में ये सब हैं, लोगों की गलतियों को सुधारने के लिए, मैं लोगों को डांटता रहा हूं,
क्रोधित होकर नहीं बल्कि मात्र उन्हें ठीक करने के लिए" उन्होंने मेरी ओर देखा और
कहा "मैं तुम्हें भी डाटूंगा।" मैंने उनकी ओर देखा और कहा "मैं बहुत कमजोर आदमी
हूं, कृपा कर ऐसा न करें। मैं आपकी डांट नहीं सहन कर सकता। तब उन्होंने कहा "जहां
कहीं भी बीमार व्यक्ति है, दवा देनी ही पड़ती है।" यह ठीक है मैंने कहा, "मैं अपना
स्वास्थ्य बनाये रखूंगा। मुझे दवा की आवश्यकता नहीं है।"
बाबा की
वार्तायें अद्वितीय होती हैं। कुछ रहस्य और गुप्त बातें जो केवल उन्हें ही
मालूम हैं, उनमें प्रकट हो जाती हैं। वह सनातन बालक हैं जबकि हम लड़के
थे, बाद में पिता और पितामह। क्षमा करिये, यदि मैंने आज अत्यन्त गम्भीर विषय से
शुरू किया। आप जानते हैं कि होम्योपैथिक गोलियों के अन्दर औषधि होती है। इसलिए
मैंने भी एक गम्भीर विषय शुरू किया था, लेकिन परिहास और विनोद मेरी गम्भीर वार्ता
को ढके रखते हैं। आध्यात्मिकता और दर्शन के अन्दर औषधियां हैं। हमें सनातन धर्म के
पवित्र ग्रन्थ पढ़ाने के लिए कल कोई नहीं मिलेगा। मैं इन ग्रन्थों की पूजा करता हूं,
किन्तु दुर्भाग्यवश मैं उन्हें समझ नहीं सका। अध्यापक जो इनकी व्याख्या करते थे,
मैं उनकी वार्ता सुनकर सो जाता था। वे परम्परागत रीति से दी जाती थीं और इसलिए वे
फीकी और स्वादहीन होती थीं। लेकिन भगवान अपने प्रवचन में मसाला मिलाते हैं तथा अपने
सभी वक्तव्यों को हमारे दैनिक जीवन की परिस्थितियों के अनुसार उदाहरण देकर पुष्ट
करते हैं। इससे हम अपने को विषय के साथ एकाकार कर लेते हैं। यह वही सन्देश है जो
युगों से दिया गया है, लेकिन उसकी व्याख्या वह नये ढंग से करते हैं। यही
अवतार का उद्देश्य है।
सुई, धागा और
फूल है। हमें धागे से हार बनाना है। किसी को हार बनाना ही चाहिए। बाबा पुष्प
विक्रेता हैं। वह दर्शन के पुष्प चुनते हैं। वह दिव्यता का
धागा तथा शिक्षा की सुई उपयोग करते हैं, सनातन धर्म को सदा नया और सजीव बनाने के
लिए। स्वर्ण, क्या स्वयं अपनी इच्छा से अंगूठी बना लेगा? नहीं। आभूषण बनाने के लिए
एक सुनार की आवश्यकता है। बाबा वह सुनार हैं। स्वर्ण सनातन धर्म है। आभूषण और
मूल्यवान रत्न उनके दिव्य प्रवचन हैं। दीपक, तेल और बत्ती उपलब्ध है। क्या आप
प्रकाश पा लेंगे? उसे प्रकाशित करने के लिए कोई होना चाहिए। भगवान हमारे हृदयों में
दीपक प्रकाशित करते हैं, ज्ञान का प्रकाश, आनन्द का प्रकाश। इसलिए, अवतार का अर्थ
वह है जो सत्य को सम्भव, आनन्ददायक और अर्थपूर्ण बनाता है। ये पुस्तकें हैं किन्तु
इनके लिए एक शिक्षक होना आवश्यक है। बाबा एक विश्व शिक्षक हैं, आपको आध्यात्मिकता
का ककहरा सिखा रहे हैं ताकि आप आत्मा के ग्रन्थ को पढ़ना शुरू कर सकें।
अध्याय-18
साई अवतार की घोषणा
साई अवतार की
घोषणा 20 अक्टूबर, 1940 को की गई थी। आज प्रात: इस पर विचार करने की पूर्ण
प्रासंगिकता है। भगवतगीता में कृष्ण ने वादा किया कि जब-जब धर्म की हानि होगी है,
वे बार-बार आयेंगे। उन्होंने बार-बार जन्म लेने का वादा किया। उन्होंने
वादा किया कि बुरी शक्तियों को निर्मूल करने तथा अच्छी शक्तियों की रक्षा करने,
वह फिर आयेंगे। जीसस ने कहा "वह जिसने मुझे भेजा है, फिर आयेगा" समस्त
धर्म स्वीकार करते हैं कि पैगम्बर और स्वामी मानवता के त्राण के लिए जन्म लेते रहे
हैं।
जिस क्षण बाबा
ने अपनी पुस्तकें फेकीं, वे स्कूली बच्चों द्वारा घेर लिए गये थे। सभी बड़े लोग उनके
निकट आ गये थे। यह
उर्वाकोण्डा में घटित
हुआ था, जहां वे एक पत्थर पर बैठे और गाया "मानस भजरे गुरु चरणम्" गुरु ईश्वर के
चरण कमलों की प्रार्थना करो, प्रार्थना करने से गुरु इस विशाल सागर, पारिवारिक जीवन
के इस संसार को पार करने में आपकी सहायता करेंगे। अपने गुरु की प्रार्थना प्रत्येक
बृहस्पतिवार करो।
यही समय था जब
कोई उनका फोटो लेने आया। उन्होंने कहा "ठीक है मेरा फोटो लो।" लेकिन क्या
फोटोग्राफर को फोटो मिल पायी? सत्य साई बाबा की फोटो के स्थान पर शिरडी साई बाबा की
मूर्ति प्रकट हुई। कोई फूल ले आया। उन्होंने उन्हें जमीन पर फेंक दिया, फूलों ने
"साई बाबा" के नाम का रूप ले लिया। उस समय वहां किसी ने साई बाबा का नाम नहीं सुना
था। इस समाचार को सुनकर उनके भाई आये, उन्होंने कहा- "मैं तुम्हें यहां नहीं छोड़
सकता, मुझे तुमको अपने माता-पिता को सौंपना है।"
भगवान के
निकटतम दो सहपाठी थे, जो उनके साथ दोनों ओर बैठते थे। उन्होंने कहा "हम अब और पढ़ना
नहीं चाहते, जब तुम वहां नहीं हो, तो वह स्कूल भी नहीं है। उनमें से एक सहपाठी पागल
हो गया और अन्तिम स्वांस तक बाबा का नाम लेता हुआ मर गया। दूसरा सहपाठी चलता रहा और
चलता रहा, कुएं में गिर गया और आत्महत्या कर ली। प्रधानाध्यापक ने त्याग पत्र दे
दिये। उन्होंने कहा बिना बाबा के वह प्रधानाध्यापक का कार्य नहीं कर सकते। दो अन्य
अध्यापकों ने भी त्याग पत्र दे दिया। जब स्वामी ने स्कूल छोड़ दिया, एक लड़के को
प्रार्थना का नेतृत्व करने हेतु कहा गया। जब बाबा वहां थे, वह प्रतिदिन प्रार्थना
का नेतृत्व करते थे। बाबा बहुत छोटे थे। कुछ सीढ़ियां बनायी गई थीं और वे स्टेज पर
पहुंचने के लिए उन पर चढ़ा करते थे। वे अध्यापकों सहित सभी बच्चों को प्रार्थना
करवाते थे। बाबा ने जिस दिन स्कूल छोड़ा एक मुस्लिम लड़के से प्रार्थना करवाने को कहा
गया। यह छोटा लड़का सीढ़ियों पर चढ़ गया और मंच के केन्द्र में खड़ा हो गया। प्रार्थना
शुरू कराने के स्थान पर वह रोने लगा, वह बाबा की याद कर रहा था। सभी बच्चे और
अध्यापक भी रोने लगे। उस दिन वहां केवल मौन प्रार्थना हुई। कितना गहरा प्रेम था
उनमें उनके लिए।"
बाबा को पर्ती
जाने के लिए आमन्त्रित किया गया। उस समय एक म्युनिसिपल कमिश्नर उनसे मिलने आये थे।
उन्होंने कहा, "हम लोग हम्पी चलें, जहां एक अति प्रसिद्ध मंदिर है" उनका
परिवार हम्पी के लिए चला, बाबा भी साथ गये। बाबा मंदिर के बाहर बैठे थे, जबकि अन्य
सभी लोग मंदिर के अन्दर थे। मंदिर के पवित्र गर्भ में, यह क्या? मूर्ति नहीं थी।
म्युनिसिपल कमिश्नर तथा अन्य सभी आश्चर्यचकित थे कि वहां कोई मूर्ति ही नहीं थी।
फिर उन्होंने वहां बाबा को बैठे देखा। वे समझे कि बाबा अन्दर आ गये हो सकते हैं।
इसलिए वे सब बाहर आ गये, लेकिन वहां भी बाबा को बैठे देखा। वे वापस गये और वहां
बाबा को फिर देखा। उन्होंने सोचा वह एक चमत्कार था और वे अपनी आंखों पर विश्वास न
कर सके। इसके बाद वे उन पर विश्वास करने लगे।
बाबा सदा सिर
झुका कर चलते थे। उन्होंने कभी किसी स्त्री के चेहरे पर दृष्टि नहीं डाली। जब कभी
किसी ने पूछा कि क्या वे शर्माते हैं। वे कहा करते, "नहीं, मैं शर्माता नहीं हूं,
जब मैं चल रहा हूं, मुझे सड़क देखना चाहिए, लोग नहीं। प्रत्येक व्यक्ति को देखना
आवश्यक नहीं है।"
उसी वर्ष 20
मई को एक अन्य घटना घटी। एक बिच्छू ने उन्हें काट लिया। वह अचेत हो गये। जब वे
लोगों की प्रार्थनाओं का उत्तर देने लगे और स्वयं से अन्दर बातें करने लगे। उन्हें
एक पागल व्यक्ति के रूप में मान लिया गया। एक काले जादू के जानकार ओझा ने उनका
उपचार किया? उनके परिवार ने समझा बाबा पागल हो गये। ओझा ने उनका सिर उस्तुरे से
मूंड दिया और एक बड़े चाकू से चीरे का निशान बनाया, अपने लम्बे नाखूनों से उसने खाल
हटाई। बाबा के खून बुरी तरह बह रहा था। ओझा ने फिर घाव पर नींबू का रस निचोड़ दिया।
उससे और अधिक जलन हुई, लेकिन बाबा मुस्कराते और मुस्कराते ही रहे। इससे ओझा और अधिक
क्रोधित हो गया। उसने बल दिया कि उसी रात्रि बाबा का और उपचार होना है। बारह बजे
मध्य रात्रि ओझा दो गरम लाल लोहे की छड़ लाया और बाबा की पीठ पर छाप दिया। फिर भी
बाबा मुस्कराते रहे थे। उन्हें वापस पुट्टपर्ती ले जाया गया। उनके माता-पिता बहुत
रोये। हर व्यक्ति रोया। उनके अभी भी खून बह रहा था, इसे सार्वजनिक रूप से लोगों ने
देखा।
इसी प्रकार
प्रत्येक श्रेष्ठ आत्मा, प्रत्येक अवतार को समाज की चुनौतियों का सामना करना पड़ा
है। ईसा को सलीब पर क्रूसारोपित किया गया, मोहम्मद को मक्का से मदीना भागना पड़ा।
अनेक लोगों ने आदि शंकर को अत्यधिक कष्ट दिये। वास्तव में कहा जाय तो उनमें से कोई
भी पीड़ित नहीं हुआ। उनमें से प्रत्येक ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और उससे
अधिक यश तथा प्रसिद्धि प्राप्त की। स्वर्ण जब आग में रखा जाता है, उसमें चमक बेहतर
हो जाती हे। हीरे में चमक घिसने के बाद आती है। इसी प्रकार, उनमें इन अनुभवों के
बाद सर्वोत्तम निकल कर आया। इस सन्दर्भ में ही अक्टूबर, 20 अन्तर्राष्ट्रीय रूप से
महत्वपूर्ण है। कल बाबा ने कहा कि भारतीय संस्कृति तथा आध्यात्मिकता पर सभी
ग्रीष्मकालीन कक्षायें बिच्छू काटने की घटना के उपलक्ष्य में 20 मई से प्रारम्भ
होंगी। अत: अब हम समझ गये कि मानवता को श्री सत्य साई के रूप में एक अति मूल्यवान
भेंट प्राप्त हुई है।
राम अपने
अवतार के समय सबके द्वारा नहीं पहचाने गये। उनके स्वयं के पिता भी पितृत्व मोह में
भ्रमित थे। जिस क्षण राम ने वन गमन किया, दशरथ, उनके पिता उनका वियोग सहन नहीं कर
सके और वह मर गये। वह एक पिता की पुत्र के प्रति भावना थी। कैकेयी, सौतेली मां,
अपने पुत्र भारत को राजा बनाना तथा राम को वन भेजना चाहती थी। यदि उसने यह भावना
विकसित की होती कि राम ईश्वर हैं, तो उसने इस प्रकार से न महसूस किया होता। उसमें
केवल सौतेली मां की ही भावना थी।
लंका में वे
सब, रावण के पत्नी से ले कर किसी ने राम को ईश्वर के रूप में नहीं पहचाना। रावण
महान विद्वान था। उसके पास छ: एम0एससी0 और चार पी0एच0डी0 थीं। माना जाता है कि उसके
दस सिर थे। सिर ज्ञान के प्रति रूप थे। बाबा कहते हैं, इतने सारे सिर वाला कोई
व्यक्ति नहीं हो सकता। यदि किसी के इतने सारे सिर थे तो वह किस प्रकार लेटता, सोता
या चलता था? यह सब प्रतीक हैं। उसके छ: सिर भौतिक या सांसारिक ज्ञान तथा चार सिर
आध्यात्मिक ज्ञान के प्रतीक थे। राम ने उसके सारे सिर काट दिये, क्योंकि रावण ने
अपने दस सिरों से भी राम की दिव्यता को नहीं पहचाना। उसने वासना को विकसित किया था,
लेकिन प्रेम नहीं। उसकी कमजोरी, वासना ने उसे पूर्णतया नष्ट कर दिया था। इस प्रकार
राम अपने समय में नहीं पहचाने गये थे।
इसी प्रकार,
कृष्ण भी नहीं पहचाने गये, अर्थात वह ईश्वर के रूप में नहीं स्वीकार किये गये। उनके
सभी चाचा लोग उनके घोर विरोधी थे। कंस उनका मामा था, शिशुपाल उनका चाचा था। जरासंध
उनका चाचा था। सभी उनके अति निकट और प्रिय थे, लेकिन उनकी दिव्यता को नहीं
पहचान सके। कौरव अज्ञानी लोग थे और उन्होंने उनकी दिव्यता को कभी स्वीकार
नहीं किया। इस प्रकार कोई भी अवतार समकालीन समाज द्वारा स्वीकार नहीं किया गया? ईसा
सलीब पर निरा अकेले थे, उनके शिष्य उन्हें क्रूसारोपण के दिन छोड़कर भाग गये थे।
शिरडी बाबा का एक शिष्य श्यामा नाम का था। वह रोया और यह कहते हुए रोया "स्वामी मैं
आपको पूर्णतया अनुभव नहीं कर सका। जब तक आप इस शरीर में थे, मैं पूर्णतया लाभ नहीं
उठा सका। शिरडी भगवान अपने समय में सबके द्वारा स्वीकार नहीं किये गये। कुछ ने सोचा
कि वह एक मुस्लिम फकीर थे। कुछ ने समझा कि वह एक पागल व्यक्ति थे। व्यापारियों ने
उन्हें अपने दिये जलाने के लिए तेल देने से मना कर दिया। मंदिर में प्रवेश से
उन्हें रोका गया। शिरडी बाबा तक समकालीन समाज द्वारा स्वीकार नहीं किये गये।"
रामकृष्ण
परमहंस जीवन की अन्तिम अवस्था में गले के कैंसर से पीड़ित हुए, वे कुछ खा या पी नहीं
सकते थे। विवेकानन्द उनके निकटतम शिष्य थे। उन्होंने प्रश्न किया उन्हें इतना अधिक
पीड़ित क्यों होना चाहिए और आश्चर्यचकित थे, क्यों, यदि वह वास्तव में ईश्वर हैं, वह
स्वयं अपने को उपचारित नहीं कर सके। तुरन्त ही रामकृष्ण परमहंस प्रकाश और तेज के
प्रभामण्डल में उठ बैठे और कहा "विवेकानन्द तुम गलती पर हो। त्रेता युग के राम और
द्वापर युग के कृष्ण ठीक तुम्हारे सामने हैं, क्या तुम यह जानते हो?" विवेकानन्द
चकरा गये। वह तक पूर्णतया नहीं समझ सके। कृष्ण द्वारा शरीर छोड़ने के बाद अर्जुन
चीखा "हे भगवान! मैंने कभी नहीं सोचा था मैं इस प्रकार का हो जाऊंगा।" अर्जुन उस
समय का महान सेनानी था उसके पास सर्वोच्च प्रकार के शस्त्र थे जो कहीं भी
सफलतापूर्वक चलाये जा सकते थे। समाज द्वारा उसे चौदह
उपाधियां उसकी विजयों
तथा यश के लिए दी गई थीं। कोई उसके सामने ठहर नहीं सकता था। अपना शरीर छोड़ते समय,
कृष्ण ने अर्जुन से कहा - "देखो मैं जा रहा हूं, कुछ महिलायें यहां हैं। उन्हें
किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर ले जाना।" ऐसा कहकर कृष्ण ने अपना शरीर त्याग दिया।
अर्जुन रो रहा था और जब वह महिलाओं को अन्य स्थान पर ले जा रहा था। उस पर गांव के
लड़कों ने आक्रमण कर दिया। उन्होंने उसे पीटा। उसने लड़ना चाहा, किन्तु वह लड़ न सका।
वह अपने साहस और वीरता के लिए जाना जाता था, एकाएक बिल्कुल कमजोर हो गया। वह
पूर्णतया निस्सहाय था। तब वह समझा। "हे ईश्वर! मैं सेनानी के रूप में शक्तिशाली था,
अपने धनुष ज्ञान के कारण नहीं। हे स्वामी! वह आपका मेरे साथ सदा उपस्थित रहने के
कारण था। हे स्वामी, जब आप मेरे साथ थे मैं हीरो था। अब मैं जीरो हूं।" अर्जुन तक
भ्रमित था। कोई भी सन्त, कोई भी अवतार उस समय अपने समकालीनों द्वारा नहीं पहचाना
गया। इसके अतिरिक्त राम की पूजा केवल हिन्दुओं द्वारा की गई जो एक छोटे से क्षेत्र
तक सीमित था। कृष्ण को ईश्वर के रूप में जिन लोगों द्वारा माना गया, वे उस क्षेत्र
तक सीमित थे।
आइये हम देखें
कि आज हम कहां हैं। हम भगवान श्री सत्य साई बाबा की पृष्ठभूमि तथा स्थिति के
सम्बन्ध में विचार करें। वे इस शरीर में ही सम्पूर्ण संसार द्वारा ईश्वर के अवतार
मान लिए गये हैं। किसी भी देश का नाम लें, उसके और वहां के भक्त यहां हैं। किसी
पेशे का नाम लें, वे पेशेवर यहां हैं। हर आयु वर्ग और पेशे के लोग, शिक्षित,
अशिक्षित, नौकरी में या बेरोजगार, मुस्लिम, ईसाई, पुरुष और महिलायें सभी यहां
अधिकतम संख्या में हैं। यह भारतीय इतिहास में एक अविश्वसनीय घटना है। क्या बाबा एक
अलग धर्म की शिक्षा दे रहे हैं? किसके प्रतिरूप हैं वह? यदि कोई आपसे पूछता है कि
आप किस धर्म को मानते हैं, आपको कहना चाहिए "प्रेम के धर्म को।" भक्त के रूप में
हमें अपने स्वयं के पूर्व धर्म के आधार पर विभाजित नहीं होना चाहिए, क्योंकि सभी
धर्मों का सार प्रेम है। यह भगवान, हमसे प्रेम को व्यवहार में लाना चाहते हैं।
दिव्यता तक पहुंचने का और क्या मार्ग है। भगवान के अनुसार क्या हम चौबीसों घंटे
प्रार्थना करें? असम्भव। क्या हम प्रात: दो घण्टे प्रार्थना करें? क्या हम ध्यान
करें? हमारे मन एकाग्रता के लिए स्वस्थ नहीं हैं। इसलिए ईश्वर तक पहुंचने के लिए
क्या उपाय है? उन्होंने ईश्वर तक पहुंचने के लिए केवल एक मार्ग सेवा का
मार्ग दिया है। उन्होंने प्रेम का धर्म दिया है। उन्होंने हमें सेवा
का पथ दिखाया है। भगवान ने इन दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं को स्वयं अपने ऊपर लिया है।
प्रत्येक अवतार के पास एक योजना थी।
राम के समय दो
बातें महत्वपूर्ण थीं। एक था सत्य और दूसरा सदाचरण या धर्म। इसलिए राम का कार्य इन
दो की स्थापना करना था। कृष्ण के समय में, दो योजनायें थीं। एक थी शान्ति और दूसरा
था प्रेम।
आज हमारे
सामने ये चारों हैं। बाबा के अवतार की समस्या चार गुणा महान है। अर्जुन ने कृष्ण के
आगे घुटने टेककर चुपचाप और धैर्यपूर्वक सुना। बुद्ध भी उनके शिष्यों द्वारा मौन हो
सुने गये। आज हम सुनते नहीं। बाबा द्वारा शिक्षा देने के पूर्व ही हम प्रश्न करते
हैं। हम में अधैर्य है और संदेहों से हम भरे हैं। हम कपटी हैं। हम में अनुशासन नहीं
है। ऐसे लोगों को शिक्षा देने वह अवतरित हुए हैं। अर्जुन को शिक्षा दे पाना
बहुत आसान था। वह बुद्धिमान था। आज, हम शारीरिक रूप से कमजोर, मानसिक रूप से चंचल
और बौद्धिक रूप से निस्तेज हैं। अत: यह बाबा की समस्या है।
उन दिनों एक
बार उन्होंने विश्वास कर लिया तो अन्त तक विश्वास करते थे। लेकिन आज हम सोमवार को
विश्वास करते हैं और मंगलवार को अविश्वास। हम बुधवार को दृढ़ विश्वास प्रकट करते
हैं। बृहस्पतिवार को वह आधा हो जाता है और शुक्रवार को अविश्वास हो जाता है। हम
शनिवार को नास्तिक या विश्वासहीन हो जाते हैं और रविवार को अवकाश का आनन्द लेते
हैं। जब हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर मिलता है, जब हमारे चारों ओर, हमारे हित में
होता है और ईश्वर हम से बात करता है जब भी हम चाहते हैं, वह हमारे पत्र लेता
है, वह हमें साक्षात्कार देता है, वह हमारे स्वप्नों में आता है और
जो भी हम चाहते हैं देता है, जब वह मेरी ओर देखता है और केवल मुझसे बात करता
है, दूसरों से नहीं और जब वह मेरी प्रार्थनाएं स्वीकार करता है और दूसरों की
नहीं, हम भक्ति में अधिक से अधिक दृढ़ होते जाते हैं। जब हमारी प्रार्थनाओं के उत्तर
नहीं मिलते, जब हम परीक्षणों, समस्याओं और कठिनाइयों से गुजरते हैं। जब सब कुछ
नकारात्मकता में परिवर्तित हो जाता है और वह हमारी ओर या हमारे लिखे पत्रों
की ओर देखते तक नहीं। जब वह हमारी ओर ध्यान तक नहीं देते जैसे कि हम
अस्तित्व में ही न हों, और अपना सिर हमारी ओर घुमाते तक नहीं। भले ही हम उनकी ओर
देखते हों, तब हम प्रश्न करने लगते हैं। क्या वह ईश्वर है या धोखेबाज? इस
प्रकार के लोग हैं, जिनके साथ उन्हें कार्य करना है।
समस्या इससे
अधिक कठिन है। लोगों को समझा पाना बहुत कठिन है। उन दिनों लोगों की सीमित इच्छायें
थीं। जब इच्छाओं की पूर्ति हो गई वे सम्पूर्ण जीवन समर्पित रहते थे। और आज यदि बाबा
पूछते हैं, "तुम क्या चाहते हो" मैं कहता हूं, "मुझे आपको बताने के लिए समय दीजिए
क्योंकि वे मात्र एक या दो वस्तुएं नहीं हैं। हम में इच्छाओं का ढेर है। मन इच्छाओं
से भरा हुआ है। हमारी भक्ति, इन इच्छाओं की पूर्ति से जुड़ी हुई है। हमें उनकी
ओर देखने में अधैर्य है क्योंकि हम उन्हें अपने पत्र देने हेतु व्यग्र होते
हैं। हम चिन्तित होते हैं कि हमें साक्षात्कार मिल पायेगा या नहीं। हम चिन्तित हैं
कि वह हमारी ओर देखेंगे या नहीं। उनके सामने होने पर भी हम अपने बारे में
सोचते हैं, उनको नहीं। हम किस प्रकार से प्रसन्न, सन्तुष्ट, आनन्द से
परिपूर्ण, साधन सम्पन्न, मस्त होने की आशा करते हैं। इसलिए बहुत से लोगों के चेहरे
लम्बे हो जाते हैं, जिन्हें हम कह पड़ते हैं, "शैक्सपियर चेहरे" बाबा उन्हें "कैस्टर
आयल चेहरे" कहते हैं। निराशा हमारे चेहरों को लम्बा और बदसूरत बना देती है। ऐसे
भक्त हैं उनके पास।
सत्य साई के
अवतार के इस दिन 20 अक्टूबर को सत्य साई बाबा के भक्तों के रूप में, आइये हम अपने
जीवन की गुणात्मकता को बढ़ायें। हम अपने पूर्ण व्यक्तित्व को विकसित करें। आइये, हम
जाने, क्यों यह शरीर हमें दिया गया है। इसलिए नहीं दिया कि हम आठ डॉलर में विश्व
भ्रमण कर लें। शरीर मानवता की सेवा के लिए दिया गया है। आइये हम, मन की सही
उपयोगिता को जाने, क्योंकि वह विचारों को बार-बार लेने के लिए नहीं है। इसी मन के
दो गुण हैं, कोई कार्य कई बार दुहराना और रोकना। आप में से अधिकतम लोगों ने अनुभव
किया है कि जब आप भजनों में जाने लगते हैं, मन भजनों में बार-बार जाना चाहता है। जब
आप रात्रि क्लबों में जाना शुरू करते हैं, मन वहां बार-बार जाना चाहता है। जब आप मन
को देना शुरू करते हैं, वह क्या चाहता है, तब वह चाहता है कि उसे निरन्तरता के साथ
दिया जाय। जब आप संग्रह करना शुरू करते हैं मन पूर्णतया रोककर रखना चाहता है। आपको
मन अनुशासित करना पड़ेगा। "हे मन मत नष्ट करो, अपने को और मुझे नष्ट मत होने दो। तुम
अपने को नष्ट कर रहे हो क्योंकि तुम पागल हो जाते हो। तुम मुझे नष्ट कर रहे हो
क्योंकि तुम मुझे पशु बना रहे हो। मैं पशु नहीं हूं। मैं मानव हूं" हे मन इस प्रकार
के विचारों को मत लाओ। हे मन, मुझे ईश्वर के चरण कमलों में चिन्तन करने दो। हे मन,
अपने को संसार से वापस करो। हे मन, अपने को ईश्वर की ओर मोड़ो।" यह प्रार्थना हमारी
इस पवित्र दिन होनी चाहिए।
आइये हम अपनी
बुद्धि से प्रार्थना करें। "हे बुद्धि, आप धनार्जन में अति चतुर हैं। हे बुद्धि, आप
अपनी त्रुटियों को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने में अति बुद्धिमान हैं। हे बुद्धि, आपकी
बुद्धिमत्ता पूर्णतया स्वार्थी है। अपनी तेजस्विता से हमें देखने दीजिए कि क्या
स्थायी है और क्या अस्थायी। हे बुद्धि, मुझे ईश्वर और संसार में अन्तर जानने दें।
हे बुद्धि, हमें जानने दें कि क्या अच्छा है और क्या बुरा क्योंकि आप आत्मा के निकट
रहते हैं। कृपया मन नहीं आत्मा की प्रकृति को प्रतिबिम्बित करें। बुद्धि, आप स्वामी
हैं। ईश्वर करे आप मन और इन्द्रियों के गुलाम न बनें। वे आपकी सेवा में रहें।" यह
हमारी प्रार्थना होनी चाहिए। अवतार की घोषणा के इस पर्व पर हमें उनकी महिमा का गान
निरन्तर तथा उच्च ध्वनि से करना चाहिए।
एक सरल सा
उदाहरण - पेड़ पर कौवे हैं। यदि आप उन्हें भगाना चाहते हैं, आपको ताली बजाना और
चिल्लाना चाहिए। इन्द्रियां चिड़ियां हैं जो शरीर रूपी पेड़ पर बैठी हैं। वे उड़ जाती
हैं,जब आप ताली बजाते हैं और चिल्लाते हैं। यहां जब कोई भगवान का नाम उच्च स्वर में
लेता है, जो नाम स्मरण का गायन है और जैसे ही वह ढोलक के ताल में ताली बजाता है, वे
कहां जाती हैं? वे एक अन्य मौन वृक्ष पर बैठ जाती हैं।
आइये हम
प्रार्थना करें कि बाबा हमें उनकी महिमा गाने का साहस तथा दृढ़ विश्वास दें। हमें वह
विश्वास प्रदान करें जो अटल, बाधारहित और अचंचला हो। वह हमें साधना और मानवता की
सेवा में प्रगति करने हेतु सहायता करें।
भगवान
आपको आशीर्वाद दें।
अध्याय
- 19.
अवतार साई बाबा
प्रत्येक
स्थान का अपना आन्तरिक महत्व है। भगवान क्यों भारत, इण्डिया में ही जन्म लेते हैं?
भारत को ही समस्त अवतारों ने जन्म भूमि के रूप में क्यों चुना? उत्तर सरल है। भगवान
ने कहा-"आप ड्राइवर को ट्रेन के इंजन में बैठा पायेंगे, क्योंकि आपको वहां ऊर्जा,
सक्रिय ऊर्जा, जो इंजन से लगे डिब्बों को खींचती है, मिलेगी।" यदि ड्राइवर वहां है
जहां ऊर्जा जेनरेटर तथा मशीनरी है, वह कार्य कर सकता है। इसी प्रकार इंजन भारत है,
ड्राइवर अवतार है, ऊर्जा और उत्पादन करने वाली मशीनरी की तुलना यज्ञों से की जाती
है। शेष डिब्बे विभिन्न देशों के रूप में हैं।
एक अन्य
व्याख्या है - रत का अर्थ है प्रेम। भा का अर्थ है भगवान। भारत का अर्थ उस देश से
है जहां लोग ईश्वर को पूर्ण तन्मयता से प्रेम करते हैं, जहां लोगों ने ईश्वर पर
धारणा, ध्यान किया है, जहां अनेक ग्रन्थों जैसे वेदों, उपनिषदों, पुराणों की रचना
की गई है। इस सबसे स्पष्ट होता है कि इस धरती पर आध्यात्मिकता की चाह है। इस प्रकार
यही कारण है, क्यों बाबा ने इसे अपनी जन्मभूमि के लिए चुना। भारत में तीन अक्षर है
भा+र+त। ये तीनों मिल जाते हैं, जब हम भजन भाव, राग और ताल से गाते हैं। प्रत्येक
भजन में राग, भाव व ताल है। ये तीनों जब पूर्ण समन्वय में होते हैं, एक सुन्दर
वाद्य मण्डल का सृजन होता है। यह साईं सुर संगति (सिम्फोनी) है। इसलिए भारत का अर्थ
है जहां ईश्वर की प्रशंसा पूर्ण भाव, राग और ताल से सुन्दर भजनों के रूप में होती
हो। यही वह कारण है कि भगवान ने भारत को अपना जन्मस्थान चुना है।
पवित्र ग्रथ
भागवतम् के अन्त में एक अध्याय है जो भगवान के जन्म से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण
स्थानों को विस्तार से समझने में हमारी सहायता करता है। अध्याय "पूरांजनोपाख्यानम्"
कहलाता हे।
अध्याय का सार
है पुरा - शरीर, जिसकी राज्य से तुलना की गई। राजा की तुलना व्यक्तिगत आत्मा,
पुरंजना से की गई है। यह राजा, पुरंजना अपना राज्य, पुरा समय गुजरने के साथ खो देता
है। इसी प्रकार राजा शरीर, पुरा छोड़ मृत हो जाता है। इसलिए पुरंजना व्यक्तिगत
आत्मा, राजा, राज्य करने वाला यह शरीर पुरा, मृत्यु के समय यह शरीर, राज्य छोड़कर
चला जाता है।
यह हमें अन्य
सभी विवरण जानने में सहायक होगा। अब तक आप समझ गये होंगे कि पुरा का अर्थ शरीर है।
एक पौधा, पशु या मानव मात्र एक उपाधि है, जो अन्त:वासी द्वारा ओढ़ा हुआ है। एक आत्मा
है, जीवात्मा, सम्पूर्ण जैविक संसार का आधार। एक अनुमान के अनुसार चौरासी लाख
जातियां इस जैविक संसार में हैं। अनगिनत जीव, पौधे और पशु हैं। प्रत्येक जीव और
जातियों में एक आत्मा, एक जीवात्मा निहित है, जिसके बिना उसका अस्तित्व नहीं हो
सकता। इसलिए "अनन्त" - अर्थ है जिसका अन्त नहीं। पुरा का अर्थ है शरीर, समस्त अनन्त
संख्या के शरीरों में ईश्वर विद्यमान है। शब्द अनन्तपुर से यह अर्थ हम तक पहुंचाया
गया है। यह वह जनपद है जिसमें भगवान ने जन्म लिया। अब आता है दूसरा पक्ष। एक मानव
विशेषकर एक भक्त को दृढ़ विश्वास होना चाहिए। वह विश्वास चंचल नहीं होना चाहिए या जो
समय के किसी बिन्दु पर, बावजूद चुनौतियों, कठिनाइयों, अशान्ति, आपदा होने पर नष्ट न
हो या उस कागज के समान न हो जो हल्की सी हवा में उड़ जाये। विश्वास एक पर्वत या
पहाड़ी के समान होना चाहिए। पहाड़ किसी तूफान में भी नहीं हिलेगा। इस प्रकार प्रत्येक
भक्त में दृढ़ और स्थिर विश्वास पर्वत के समान होना चाहिए। यही आशय पुट्टपर्ती के
अति निकट एक अन्य स्थान का नाम सम्प्रेषित करता है। "पेनू" का अर्थ है "बड़ा"
"कोण्डा" का अर्थ है "पर्वत"। इस तरह पेनूकोण्डा का अर्थ होता है "बड़ा पर्वत"।
इसलिए आपका विश्वास एक बड़े अचल पर्वत के समान, बावजूद जीवन में आंधी और तूफान के
स्थिर और दृढ़ होना चाहिए। इसी कारण पेनूकोण्डा वह एक स्थान है जो भगवान के जन्म
स्थान पुट्टपर्ती के अत्यन्त निकट है।
अब हम भगवान
के जन्म स्थान से सम्बन्धित एक अन्य स्थान पर आते हैं एक साधारण सा उदाहरण यदि आप
बम्बई जाना चाहते हैं, आपको बम्बई जाने वाली ट्रेन पर ही चढ़ना चाहिए, मद्रास जाने
वाली पर नहीं। क्या ऐसा नहीं हैं? इसी प्रकार ईश्वर का दर्शन करने के लिए, आपको
सत्य बोलने की आवश्यकता है। यदि आप ईश्वर की अनुभूति करना चाहते हैं तब आपको सदाचरण
(धर्म) के पथ का अनुसरण करना चाहिए। यदि आप केवल धर्म का अनुसरण करते हैं, आप ईश्वर
की अनुभूति कर सकते हैं जो स्वयं धर्म-स्वरूपा हैं। यही अर्थ है शब्द धर्मावरम का।
धर्मावरम का अर्थ है धर्म का केन्द्र, धर्म का पथ जो आपको ईश्वर के निकट और अधिक
निकट ले जायेगा। अभी तक हमने जाना कि बाबा ने भारत क्यों चुना, बाबा ने अनन्तपुर
क्षेत्र धर्मावरम तथा पेनूकोण्डा के निकट क्यों चुना।
अब हम जन्म
स्थान पुट्टपर्ती के निकट आते हैं। केवल तभी हम जानेंगे, अपने जन्मस्थान के लिए
उन्होंने पुट्टपर्ती ही क्यों चुना। "पुट्टा" का अर्थ है "बांबी"। वास्तव में बांबी
का एक महान इतिहास है। रामायण की रचना ऋषि बाल्मीकि ने की थी। बाल्मीकि बालू के एक
बड़े ढेर बाम्बी में डूब गये थे क्योंकि उन्होंने कई सौ वषों का कठिन तप किया था।
इसलिए उनका नाम बाल्मीकि अर्थात बाम्बी पड़ गया। उनका पूर्व नाम रत्नाकर था। रत्नाकर
पूर्व में एक डाकू का जीवन व्यतीत करता था, लेकिन ऋषि नारद के मार्गदर्शन और अमूल्य
सुझावों के द्वारा उनका जीवन परिवर्तित हुआ। नारद ने उन्हें महान तप करने का सुझाव
दिया। इस प्रकार बगैर खाये-पिये, उन्होंने कठिन तप किया और उनका पूरा शरीर बाम्बी
द्वारा आच्छादित हो गया। इस प्रकार उन्होंने नाम बाल्मीकि (बाम्बी) पाया। यह एक कथा
है जो पुट्टा, बाम्बी से जुड़ी हुई है। दूसरी कथा है - भगवान शिव के गले में सर्पों
की माला है। सभी सर्प बाम्बी में रहते हैं। इस प्रकार यह दूसरी कथा है जो बाम्बी से
जुड़ी है।
भगवान
सुब्रमण्यम की एक अन्य कथा - सुब्रमण्यम भी इस बाम्बी या पुट्टा से सम्बन्धित हैं।
सुब्रमण्यम पुट्टा - बाम्बी में रहते हैं जो रहने के लिए एक पवित्र स्थान है।
चौथी कहानी है
भगवान वेन्कटेश्वर की। भगवान वेंकटेश्वर इस पुट्टा (बाम्बी) के अन्दर बहुत काल तक
एक गाय के थन से दूध पीकर रहे। यह पुट्टा या बाम्बी का सम्बन्ध इन चारों कथाओं से
है और यही कारण है, क्यों भगवान ने अपनी पृष्ठभूमि नहीं छोड़ी है, उन्होंने अपनी
पसन्द या इस पुट्टा बाम्बी का स्वाद नहीं त्यागा है। इसलिए पुट्टा के संस्मरण में
जिससे वह भूतकाल से सम्बन्धित रहे, उन्होंने इस पुट्टपर्ती - बिम्बयों की भूमि को
चुना है। यह पुट्टपर्ती एक महत्वपूर्ण स्थान है जिसकी एक आन्तरिक विशेषता भी है।
मानव मन अति
विलक्षण, विचित्र और रहस्यमय है। जब प्रशंसित होता है वह अहं में फूल जाता है। जब
आलोचित होता है, वह निराश और कुण्ठित हो जाता है। मानव मन सदा उछल-कूद करता रहता
है। यह मन है जो नर्क को स्वर्ग बनाता है और स्वर्ग को नर्क बनाता है। यही बन्धन
तथा मोक्ष के लिए भी उत्तरदायी है। इसलिए मन ही सब बातों के लिए कुंजी है बन्धन हो
या मुक्ति, उल्लास हो अथवा निराशा। अत: चित्र का अर्थ है विलक्षण, चित्रावती का
अर्थ है मन की ये सब विलक्षणतायें, तरंगे, झकपन। इसके अतिरिक्त चित्रा का अर्थ है
अत्यन्त विलक्षण। अपने द्वारा किये गये सभी कार्य भले ही हम दूसरों को न बतायें,
लेकिन हमारा अन्त:करण विचित्र ढंग से हमारे सभी किये गये कार्यों को अंकित करता है।
इसलिए चित्रावती नदी दो अर्थों में विशिष्ट है - मन और अन्त:करण। मन विचित्र है
क्योंकि वह द्वन्द का प्रतिनिधित्व करता है। अन्त:करण, चित्रा विशिष्ट हो जाती है
क्योंकि वह अनजाने में हमारी समस्त क्रियाओं की साक्षी है। यह चित्रावती है।
अब अगला
प्रशान्ति निलयम। आपने ध्यान दिया होगा कि चिड़ियां विस्तृत आकाश में उड़ती हैं।
लेकिन कभी-कभी ये चिड़ियां अन्त में किसी पेड़ की शाखा पर आराम करती हैं। वे दिन में
अत्यन्त थक कर अपने घोंसले में आराम करती हैं। इसी प्रकार आदमी अपनी सांसारिक,
शारीरिक, पारिवारिक मांगों और आवश्यकताओं हेतु कार्य करते हुए अत्यधिक थक जाता है।
उसे आराम की आवश्यकता होती है। इसीलिए नाम है प्रशान्ति "शान्ति" आराम है, "प्र" का
अर्थ है "दैविक" अस्तु प्रशान्ति का अर्थ है सर्वोच्च दैविक विश्राम, क्योंकि
सामान्य विश्राम कोई भी शराब या अल्कोहल की चुस्की लगाकर पा सकता है। लेकिन यहां
सर्वोच्च विश्राम, प्रशान्ति है जो केवल ईश्वर के साथ ही सम्भव है । यह केन्द्र,
प्रशान्ति निलयम, सर्वोच्च शान्ति का केन्द्र। यहां शान्ति का आवास है। इसलिए भगवान
ने प्रशान्ति निलयम को अपने केन्द्र के रूप में चुना है।
उनका नाम साई
बाबा है। "बाबा" का अर्थ होता है "पिता", "सा" का अर्थ है "दिव्य", "आई" का अर्थ है
"मां"। इस प्रकार साई बाबा का अर्थ है "दिव्य माता और पिता"। मां की तरह वह
हमें कहानियां सुनाते हैं तथा अपने प्रेम के द्वारा हमारा पोषण करते हैं। पिता के
समान वह हमें मार्गदर्शन तथा आदेश देते हैं। वह कोई साधारण माता-पिता
नहीं हैं बल्कि दिव्य माता-पिता हैं। शारीरिक माता-पिता अपनी सीमित जानकारी तथा
तरीके से चीजें कर सकते हैं। लेकिन बाबा दिव्य पिता है असीमित तथा नि:स्वार्थ। अत:
"स" + "आई" साई बाबा के बराबर है। इसलिए साई बाबा, साम्ब शिवा के समान हैं। सा+शिवा
बराबर है शाम्ब शिवा के। सा-दिव्य है, अम्बा - माता-पिता है। साम्ब शिवा, साई बाबा
के समान हैं। अत: प्रत्येक स्थान और शब्द में उसकी अपनी आन्तरिक विशेषता है जिसे
यहां भली प्रकार प्रेषित किया गया है। साई, जिसको पहले ही स्पष्ट किया गया है, स,
अ, ई भी साई के अर्थ में है और ई, व्यक्ति के लिए यहां प्रयुक्त है, अत: स, आ, ई,
का अर्थ है साई बाबा और मैं एक हैं - "तत् त्वम् असि" अर्थात् "वह और तुम एक हो"।
यदि इस क्रम को पलट दो तो आपको अंग्रेजी भाषा में आई, ए, एस मिलता है। इसका अर्थ आई
(मैं) और साई बाबा एक हैं "अहं ब्रह्मास्मि" ये उपनिषद के महावाक्य हैं। यह समस्त
वेदों का सार है। तत् त्वम् असि और अहम ब्रह्मास्मि वह सार है जो साई बाबा के नाम
द्वारा व्यक्त होता है।
अगला - बाबा -
बी+ए+बी+ए, यह साधारण बी0ए0 नहीं है। यह दुगुना बी0ए0 है।
B. बीइंग के लिए है -
अस्तित्व - सत
A. अवेयरनेस - चित
B. ब्लिस - आनन्द
A. आत्मा
इस प्रकार
बाबा का अर्थ है सत् चित् आनन्द आत्मा। व्यक्तिगत आत्मा सत्, चित्, आनन्द है। हम सब
सोचते हैं कि हम इस पृथ्वी पर स्थायी रूप से हैं। हम प्रतिदिन लोगों को मरते देखते
हैं। हम कहते हैं कि वह व्यक्ति एक दुर्घटना में अथवा चिकित्सा सुविधा की कमी आदि
से मर गया। हम इस सत्य को भूल जाते हैं कि हम भी एक दिन मर जायेंगे। लेकिन यहां
बिन्दु यह है कि प्रत्येक व्यक्ति महसूस करता है कि वह स्थायी है, यद्यपि वह लोगों
को मरता देखता है। इस प्रकार अनजाने में या ज्ञान में अस्तित्व की भावना है।
प्रत्येक व्यक्ति में स्थायित्व की भावना है। आखिरकार प्राकृतिक मृत्यु तक में यह
केवल शरीर है जो मरता है, आत्मा नहीं। आत्मा की मृत्यु नहीं होती। हम इस बिन्दु को
नहीं जानते, लेकिन सभी महसूस करते हैं कि वे स्थायी हैं। इसलिए यह स्थायित्व की
भावना आत्मा से सम्बन्धित है, शरीर से नहीं। यह अस्तित्व, सत है। जो पहला अक्षर बी
का अर्थ देता है।
अब `ए´ चेतना
या चित। बालक, पिता से, यह क्या है, वह क्या है, पूछता है। हम प्रत्येक बात जानना
चाहते हैं। मानव की गवेषणायें और वैज्ञानिक ज्ञान, क्या, कब और कैसे जानने का ही
परिणाम है। जब मैं सो जाता हूं। मैं सब कुछ भूल जाता हूं। अगली सुबह किसी को मुझे
यह बताने की आवश्यकता नहीं होती कि मैं एक मानव हूं। किसी को मुझे मेरा नाम या काम
नहीं बताना है। मैं वह सब जानता हूं, यह बोध है। प्रत्येक व्यक्ति जानता है, वह कौन
है? यह "चित" है। तीसरा है आनन्द। प्रत्येक व्यक्ति निरंतर प्रसन्न रहना चाहता है।
कोई भी दु:खी, निन्दित या दोषी बनकर नहीं रहना चाहता। यद्यपि हम निरंतर प्रसन्न
नहीं रहते हैं, लेकिन अपने सम्पूर्ण जीवन काल में आनन्दित रहने की लालसा रहती है।
वास्तव में अप्रसन्नता के अवसरों से प्रसन्नता के अवसर अधिक संख्या में होते हैं।
यदि कोई एक
दु:खी है, कुछ लोग उससे पूछेंगे - "तुम क्यों दु:खी हो?" कोई भी नहीं पूछता, "तुम
क्यों प्रसन्न हो।" यदि कोई रो रहा है, लोग पूछेंगे "तुम क्यों रो रहे हो?" यदि कोई
नहीं रो रहा है, कोई नहीं पूछेगा।" तुम क्यों नहीं रो रहे हो।" इस प्रकार दु:ख
अप्राकृतिक है, जबकि प्रसन्नता स्वाभाविक है। प्रसन्नता मूल रूप में है, जबकि
अप्रसन्नता आपकी स्वयं की उपज है। आपका जन्म आनन्द में हुआ है। आप आनन्द हैं, लेकिन
अत्यधिक इन्द्रियजन्य पहचान, अत्यधिक सांसारिक इच्छायें और आसक्ति के कारण आप दु:खी
हो जाते हैं, अन्यथा आप आनन्द हैं। उदाहरण के लिए, बहुत से चावल के दानों में से हम
एक या दो पत्थर होने की शिकायत करते हैं। इसी प्रकार अधिकतर हम प्रसन्न रहते हैं और
केवल एक, दो अवसर पर ही दु:खी होने की शिकायत करते हैं। अन्तिम अक्षर "ए" -
"आत्मा" जीवात्मा है। आत्मा, जीवात्मा में उपरोक्त तीनों गुण सत्, चित और आनन्द
हैं। इस प्रकार, साई बाबा मात्र एक नाम नहीं है, जो इस प्रकार से आता है - इसमें
मानवता हेतु गहन अर्थ तथा प्रासंगिकता है।
किसी ने एक
बार बाबा से पूछा - "आप कहां हैं, आप कहां रहते हैं?" बाबा ने उत्तर दिया, "मैं
तुम्हारे हृदय की वेदिका पर रहता हूं।" भगवान अपने को शुद्ध हृदय की राजगद्दी
पर स्थापित करते हैं। इसलिए बाबा हमारे हृदय में रहते हैं, जब तक हम उसे शुद्ध और
पवित्र रखते हैं। अगला प्रश्न जो बाबा से किया गया था "स्वामी, आप करते क्या हैं"
उन्होंने कहा - "मैं अपने भक्तों की देखभाल करता हूं, मैं धर्म पुर्नरुद्धारण
करूंगा, मैं असहाय और त्याज्य लोगों को देखूंगा। वैदिक ज्ञान का मेरे द्वारा पोषण
होगा।" आगे उन्होंने कहा - "मैं प्रत्येक व्यक्ति को आनन्द प्रदान करूंगा। यह मेरी
प्रतिज्ञा है कि वे जो धर्म के पथ से भटक गये हैं उन्हें पुन: धर्म पथ पर
वापस लाऊंगा। यह मेरी प्रतिज्ञा है कि गरीबों की पीड़ा को उपशमित(कम) करूंगा। मेरे
प्रति सच्ची भक्ति का अर्थ है कि भक्त को सुख और दु:ख में समानता की भावना रखनी
चाहिए।"
बाबा ने यह भी
कहा कि वह लोगों को परिवर्तित करेंगे। वह बुरे लोगों को नष्ट नहीं
करेंगे। उनके अवतार का उद्देश्य सबको अंतरनिहित दिव्यता की अनुभूति कराना
है। भगवान समस्त धर्मों के संश्लेषण की बात करते हैं किसी एक विशिष्ट धर्म की नहीं।
भगवान का उद्देश्य धर्मों के सम्बन्ध में शिक्षण या पढा़ना नहीं है, बल्कि आचरण में
उसे ढालना है। भगवान का दर्शन किसी भी प्रकार से युगों पुरानी दिव्यता के प्रति
परम्पराओं, कर्मकाण्डों को दोहराना नहीं है। वह एक सेवा है। भगवान दिव्यता के लिए
सेवा के पथ पर बल देते हैं। वह न तो ध्यान है और न ईश्वर के दर्शन को प्रचारित करना
है जो हमारी समझ से परे है। वे उस ईश्वर की बात नहीं करते जो हमारी पहुंच में नहीं
है, जिसे हम सोच या अनुभव नहीं कर सकते। बाबा की अपने सम्बन्ध में परिभाषा है
"ईश्वर प्रेम है, प्रेम ईश्वर है, प्रेम में रहो।" इसलिए यदि प्रेम को एक
व्यक्ति का रूप देना है या प्रेम स्वरूपा हो जो हमारे बीच चलता है, उस अवतार को
"भगवान श्री सत्य साई बाबा" कहा जाता है। भगवान श्री सत्य साई बाबा ईश्वर के अवतार
हैं, जिनके पास और कुछ नहीं, बस प्रेम है।
वह प्रेम
क्यों हैं? वह कहते हैं, यह शेष अन्य गुणों का आधार है। वे प्रेम के बिना
व्यर्थ होंगे। जब प्रेम विकसित हो जाता है, अन्य सारे गुण नि:सन्देह अनुसरण करेंगे।
जहां कहीं प्रेम है, जो कुछ आप बोलेंगे वह सत्य के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा। जब
प्रेम है, चाहे जो आप करें, वहां सदाचरण के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा। तब शान्ति
रहेगी। प्रेम, शान्ति की भावना के रूप में व्यक्त होता है। प्रेम समझदारी के रूप
में अहिंसा है। प्रेम सम्भाषण में सत्य है। प्रेम क्रिया में धर्म है। प्रेम भावना
में शान्ति है और प्रेम समझदारी में अहिंसा है। प्रेम सम्पूर्ण गुण है। इसलिए जहां
कहीं प्रेम है समस्त गुण उत्पन्न हो जाते हैं, प्रेम के अमृत से प्रस्फुटित हो जाते
हैं। इस प्रकार यह एक मात्र प्रेम है जो एक व्यक्ति का दूसरे से सम्बन्ध स्थापित
करता है। यही एक मात्र सम्बन्ध व्यक्ति और ईश्वर के बीच है। प्रेम एक मात्र धागे के
समान बांधने वाला तत्व है जो समस्त पुष्पों को परस्पर जोड़ता है। दूसरा है सत्य साई
बाबा। सत्य। सत्य है। किस प्रकार का सत्य? सत्य क्या है? यहां हमें कुछ विस्तार से
जानना चाहिए। हम अक्सर सोचते हैं विज्ञान का अर्थ सत्य है। इसे हमें कुछ और विस्तार
से जानना चाहिए। हम सोचते हैं कि वैज्ञानिक नियम सत्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।
नहीं, ऐसा नहीं है। वैज्ञानिक नियम बदलते रहते हैं, जो आज सत्य है कल बदल जाता है,
उदाहरण के लिए एक समय कहा गया था कि परमाणु अविभाज्य है। यह एक समय सत्य था। बाद
में सिद्ध हुआ कि वह भाज्य है। सत्य एक है, दो नहीं। वैज्ञानिक सत्य बदलते रहते
हैं। वैज्ञानिक जो सत्य के रूप में आज कहते हैं कल वह गलत हो सकता है। इसलिए
वैज्ञानिक नियम बदलते रहते हैं। विज्ञान तथ्य पर आधारित है, सत्य पर नहीं। तथ्य
सत्य से भिन्न है। तथ्य समय और स्थान पर आधारित है, जबकि सत्य समय और स्थान से परे
है। सत्य सार्वभौमिक है, जबकि तथ्य अपने चारों ओर की स्थितियों आदि पर निर्भर है।
सत्य अपरिवर्तनीय है जबकि तथ्य परिवर्तनीय है। सत्य सनातन है, जबकि तथ्य भौतिक है।
सत्य आत्मा है, जबकि तथ्य शरीर है। सत्य ईश्वर है, जबकि तथ्य एक प्रतिबिम्ब है और
अधिक विस्तार से स्पष्ट करने के लिए मैं आज एक प्रकार की पोशाक पहनता हूं। यह एक
तथ्य है। मैं कल भिन्न प्रकार की पोषाक पहनता हूं। यह तथ्य है। इस प्रकार तथ्य
बदलते हैं, लेकिन "मैं" नहीं। इसलिए सत्य अमर, दिव्य, आध्यात्मिक और स्थायी है जिसे
संस्कृत में "रूथम" कहा जाता है। रूथम सत्य है। भगवान बाबा, सत्य साई बाबा हैं
अर्थात दैविक सत्य है। अनश्वर और सनातन सत्य, सत्य साई बाबा के रूप में अवतरित हुआ
है।
अगला पक्ष है
धर्म। धर्म की अक्सर गलत व्याख्या की गई है। दैनिक भाषा में धर्म को एक दान की
क्रिया या दया, करुणा का कार्य कहा जाता है। बाबा कहते हैं कि धर्म किसी के जन्म के
साथ उसका स्वाभाविक गुण या विशेषता है। आग, जलाने की शक्ति के साथ, लाल रंग की है।
बर्फ, ठण्डी और सफेद है। यह बर्फ का धर्म है। पक्षियों का अपना धर्म है और पशुओं का
अपना है। मानवों का गुण मानवीय धर्म के रूप में है। भगवान ने मानवीय मूल्यों के
पुर्नउद्धार का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया है। मानवीय मूल्यों का कार्यक्रम, सत्य
साई संगठन द्वारा हाथ में लिया गया है, ताकि मानव इसके बाद मानवों के समान व्यवहार
करने लगे।
अब हम अगले
मूल्य शान्ति पर आते हैं। प्रेम, भाव के रूप में शान्ति है। हमें केवल व्यक्ति के
मुख को देखना है, वह शान्ति का अनुभव कर रहा है या नहीं। आज शान्ति क्यों गायब है?
हमारे बोलने में सत्य नहीं है। हमारे कार्य सदाचरण हीन हैं। शान्ति भाव है, जो
तुम्हें मिलेगी, जब तुम्हारे सम्भाषण में सत्य होगा और क्रिया में धर्म। भगवान मानव
रूप में सत्य हैं। जो, कुछ भी वे करते हैं, धर्म है। जो, कुछ भी वे कहते हैं सत्य
है। इसलिए उनका स्वभाव शान्ति है। आज शान्ति के नाम पर हम अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन
करते हैं, जबकि हाथों में अणु बम लिए हुए हैं। इसी कारण शान्ति तार-तार हुई है।
अनेकों स्वामी के पास आते हैं और कहते हैं, "स्वामी मैं शान्ति चाहता हूं, मैं
शान्ति चाहता हूं।" यह तथ्य है कि उनके पास शान्ति नहीं है। वे नहीं समझते कि
शान्ति का अभाव क्यों है? कारण साधारण है। चूंकि सत्य और धर्म नहीं है, इसलिए
शान्ति नहीं है। इसलिए भगवान ने शान्ति का प्रतीक प्रशान्ति - सर्वोच्च शान्ति का
निर्माण किया। कारण यह है कि वे सत्य और धर्म के स्वरूप हैं।
अब हम आगे
अहिंसा पर आते हैं -
हम वास्तव में
इस शब्द के अर्थ नहीं समझते। हम सोचते हैं कि मात्र हत्या करना हिंसा है, नहीं।
भगवान एक भिन्न व्याख्या देते हैं। यदि तुम अपनी किसी क्रिया से किसी को आघात
पहुंचाते हो, वह हिंसा होती है। यदि तुम अपने विचारों से किसी को आघात पहुंचाते हो,
तब भी वह हिंसा है। इस प्रकार आप अपने विचार, शब्द और कार्य के द्वारा हिंसक होते
हैं। भगवान के शब्द कितने शान्ति दायक होते हैं, उनके कार्य प्रेमपूर्ण होते हैं,
इसलिए इन सबके पीछे अहिंसा का भाव होता है। वह किसी को आघात नहीं पहुंचाते,
वह प्रत्येक कार्य, प्रत्येक व्यक्ति को प्रसन्न करने के लिए करते हैं,
इसलिए अहिंसा उनकी स्वांस ही है। इसलिए वह स्वयं शान्ति हैं। अत: यदि
सत्य, धर्म, शान्ति और प्रेम चार खम्भे हैं तो अहिंसा छत है और जीवन मकान है। यह
मानवीय मूल्यों का महल है। आज मानवीय मूल्यों का प्रशिक्षण, बैंक प्रबंधकों,
होटलियरों, उद्योगपतियों और सभी प्रकार के लोगों को दिया जा रहा है ताकि प्रसन्नता
और शान्ति स्थापित हो।
भगवान के दो
महत्वपूर्ण कार्यक्रम हैं।
1. विद्या
2. वैद्य - स्वास्थ्य सुरक्षा।
विद्या
बौद्धिक आवश्यकता की पूर्ति करती है, जबकि वैद्य आपके शरीर की देखभाल करेगा। स्वस्थ
शरीर में स्वस्थ मन रहना अति महत्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता का
पुनरुद्धार करना, साई मिशन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। भगवान प्रत्येक ग्रीष्म कालीन
कक्षाओं द्वारा इन पाठ्यक्रमों का प्रबन्ध करते हैं, जिसमें सम्पूर्ण भारत से
विद्यार्थी भाग लेते हैं। क्या है संस्कृति? बाबा के अनुसार संस्कृति जीने की
पद्धति है। संस्कृति पूर्णता है। उन्होंने कहा, "संस्कृति-विचार, शब्द और कार्य
के बीच समन्वय है।" संस्कृति परिष्करण की प्रक्रिया है। एक पहाड़ के टुकड़े को
छेनी से छीलकर ही एक मूर्ति या बुत का आकार दिया जाता है। छीलने, हथौड़ी मारने और
पॉलिश करने की प्रक्रिया संस्कृति या परिष्करण है। अत: जब मूर्ति परिष्कृत हो जाती
है वह पूजा प्राप्त करती है। जो पत्थर परिष्करण की प्रक्रिया नहीं प्राप्त करता, वह
आदमी के पैरों तले रौंदा जाता है। लेकिन वही पत्थर जब सम्सकृत हो जाता है सभी से
पूजा-अर्चना प्राप्त करता है। इसी प्रकार एक लोहे का टुकड़ा बहुत अधिक धन के योग्य
नहीं होता। जब उसको पॉलिश कर दिया गया और घड़ी का आकार दे दिया जाता है तब उसकी कीमत
सैकड़ों रुपयों में होती है। हीरा प्रारम्भ में एक शीशे का टुकड़ा होता है। आकार
देने, काटने और पॉलिश करने की प्रक्रिया के बाद उसका मूल्य बढ़ जाता है और बहुमूल्य
हो जाता है, इसलिए सम्सकृत की परिभाषा परिष्करण की प्रक्रिया के रूप में करते हैं
जो धीमा और कष्टदायक है। मानव के लिए सम्सकृत होना मानवीय मूल्यों का होना है, जो
अन्तत: दिव्यता में विलीन हो जाता है। इस प्रकार व्यक्ति की दिव्यता के साथ एकता
सम्सकृत होना है। अत: आइये, हम सब भगवान बाबा की शिक्षाओं और उदाहरणों से सीखें और
प्राप्त करें, जो कहते हैं "मेरा जीवन ही मेरा सन्देश है" और संसार को अधिक
शान्तिपूर्ण तथा प्रसन्नता का स्थान बनाने के उनके पवित्र कार्य में उनकी
सहायता करें।
अध्याय
- 20
साईं रूपान्तरण
जब हम भगवान
के पास आते हैं, हम विभिन्न जीवन पद्धतियों, कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक पुरानी
आदतों को साथ लेकर आते हैं। नकारात्मक आदतों को धीरे-धीरे परिवर्तित करना है। यदि
हम उन्हें अत्यधिक शीघ्रता से परिवर्तित करते हैं, वे और खराब हो सकती हैं और हमें
अधिक परिमाण में आसक्त बना सकती हैं। इसलिए हमें अपनी आदतें धीरे-धीरे बदलनी चाहिए।
भगवान बहुत दयालु हैं। वह हमें परिवर्तन के लिए समय देते हैं। वह
आपको दण्ड नहीं देंगे, यदि आप तुरन्त परिवर्तित नहीं होते। भगवान कहते हैं "जो
गुजर गया वह गुजर गया, कम से कम इस दिन से परिवर्तन करो।" कम से कम एक या दो
बातों का अभ्यास करो। कितने सच्चे प्रजातान्त्रिक, वह हैं। वह
तानाशाह नहीं हैं कि आपसे सभी 20 बिन्दुओं को तुरन्त करने के लिए कहें। वह
इतने उदारचरिता, सहानुभूतिक तथा समझ के हैं कि वह तुमसे केवल एक या दो बातों
का अभ्यास कराना चाहते हैं।
यदि एक अच्छे
गुण का अभ्यास हो गया, शेष क्रम से स्वयं आ जायेंगे। इसी प्रकार एक बुरी आदत,
अनेकों अन्य बुराइयों को साथ ले आती है। इसलिए हमें इस अवस्था या दूसरी पर धीरे से
प्रारम्भ करना है। हमें सन्त या ऋषि बनने का लक्ष्य नहीं रखना है। हम मात्र इतना कह
सकें कि हम पहले से कुछ बेहतर हैं। भगवान ने एक बार कहा "मैं भक्तों की खोज में
हूं। मैं खोज में हूं" विश्व की जनसंख्या विशाल है। 110 देशों से भक्त यहां आते
हैं। सभाकक्ष सदा पूर्ण रहता है फिर भी ईश्वर कहता है "मैं एक भक्त की खोज में
हूं।" इसका क्या अर्थ है वह हमारी ओर नहीं देखते हैं? नहीं! इसका एक मात्र अर्थ यह
है कि वह एक ऐसे भक्त की प्रतीक्षा में हैं जो उनकी सभी शिक्षाओं का अभ्यास करेगा।
परिवर्तन इतना
आसान या सरल नहीं है। फिर भी, एक सच्ची स्वीकारोक्ति या मानना कि कुछ मुझमें गलत
है, ही भगवान के हृदय को द्रवित करने के लिए पर्याप्त है। मैं एक उदाहरण आपको देता
हूं। जब कभी हम महसूस करते हैं कि सब ठीक है, भगवान उसका उल्टा सोचते हैं। जब आप
संतुष्ट होते हैं, भगवान कहेंगे - "यह अभी उस स्तर तक नहीं है।" जब आप कहते हैं
"स्वामी मैं ध्यान कर रहा हूं।" वह कहेंगे "नहीं, तुम अपनी पत्नी का चिन्तन
कर रहे हो।" यदि आप कहते हैं "स्वामी", मैं जपकर रहा हूं" वह कहेंगे, "नहीं,
तुम धोबी का चिन्तन कर रहे हो।"यदि आप कहते हैं "स्वामी, मैं भजन कर रहा हूं" वह
कहेंगे "मैं प्रभावित नहीं हूं, मैं तुम्हारी स्थूल आवाज सुन सकने और सहने
में असमर्थ हूं, इसलिए मैं अपने कान ढक लेता हूं।" हमारे उत्तरों की यह
प्रतिक्रिया स्वामी की होती है। इसे दूसरी तरह से प्रयास करें : कहो "स्वामी, मैं
कुछ नहीं कर पा रहा हूं। मुझे बहुत बुरा लग रहा है। मैं अपनी सभी कोशिशों में असफल
रहा। मैं आपकी किसी भी शिक्षा का अभ्यास करने में समर्थ नहीं हूं। मैं अत्यधिक
शर्मिन्दा हूं। मैं एक मूर्ख, गधा हूं।" मेरी बात मानें। तब भगवान कहेंगे "नहीं!
नहीं!" तुम जो कर सकते हो तुम कर रहे हो। अच्छा है। आखिरकार सन्त और ऋषि तक
कमजोरियों से मुक्त नहीं हैं। इसलिए तुम्हारे लिए क्या, निरीह मानव? अच्छे बनो,
अच्छा करो और अच्छा देखो। यही पर्याप्त है।" इसलिए हम कुछ भी अच्छा करने के बाद
सन्तुष्टि या किसी प्रकार का घमण्ड नहीं कर सकते, क्योंकि बाबा पूर्णावतार हैं। हम
उनकी अवस्था में नहीं पहुंच सकते। इसलिए, हमारी गलतियां इंगित की जायें,
इससे बेहतर हमारे लिए यह कहना है कि "हां, मैंने गलती की है।"
लगभग 20 दिन
पूर्व वह विद्यालय सभागार में आये। वहां दीवाल पर दो प्लास्टिक बोर्ड लगे
हैं जिन पर तेलगू पद हैं। मैं जानता था कि उसमें एक या दो त्रुटियां हैं। मैंने उन
गलतियों का सुधार अभी तक नहीं किया था क्योंकि मैंने उस दिन स्वामी की आशा नहीं की
थी। वह वहां चार्ट के सामने खड़े हो गये। हाथ जोड़कर मैंने कहा, "स्वामी उसे मत
पढ़िये, उसमें एक या दो गलतियां हैं" वह बहुत सख्त थे और वहां खड़े रहे। उसे
दो बार पढ़ा। तब वह मुस्कुराये और चले गये। लेकिन मान लीजिए, मैंने कहा होता "स्वामी
मैंने चार्ट पर एक पद लिखा है।" मैं निश्चित रूप से तब उसके लिए परेशानी में पड़ गया
होता। इसलिए आपको भगवान की उपस्थिति में सदा अत्यन्त विनयी होकर रहना चाहिए। भगवान
के सामने सदा सरल रहें। हमें जानना चाहिए कि भगवान अत्यन्त तेजधार वाले रेजर के
समान हैं।
एक सरल सा
उदाहरण - एक सज्जन ने कहा - "स्वामी मैं आपसे हमारे घर आने के लिए सविनय अनुरोध
करता हूं। स्वामी ने गहराई से उनकी आंखों में देखा और कहा "क्या वह तुम्हारा घर
है?" नहीं! नहीं! स्वामी वह आपका घर है। मान लीजिए, आप उन्हें निमन्त्रित नहीं करते
हैं, वह कहेंगे - "मां तक बच्चे को दूध नहीं देती है जब तक बच्चा उसके लिए
रोता नहीं है" तुम्हें पूछना चाहिए था।"
यदि तुम पूछते
हो तो तुम्हें शर्मिन्दा होना पड़ेगा, यदि तुम नहीं पूछते हो तब वह स्वीकृति
नहीं देते। वह भगवान हैं। वह आपको आकार के अनुसार काट देंगे। लेकिन यदि
उन्हें लगता है कि आदमी पहले ही रो रहा है या कि आदमी पहले ही जानता है कि वह
पूर्ण नहीं है तब कृपा कर वह सहनशील हो जायेंगे। हमें स्वामी के सामने एक
बाल बराबर भी अहंकारी नहीं होना चाहिए।
मान लीजिए एक
भक्त पिछले अनेक वर्षों से प्रशान्ति निलयम आता रहा है। हो सकता है, उसने अनेक बार
भ्रमण किया हो। वह मौन और शान्त हो सकता है। बाबा कहेंगे "वह एक पुराना भक्त है, वह
अनेक बार आया है, मैं उसे जानता हूं।" दूसरी ओर यदि आप कहते हैं - "मैं पुराना भक्त
हूं और मैं यहां पन्द्रह वर्षों से आ रहा हूं।" उनकी भाषा भिन्न होगी। वह
कहेंगे - "क्या उपयोगिता है?" तुम इतने वर्षों से आ रहे हो, कोई परिवर्तन तक नहीं
हुआ, शर्म की बात है।"
एक बार किसी
ने कहा - "स्वामी, मैं मात्र ईश्वर के प्रकटीकरण, साक्षात्कार की प्रतीक्षा कर रहा
हूं।" बाबा ने कहा - "तुम मूर्ख हो, ईश्वर किस प्रकार तुम्हारे सामने प्रकट हो सकते
हैं?" ईश्वर तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारे में, तुम्हारे चारों ओर, सर्वत्र हैं।
उनका तुम्हारे सामने प्रकट होना क्या खेल है? ईश्वर तुम में हैं और तुम ईश्वर
हो। वह किस प्रकार तुम्हारे सामने प्रकट हो सकते हैं?"
एक बार एक
अमरीकन दम्पत्ति भगवान के पास आया। वे अपने पालतू कुत्तों के बड़े स्नेही थे।
यू0एस0ए0 में पशुओं के लिए स्कूल, अस्पताल और दुकानें हैं। वे उनके पालतू कुत्तों
को डिप्लोमा डिग्री देते हैं। वहां पशुओं के लिए बहुत अधिक प्रेम है। मैं इसकी
प्रसंशा करता हूं। यह अमरीकन दम्पत्ति अपने साथ अपना कुत्ता भी लाया क्योंकि वे
उससे अत्यधिक स्नेह करते थे। वह सदा उनके साथ रहता था। प्रशान्ति निलयम में, जहां
नियम है, पुरुष एक तरफ और स्त्रियां दूसरी ओर, कुत्ते को नहीं बैठाया जा सकता था।
इसलिए यह दम्पत्ति बाहर एक पेड़ के नीचे अपना कुत्ता अपनी गोद में लिए खड़ा था।
भगवान, जो कार द्वारा उसी समय जा रहे थे, कार रोकी, बाहर आये और उन तक पहुंचे,
दोनों उनके चरणों पर गिरे। भगवान ने दोनों पति और पत्नी को आशीर्वाद दिया। तब पत्नी
ने कहा - भगवान कृपया हमारे पालतू कुत्ते को भी आशीर्वाद दे दें। इस कुत्ते ने इतने
दूर की यात्रा की है तथा समस्त मंदिरों का भ्रमण किया है। "भगवान ने उनकी आंखों में
देखा और कहा" उसने बहुत सारे मंदिरों का भ्रमण किया कोई परिवर्तन नहीं और तुम में
भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ।" यह भगवान है।
वह
अत्यन्त विनोद प्रिय हैं। आमतौर पर जो लोग वेदान्त पर भाषण देते हैं, लम्बे चेहरे,
कैस्टर आयल चेहरे रखते हैं। हमारी विषय में रुचि समाप्त हो जाती है और कुछ तो
वेदान्त को सुनना अपने जीवन के अन्त तक स्थगित कर देते हैं। लेकिन उनके साथ
इस प्रकार का कुछ नहीं है। वह वेदान्त को अत्यन्त सरल और आमोद प्रमोद युक्त
बनायेंगे। इसी कारण भगवान के प्रवचन युवाओं एवं वृद्धों को समान रूप से आकर्षित
करते हैं।
एक दिन वह
लड़कों से बात कर रहे थे। भगवान प्रत्येक का मन पढ़ते हैं। तुरन्त ही वह जान
सकते हैं कि हम क्या सोच रहे हैं। इसलिए वह लड़कों की मनोवृत्ति उस दिन जान
गये। उनमें से कुछ ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली थी और कुछ प्रवक्ताओं के रूप में कार्य
कर रहे थे। वह एक लड़के की ओर मुड़े और कहा तुम्हारी पत्नी कहां हैं? क्या तुम
शादीशुदा नहीं हो?"
उस लड़के ने चौंक कर पूछा
- "पत्नी?"
बाबा ने कहा - "ओ, मैं
देखता हूं, तुमने उसे पहले से ही अपनी जेब में रखा हुआ है।"
एक अन्य दिन स्वामी ने
उसी लड़के से पूछा - "तुम्हारे पास कौन सी डिग्री है?"
लड़के ने उत्तर दिया -
"स्वामी, मेरे पास एम. एससी. की डिग्री है।"
उन्होंने कहा - "तुम
श्रीमती डिग्री को लेने कब जा रहे हो।"
लड़का समझ नहीं पाया,
इसलिए स्वामी ने दुबारा कहा - कब तुम श्रीमती - पत्नी - श्रीमती को लेने जा रहे हो?
एक दिन भगवान
ने कहा "लड़कों! तुम शादी करने के लिए उत्सुक हो, मैं जानता हूं। तुम एक पत्नी चाहते
हो। तुम वाइफ को जीवन के रूप में देखते हो, लेकिन वह बाद में नाइफ हो जाती है। तब,
तुम स्वामी का चिन्तन करोगे, तब तक नहीं। शादी के पूर्व तुम मास्टर हो। शादी के बाद
तुम मिस्टर हो। मास्टर के रूप में शादी के पूर्व तुम दो पैरों पर चलते हो। शादी के
बाद तुम चार पैरों पर चलोगे। तुम और तुम्हारी पत्नी, एक बच्चा पाने के बाद, तुम छ:
पैरों पर चलोगे, एक बिच्छू की भांति। एक अन्य बच्चे के बाद तुम्हारे आठ पैर हो जाते
हैं और धीरे-धीरे शतपदी, कनखजूरा और दस लाख पदों में परिवर्तित हो जाओगे।"
तब मैं हीन
भावना से भर गया था क्योंकि मैंने स्वामी के पास आने के काफी पहले शादी कर ली थी।
"तुम पांच मिनट के लिए प्रसन्न हो सकते हो और 23 घंटे 55 मिनट तुम दु:खी हो सकते
हो। शादी एक मृगतृष्णा है।" मैं बहुत बुरा महसूस कर रहा था, क्योंकि वह प्रत्येक
दिन की बातों का सार था। वहां सब लड़के थे और शादी-शुदा आदमी केवल मैं ही था।
इसलिए एक दिन
उन्होंने कहा - "वाइफ की स्पेलिंग क्या है?" डब्ल्यू.आई.एफ.ई.। वरी इनवाइटेड फॉर
इवर। (सदा के लिए आमन्त्रित चिन्ता)
अत: पत्नी सदा
के लिए आमन्त्रित चिन्ता है। यह (पत्नी) वाइफ जो (चाकू) नाइफ हो जाती है हसबेन्ड
(पति) को झुकने के लिए मजबूर करती है। हसबेण्ड! (पति) को उसके सामने झुकना है।"
मैं यह सब सुन
रहा था। मैंने अन्दर से पुकारा "स्वामी अब और नहीं"। पांचवे दिन मैंने कहा "भगवान
यदि आप मुझे आज्ञा दें, मैं आप से कुछ कहना चाहता हूं। लेकिन कृपया आश्वस्त करें कि
आप क्रोधित नहीं होंगे। मुझे एक साधारण सा सन्देह है। अवतार तक ने अपने माता-पिता
से जन्म लिया हैं। राम, कृष्ण यहां तक बाबा के भी माता-पिता थे। समस्त ऋषिगण,
विश्वामित्र, वशिष्ठ आदि सब गृहस्थ थे। आपके भक्तों में से अधिकतम, महिला भक्त हैं
जो पहले भक्त होती हैं। तब पति विद्रोह करता है। पति और पत्नी के बीच सदा तर्कयुद्ध
होता है क्योंकि पति चाहता है कि पत्नी घर पर रहे, पुट्टपर्ती न जाये। कुछ को छोड़कर
अधिकतर पति इस प्रकार प्रवचन अपनी पत्नी को देते हैं। मैं कोई अपवाद नहीं हूं,
वास्तव में, उन सबसे, जो यहां हैं, अधिक बुरा हूं। मैंने उससे मात्र कहा ही नहीं
बल्कि उसे चेतावनी भी दी। जब मेरी पत्नी ने मुझे यहां लाना चाहा, मैंने कहा "ऐसा
कुछ नहीं करने जा रहा हूं। मैंने कहा कि मेरे पास अवकाश शेष नहीं है। मुझे तीन दिन
के अन्दर वापस होना ही है। इस प्रकार हम में से अधिकतर अपनी पत्नी के कारण यहां आये
हैं।" क्या आप अब भी कहते हैं "पत्नी सदा के लिए आमन्त्रित चिन्ता है?" क्या आप अब
भी कहेंगे वाइफ नाइफ है? मैं सत्य साई संगठन में एक व्यस्त आदमी हूं और जब मैं देर
रात घर लौटता हूं यह एक मात्र मेरी पत्नी है जो घर पर सब कुछ का प्रबन्ध करती है
तथा घर में सास आदि का ध्यान रखती है इसलिए उसने सदा के लिए चिन्ता को आमन्त्रित कर
लिया है। अनेकों उदाहरण हैं जहां पुरुष आये हैं क्योंकि उनकी पत्नियां उन्हें ले
आईं। बाबा ने कहा - "बैठ जाओ, ऊँ शान्ति! शान्ति!" फिर उन्होंने मुझे उठने के लिए
कहा। आप जानते हैं भगवान की कार में आगे जाने का गियर और पीछे जाने का भी गियर है।
उन्होंने अब गियर बदल दिया और उल्टी दिशा में चल दिये।
उन्होंने कहा
- "महिला अधिक महत्वपूर्ण है। ग्रहस्थ अवस्था ब्रह्मचर्य के लिए आधारशिला की अवस्था
है।" ग्रहस्थावस्था एक संन्यासी के लिए आधार शिला की अवस्था है। गृहस्थ की अवस्था
अति श्रेष्ठ और पवित्र है। एक महिला त्याग और सहनशीलता का प्रतीक है। जब पति तनाव
में होता है पत्नी उसके लिए मरने तक तैयार होती है, लेकिन आदमी सड़क का कुत्ता है वह
कभी ध्यान नहीं देता। यदि पति मर जाता है, महिला अपने जीवन को दु:स्वप्न मानती है।
पत्नी मेरे पास रोती आती है "मैं अपने पति के बिना नहीं रह सकती।" वह कहती
है "मेरा जीवन ले लो, मैं बिल्कुल जीना नहीं चाहती। मेरा जीवन भी ले लो। एक महिला
का यह प्रेम है। जब पति, पत्नी को खो देता है, वह मेरे पास आता है, केवल
दूसरी बार शादी के लिए आज्ञा लेने। मैंने इस दिन तक एक भी आदमी को अपनी
पत्नी के लिए रोते हुए नहीं देखा है। महिला में सात अतिरिक्त गुण होते हैं। पुरुष
में केवल तीन गुण होते हैं। महिला में विश्वास होता है।"
"कृष्ण के एक
मित्र कुचेला (सुदामा) थे। कुचेला एक गरीब आदमी थे। उनके नौ बच्चे थे। उनकी पत्नी
ने उनसे कृष्ण के पास जाने और सहायता मांगने के लिए कहा, लेकिन कुचेला शर्मीला था
और सोचता था, कृष्ण एक महान राजा हैं, वह उन्हें पहचानेंगे तक नहीं। इसलिए वह अपनी
पत्नी द्वारा अत्यधिक उत्साहित करने पर ही गये। यह एक महिला का विश्वास उस व्यक्ति
में है जिसे उसने देखा तक नहीं है। जबकि कुचेला कृष्ण का सहपाठी था, उसे विश्वास
नहीं था। महिला का अर्थ है विश्वास, जो पुरुष में नहीं है। कृष्ण ने उन्हें सब कुछ
दिया और उनकी गरीबी दूर हो गई क्योंकि कृष्ण अपने मित्र को कभी नहीं भूले। इस
प्रकार पत्नी में ईश्वर के प्रति विश्वास पति से पहले हुआ, जिसका उनसे प्रत्यक्ष
सम्पर्क था। बगैर एम0बी0ए0 की डिग्री के प्रत्येक महिला एक एम0बी0ए0 है, मास्टर ऑफ
बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन, क्योंकि वह घर का प्रबन्ध करती है। गृह विज्ञान की डिग्री
लिए बिना महिला गृह विज्ञान में मास्टर है। घर का स्तर और गरिमा का अनुमान, महिला
द्वारा घर गृहस्थी के प्रबन्ध पर निर्भर होकर लगाया जा सकता है। केवल महिला पति को
सही पथ, धार्मिक पथ पर चलने के लिए तैयार करती है। इसलिए महिला निश्चित रूप से
पुरुष से बेहतर है। शादी में कुछ भी गलत नहीं है।"
अध्याय-21
दुर्गा-शक्ति की देवी
दशहरा के इस
पर्व में हम तीन देवियों की पूजा करते हैं। एक दुर्गा हैं, दूसरी लक्ष्मी और तीसरी
सरस्वती हैं। इस पर्व में ये तीन देवियां पूजी जाती हैं। यद्यपि देवियों को तीन नाम
दिये गये हैं, लेकिन विशेषतायें एक और समान हैं। देवियों में से प्रत्येक दुर्गा
हैं। दुर्गा का अर्थ शक्ति है। शक्ति सम्पूर्ण जैविक और अजैविक संसार के लिए
महत्वपूर्ण है। कोई संवेदी हो या असंवेदी, लेकिन फिर भी उनके अन्तस में गुप्त रूप
से शक्ति है। जैविक हो या अजैविक, अन्तत: प्रत्येक वस्तु पदार्थ से निर्मित है।
पदार्थ अणु के सूक्ष्म कणों के मिलने से बना है। प्रत्येक अणु-प्रोटॉनों,
न्यूट्रॉनों और इलेक्ट्रॉनों से निर्मित है। ये प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन
स्थिर नहीं हैं। वे विभिन्न चक्र में घूमते हैं। ये अणु, दैविक शक्ति के कारण घूमते
हैं। इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि ऐसा कोई स्थान नहीं जहां दैविक शक्ति न हो। हम
शारीरिक शक्ति, राजनैतिक शक्ति, अधिकारिक शक्ति, सामुदायिक शक्ति, धन की शक्ति को
जानते हैं। ये सब विभिन्न रूप हैं जिनके द्वारा हम सांसारिक शक्ति पाते हैं। ये
सारी शक्तियां स्थूल रूप में हैं।
सूक्ष्म रूप
में दैविक शक्ति है। प्रत्येक व्यक्ति शक्तिशाली बनना चाहता है। शक्ति की
अनुपस्थिति, कमजोरी का चिन्ह है। शक्ति कहां से आती है? बाहर शक्ति का संयन्त्र है
जिससे हम विद्युत पाते हैं। आप नियागरा झरने में देखेंगे, जो विद्युतीय शक्ति देता
है। इस शक्ति का स्रोत क्या है? वह कहां उपलब्ध है? क्या हमारे पास पर्याप्त शक्ति
है? ईश्वर केवल शक्तिशाली ही नहीं है, वह स्वयं शक्ति है। कृपया अन्तर को समझें।
आपको शक्ति मिलती है, आप शक्तिशाली हो जाते हैं या आप शक्ति खो देते हैं, लेकिन
ईश्वर के सम्बन्ध में, वह कहीं से शक्ति नहीं पाता, वह शक्तिशाली नहीं होगा,
क्योंकि वह स्वयं शक्ति का स्रोत है। इसलिए दिव्यता और कुछ नहीं, बल्कि शक्ति का
प्रकटीकरण है या दूसरे शब्दों में जिसे हम ऊर्जा की शक्ति कहते हैं।
वह ऊर्जावान
हैं, सक्रिय हैं। एक ऊर्जावान व्यक्ति गतिमान होता है। उसमें एक नेता के समस्त गुण
होते हैं। इसलिए प्रत्येक कार्य में हमें ऊर्जा या शक्ति की आवश्यकता है। हृदय
धड़कता है, रक्त परिभ्रमण करता है और प्रत्येक कोषाणु की अपनी-अपनी क्रियायें हैं।
यहां तक जब हम सोते हैं, कोषाणु सक्रिय रहते हैं। जब हम सोते हैं हृदय धड़कता है और
रक्त परिभ्रमण करता है। पाचन प्रक्रिया चलती रहती है। मानव शरीर, शारीरिक
गतिविधियों से पूर्ण है। इसलिए बाह्य या आन्तरिक रूप से हमें शक्ति या ऊर्जा की
आवश्यकता है। हमें अपनी ऊर्जा ईश्वर से मिलती है। आप भले ही विटामिन की गोलियां या
अन्य शक्तिदायक गोलियां खरीद सकने में समर्थ हों, लेकिन आपको ऊर्जा नहीं मिल सकती।
जो ऊर्जा आपको इन गोलियों से मिलती है, बहुत दिनों तक नहीं रह सकती। ईश्वर कुछ नहीं
बल्कि आन्तरिक ऊर्जा है।
आइये, भगवान
बाबा के दैनिक नियत कार्यों पर दृष्टि डालें। ऊर्जा की वैज्ञानिक रूप से गणना
कैलोरी के रूप में होती है। इतने कार्य के लिए आपको इतनी कैलोरी की आवश्यकता है।
डॉ0 भगवन्तम नाम के एक वैज्ञानिक थे। उन्होंने बाबा की ऊर्जा की कैलोरी में गणना की
थी। उन्होंने बाबा के दैनिक समय सूची की गणना की। उन्होंने यह भी गणना की कि बाबा
को कितने कैलोरी की आवश्यकता होगी, उतनी मात्रा का कार्य करने में जितना वह एक दिन
में करते हैं। उन्होंने उस खाने से, जो बाबा खाते हैं, ऊर्जा की कैलोरी की गणना की।
परिणाम आश्चर्यजनक था। परीक्षण का परिणाम विस्मित करने वाला था। अन्वेषण रोमांचक
था। वास्तविकता यह है कि बाबा बहुत सूक्ष्म नाश्ता, एक गिलास पानी से प्रारम्भ कर
लेते हैं। वह ग्यारह बजे तक काम करते हैं और ग्यारह बजे वह मध्यान्ह भोजन लेते हैं।
केवल एक छोटा चम्मच दाल, रसम और बहुत थोड़ा चावल। क्या आप गणना कर सकते हैं इसमें
कितनी कम कैलोरी है? वह नाश्ते और मध्यान्ह भोजन के बीच संक्षिप्त समय में सैकड़ों
लोगों से बात करते हैं। वह हजारों पत्र पढ़ते हैं। वह अनगिनत लोगों पर अपनी मुस्कान
देते हैं। क्या मैं कहूं वह चलते हैं या क्या आप कहते हैं वह दौड़ते हैं? हम कहते
हैं कि वह तैरते हैं। वह बार-बार दर्शन देते हैं। वह सक्रिय रूप से विद्यार्थियों
एवं बच्चों के बीच मंदिर के बराम्दे में घूमते हैं। वह व्यक्तिगत रूप से आश्रम
गतिविधियों का सारा प्रबन्ध करते हैं। कितनी कैलोरियों की उन्हें आवश्यकता होनी
चाहिए?
डॉ0 भगवन्तम
ने कहा कि बाबा को खाने से जो वह खाते हैं, कैलोरियां नहीं मिलती क्योंकि वह
शक्तिस्वरूपा हैं। वह शक्ति के मूर्त रूप हैं। वह दो पैरों पर चलने वाले मानव रूप
में शक्ति हैं। मध्यान्ह भोजन के बाद भौतिक रूप से वह थोड़ा आराम कर सकते हैं, जिसके
बाद उनके द्वारा संचालित संस्थानों के प्रशासनिक मसले आ जाते हैं। प्रत्येक बात में
उनकी स्वीकृति की आवश्यकता होती है। उनके द्वारा काम की मात्रा और जिन संस्थानों को
वे संचालित करते हैं, विशाल है। उनका मानदण्ड पूर्णता है और वह कमियों को सहन नहीं
करते। तदुपरान्त वह हजारों पत्रों के मध्य जाते हैं और उसके बाद दर्शन, सैकड़ों से
बात करना। अत: यदि भोजन ऊर्जा देता है, वह बाबा के विषय में पूर्णत: अनावश्यक है।
वह, स्वयं शक्ति हैं, इसलिए उन्हें भोजन से शक्ति लेने की आवश्यकता नहीं।
यह शक्ति
भगवान का दुर्गा पक्ष है। सत्य साई बाबा, दुर्गा हैं। दुर्गा का अर्थ होता है शक्ति
और ऊर्जा। इसलिए इस मौसम में, इस देश में विशेषकर, महिलायें भगवान की पूजा दुर्गा
के रूप में करती हैं। वे उन्हें मां देवी के रूप में देखती हैं। कभी-कभी जब वह
कुर्सी पर बैठते हैं, हमें महसूस होता है जैसे कि वह हमारी माता हैं, कुर्सी पर
बैठी हुई, उनका पुरुषोचित रूप नहीं दिखता। जब हम उनके गुलाबी कोमल पंखुड़ी के समान
चरणों को देखते हैं, हम जानते हैं कि वे केवल दैविक मां के ही हो सकते हैं। उनके
पैर कोमल और मखमल के समान गुलाबी हैं। वे चमेली के फूलों की पंखुड़ियों से भी अधिक
कोमल हैं। कभी-कभी वह अति गहरे रंग में दिखते हैं, लेकिन उनके पैर सदा चमकते हुए
रहते हैं। पैर वजन में हल्के, रंग में चमकदार हैं और वे ब्रह्माण्ड का भार सहन करते
हैं। बाबा के हाथों के बारे में कैसा है? वे सुन्दर और सौम्य हैं। उनकी अंगुलियां
कोमल एवं स्नेहिल हैं। उनकी हथेली मुलायम और सिल्की है।
दूसरे शब्दों
में दुर्गा दिव्यता का एक पक्ष है जो ऊर्जा और शक्ति है और जो भगवान बाबा हैं।
दुर्गा एक अन्य पक्ष के अर्थ में भी हैं। इच्छा-शक्ति के पक्ष का अर्थ है - विल
पावर। अत: दुर्गा का अर्थ इच्छा-शक्ति है। एक दिन किसी ने पूछा - "बाबा", क्या आदमी
के पास इच्छा-शक्ति है?" उन्होंने उत्तर दिया। आदमी में इच्छा-शक्ति नहीं है।"
(मेरा मतलब महिलाओं से भी, क्योंकि यह महिलाओं का महोत्सव है) इस प्रकार किसी मानव
में इच्छा-शक्ति नहीं है। इच्छा-शक्ति ईश्वर के हाथ में है। इच्छा-शक्ति दैविक है।
एक साधारण उदाहरण, जब एक आदमी के बायीं ओर लकवा मार गया, उसके हाथ और पैर सुन्न हो
गये। यदि इस आदमी में इच्छा-शक्ति है तब वह अपने हाथ और पैर उठा सकता है। असम्भव।
इसलिए तुम्हारे पास जो इच्छा-शक्ति है वह शक्तिहीन है।
जो कुछ भी हम
इच्छा करते हैं या चाहते हैं, मन से निकलता है। हमारी योजना और अन्य सब कुछ मानसिक
स्तर पर है। लेकिन उनकी इच्छा बौद्धिक स्तर पर है। मन सोचता है, बुद्धि इच्छा करती
है। मन सोचता है, बुद्धि निर्णय करती है। मन भावुक है। जबकि बुद्धि विवेकजन्य है।
इस तरह इच्छा-शक्ति का सम्बन्ध बुद्धि से है। लेकिन हम पर्याप्त बुद्धिमान हैं,
बुद्धि के पास न जाने के लिए। हम बुद्धि का उपयोग करना पसन्द नहीं करते क्योंकि वह
केवल अच्छी बातें बोलती हैं और भलाई का मार्गदर्शन करती है। हम अपना जीवन केवल
इन्द्रियों और मन की तरंग पर जीते हैं। मन चाहता है, इन्द्रियां काम करती हैं। मन
योजना बनाता है, इन्द्रियां क्रियान्वित करती हैं। इसलिए हम बुद्धि का उपयोग नहीं
करते। यदि हमने उपयोग किया होता, हमने इच्छा देखी होती। इच्छा, बुद्धि की इच्छा और
कुछ नहीं, बल्कि आत्मा का प्रतिबिम्ब है। आत्मा, बुद्धि में प्रतिबिम्बित होती है।
जो कुछ भी बुद्धि निर्णय करती है, आत्मा के दिशा-निर्देश और मार्गदर्शन से आता है।
हम संसार में डूबे हुए हैं। हम पीड़ित होना चाहते हैं तथा सुख और दु:ख के द्वन्द के
माध्यम से गुजरना चाहते हैं। हम दर्द और प्राप्ति की अनुभूति से गुजरना चाहते हैं।
इसलिए हम जानते ही नहीं, क्या है बुद्धि या इच्छा शक्ति।
आइये हम लेते
हैं इच्छा शक्ति देवी दुर्गा का दूसरा पक्ष। बाबा की इच्छा किस प्रकार की है? एक
संस्थान निर्मित होना है। उन्होंने उसकी इच्छा की और वहां एक उच्च शिक्षा का
संस्थान स्थापित हो गया। उन्होंने अस्पताल और सब कुछ की इच्छा की, आप जो यहां आते
हैं, जानते हैं कि वैसा ही हो गया। उनकी इच्छा शक्तिशाली और अबोधगम्य है। दूसरी ओर,
हम यहां होने की योजना बना सकते हैं, लेकिन उनकी इच्छा के बिना हम नहीं कर सकते।
इसलिए दुर्गा का अर्थ होता है ऊर्जा, जो इच्छा शक्ति है। दुर्गा का वाहन क्या है?
एक शेर! यह प्रतीकात्मक और मूर्ति सम्बन्धी है, लेकिन शाब्दिक नहीं है। बाबा कहते
हैं कि वह केवल कवियों, चित्रकारों या किसी सन्त की दृष्टि की उत्पत्ति है। किसी ने
भी दुर्गा का फोटो शेर पर नहीं लिया है। शेर पशुजन्य गुणों का अर्थ देता है। हम में
पशुजन्य गुण जैसे क्रोध, घमण्ड, अहं, वासना आदि हैं। शेर, मां दुर्गा के नियन्त्रण
में है। इसलिए यदि हम अपने अन्दर पशु प्रवृत्ति पर नियन्त्रण करते हैं। यह हो सकता
है कि वह मां दुर्गा हैं जिनके नियन्त्रण में है वह। हमारे अन्दर समस्त पशुजनित गुण
व्यक्त होंगे जब तक मां दुर्गा उन पर शासन न करें। इसलिए हम देवी दुर्गा से अपने
अन्दर पशु प्रवृत्ति को नियन्त्रित करने के लिए प्रार्थना करते हैं। जब तक पशुजनित
गुणों पर नियन्त्रण नहीं होता, मानवीय गुणों का प्रकटीकरण नहीं हो सकता है। जब तक
बादल साफ न हो जायें आप सूर्य को नहीं देख सकते। इसलिए समुचित दृश्य पाने के लिए
बादलों को साफ होना है। जैसे एक शिकारी ही शेर के निकट जाने तथा उसे पकड़ने का जोखिम
उठा सकता है। हमें अपने अन्दर पशुजनित गुणों को नियन्त्रित करने के लिए, उच्च
शक्तियों की सहायता की आवश्यकता है। हमें एक अधिक महान और अधिक शक्तिशाली, दिव्य
व्यक्तित्व की, अपनी सहायता हेतु आवश्यकता है। यह हैं देवी दुर्गा। इस प्रकार
दुर्गा दो पक्षों, ऊर्जा की शक्ति और इच्छा की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस
महोत्सव में प्रत्येक दिन का कुछ आंन्तरिक महत्व है। यदि हम मात्र समारोह को समारोह
के रूप में देखते हैं, हम अज्ञानी रह जायेंगे। ईश्वर ने हमें अच्छी सोच, मन और
बुद्धि दी है। इसलिए जो कुछ भी हम करें उसे हमें सामान्य बुद्धि और चैतन्यता से
करना चाहिए। इसलिए दुर्गा अष्टमी इस ज्ञान या चैतन्यता के लिए मनाना चाहिए। हम मां
दुर्गा की पूजा, ऊर्जा-शक्ति और इच्छा-शक्ति के रूप में करें, हमें शक्तिशाली होने
की प्रार्थना करनी चाहिए। हम बौद्धिक स्तर पर शक्तिशाली होने के लिए प्रार्थना
करें। यह है सारांश और सार दुर्गा अष्टमी समारोह का, जो दशहरा महोत्सव का पहला दिन
है।
अध्याय
- 22
देवी
लक्ष्मी की विशेषतायें (महत्व)
दशहरा समारोह
का यह दूसरा दिन है, जब ईश्वर की पूजा देवी लक्ष्मी के रूप में की जाती है। समारोह
के पहले दिन ईश्वर की पूजा देवी दुर्गा के रूप में करने का अवसर होता है। जिस पर
हमने कल चर्चा की थी। आज हम लक्ष्मी के पक्ष को समझने का प्रयास करेंगे। ईश्वर के
सभी नाम एक ही दिव्यता के नाम हैं, लेकिन प्रत्येक नाम उसी ईश्वर के एक पक्ष का
प्रतिनिधित्व करता है।
ऐसा मत सोचें
कि भारत दिव्यता और आध्यात्मिकता में विभिन्नता की संस्कृति का देश है। भारत की
संस्कृतियों में विभिन्नता होते हुए भी संस्कृति में एकता है। इसी प्रकार
आध्यात्मिकता में विभिन्नता है, फिर भी विचार में एकता है। यही कारण है, इस देश में
अनेकों आक्रमणकारियों द्वारा युद्ध लड़े जाने के बावजूद आध्यात्मिकता और धर्म को
हिलाया नहीं जा सका। यह संसार की अत्यन्त पुरातन संस्कृतियों में एक है। मुस्लिमों
ने इस देश पर आक्रमण किया, वे हिन्दुत्व को पूर्णतया नष्ट नहीं कर सके। दूसरी ओर
लोगों द्वारा इस्लाम को स्वीकार कर लिया गया। इसके अतिरिक्त हिन्दुत्व और इस्लाम
मिलकर एक अन्य संस्कृति सूफियाना का जन्म भी हुआ। ब्रिटेन ने देश पर 200 वर्ष शासन
किया। इस देश के लोगों द्वारा ईसाइयत स्वीकार की गई। इतना ही नहीं, हिन्दुत्व और
इसाइयत ने मिलकर तीन अन्य धर्मों - ब्रह्म समाज, आर्य समाज और ब्रह्म विद्या को
जन्म दिया, ये नये धर्म हैं, जिनका जन्म हिन्दू तथा ईसाई धर्मों के मिलन से हुआ है।
इसलिए भाईयों तथा बहनों, नये धर्म यहां स्वीकार किये जाते हैं और साथ-साथ होने के
कारण कुछ अन्य धर्मों का जन्म हुआ। यह विविधता है, फिर भी यहां मूल आधार में एकता
है। एकता एक अन्तरधारा के रूप में प्रवाहित है, हां, यहां बाहरी विभिन्नता है। यह
जोड़ने वाली है, तोड़ने वाली नहीं। यह परस्पर मिलन का देश है, अलगाववाद जैसी किसी
वस्तु का नहीं। यह एक पूरकता का देश है, विरोधों का नहीं।
इसलिए देवी
लक्ष्मी, जिनकी हम पूजा करते हैं, एक सन्देश देती हैं। सामान्य अर्थों में लक्ष्मी
को सम्पत्ति की देवी माना जाता है। लोग केवल सम्पत्ति चाहते हैं, क्योंकि लक्ष्मी
के बिना हम कहीं के नहीं रहेंगे। इसलिए यह दिन सम्पूर्ण विश्व के लिए महत्वपूर्ण है
क्योंकि आज लक्ष्मी विश्व पर राज्य कर रही हैं। धन सम्पूर्ण विश्व में एक प्रभावी
तत्व है। चूंकि धन ने प्राथमिकता पा ली है, इसलिए अनेकों समस्यायें उत्पन्न हुई
हैं। यद्यपि लोग कहते हैं कि धन से बहुत से काम सम्भव होते हैं, किन्तु धन से बहुत
सी समस्यायें भी आती हैं। हम समझते हैं कि धन समस्त भौतिक समस्याओं का निराकरण करता
है, लेकिन दूसरी ओर वह मानसिक समस्याओं का कारण भी बनता है। इसलिए हम देवी लक्ष्मी
की कृपा चाहते हैं। देवी लक्ष्मी के पक्ष पर दृष्टि रखते हुए हम केवल सम्पत्ति का
अर्थ बैंक खातों के सम्बन्ध में चर्चा नहीं कर रहे हैं। वह प्रेम है, प्रेम की
सम्पत्ति, स्वास्थ्य की सम्पत्ति, एक अच्छे परिवार की सम्पत्ति, धन, ज्ञान की
सम्पत्ति, शान्ति और सम्मान की सम्पत्ति भी हैं। सम्पत्ति विभिन्न रूपों में व्यक्त
होती है। संगीत में आपकी प्रवीणता सम्पत्ति है। चित्रकारी में आपकी प्रवीणता
सम्पत्ति है। आपकी कवि के रूप में प्रवीणता भी सम्पत्ति है। आपकी सभी प्रवीणतायें
सम्पत्ति का एक रूप हैं। इसलिए जब हम लक्ष्मी पर विचार करें हम में यह उदार समझदारी
होनी चाहिए। हम में से अधिकतर, जब भगवान के पास आते हैं, हम साई लक्ष्मी, सम्पत्ति
की देवी को स्वास्थ्य के रूप में पाते हैं। अधिकतर लोग जो भगवान के पास आते हैं,
स्वस्थ हो जाते हैं - क्योंकि स्वास्थ्य सम्पत्ति है। यह साई लक्ष्मी है। हम अनेक
लोगों को जानते हैं जो कैंसर से पीड़ित हुए, लेकिन उनका कैंसर साईं लक्ष्मी की कृपा
से समाप्त हो गया। बहुतों की आदतें और विशिष्टतायें स्वामी के पास आने से परिवर्तित
हो गईं। यह सम्पत्ति साई लक्ष्मी है। जब घर में शान्ति नहीं है और माता-पिता तथा
बच्चों में या पति-पत्नी में मत वैभिन्न है, यहां स्वामी के पास आने के बाद शान्ति
हो जाती है। शान्ति, सम्पत्ति है, जो साई लक्ष्मी है। एकता सम्पत्ति है, जो साई
लक्ष्मी है।
भगवान के
सानिध्य में बिल्लियां और चूहे भी शान्ति और आनन्द में पूर्ण समन्वय सहित रहते हैं।
शेर और चूहा साथ रहता है। आग और पानी साथ-साथ रहते हैं। यह एकता की सम्पत्ति है, जो
साई लक्ष्मी हैं। प्रत्येक व्यक्ति के साथ बाबा द्वारा समान व्यवहार होता है। भगवान
अनन्त हैं। आप में से अधिकतर लोगों ने प्रशान्ति निलयम का भ्रमण किया हो सकता है।
भगवान के मंदिर में, साक्षात्कार का कमरा तथा एक छोटा सा अन्दर का कमरा है। वहां से
ऊपर भगवान के कमरे के लिए संकरा जीना है। त्योहार की अवधि में कपड़ों के बण्डल और
कमीजें तथा पुरुषों के कपड़े आदि आते हैं। वहां इन सबके भण्डारण के लिए स्थान कहां
है? यह भगवान का लक्ष्मी रूप है, जो अनन्त है और अन्तहीन है क्योंकि इसका आदि नहीं
है। जो बिना आदि और अन्त के है, दिव्यता है।
बहुत दिन हुए
बाबा ने 120 लड़कों का यज्ञोपवीत संस्कार किया। माता-पिता भी दावत में आमन्त्रित थे,
इनके अतिरिक्त किसी को सम्मिलित होने की स्वीकृति नहीं थी। मुझे तक वहां से जाने के
लिए कहा गया। संस्कार के उपरान्त, प्रत्येक लड़के के माता और पिता को रुकने के लिए
कहा गया। वे सब 500 थे। सभी भोजन हेतु आमन्त्रित थे। बाबा की दावत शाही स्तर की
होती है जिसे राजाओं के राजा भी देने में सक्षम नहीं हैं। मैंने दो हजार लोगों को
निकलते देखा। मैं उनमें से एक से बात कर रहा था जिन्होंने भाग लिया था। बाबा ने उस
व्यक्ति को बताया कि भोजन पांच सौ के लिए तैयार किया गया था, लेकिन दो हजार लोगों
ने भोजन लिया। विशिष्ट भोज्य वस्तुएं भी बनायीं गईं थी। इस प्रकार बाबा सम्पत्ति की
देवी हैं - साई लक्ष्मी, अविनाशी, अनन्त तथा अक्षय हैं। भगवान सम्पूर्ण स्वास्थ्य,
स्वयं साई लक्ष्मी हैं। यदि स्वास्थ्य सम्पत्ति है, तो यह बाबा हैं। जिन्होंने
उन्हें बीस या तीस वर्ष पूर्व देखा था, कहते हैं कि वह आज भी पहले जैसे
हैं। हम उस तरह के नहीं रहे क्योंकि इतनी अधिक आयु हो गई और पहले जैसे नहीं रह गये।
हम इस प्रकार के नहीं है, आयु बढ़ने के साथ हमारी शक्लें बदल गईं। हमारी सभी
इन्द्रियां शिथिल हो रहीं हैं। दूसरी ओर बाबा दूरी पर एक चींटी को भी देख सकते हैं।
यदि वह नहीं देखना चाहते हैं, तो वह एक पर्वत की भी उपेक्षा कर सकते
हैं। उनके कान इतने शक्तिशाली हैं कि वह सूक्ष्मतर फुसफुसाहट सुन
सकते हैं। वह लोगों को दण्ड देंगे, यदि उनका आचरण अच्छा नहीं है। लेकिन उनका
रक्तचाप वही रहता है और यदि वह नहीं सुनना चाहते, वह आपकी पूर्णतया
उपेक्षा कर देंगे। यहां तक वे अपने कान अपने बालों से ढक लेंगे। इसलिए श्रव्यता
केवल सामान्य नहीं, वरन सर्वोच्च है। उनका नाम और प्रसिद्धि कल्पनातीत है। उनकी
प्रतिष्ठा अपरिमेय है। उनकी प्रतिष्ठा और मर्यादा आज तक कायम है, ऐतिहासिक
है यद्यपि वह एक छोटे से निरक्षर गांव से आये हैं, एक गांव जो अत्यन्त गरीब
लोगों का गांव है। एक अत्यन्त दूरस्थ गांव है, फिर भी आज उसका स्थान विश्व मानचित्र
पर है। वह अकेले हैं जिन्हें किसी आदमी की सहायता नहीं प्राप्त थी। प्रत्येक
व्यक्ति ने उनका विरोध किया, पिता द्वारा प्रश्न किया गया था, भाई द्वारा सन्देह
किया गया और गांव में प्रत्येक व्यक्ति द्वारा सताया गया। फिर भी उनका कद ऊंचे से
ऊंचा होता गया। प्रत्येक समस्या, प्रत्येक अत्याचार जो उन पर हुआ एक चुनौती हो गई
और उनकी प्रसिद्धि के लिए एक और मील का पत्थर सिद्ध हुआ।
जब उन्हें
विष दिया गया, उन पर असर नहीं हुआ। हजारों अन्य भक्त हो गये। जब वह घर जहां
वे रहते थे जला दिया गया, वह नहीं जले बल्कि लोगों के समस्त पाप जल गये।
यद्यपि उनके पिता ने प्रश्न किया, भाई ने सन्देह व्यक्त किया और उनकी मां को भी
सन्देह था, अन्तत: वे सभी उनके भक्त हो गये। इस प्रकार उन्होंने अपनी प्रसिद्धि,
स्वयं अपनी शक्ति से, बगैर किसी की सहायता के प्राप्त की। उन्होंने विरोधों
तथा अपने उद्देश्य पर प्रश्न चिन्ह की चुनौती का सामना किया और वह अविवादित
हो गये। उन्होंने ईर्षा और द्वेष की चुनौती का सामना किया, क्योंकि वह
स्वयं एकता है। उन्होंने शत्रुता का सामना किया क्योंकि वे स्वयं ही इकाई हैं।
उन्होंने ईर्षा और द्वेष का सामना किया क्योंकि वे स्वयं विनय तथा
दिव्यता हैं - क्योंकि वह साई लक्ष्मी हैं। इस प्रकार लक्ष्मी, साई में और
साई, लक्ष्मी में हैं। हम भक्तगण जो उनकी आराधना साई के रूप में करते हैं -
स्वस्थ, सम्पन्न तथा बुद्धिमान हो जायेंगे। साई लक्ष्मी आप सब पर आपकी इच्छानुरूप
आशीर्वादों की वर्षा करें।
प्रेम सहित
कर्तव्य अपेक्षित है,
प्रेम बिना
कर्तव्य दिव्य है।
मैं अपने
पुत्र को प्यार करता हूं क्योंकि वह मेरा कर्तव्य है। लेकिन बाबा आपको और मुझे
प्रेम करते हैं जबकि यह उनका कर्तव्य नहीं है। इसलिए कर्तव्य रहित प्रेम दिव्य है
और यही बाबा का प्रेम है। बाबा कहते हैं "नि:स्वार्थता प्रेम है।" स्व क्या है?
प्रेम का न होना स्व है? "प्रेम, देना और क्षमा करना है, स्व, पाना और भूल जाना
है।" - बाबा ने कहा।
एक बार आप इन
सब प्रकार के प्रेम को संयुक्त कर ईश्वर की ओर मोड़ दें, प्रेम दिव्य हो जायेगा। एक
बार जब वह वहां हो जाता है फिर आप विश्वस्त हो जायेंगे और आपका जीवन सार्थक हो
जायेगा। भगवान ने सांसारिक प्रेम का एक उदाहरण दिया। एक नवविवाहित दम्पत्ति सायंकाल
टहलने जा रहे थे। पति ने एक कांटा देखा और चीख पड़ा "ओ प्रिये, ध्यान देना, वहां
कांटा है।" वह इतना संवेदनशील था कि कांटा उसकी पत्नी के चरण कमलों में चुभ सकता है
और उसे अत्यधिक पीड़ा सहन करनी होगी। दुल्हन, उसकी अत्यन्त चिन्ता से बहुत प्रसन्न
थी। छ: माह गुजर गये और दोनों सड़क पर टहल रहे थे। फिर एक कांटा वहां था। इस बार
उसने कहा "देखकर चलो, ध्यान रखो। कांटें हैं, ध्यान से पैर रखो।" पत्नी ने ध्यान
दिया कि 50 प्रतिशत प्रेम चला गया। एक वर्ष उपरान्त सायंकालीन टहलने के लिए अपने
नवजात शिशु को लेकर बाग में जा रहे थे। फिर वहां कांटा था, वह चीखा "क्या हुआ
तुम्हारी आंखों को? क्या तुम ठीक से देख नहीं सकतीं? हमारा धन केवल चिकित्सकीय
बिलों पर व्यर्थ नहीं होना है।" पत्नी समझ गई कि शत प्रतिशत प्रेम एक वर्ष के
अन्तराल में समाप्त हो गया।
बाबा ने एक
अन्य उदाहरण दिया -
एक समय एक
गृहस्थ गुरुकुल में भाग लिया करता था। जब अध्यापक अच्छे मनोभाव में होते थे, वह
नहीं जान पाते थे कि वह कितनी देर तक बोलते रहे थे। उस दिन अध्यापक पूरे एक घण्टे
तक बोले। वह आदमी हाथ जोड़कर उठा और प्रार्थना की कि जाने का समय हो गया है। अध्यापक
ने कहा कि वह चुप होकर बैठ जाय। लेकिन उस आदमी ने यह कहते हुये आग्रह किया कि
अध्यापक कुंआरे होने के कारण एक पत्नी की प्रतीक्षा का अर्थ नहीं जानते। चूंकि
अध्यापक ने बालपन में घर छोड़ दिया था, वह मां के प्रेम का अर्थ तक कभी नहीं जान
पाये। ये वे तर्क थे जो उस आदमी द्वारा रखे गये। अध्यापक ने उत्तर दिया - "क्या तुम
सोचते हो कि वह वास्तविक प्रेम है? कोई भी वास्तव में प्रेम नहीं करता, कोई नहीं,
सिवाय आत्मा के।"
आदमी ने कहा
"यह सब दार्शनिक बातें हैं।" कृपया जाने की आज्ञा दें" अध्यापक ने जोर देकर कहा -
"आज मैं दिखाऊंगा कि मां का प्रेम और पत्नी का प्रेम क्या है। मैं तुम्हारे घर भी
चलूंगा। मैं तुम्हें मन्त्र युक्त एक गिलास पानी दूंगा। तुम पानी पीते ही, अचेत हो
जाओगे, तथापि तुम अपने चारों ओर की हर बात सुनने में सक्षम होगे। प्रत्येक व्यक्ति
के लिए तुम मर चुके लगोगे, लेकिन वह एक नाटक होगा।"
अध्यापक और
विद्यार्थी घर आये। अध्यापक ने एक गिलास मन्त्र युक्त पानी आदमी को दिया। तुरन्त ही
वह अचेत हो गया जैसे कि मृत हो गया। पत्नी ने उसके वियोग में चीखना और रोना शुरू कर
दिया। हर कोई दु:खी था। मां भी विलाप करने लगी क्योंकि वह उसका अकेला लड़का था। उसने
कहा "ईश्वर को इसके स्थान पर उसका जीवन लेना चाहिए था।"
गुरू ने कहा -
"चिन्ता मत करो, एक गिलास पानी लाओ। मैं उसे अभिमन्त्रित कर दूंगा। जो भी इस पानी
को पियेगा, मर जायेगा और यह मृत व्यक्ति जीवित हो जायेगा।" गुरू ने मां से कहा "आप
वृद्ध भी हैं और आपका हृदय अस्वस्थ है, आपकी किडनी तक कमजोर हैं। इसलिए, चूंकि आपका
पुत्र युवा है और उसके सामने लम्बा जीवन है, यह पानी पी लो और मर जाओ, और अपने
पुत्र को सानन्द रहने दो" मां ने उत्तर दिया "मुझे खेद है, मैं अभी अपनी सबसे छोटी
बेटी की शादी देखना चाहती हूं। मैं अपने पोते, पोतियां देखना चाहती हूं, यह मेरी एक
मात्र सन्तान नहीं है, मेरी तीन पुत्रियां भी हैं" अब अध्यापक ने पत्नी को बुलाया।
उससे कहा - "तुम अपने पति की मृत्यु के कारण रो रही थीं, तुम कहती हो कि तुम उसके
बिना एक क्षण भी नहीं रह सकतीं। तुम यह पानी पी लो और मर जाओ और तुम्हारा पति जीवित
हो जाय।" युवा स्त्री ने उत्तर दिया "मुझे खेद है, मैं मरने के लिए अभी अल्प आयु
हूं। मैं उनका अनुसरण स्वर्ग या नर्क में नहीं कर सकती। मैं अभी जीवन का उपभोग करना
चाहती हूं।" एकाएक यह आदमी जो फर्श पर अचेत पड़ा था, उठ खड़ा हुआ। उसने अपनी मां और
पत्नी से कहा - "आपको धन्यवाद" और सदा के लिए घर छोड़कर चला गया। उसने पूर्ण
अनासक्ति विकसित कर ली थी। सांसारिक प्रेम अस्थायी है और उसमें गिरावट होना निश्चित
है। इसलिए हमको वह प्रेम उत्पन्न करना चाहिए जो स्थायी है, ताकि हम सदा, सब समय
ईश्वर के संग रह सकें।
बाबा ने एक
अन्य उदाहरण दिया। कंस, कृष्ण का मामा था। जब कृष्ण के माता-पिता का विवाह हुआ, कंस
स्वयं उनको रथ में बैठाकर ले जा रहा था। कृष्ण की मां कंस की बहन देवकी थी। कंस
अत्यधिक प्रसन्न था। एकाएक कंस ने आकाशवाणी सुनी "हे कंस, देवकी से जन्म लेने वाला
आठवां पुत्र तुम्हारा काल होगा।" तुरन्त ही कंस का बहन के प्रति सम्पूर्ण प्रेम
विलुप्त हो गया और उसने उसे मार डालने का प्रयास किया। अत: क्या है प्रेम? वही
प्रेम घृणा में परिवर्तित हो गया। अत: हम वास्तविक प्रेम क्या है, समझें। प्रेम का
कोई कारण नहीं होता और न मौसम। वह स्थायी है। भगवान बाबा प्रेम हैं। प्रेम बाबा है।
उनका सर्वशक्तिशाली शस्त्र प्रेम है। उनकी सम्पत्ति प्रेम है। यह एक
मात्र उनका प्रेम है जो सम्पूर्ण विश्व से लोगों को खींच लाता है। एक बार
कौड़ाई कोनाल में अनेकों विदेशी उनके आश्रम साई स्मृति में आये। प्रतिदिन वर्षा हो
रही थी। उन्होंने मुझे बुलाया और यह घोषणा करने के लिए कहा कि भारी वर्षा होने के
कारण कल से कोई भजन नहीं होगा। कुछ देर बाद स्वामी ऊपर चले गये। सभी भक्त निराश हो
गये और हताशा में रोने लगे। अगले दिन बाबा ने कहा, भजन शुरू किये जायें, क्योंकि
भक्तगण वर्षा में अपने बच्चों सहित आये हैं। क्या यह प्रेम और चिन्ता नहीं है? एक
बार स्वामी ने अपनी कार मैसूर में रोक दी। अनेकों विदेशी वहां थे। सभी लड़कों और
कर्मचारियों को नाश्ता परोसा गया। उन्होंने कुछ लोगों को बुलाया और उनसे
विदेशियों को भी भोजन परोसने के लिए कहा। क्या यह प्रेम नहीं है?
वह
प्रतिदिन चाकलेट और पिपरमिंट दिया करते थे। मैं उन्हें अपने सूटकेस में रखा करता
था। एक दिन जब सब उपस्थित थे, उन्होंने कहा - "यहां सब लोगों में एक जन
चाकलेट नहीं खा रहे हैं। आओ, सभी सूटकेसों की तलाशी लो।"
मैंने तुरन्त
कहा - "स्वामी, नहीं! केवल मैं नहीं खा रहा हूं।"
स्वामी ने कहा
- तुम क्यों नहीं खा रहे हो?
मैंने कहा -
"स्वामी, घर में मेरे बच्चे हैं। यदि मैं आपकी प्रेम स्वरूप ये भेंट ले जाऊंगा, तो
वे अति प्रसन्न होंगे।" एक दिन स्वामी ने अपनी लाल मर्सडीज में मुझे साथ ले लिया,
उन्होंने कहा - "अनिल कुमार, क्या तुम यह कार खरीदोगे?"
मैंने उत्तर
दिया - "असम्भव"।
स्वामी ने
मेरी हंसी उड़ाते हुए कहा - "क्या शर्म की बात है! क्या तुम नहीं कह सकते, स्वामी
आपकी कृपा से मैं खरीद सकता हूं? क्या तुम नहीं कह सकते, स्वामी जब आप मेरे साथ
हैं, तब क्यों नहीं? तुम पर लानत है।" उन्होंने मुझसे कार सहित उनके साथ फोटो हेतु
खड़े होने के लिए कहा और फोटो लिया गया। तब बाबा ने कहा - "तुम एक मालिक के समान
नहीं खड़े हो, एक ड्राइवर की तरह खड़े हो।"
मैं मात्र एक
सामान्य प्रवक्ता हूं। मेरे पास न कोई सम्पत्ति है और न पद। मेरा कोई प्रभाव भी
नहीं है। यह सब क्या है, यदि प्रेम नहीं है?
एक दिन
उन्होंने मुझे बुलाया और मेरा चश्मा ले लिया। मैं अचम्भे में था। तब स्वामी ने
स्वयं चश्मा लगा लिया और मुझसे, मेरा चश्मा लगाये हुए उनका फोटो लेने के लिए कहा।
मैं अभी भी वह विश्वास नहीं कर पाता हूं। इसलिए जब मैं उस घटना पर विश्वास करना
चाहता हूं, मैं अपना एलबम खोलता हूं और देखता हूं कि वह सत्य है क्योंकि उसमें
स्वामी का चित्र मेरा धूप का चश्मा लगाये हुए है। एक बार कोड़ाईकनाल में हम लोग
स्वामी के साथ शानदार भोजन ले रहे थे, मैं देख रहा था कि कौन सी वस्तु गरम है या
नहीं, क्योंकि मैं गरम वस्तुयें खाने का बहुत शौकीन हूं। शेष विद्यार्थियों ने,
उत्तर भारतीय होने के कारण गरम भोजन नहीं पसन्द किया। इसलिए मैं प्रतीक्षा कर रहा
था।
एकाएक स्वामी
ने मुझे देखा और मेरे पास आये, अरे तुम केवल गरम भोज्य पदार्थ ही क्यों खाते हो?"
मैंने उत्तर
दिया, "मैं उसका अभ्यस्त हूं, स्वामी!"
बाबा ने कहा -
"मैं जानता हूं, इसीलिए मैं तुम्हारे लिए अचार लाया हूं।"
वह
अन्दर गये और अचार की एक बोतल ले आये तथा अपने दिव्य हाथों से मुझे परोसा
एवं कहा, "तुम्हारे अतिरिक्त यहां कोई अन्य अचार नहीं खाता, मैं यह अचार विशेषकर
तुम्हारे लिए लाया हूं। फिर भी साथ देने के लिए मैं भी तुम्हारे साथ खा लूंगा। तुम
गरम खाना क्यों खाते हो? तुम्हारा रंग काला हो जायेगा। चिन्ता मत करो, आज तुम खा
सकते हो" मैं किस प्रकार उनके प्रेम को माप सकता हूं?
एक दिन स्वामी
ने लड़कों को फिलीपीनी कमीजें दीं। वे बहुत सुन्दर थीं और मैं उन्हें देख रहा था।
एकाएक स्वामी ने मुझे भी बुलाया और मुझे एक पकड़ा दी, मैं अत्यन्त प्रसन्न था, मैंने
तुरन्त उसे खोला और स्वयं उनकी उपस्थिति में पहनने लगा। स्वामी ने मुझे डांटा और
कहा कि मुझे कमीज कमरे में बदलना चाहिए, सार्वजनिक रूप से नहीं। मैं नयी कमीज पहन
कर वापस आया। स्वामी ने कहा "तुम इस प्रकार व उस प्रकार चलो।" मैं अपना सीना फुलाये
इधर से उधर चला और भगवान मुझे देख अत्यन्त प्रसन्न थे। उन्होंने कहा "आह! यह तो
अत्यन्त प्रसन्न है और अच्छा दिख रहे हैं। आओ एक फोटो लिया जाये।"
यह सब अनेकों
आने वाले जन्मों तक याद रखने योग्य है। एक दिन कोड़ाईकनाल में, वह प्रत्येक को 50/-
रुपए का नोट दे रहे थे। उन्होंने सभी लड़कों को 50/- रु0 दिये और घुड़सवारी करने जाने
के लिए कहा। उन्होंने मेरी ओर भी देखा और मुझे एक नोट दिया। मैंने कहा - "स्वामी,
मैं नहीं जाना चाहता, मैं डरता हूं।" उन्होंने कहा नहीं, नही, तुम्हें अवश्य जाना
है। तुम फोटो भी ले सकते हो ताकि तुम अपनी पत्नी को दिखा सको। साई का हास्य तथा
विनोद अति मधुर है। आप सागर की गहराई नाप सकते हो या आकाश का विस्तार, लेकिन साई का
प्यार नहीं माप सकते। भगवान किस प्रकार हमें प्रेम करते हैं, यदि हम उनकी
शिक्षाओं का अनुसरण करते हैं, किस प्रकार वह हममें से प्रत्येक को याद रखते
हैं। कितना परिवर्तन हमारे जीवन में आता है, हमारे लिए यह सब कितना लाभप्रद है,
इसका वर्णन नहीं हो सकता।
जब हम हवाई
जहाज में यात्रा करते हैं, समस्त सामान रैक पर रख जाता है और हवाई जहाज सारा भार ले
जाता है, हम साई के हवाई जहाज पर बैठे हुए हैं। यदि कोई व्यक्ति हवाई जहाज से जाता
है, उसे वीजा और पासपोर्ट की आवश्यकता होती है। यहां वीज़ा है अनुशासन और विश्वास
पासपोर्ट है। भक्ति, अनुशासन और विश्वास पासपोर्ट, टिकट तथा वीज़ा है जिनकी हमें
साई के हवाई जहाज में बैठने, साई को पायलट रूप में पाने, एवं सुरक्षित पहुंचने के
लिए आवश्यकता है। बगैर साई के, हवाई जहाज दुर्घटना ग्रस्त या अपहरित हो सकता है।
हमारा जीवन साई के साथ सुविधाजनक है। हमारा जीवन साई में प्रसन्न है। हमें साई के
लिए जीना है, इसका अर्थ है मानवता की सेवा। जब हम हर व्यक्ति की सेवा कर रहे
हैं, इसका अर्थ है हम साई के लिए जी रहे हैं। अपने को भूलकर, पूर्ण समर्पण, उनके
नाम का निरन्तर जप साई में रहना है। ये तीन पग हैं। प्रथम सेवा के क्षेत्र में साई
के लिए हम जियें। तब हम उनके साथ रहते हुए उनके निकट होंगे। भक्ति पथ का अनुसरण
करते हुए, हम साई में रह रहे होंगे।
अध्याय-23
जीवन एक चुनौती है
जीवन एक चुनौती है,
सामना करो,
जीवन एक खेल है, उसे
खेलो,
जीवन प्रेम है, उसके
भागीदार बनो,
जीवन स्वप्न है -
अनुभूति करो।
जीवन अत्यधिक
जटिल है। कोई उसे अत्यन्त आसानी से ले सकता है, फिर भी जीवन कठिन है। किसी को ऐसा
लग सकता है, जैसे उसको कोई समस्या नहीं फिर भी जीवन समस्यापूर्ण है। जीवन-निर्वाह
सरल नहीं है। इस पर अनुसंधान, परीक्षण, चिन्तन, वार्ता होना चाहिये तथा उसे परस्पर
बांटना आवश्यक है। इस नव वर्ष 1995 में भगवान ने चार वक्तव्य जीवन पर दिये हैं। हम
अपने जीवन में एक खोज करना प्रारम्भ करते हैं। दुर्भाग्यवश हम प्रत्येक अन्य
व्यक्ति का जीवन जानते हैं, लेकिन अपना नहीं। हमें अपने जीवन में गहराई से जाना
चाहिए।
भगवान के
अनुसार "जीवन समाचार पत्र है" आप आज का समाचार पत्र पढ़ते हैं। कल आप कल का समाचार
पत्र पढ़ेंगे। आप निश्चित रूप से आज का समाचार पत्र कल नहीं पढ़ेंगे। आज का समाचार
पत्र कल का व्यर्थ कागज है। इसी प्रकार यह जीवन भी एक समाचार पत्र है, जिसे दुबारा
नहीं पढ़ना है। उसे विराम तक पढ़ना चाहिए कॉमा या सेमीकोलन तक नहीं। लेकिन यह तभी
सम्भव है यदि हम जानते हैं, क्या है जीवन? उसकी देखभाल कैसे करनी है? हमें देखना
चाहिए कि वह बार-बार रिकरिंग डिपाजिट के समान न बने। हम कैसे करें कि हमें कष्ट,
दु:ख या परेशानियां ब्याज के रूप में न देना पड़े। हमें जीवन को पूर्णता के साथ
समझना है। भगवान ने कहा, "जीवन एक चुनौती है - उसका सामना करो" हममें से
कितने हैं जो जीवन को एक चुनौती मानते हैं? एक बार यदि हम जान लें कि वह एक चुनौती
है, तब हम इन चुनौतियों से भागेंगे नहीं। हम में से बहुत लोग प्रार्थना करेंगे कि
चुनौतियां न आयें, हम में से बहुत लोग चिन्तित या परेशान न होंगे, क्योंकि हमने
नहीं समझा है कि जीवन एक चुनौती है। हम जीवन को चुनौती मानने के लिए तैयार नहीं
हैं। हम जीवन को एक पिकनिक की भांति मान रहे हैं। हम उसे पॉप संगीत जैसी व्यर्थ की
वस्तुओं में नष्ट कर रहे हैं। हम इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं।
हम में हीन भावना है कि हम चुनौती का सामना कर सकते हैं या नहीं कर सकते। हम
सन्देही हैं और उसका सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं, लेकिन फिर भी, जो होना है,
होता है, जीवन एक चुनौती है। हम इस वक्तव्य को चुनौती नहीं दे सकते। प्रत्येक के
जीवन में उतार चढ़ाव आते हैं।
भगवान ने कहा
कि जीवन में सदा सुख या सदा दु:ख नहीं है। "सुख, दो दु:खों के बीच मध्यान्तर है"
हम किस प्रकार एक सुख से दूसरे सुख पर दु:ख की उपेक्षा कर कूद कर पहुंच सकते हैं?
चाहे हम तैयार हों या नहीं, हमें स्वीकार करना चाहिए कि जीवन एक चुनौती है। जीवन के
हर क्षेत्र में चुनौतियां हैं, वह चाहे कोई व्यवसाय, शिक्षा, व्यापार, विज्ञान या
प्रौद्योगिकी हो। कृषि तथा उद्यान विज्ञान के क्षेत्र में अत्यधिक प्रतियोगिता है।
यदि एक देश बड़े आकार का केला उत्पन्न करता है, दूसरा उससे बड़ा उत्पन्न करना चाहता
है। अन्तत: दोनों ही स्वादहीन हो जाते हैं। चीनी उद्योग को लें, वे बांस से भी
शक्कर बनाने का प्रयास करते हैं, दुर्भाग्यवश आप पाते हैं कि वह न तो गन्ना है और न
बांस। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र, व्यवसाय, राजनीति, कृषि आदि में चुनौतियां
हैं। इसलिए क्यों नहीं अध्यात्मिक क्षेत्र में? क्यों नहीं धार्मिक क्षेत्र में? हम
तुरन्त स्वर्ग चाहते हैं। हम सीधे स्वर्ग पहुंचने के लिए एक सुसंगति चाहते हैं। हम
सब कुछ तुरन्त और तत्काल भोजन के समान चाहते हैं, लेकिन वह ऐसा है नहीं।
भगवान ने कहा
कि शिक्षित होने में वर्षों लग जाते हैं। आप कुछ वर्ष प्राईमरी स्कूल में, फिर
सेकेण्डरी, कुछ और इसके पूर्व आप अन्त में कालेज में प्रवेश पाते हैं। अध्यात्मिक
क्षेत्र में भी ऐसा ही है। भगवान आपकी उपेक्षा कर सकते हैं या आपको साक्षात्कार
नहीं दे सकते हैं। आपको, उनके सभी परीक्षणों के बावजूद निराश नहीं होना चाहिए। आपको
चुनौती स्वीकार करने हेतु तैयार होना चाहिए, भले ही वे आप से बात करें या नहीं, भले
ही वे आपको मुस्कुराहट दें या न दें, भले ही वे आपको पहचानते हैं या नहीं। आपको
उनका भक्त बने रहना चाहिए तथा तमाम निराशाओं के बावजूद, जिसे वे आपके लिए चुनते
हैं, निरन्तर प्रार्थना करते रहें। तेलगू में मैंने एक कविता की रचना की थी।
चाहे
स्वामी देखते हैं आपकी ओर या नहीं,